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आपदा विशेष
 
चट्टियों को जिंदा करने की जरूरत

केदारनाथ मंदिर अपने प्राचीन स्वरूप में यथावत है। उसके जीर्णोद्धार के बजाय उन चट्टियों को पुनर्जीवित किए जाने की अहम जरूरत है जिन पर उत्तराखण्ड का परंपरागत तीर्थाटन टिका हुआ था और जो तीर्थ यात्रियों को बाजार में लुटने से बचाती थी

 

उत्तराखण्ड के पुराने लोग पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से काफी सुलझे हुए थे। वे जानते थे कि तीर्थ स्थलों पर बढ़ती भीड़ ग्लेशियरों को नुकसान पहुंचा सकती है। इसीलिए उन्होंने छह माह की यात्रा का विधान रखा। इतना ही नहीं प्रकूति से छेड़छाड़ के खतरों से वाकिफ उन लोगों ने तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए पक्के निर्माण नहीं किए बल्कि इसके लिए वे यात्रा मार्गों पर चट्टियां लगाया करते थे। चट्टियों में ठहरने वाले श्रद्धालु उन्हें अपनी श्रद्धानुसार पैसा देते थे। जिस किसी श्रद्धालु के पास पैसा नहीं होता था उसे भी चिंता करने की जरूरत नहीं थी। कितनी अच्छी बात थी कि चट्टियों से जहां एक तरफ स्थानीय लोगों को आय होती थी वहीं दूसरी तरफ श्रद्धालुओं की जेब भी नहीं कटती थी। इसके अलावा श्रद्धालु यात्रा मार्ग पर पड़ने वाले तमाम छोटे-मोटे देव मंदिरों के दर्शन भी करते थे। इन देव मंदिरों के पुजारियों और पंडों को भी उनसे आय हो जाती थी। चट्टियां लगाने वाले लोग और पंडे-पुजारी तीर्थ यात्रियों से उनके क्षेत्र की संस्कूति का ज्ञान अर्जित करते थे और उन्हें अपने क्षेत्र की संस्कूति से अवगत कराते थे। इस तरह तब यात्राएं भावनात्मक और सांस्कृतिक लगाव को बढ़ाने के साथ ही शिक्षा का साधन भी होती थीं। तीर्थाटन की यह परंपरा तब कूषि और पशुपालन आधारित स्थानीय लोगों की अर्थव्यवस्था का हिस्सा थी और वे पहाड़ से पलायन की नहीं सोचते थे। 

 

उत्तराखण्ड के पुराने लोग बताते हैं कि सन् १९५० तक केदारनाथ में मंदिर के सिवाय कोई पक्का निर्माण नहीं था। लेकिन बाद के वर्षों में सरकार ने पर्यटन और तीर्थाटन का ऐसा द्घालमेल किया कि व्यावसायिकता की अंधी दौड़ में तीर्थ स्थल पिकनिक स्पॉट बनने लगे। वर्षों से श्रद्धालुओं की मदद करती रहीं चट्टियां और बाबा काली कमली जैसी एकाध पुरानी धर्मशालाएं हाशिये पर चली गईं। इनकी जगह अस्तित्व में आई हाइटेक बाबाओं की हाइटेक धर्मशालाओंरिसॉर्टों और होटलों ने ले ली। पहले बाजार और फिर विश्व बाजार व्यवस्था ने यहां पैर जमा लिये। देश-विदेश के लोग यहां व्यवसाय चलाने लगे। सैर-सपाटे पर आए पर्यटकों ने उनके व्यवसाय में दिन-दुगुनी और रात चौगुनी बढ़ोतरी की। चट्टियों को किनारे लगाने के लिए एक साजिश के तहत शुरू-शुरू में तीर्थ यात्रियों को जायज कीमतों पर कमरे और भोजन दिया गया। लेकिन ज्यों ही चट्टियां रास्ते से हटीं तो उन्होंने खुलेआम लूट-खसोट मचानी शुरू कर दी। विश्व बाजार की इसी व्यवस्था का दुष्परिणाम है कि आज जबकि पूरा देश प्राकूतिक आपदा से दुखी है वहीं तीर्थयात्रियों से लूटपाट की खबरें जख्म पर नमक छिड़कने का काम कर रही हैं। केदारनाथ का मंदिर का खजाना लूटना तो दूर रहा लाशों से गहने निकालने की द्घृणित खबरें तक सामने आ रही हैं। लेकिन दुर्भाग्य है कि कुछ मीडिया चैनलों को दोष लूट-खसोट पर टिकी इस विश्व बाजार व्यवस्था में नहीं बल्कि सिर्फ उत्तराखण्ड के उन स्थानीय लोगों में नजर आ रहा है जो सदियों से तीर्थ यात्रियों से भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से जुड़े हैं और आज खुद ही आपदा मारे है। 

 

तीर्थयात्री हैरान हैं कि राज्य सरकार के पास आपदा प्रबंधन के उपाय नहीं हैं तो कम से कम वह लूट-खसोट पर तो अंकुश लगा ही सकती है। लेकिन उन्हें क्या मालूम कि विश्व बाजार का चरित्र ही लूटपाट का है और सरकार उसके सम्मुख असहाय है फिर राज्य में आपदा प्रबंधन मंत्रालय सरकारी धन को ठिकाने लगाने का जरिया बनकर रह गया है। जिस राज्य के राजनेता एवं नौकरशाह खुलेआम माफिया से मिलकर सरकारी जमीनें हड़प रहे हों वहां भला लूट-खसोट पर कैसे अंकुश लग पाएगा? जब केदारनाथ और अन्य जगहों पर लूट मची थी तब राज्य की पुलिस कहां थी? आपदा के ३६ घंटे बाद भी पुलिस के आधुनिक वायरलेस सेट आपदाग्रस्त क्षेत्रों तक क्यों नहीं पहुंच पाए? क्या वे उपकरण सिर्फ कागजों पर खरीदे गए? सेना का शुक्र है कि उसने लोगों की जिंदगियां बचाईं। 

 

भविष्य में राज्य में तीर्थाटन को बचाए रखना है तो जड़ों की ओर लौटना होगा। केदारनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के नाम पर वहां फिर बाजार को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। जीर्णोद्धार मंदिर का नहीं बल्कि चट्टियों का हो। दुनिया देख रही है कि मंदिर अपने प्राचीन स्वरूप में यथावत खड़ा है। इससे छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए। यात्रा के दौरान यदि किसी को वहां ठहरना ही है तो इसके लिए चट्टियों को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए। वह चाहे कितना ही बड़ा आदमी क्यों न हो चट्टी में ही ठहरे। पहाड़ पर तीर्थाटन पर्यावरण और राष्ट्र के हित में यही बेहतर होगा। 

दाताराम चमोली

टिहरी बांध से खतरा

कुछ लोग कह रहे हैं कि बांध बन गया है कुछ का कहना है कि सैकड़ों गांवों के लगभग ६००० परिवार उजड़ गए हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि विकास का आधुनिक मंदिर मिलंगना और भागीरथी के संगम पर बन गया है कुछ का कहना है कि सैकड़ों मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा श्रीदेव सुमन चौक ऐतिहासिक घंटा घर सहित एक सांस्कूतिक विरासत इस आधुनिक विकास की बलि बेदी पर चढ़ गई है। सच्चाई चाहे कुछ भी हो पर इतिहास में पहली बार गंगा नदी हरिद्वार नहीं पहुंच पाई।

५ दिसंबर २००१ देर रात को टिहरी में एशिया के सबसे बड़े और विश्व में पांचवे नंबर के बांध टिहरी बांध की डाइवर्जनटनल टी-३ और टी-४ की सुरंगों के फाटक गिरा दिए गए और भागीरथी के प्रवाह को रोक दिया। भागीरथी उल्टी बहने लगी छह दिसंबर (भारतीय जनता पार्टी विश्व हिन्दु परिषद और हिन्दुओं के तथाकथित शौर्य दिवस) को जब सूर्य प्रकट हुआ तो श्रद्धालुओं को देवप्रयाग ऋषिकेश और हरिद्वार में गंगा के दर्शन नहीं हुए। इतिहास में पहली बार करीब ७२ घंटे भागीरथी टिहरी में रुकी रही।

 

बांध के कारण उजड़ने वाले इन गांवों के करीब नौ हजार परिवारों में मात्र पांच हजार के कुछ अधिक पूर्ण विस्थापितों की श्रेणी में आते हैं। आंशिक प्रभावित परिवारों की संख्या चार हजार से अधिक है। पीयूसीएल की रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से आधों का भी अभी तक पुनर्वास नहीं हो पाया है अभी तक सिर्फ २१४ परिवारों को ही पैसा मिल पाया है। टिहरी नगर सहित पूर्ण विस्थापित परिवारों की संख्या मार्च २००९ में १०३०३ दर्शाई गई है इनमें से पांच हजार से अधिक परिवारों के पुनर्वास का दावा किया गया है किंतु सच्चाई यह है कि इन पांच हजार में वास्तविक लोगों की संख्या मात्र १७५० है बाकी में दो हजार सरकारी-अर्द्धसरकारी कर्मचारी है। आंकड़ों को सुंदर बनाने के लिए इसमें भू-भवन स्वामी नजूल व वेनाम किराएदार व संस्थाओं को भी शामिल कर दिया है।

 

आंकड़े चाहे कुछ भी कहें पर सच्चाई यह है कि एक आधुनिक विकास के मंदिर के निर्माण के लिए सैकड़ों गांवों की उपजाऊ जमीन को डुबो दिया गया हैहजारों लोगों को बेघंर कर दिया गया है।

 

टिहरी बांध जो कि अपने वैचारिक जन्म के दिन से ही हमेशा विवाद का मुद्दा बना रहा है। न केवल इसका पर्यावरणीय पक्ष बल्कि सामाजिक सांस्कूतिकपुनर्वास भ्रष्टाचार हिमालय के प्रबंधन भूकंप या कोई अन्य कारण से इसके टूटने की स्थिति में व्यापक मानवीय त्रासदी बड़े बांधों के वैकल्पिक उपाय पिछले बीस वर्षों से बहस के मुद्दे रहे हैं। अनेक शोधार्थियों ने इस पर अपने विचार दिए। पर्यावरणविद् सुंदर लाल बहुगुणा के अनुसार यह हिमालय के लिए सबसे भयंकर त्रासदी है। इतना ही नहीं यदि भूकंप या किन्ही अन्य कारणों से टिहरी बांध टूट जाता है तो देवप्रयाग ऋषिकेश हरिद्वारमेरठमुजफ्फरनगर बुलंदशहर आदि नगरों के साथ ही समस्त उत्तर बांध की चपेट में आ जाएगा।'

 

पुनर्वास कार्यालय के आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि सरकारी विभागों के कर्मचारियों के लिए आवासों के निर्माण पर जितनी रकम खर्च की गई हैविस्थापितों के आवास निर्माण पर उसकी आधी रकम भी खर्च नहीं की गई। पीयूसीएल की रिपोर्ट के मुताबिक कर्मचारियों के आवासों पर ४३ करोड़ रुपये खर्च किए गएजबकि विस्थापितों के आवासों पर मात्र २७ करोड़ ३४ लाख। नई टिहरी के अकेले जिलाधिकारी और पुलिस अधिकारी के आवास पर ही ६० लाख रुपये फूंक दिए गए।

 

और ऐसा नहीं है कि बांध के टूटने की कल्पना कोई हवाई कल्पना है। ैवनजी ।ेपंद छमजूवता वद क्ंउए त्मअमत ंदक च्मवचसम की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में आज तक ५० से अधिक बांध विभिन्न कारणों से टूटे हैं जिससे अरबों डालर की क्षति के साथ ही करोड़ों लोगों की जान भी जा चुकी है। सन् ८० के बाद के पिछले २० वर्षों में दुनिया के विकसित देशों अमेरिका सहित भारत रूस स्पेन इटली श्रीलंका चीन में लगभग ११ बांध टूट चुके हैं। १९९५ के केंद्रीय जल आयोग ने भारत में ऐसे ३३ बांधों की सूची तैयार की थी जिनमें ढांचागत अथवा जल गति संबंधी त्रुटियां हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट (२७-०५-१९९५) के अनुसार विश्व बैंक ने २५ भारतीय बांधों को असुरक्षित घोषित किया था। फिलहाल टिहरी बांध का निर्माण अनेक वैज्ञानिक एवं मानवीय विरोधों के बावजूद हो चुका है। टिहरी डूब चुकी है। और इसी के साथ डूब चुकी है नवगठित राज्य के हजारों लोगों की दुनिया। अपने घर नौले धारे देवी-देवताओं के स्थान और पूर्वजों की यादों को इस विशाल झील में डुबा चुके लोग आज मुआवजे के चंद रुपयों के लिए सरकारी अधिकारियों की बाट जोह रहे हैं।

 

 

पर्यावरण मंत्रालय के दस्तावेज में टिहरी बांध के टूटने की दशा में संभावित नुकसान को निम्न तालिका से समझा जा सकता है। बांध का जलाशय २२ मिनट में खाली हो जाएगा और विभिन्न नगरों की स्थिति इस प्रकार होगी

स्थान                      बांध से दूरी             बाढ़ के पानी के       पानी की गहराई

                       किमी.                    पहुंचने का समय        मीटर में

ऋषिकेश                 ८०                     ६३ मिनट                    २६०.००

हरिद्वार                   १०४                     ८० मिनट                    २३२.००

बिजनौर                  १७६                  ४ घंटा ४५ मिनट            १७.७२

मेरठ                     २४६.५             ७ घंटा २५ मिनट             ९.८५

हापुड़                     २४६.५             ६ घंटा ५० मिनट             ८.७८

बुलंदशहर                 २८६.५                 १२ घंटा                       ८.५०

 

                                                                                           फ्रेंड्स ऑफ उत्तराखण्ड दिल्ली के जनघोषणा पत्र से साभार

 
         
 
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  • आकाश नागर

 

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पूर्व में भाजपा शासन के दौरान जब राज्य के कृषि मंत्री थे तो उस समय तराई बीज विकास निगम में करोड़ों रुपए के ?kiys हुए। बीज

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