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आपदा पर विशेष
 
दर्द की यह घाटी

उत्तराखण्ड में तबाही का केंद्र बनी केदार घाटी में मोदी के गुजरातियों को बचाने की हड़बड़ी में किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया कि इस घाटी के कई गांव भी पूरी तरह नष्ट हो गए। सैकड़ों लोग लापता हैं जिनके लौटने की कोई उम्मीद नहीं। प्रलय-प्रवाह के चश्मदीदों के बयानों के जरिये घाटी में बचे लोगों की व्यथा-कथा कहती यह मार्मिक रिपोर्ट

 

बहुत से लोगों के लिए केदारनाथ मात्र एक तीर्थ स्थान भर होगा लेकिन उत्तराखण्ड के लिए यह कई लोगों की आजीविका का भी साधन है। यात्रा सीजन में आस-पास के गांवों से कई युवा पैसे कमाने के लिए केदारघाटी पहुंचते हैं। इस घाटी में १७ जून को आई भारी आपदा ने उन गांवों को तो तबाह किया ही जिनके सिर से पानी मौत बनकर गुजरा लेकिन करीब के कुछ गांव ऐसे भी हैं जिन्हें सैलाब ने बिना छुए ही तबाह कर डाला। इन गांवों से कई लोग इस यात्रा सीजन में पैसे कमाने केदारघाटी गए हुए थे जिनको इस विनाश लीला ने अपना शिकार बनाया। जालगांव बेडुला जग्गी रांसी और मोनार कुछ ऐसे ही गांव हैं जिनके सैकड़ों लोग केदारनाथ में आई आपदा में मारे गए। अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित इन गांवों के सैकड़ों लोगों का दर्द केदारनाथ में राष्ट्रीय पर्यटन और राष्ट्रीय मीडिया के शोर में दब सा गया। 

 

केदारघाटी से लगे गांवों में दर्जनों लोग ऐसे हैं जो इस विनाश लीला के प्रत्यक्षदर्शी हैं जिन्होंने मौत को इतने करीब से देखा है कि वे अभी तक अपने जिंदा होने पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने इस आपदा में अपना सब कुछ खो दिया है। इन गांवों में किसी ने अपना भाई खो दिया है तो किसी के घर का चिराग ही बुझ गया है कई औरतें विधवा हो गई हैं तो कई घर ऐसे भी हैं जहां अब कोई बचा ही नहीं है। 

 

चमोली जिले के दिनेश लाल कोटकंडारा अपने छोटे भाई के लिए काफी चिंतित हैं। उनका १८ वर्षीय भाई दीपक घर से भागकर यात्रा सीजन में खच्चरों के साथ काम करने के लिए रामबाड़ा गया था जो कि आपदा के बाद से लापता है। दिनेश बताते हैं कि उसके भाई दीपक के साथ गए गांव के दूसरे लड़के तो वापस आ गए लेकिन वह नहीं आया। रो-रो कर मां का बुरा हाल हो गया है। यह तो सिर्फ एक परिवार की कहानी है। इस समय केदारघाटी के आस-पास कई ऐसे गांव हैं जहां से अपनों के आपदा में लापता हो जाने की कराह सुनाई दे जाती है। 

 

ऐसा ही एक गांव अगस्त मुनि से ५ किमी दूर चंद्रापुरी है। आधा चंद्रापुरी गांव का आधा हिस्सा इस विनाश की चपेट में आ गया है। यहां के ८० से अधिक मकान अब खंडहर बन चुके हैं। कुछ लोग पानी के बहाव के साथ बह गए तो कइयों ने आस-पास के गांवों में दूसरों के घरों में शरण ले रखी है। स्थानीय निवासी आकाश लिंगवाल और रणबीर सजवाण कहते हैं कि हमारी तरफ किसी का ध्यान ही नहीं है जबकि हमने अपनों के साथ-साथ अपने घर भी खो दिए हैं लेकिन सरकार और दूसरे लोगों का सारा ध्यान बाहर से आए पर्यटकों पर है। हमें भी राहत की आवश्यकता है ऐसा किसी को नहीं लगता। 

 

चमोली के पज्यायणा (सिलपाटा) गांव में मानसिंह नेगी के चेहरे पर पुत्र को खो देने का गम साफ दिखाई दे रहा है। उनका २० वर्ष का बेटा केदारनाथ के एक होटल में काम करता था जो आपदा के बाद से लापता है। मानसिंह का भतीजा भी इसी आपदा का शिकार हुआ है। 

 

अरखुड़ निवासी जयलाल ने मौत को इतने पास से देखा है कि वह अभी भी ठीक से बोल नहीं पा रहे हैं। वह बताते हैं कि १६ जून की रात जब बादल फटा तो वह अपने तीन खच्चरों को छोड़कर जंगल की ओर भाग लिए जहां चार दिनों तक भूखे प्यासे टंगे रहे। जब कोई सहायता नहीं पहुंची तो वह पैदल ही घर के लिए निकल पड़े। इसी गांव के मनोज कुमार भी अपनी जान बचाने में कामयाब हुए लेकिन उनके दो दोस्त अमरदीप और अमित अभी भी लापता हैं। मनोज बताते हैं कि बादल फटने के बाद मची भगदड़ में हम तीनों जंगल की तरफ भागे जब मैंने पीछे मुड़कर देखा तो दोस्तों का कहीं अता-पता नहीं था।

 

रुद्रप्रयाग के शिशुपाल नेगी आपदा के ५ दिन बाद भी गुप्तकाशी में अपने पुत्र की तलाश कर रहे हैं। वह बताते हैं कि अरुण (पुत्र बीए में पढ़ता था। इस बार छुट्टियों में वह केदारनाथ पैसे कमाने के लिए गया था। अब वह न जाने कहां चला गया। ऐसे न जाने कितने मायूस चेहरे गुप्तकाशी गौरीकुंड आदि के कैंपों में दिखाई दे जाते हैं। 

 

गुप्तकाशी से सटी कालीमठ घाटी भी इस आपदा की चपेट में है। यहां के बेडुला गांव में ८० परिवार थे जिनके ५० लोग खच्चरों व दुकान के दूसरे सामान के साथ केदारघाटी गए थे। जिनमें १८ लोग अब भी लापता हैं। इस गांव के लापता लोगों में ज्यादातर युवा थे जो स्कूल और कॉलेजों में छुट्टी के कारण केदारघाटी में रोजगार की तलाश में पहुंचे थे।

 

बेडुला गांव के राजेंद्र सिंह ने केदारघाटी में आए सैलाब को अपनी नंगी आंखों से देखा। उन्होंने बताया कि उस दिन वह रामबाड़ा में ही थे। वहां लगभग २००० लोग थे जिनमें लगभग ५०० लोग खतरे को भांप सुरक्षित स्थान पर चले गए लेकिन बाकी लोग कहां गए कुछ पता नहीं है। वे बताते हैं कि वह स्वयं बाढ़ के पानी में बह गए थे लेकिन किसी तरह बाहर निकल के जंगल की ओर भागने में कामयाब हुए। इसके बाद ६ दिनों तक जंगल में भूखे रहे। उन्होंने इस आपदा में अपनी सारी गाढ़ी कमाई खो दी। उस समय इसी गांव के सोबन सिंह भी गौरीकुंड में थे। वह भी किसी तरह अपनी जान बचाने में सफल हुए। सोबन सिंह कहते हैं कि यह उनका दूसरा जन्म है। 

 

आस-पास के प्रभावित गांवों में भूख-प्यास और उचित चिकित्सा न मिलने के कारण मरने वाले स्थानीय लोगों की संख्या एक अनुमान के अनुसार १५०० पार कर गई है। कुछ गांवों के आंकड़े इस प्रकार हैं। लमगड़ी २० बणीग्राम २२ त्वगणी १४ तुलंगारू २३ रुद्रपुर १५ जालगांव ३० किमाणा १७ पथाली १० सांग ०६ और बैदुला के साथ-साथ १८ है।



गुप्तकाशी में ही टिहरी गढ़वाल निवासी शीशपाल अपने बड़े भाई संजयपाल बिष्ट  और विक्रम की तलाश में पुलिस सहायता कैंपों में इधर से उधर भटकते नजर आ रहे हैं। वह बताते हैं कि भाई संजय पाल की तीन महीने पहले ही शादी हुई थी। वह यहां काम से आया था और आज आपदा के इतने दिनों बाद भी उसका कोई अता-पता नहीं है।

 

संतोष सिंह

 
         
 
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