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आवरण कथा
 
प्रकृति का प्रतिकार

 


श्रीनगर में तबाही

पौड़ी जिले की यदि बात की जाये तो यहां पर २ सौ करोड़ से भी ज्यादा के नुकसान का अनुमान है। अतिवृ८िट के कारण अलग-अलग क्षेत्रों में कई मवेशियों की मौत हुयी है। जबकि कि ९० सड़कें बारिश और भूस्खलन के कारण क्षतिग्रस्त हो गयी हैं। श्रीनगर में आयी बाढ़ से एसएसबी एकेडमी को १०० करोड़खाद्यान एवं आपूर्ति विभाग को २५ लाख गैस गोदाम को २५ लाख आईटीआई को १२ करोड रेशम विभाग को ८० लाख का नुकसान का अनुमान है। इंडियन आयल के कुकिंग गैस गोदाम में भी ७७४ गैस सिलेंडर बह गये। आईटीआई प्रशासन के मुताबिक वहां रकखे सारे रिकार्ड पानी में बह गये।

 

उत्तराखण्ड ऐसा राज्य है जहां आपदा प्रबंधन का अपना अलग मंत्रालय है। इसके लिए प्रतिवर्ष भारी भरकम बजट की व्यवस्था की जाती है। खास बात है कि यहां के प्रतिनिधि आपदा प्रबंधन की जानकारी लेने के लिए विदेशों में जाते हैं पिछले वर्ष में सबसे ज्यादा भूगर्भीय सर्वेक्षण पहाड़ को जानने के लिए हुए हैं। राज्य में स्थापित वि६वविद्यालयों में इसके लिए शोध कार्य हो रहे हैं लेकिन वे तमाम बातें फाइलों और सेमिनारों तक ही सीमित है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कई चीजों पर मानव का वश नहीं चलता लेकिन कई बार ऐसी घटनाओं को कम किया जा सकता है रमनीत चीमा एडीएम पौड़ी ने कहा कि ४२ गांवों की सूची ५ाासन को पूर्व में भेजी गयी है। ५ाासन से निर्देश आने पर शीघ्र ही इन गावों में विस्थापन की तैयारी की जाएगी। कंट्रोल रूम के प्रभारी को मेरे द्वारा लिखित पत्र दिया गया था कि वह कंट्रोल रूम में असावधानी न बर्तें व समय समय पर आपदा प्रभावितों की सूची उपलब्ध करवायें।

 

अलकनन्दा नदी के जलस्तर के बढ़ने से लगभग ८०० वर्ष पुराने एतिहासिक धारी देवी का मूल मंदिर भी पानी में डूब गया। धारी देवी की मूर्ति को पहले जिस अस्थायी मंदिर में ६फिट किया गया उसके पिल्लर भी अलकनन्दा के उफान के कारण गिर गये जिससे मूर्ति को किसी आवासीय भवन में रखा गया है। अलकनन्दा और मंदाकिनी नदियों का जलस्तर खतरे के निशान से उपर बहने की घटना पिछले व८र्ाो में कभी नहीं हुयी। पहले इन नदियों के जलस्तर में बढ़ौतरी हुयी है लेकिन इस बार जो हुआ उससे लोग काफी सहमें हुये है। पहले भी १८९४ में गौनाताल के टूटने के कारण बिरही की बाढ़ में पुराना श्रीनगर बह गया था। लेकिन वर्ष १८९६ में मास्टर प्लान से तैयार श्रीनगर का ढांचा आज लगभग समाप्त होने के कागार पर खड़ा है। अनियोजित निर्माणअतिक्रमण और नदियों के किनारे हो रहे अवैध खनन ने भी इस तरह के खतरे को बढ़ाने में कोई कसर नही छोड़ी है। भारी बारिश के चलते चमोलीरुद्रप्रयाग में कहर बरपाने के बाद अलकनन्दा नदी ने अपना रौद्र रुप दिखाते हुये श्रीनगर के लोअर भक्तियाना श्रीकोट आदि के निचले इलाकों के १०० से अधिक भवनों को अपने आगोश में ले लिया। १७ जून को देर रात अचानक बढ़े जलस्तर ने एसएसबी स्टेडियम की दीवार तोड़कर अलकनन्दा का पानी नेशनल हाइवे तक आ पहुंचा।

 

देर रात अचानक आये पानी ने लोगों को कुछ समझने का मौका ही नही दिया। घरों में पानी घुसता देख लोग जिस हाल में थे वैसे ही दौड पडे़। लेकिन अपने बेजुबान जानवरों के साथ ही नकदी जेवर और सामान को बचाने में असमर्थ रहे। अपने सामने अपने आशियाने पिथौरागढ़ में कहर जनपद में मानसून की पहली बरसात कहर ढा गई। आपदा के चलते १०५ गांवों के ६०० परिवार और हजारों की जनसंख्या प्रभावित हुई एवं १५ लोग मौत के आगोश में समा गए। कई लोग अब भी लापता हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्रों से निकलने वाली काली गौरी और धौली नदियां यहां के लिए जीवनदायिनी मानी जाती हैं लेकिन विगत दिनों यह नदियां मौत लेकर सामने आई। इन नदियों की लहरों ने ऐसा तांडव मचाया की तीन दिनों तक लोगों की सांसें अटकी रही।

 

तीन दिन हुई इस बरसात में जनपद के धरचूला और मुनस्यारी तहसीलें सर्वाधिक प्रभावित हुई हैं बलुवाकोट कालका घाटीबगड़ जौलजीबी बगड़ीहाटहंसेखवर तीतरी द्वालीसेरा पीपली डोडा आदि कई क्षेत्रों में जबर्दस्त भू कटाव हुआ है। नेपाल को जोड़ने वाले दोनों पुल बह गए। काली गौरी रामगंगा का उग्र रूप सामने आया। दारमा घाटी में ग्लेशियर खिसक गया। छिपला केदार में बादल फटने और ग्लेशियर दरकने से दस लोग मौत के मुंह में समा गए। पांच लोग गंभीर रूप से घायल हैं। तीजम का हैलीपैड ध्वस्त हो गया। गर्ब्यांग के पास पहाड़ टूटने से ५० भेड़ों की मौत हो गई। सोबला गांव के भीमराम के परिवार के पॉंच सदस्य मौत के आगोश में समा गए। सुमगढ़ गांव का आध हिस्सा बह गया। धारचूला के गोठी में ३०० मीटर मार्ग बह गया। काली नदी के वेग के चलते एनएचपीसी की तपोवन स्थित कालोनी को खाली कर निंगालपानी पहुंचा दिया है। कंचौती और तवाघाट में पुल बहने से दारमा ब्यास और चौंदास का सम्पर्क तहस नहस हो गया है। राजकीय इंटर कालेज बलुवाकोट का भवन गिरने के कगार पर है। जौलजीवी स्थित मेला स्थल काली नदी में बह गया। छारछुम और गोठी में टनकपुर- तवाघाट राष्ट्रीय राज मार्ग बह चुका है। मुनस्यारी मेंल्वा मर्तोली बूफॅटोला के साथ लोहे के पुल एक साथ बह गए। जिससे उच्च हिमालीय क्षेत्रा का संपर्क शेष भारत से टूट गया।

 

यहां रैकी पर गए सेना दल सहित कई पर्यटक फंसे हुए हैं। ये पुल ही उच्च हिमालयी क्षेत्रों को शेष क्षेत्र से जोड़ते थे। उच्च हिमालयी क्षेत्र में बर्फवारी के चलते दर्जनों घोड़े खच्चर और बकरियों के मारे जाने की खबर है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में फंसे लोगों को बाहर निकालना भी एक बड़ी मुसीबत बनी हुई है। कहने को तो जनपद में आपदा से ६०० गांव प्रभावित हैं। जनपद में सड़क स्वास्थ्य विद्युत पेयजल सुविधएं ध्वस्त हो चुकी हैं। आपदा प्रबंधन तंत्र दम तोड़ रहा है। राहत के नाम पर लोगों को कुछ भी नहीं मिला। उल्लेखनीय है कि वर्ष २०१० की आपदा के तहत संवेदनशील श्रेणी में जनपद के ७१ गांवों को विस्थापित होना था। लेकिन सरकारी तंत्र की काहली के चलते ये विस्थापित नहीं हो पाए। हर बरसात में संवेदनशील गांवों की संख्या बढ़ती जा रही है। धरचुला के तपोवन में एनएचपीसी के ५ भवन सहित १०० मकान धवस्त हो गए हैं। इसके अलावा आईटीबीपी का टांजिट कैंप और टूटू कम्पनी के १४ बैरक और ग्रीफ का कैंप। मदकोट में कुमाउं मंडल का पर्यटक गृह और प्राथमिक विद्यालय और अमरनाथ यात्रा मार्ग पर शिव मंदिर कंचौती के करीब मोटर पुल क्षतिग्रस्त है।

 

मुख्य सचिव सुभाष कुमार के मुताबिक केदारनाथ और गौरीकुंड के बीच के रास्ते में आसपास के क्षेत्र में करीब ८०० लोगों के फंसे होने का अनुमान है। यह संख्या ज्यादा भी हो सकती है। कारण यह है कि गौरीकुंड से केदारनाथ जाने वाले यात्रियों की कोई गिनती नहीं होती। लिहाजा यह कहना मुश्किल हो रहा है कि इस बाढ़ की चपेट में कितने लोग आए होंगे। 

 

डीजीपी सत्यव्रत बंसल के मुताबिक पीएसी के करीब १५ जवान हैं जिनके बारे में कोई सूचना नहीं है। इसमें महिला कांस्टेबल भी शामिल हैं। आरआरबी के करीब १५ जवान हैं जो रामबाड़ा की ओर बढ़ रहे थे और पानी आने पर ऊंचे स्थान पर आने में कामयाब रहे।

 

 

  • केदारघाटी में संचार व्यवस्था ठप नहीं हो पा रहा प्रभावित क्षेत्रों से संपर्क
  • रुद्रप्रयाग चमोली टिहरी और उत्तरकाशी पिथौरागढ़ जिले सर्वाधिक प्रभावित
  • गोविंद घाट में एक निजी कंपनी का हैलीकॉप्टर भी डूबा
  • लामबगड़ में दो किलोमीटर हाइवे ध्वस्त लामबगड़ बाजार बहा
  • सरकार की संवेदनहीनता क्षेत्रीय विधायकों ने किए मोबाइल स्विच ऑफ
  • मौसम विभाग ने राज्य सरकार को दो दिन पूर्व ही दी थी चेतावनी
  • प्रधानमंत्री ने प्रदेश को १००० करोड़ रुपए देने की घोषणा की। मृतकों को २ लाख घायलों को ५० हजार पूर्णतः क्षतिग्रस्त मकान के लिए एक लाख रुपए देने की घोषणा देश में आपदा से निपटने के लिए २००५ में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण बनाया गया। इसका सालाना बजट साढ़े तीन सौ करोड़ है 
  • वर्ष २००९-१२ में ३८ लाख से ज्यादा घर तबाह और ६१२८ जानें गईं

गुंजन कुमार

 
         
 
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