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vad 41 02-04-2017
 
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प्रदेश 
 
खेल भाग्य और दुर्भाग्य का

प्राकृतिक आपदा के बाद जीवन को फिर से पटरी पर लाने के लिए लोगों के सामने तमाम चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं। लेकिन उनका यह दुर्भाग्य अधिकारियों राजनेताओं और ठेकेदारों का भाग्य बन जाता है

 

कहते हैं कि किसी एक का दुर्भाग्य किसी दूसरे के लिए भाग्य साबित हो सकता है। उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य तो हमेशा दूसरों का सौभाग्य बनता रहा है। वर्ष १८०३ में जब गढ़वाल मंडल में विनाशकारी भूकंप से बहुत बड़ी आबादी काल कवलित हो गई थी। सैकड़ों गांवों में लाशों को उठाने वाले लोग नहीं रह गए थे, तो ठीक उसी वक्त नेपाल के गोरखा शासकों ने तत्कालीन गढ़वाल राज्य पर चढ़ाई कर कब्जा कर दिया। ठीक इसी तरह श्रीनगर बांध परियोजना की निर्माणदायी कंपनी जीवीके और राज्य सरकार का रास्ता आसान कर दिया। कंपनी और सरकार के सामने सबसे बड़ी बाधा यह थी कि परियोजना के चलते संपूर्ण उत्तराखण्ड से लोग अपनी वर्षों पुरानी सांस्कूतिक विरासत धारी देवी ऐतिहासिक स्वरूप से छेड़छाड़ का विरोध कर रहे थे। हालांकि सरकार और जनता के चुने हुए प्रतिनिधि और कृपापात्र कुछ ठेकेदार जनभावनाओं को दरकिनार कर बांध निर्माता कंपनी के पैरोकार बने हुए थे, लेकिन डर इस बात का भी था कि कहीं २०१४ के लोकसभा चुनाव में इसकी भारी कीमत न चुकानी पड़ जाए। लेकिन प्रकूति उन पर जैसे मेहरबान हो गई। इस वक्त जबकि राज्य की जनता प्राकूतिक आपदा से त्राहि-त्राहि कर रही है, लोग अपनी और अपने मवेशियों की जान बचाने के लिए बेचैन हैं, तो ऐसे में शासन-प्रशासन और जीवीके कंपनी को धारी देवी के प्राचीन मंदिर से मूर्ति शिफ्ट करने का सुनहरा मौका मिल गया। बांध निर्माता कंपनी के पैरोकारों, राज्य की बहुगुणा सरकार और गढ़वाल क्षेत्र के चुने हुए विधायकों एवं सांसदों के लिए इस दृष्टि से यह आपदा बड़ी राहत पहुंचाने वाली साबित हुई है।

 

राज्य में बांध निर्माता कंपनियों और सरकार की संवेदनहीनता का यह अकेला उदाहरण नहीं है। सन् २०१० में जब पूरा उत्तराखण्ड प्राकृतिक प्रकोप से कांप रहा था तो प्रदेश के पैरोकार इस बात से फूले नहीं समा रहे थे कि बांधों से खूब बिजली पैदा हो रही है। इस बार भी जब हजारों तीर्थ यात्री बीच रास्तों में फंसे हुए थे और स्थानीय लोग उफनती नदियों के प्रकोप से जान बचाने को बेचैन थे, तो ऐसे में बांध निर्माता कंपनियों और शासन- प्रशासन को बिजली उत्पादन की ज्यादा चिंता थी। विष्णु प्रयाग परियोजना के बैराज में सिल्ट फंस जाने से बिजली उत्पादन ठप पड़ा तो जेपी कंपनी ने आधी रात को बैराज के सात गेट खोल दिए। इससे अलकनंदा का जलस्तर बढ़ा और गोविंदघाट एवं पांडुकेश्वर में पानी खतरे के निशान को पार कर गया। इससे जो तबाही मची उसके लिए जेपी कंपनी और राज्य सरकार पर केस किया जाना चाहिए। खास बात यह है कि पहाड़ में हर साल आपदा स्थानीय लोगों के सामने भारी चुनौतियां छोड़ जाती है। आपदा पीड़ितों को खुद अपने बूते जैसे-तैसे जीवन पटरी पर लाना पड़ता है। लेकिन उनका दुर्भाग्य भ्रष्ट अधिकारियों और राजनेताओं का सौभाग्य बन जाता है। राहत और पुनर्वास के नाम पर जारी करोड़ों रुपए पीड़ितों तक नहीं पहुंच पाते और इसकी लूट का खेल शुरू हो जाता है। पिछले वर्ष २०१२ में आपदा के बाद बजट को ठिकाने लगाने के लिए उत्तरकाशी जिले में विभिन्न विभागों के अधिकारियों ने ऐसे पुलों और सड़कों के पुनर्निर्माण के प्रस्ताव तक प्रशासन को भेज दिए जो पूरी तरह सुरक्षित थे। लेकिन जब लूट का खेल ऊपर से ही चल रहा हो तो बहती गंगा में निचले स्तर के अधिकारी और ठेकेदार भी क्यों नहीं हाथ धोना चाहेंगे। पीड़ितों को राहत के तौर पर दिए गए चेक बाउंस हो गए और सरकार के मंत्री आपदा का जायजा लेने के नाम पर लाखों फूंक गए। सरकार के एक मंत्री पिथौरागढ़ गए और वहां उनके हैलीकॉप्टर का टायर बदलने पर ही दो लाख का खर्च आया था। इस बार भी आपदा मंत्री को लोगों के आक्रोश का सामना करना पड़ा।

आपदा में उच्च स्तर पर लूट की बात करें तो कहने को उत्तराखण्ड राज्य में अलग से आपदा मंत्रालय है। राज्य के मंत्री और अधिकारी आपदा प्रबंधन के गुर सीखने के उद्देश्य से विदेश यात्राएं कर करोड़ों फूंक आते हैं। लेकिन जब आपदा पीड़ितों को राहत और बचाव का मौका आता है तो पूरे आपदा प्रबंधन तंत्र की पोल खुल जाती है। इस बार भी केदारनाथ रामबाड़ा और गौरीकुंड में आपदा के चलते कई लोगों की जानें चली गईं और कई अभी भी लापता हैं। हजारों लोग बीच रास्तों में फंस गए। लेकिन ३६ घंटों बाद भी उन्हें राहत मिलनी तो दूर पुलिस-प्रशासन उनसे संपर्क तक नहीं कर सका। राज्य में बाढ़ से करीब छह सौ सड़कें और बड़ी संख्या में पुल नष्ट हो चुके हैं। आपदाग्रस्त क्षेत्रों में जरूरी चीजें नहीं पहुंच पा रही हैं। ऐसे में पिछले वर्ष की तरह इस बार भी कालाबाजारी और जमाखोरी करने वाले आपदा पीड़ितों की मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें कई गुना अधिक कीमतों में जरूरी चीजें बेचेंगे विपत्ति की इस द्घड़ी से उबरने में पहाड़ के लोगों के सम्मुख तमाम चुनौतियां खड़ी हैं। लेकिन लूट-खसोट करने वालों की हर तरह से पौ-बारह है।

दाताराम चमोली

 

सुरक्षा पर सवाल

पिथौरागढ़। चीन और नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से द्घिरे पिथौरागढ़ जनपद का न केवल सामरिक दृष्टि से महत्व है बल्कि यह राजनीतिक दृष्टि से भी संवदेनशील जिला है। यहां की सीमाएं नेपाल के साथ खुली हुई हैं। उधर पड़ोसी देश नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता और माओवादी गतिविधियों के चलते भी जनपद की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा रहा है। यह जिला वन्य जीव एवं चरस तस्करी के एक बड़े गढ़ के रूप में भी उभर रहा है। ऐसे में जनपद से डीआईजी जोन को हटाना सुरक्षा की दृष्टि से असंवेदनशील निर्णय माना जा रहा है। 

 

पिथौरागढ़ में डीआईजी रेंज कार्यालय खुलने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि निकट भविष्य में यहां कमिश्नरी खुलेगी और लोगों को बेहतर सुरक्षा सुविधाएं प्राप्त होंगी। लेकिन इसके उलट डीआइजी रेंज को खत्म कर देने से लोगों में मायूसी है। स्थानीय लोगों सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का कहना है कि पिथौरागढ़ रेंज बनने से भारत-नेपाल और चीन सीमा की सुरक्षा व्यवस्था बेहतर तरीके से संचालित हो रही थी। तमाम असामाजिक गतिविधियों पर एक हद तक अंकुश भी लग रहा था। वन्य जीव तस्करों के कई गिरोहों का पर्दाफाश भी हुआ था लेकिन सरकार ने इस रेंज को खत्म कर जनपद की सुरक्षा व्यवस्था पर चोट पहुंचाने का कार्य किया है। अब इस मुद्दे पर भाजपाई मुखर हो गए हैं। भाजपाई नेताओं का कहना है कि भाजपा सरकार ने प्रदेश की सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करने के लिए चार डीआईजी जोन गठित किए थे। जिसका उद्देश्य सीमांत और सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करना था, लेकिन कांगे्रस सरकार ने सुरक्षा के सवाल को हाशिए पर डाल पुलिस जोन को खत्म कर अपनी असंवेदनशीलता का परिचय दिया है। इस सरकार ने पूर्ववर्ती सरकार के फैसलों को बदलकर बदले की भावना का कार्य किया है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री नौकरशाही के दबाव में जनहितों से खिलवाड़ कर रहे हैं। भाजपा नेताओं ने मांग की है कि डीआईजी जोन खत्म करने के फैसले पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए ताकि जनता की सुरक्षा से कोई खिलवाड़ न हो। 

 

पूर्व सैनिक शमशेर सिंह महर कहते हैं, 'आज क्राइम तेजी से बढ़ रहा है। सरकार को क्राइम फ्री स्टेट बनाने की कोशिश करनी चाहिए। सरकार ने पुलिस को निहत्था बना दिया है। आए दिन चोरी, डकैती, बलात्कार सहित कई तरह की आपराधिक द्घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है। पुलिस मजबूत नहीं बन पा रही है। प्रदेश में पुलिस फोर्स की कमी है। इसे अधिकार संपन्न बनाना चाहिए।' 

 

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता सुरेश जोशी कहते हैं हमने इस मामले पर मुख्यमंत्री को पत्र भेजा है। पिथौरागढ़ बागेश्वर चंपावत  संवेदनशील जनपद होने के चलते यहां पर पुलिस जोन बनाया गया था। उद्देश्य यह था कि पुलिस का बड़ा अधिकारी यहां बैठेगा तो यहां स्थितियां ठीक होंगी। जनपद के पड़ोस में नेपाल में राजनीतिक अस्थितरता का माहौल है। दो अंततराष्ट्रीय सीमाओं से यह जिला द्घिरा हुआ है। उसके बाद भी प्रदेश के मुख्यमंत्री इसे हल्के में ले रहे है। सांसद प्रदीप टम्टा का यह गृह क्षेत्र होने के बाद उनकी खामोशी बहुत कुछ बोल जाती है। जब प्रदेश की सरकार ही फेल हो तो फिर कांगे्रसियों से बड़ी उम्मीद लगाना व्यर्थ है।' २३ अपै्रल २०१२ को पुलिस रेंज की संख्या दो से बढ़ाकर चार किए जाने की अधिसूचना जारी की गई थी। आज देश भर में नक्सलवाद और माओवाद का समाधान खोजा जा रहा है। 

उल्लेखनीय है कि सवा साल बाद फिर से दो रेंज की व्यवस्था को बहाल करते हुए देहरादून और पौड़ी को भंग कर गढ़वाल रेंज और नैनीताल व पिथौरागढ़ को भंग कर कुमाऊं रेंज का गठन किया गया। गढ़वाल रेंज की जिम्मेदारी अमित सिन्हा और कुमाऊं रेंज की जिम्मेदारी जीएन गोस्वामी को सौंपी गई है। नैनीताल की जिम्मेदारी संभाल रहे डीआइजी पुष्कर सिंह सैलाल को इंटेलीजेंस एवं पिथौरागढ़ रेंज की जिम्मेदारी संभाल रहे डीआईजी जीएस मर्तोलिया को सीबीसीआइडी भेजा गया है। पुलिस सूत्रों के अनुसार इसे खत्म करने की मूल वजह यह है कि कुमाऊं और गढ़वाल मंडल में तैनात आयुक्त कार्यालय को एक ही मंडल में दो-दो महानिरीक्षकों से समन्वय करना पड़ रहा था। जिससे कई तरह की दिक्कतें पेश आ रही थीं।

दिनेश पंत

 

हमने दिया पचास फीसदी आरक्षण

प्रदेश भाजपा संगठन में एक मात्र नेत्री कुसुम कंडवाल को स्थान मिला है। कुसुम कंडवाल भाजपा उपाध्यक्ष के पद पर नियुक्त हुई हैं। प्रदेश में महिलाओं की स्थिति और भाजपा की अंदरुनी गुटबाजी पर कृष्ण कुमार की उनसे हुई बातचीत के मुख्य अंशः

 

आप प्रदेश भाजपा में अकेली महिला उपाध्यक्ष के पद पर नियुक्त हुई हैं जबकि आपके साथ उपाध्यक्ष के पद नियुक्त होने वाले व्यक्तियों के कद बहुत बड़े हैं। आप इस चुनौती को किस तरह से देखती हैं।

मैं भाजपा से १२ वर्ष पूर्व जुड़ी हूं लेकिन मेरे पिता जी श्री भोलादत्त मैठानी वर्षों से आरएसएस से जुड़े रहे हैं। इस कारण मुझे भाजपा को और भाजपा की नीतियों, सिद्धांतों को जानने और समझने में आसानी रही। मैं आज अकेली महिला उपाध्यक्ष के पद पर नियुक्त हुई हूं और मेरे अलावा सभी उपाध्यक्ष सरकार मे मंत्री रह चुके हैं। काम करने के लिये तो बेशक चुनौतियां हैं, लेकिन पार्टी के भीतर महिला-पुरुष के नाम पर कोई चुनौतियां नहीं हैं। हां, कभी-कभी डर भी लगता है कि मेरे साथी बड़े दिग्गज नेता हैं और मैं कहीं अपने काम में पीछे तो नहीं रह जाऊं।

 

प्रदेश भाजपा में कोश्यारी, खण्डूड़ी और निशंक तीन गुट हैं। पार्टी पदाधिकारी होने के चलते आप इनमें अपने आपको कैसे आगे ले जायेंगी।

पहले तो यह बात निराधार है कि भाजपा में गुट हैं। तीनों पार्टी के वरष्ठि नेता हैं। इन तीनों की तुलना किसी के साथ नहीं हो सकती। हर कार्यकर्ता किसी न किसी नेता से प्रभावित होता है और उस नेता के साथ उसका लगाव कुछ अधिक हो जाता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं होता कि वह किसी खास गुट का है। भाजपा में केवल एक ही गुट है और वह है भाजपा। रही मेरी बात तो मैं भाजपा से एक दशक से जुड़ी हूं और मेरे काम को पार्टी ने सराहा है जो भी जिम्मेदारी मुझे दी गई है मैंने उसे ईमानदारी से पूरा किया है। 

 

आप महिला मोर्चो की प्रदेश अध्यक्ष रही हैं। क्या भाजपा में महिलाओं को उतने अवसर नहीं मिलते हैं जितने मिलने चाहिये?

यह बात विल्कुल निराधार है कि भाजपा में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। पंचायत चुनावों में केवल भाजपा ही वह पार्टी थी जिसने पचास प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था राज्य में लागू की। देश में केवल भाजपा ही वह पार्टी है जिसने यह व्यवस्था सबसे पहले लागू की। बाकी पार्टियां तो तैंतीस प्रतिशत की बात कहती रही हैं। लेकिन किया भी नहीं। हमने तो करके दिखा दिया। आपको पता होगा कि भाजपा की सरकार में दो-दो महिलाएं मंत्री रही हैं। विधानसभा की पहली उप सभापति भी महिला ही रही हैं। टिहरी लोकसभा में भी भाजपा की सांसद महिला हैं। संगठन में भी महिलाओं को मार्चों के अलावा भाजपा में भी कई पद दिये गये हैं। महिलायें कार्यकर्ताओं के साथ पूरा सम्मान और आदर सिर्फ भाजपा में ही बरता जाता है। 

 

प्रदेश में भाजपा एक मात्र विपक्षी दल है। राज्य में महिलाओं की दशा और दिशा के लिये आपके पास कोई विचार है?

भाजपा केवल महिलाओं की ही दशा और दिशा की बात नहीं करती है। हम देश के साथ-साथ राज्य की दिशा और दशा की बात करते हैं। मैं उत्तराखण्ड प्रदेश की हूं तो स्वाभाविक है कि मैं प्रदेश की बात अधिक करूंगी और महिला होने के कारण यह अपेक्षा भी स्वाभाविक है। मेरा प्रयास होगा कि अधिक से अधिक महिलाओं को भाजपा और उसके सिद्धांतों से जोड़ना। हमारी सरकार ने जो भी महिलाओं और बालिकाओं के उत्थान के लिये योजनायें चलाई थीं उन योजनाओं को जनता तक सरकार ले जाये और उनके हकों को न छीन पाये इस पर जोर होगा। 

कृष्ण कुमार

 
         
 
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शपथ लेते ही जिस तरह ऐक्शन में हैं उससे विरोधी भी हैरान हैं। उनको मुख्यमंत्री
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