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खास खबर 
 
फिर भूमि घोटाले की आहट

उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए बड़े-बड़े दावे करते रहे हैं। लेकिन जब उनकी संपत्तियों के काले कारोबार पर अंकुश लगाने का मौका आता है तो कोताही बरत देते हैं। देहरादून के अजबपुर कलां में इस्लामिया स्कूल कमेटी की ओर से वक्फ बोर्ड की करोड़ों रुपए की भूमि बिल्डरों के हाथों बेचे जाने की साजिश का मामला सामने आया है। लेकिन हैरानी की बात है कि हर तरह की जांच के साथ ही मामला मुख्यमंत्री और राज्यपाल के संज्ञान में होने के बावजूद इस पर कोई कार्यवाही नहीं हो पा रही है। ऐसे में भू-माफिया इस जुगाड़ में लगा है कि करोड़ों रुपए की जमीन उसके हाथ आ जाए

 

उत्तराखण्ड में लोग शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए दिल खोलकर अपनी जमीनें दान देते हैं। लेकिन जमीनों के काले कारोबार से जुड़े माफिया उनका सौदा करने में जरा भी नहीं हिचकते। इससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि उन्हें शासन- प्रशासन की पूरी शह रहती है। २१ फरवरी १९५१ को देहरादून के अजबपुर कलां के अंतर्गत केदारपुर गांव के निवासी कूड़ेखान पुत्र करीम बक्श ने अपनी जमीन का एक हिस्सा इस्लाम धर्म की शिक्षा-दीक्षा के प्रचार के उद्देश्य से इस्लामिया स्कूल को दान में दिया था। कोई भी मुस्लिम धर्म का अनुयायी अगर अपनी सम्पति इस्लाम धर्म के हित में दान देता है तो उसे वक्फ सम्पति कहा जाता है। सम्पत्ति को दान करने के लिए बाकायदा वक्फनामा बनाया जाता है। उसमें सभी जरूरी शर्तों और प्रतिबंधों का उल्लेख किया जाता है ताकि कोई भी व्यक्ति दान में दी जा रही संपत्ति का अपने निजी हित में दुरुपयोग न कर सके। स्वर्गीय कूड़ेखान ने भी अपनी जमीन दान में देते समय वक्फनामें में स्पष्ट शर्त रखी थी कि इस भूमि से होने वाली आय स्कूल और इसमें तालीम लेने वाले बच्चों पर खर्च की जाए। वर्षों तक यह भूमि स्कूल के खर्च का जरिया बनी रही और इसमें किसी प्रकार से कोई बाधा नहीं आई। लेकिन उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद जमीनों के भाव अचानक आसमान छूने लगे तो करोड़ों रुपए की इस भूमि पर सभी की नजरें पड़ने लगी। अब यह जमीन राजधानी में भवन और कॉलोनी बनाने वालों के लिए सोना उगलने का जरिया बन चुकी थी। लेकिन समस्या यह पैदा हुई कि जमीन वक्फ बोर्ड के तहत आती है। ऐसे में इसे किसी भी सूरत में खरीदा और बेचा नहीं जा सकता था। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि इसके बावजूद वर्ष २००५ में इस भूमि को स्कूल संचालन कमेटी के अध्यक्ष हाजी हसन सचिव नफीसुर्रहमान और सदस्य मौलाना अल्ताफ और अजीमुद्दीन द्वारा बिल्डर्स और कलोनाईजर्स के हाथों बेचे जाने की पूरी कवायद की गई थी। हालांकि तत्कालीन तिवारी सरकार के समय उनके मंसूबे पूरे नहीं हो पाये लेकिन अंदरखाने कोशिश चलती रही। 

 

कमेटी के संचालकों द्वारा स्कूल को दान में मिली सम्पति को बिल्डर्स के हाथों बेचे जाने की कोशिश करने की बातें समाने आईं तो इस पर स्थानीय निवासियों ने भारी विरोध किया। लेकिन कमेटी और बिल्डर्स की प्रशासन और सत्ता में पकड़ का आलम रहा कि इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। जबकि स्थानीय निवासियों ने इस प्रकरण की बाकायदा लिखित शिकायत भी की थी। शिकायत पत्र में साफ तौर पर आरोप लगाए गए थे कि भू-मफिया जसवंत सिंह उर्फ दीपू रावत के माध्यम से कमेटी के संचालकों ने कमीशन के तौर पर भारी भरकम धनराशि प्राप्त की है। लेकिन प्रशासन और वक्फ बोर्ड इस मामले में आंखें मूंदे रहा।

 

मामला समाने आने के बावजूद कमेटी के संचालकों द्वारा इस भूमि को गुपचुप तरीके से बेचे जाने की साजिश रुकी नहीं। लिहाजा इसके लिये एक आसान और बेहतर तरीका यह निकाला गया कि स्कूल की भूमि की अदला-बदली की जाए। स्कूल के लिए किसी अन्य जगह पर सस्ती भूमि ली जाए और बदले में स्कूल की बेशकीमती भूमि दे दी जाए। वर्ष २००८ में कमेटी ने गुपचुप तरीके से यह काम कर भी लिया। कमेटी ने विकास नगर तहसील के अंतगर्त आने वाले क्षेत्र शिमला बाईपास के आस-पास किसी स्थान पर स्कूल की भूमि को बदलने को प्रस्ताव अपने आप ही पास कर दिया। जबकि इस तरह के प्रस्ताव बगैर वक्फ बोर्ड की सहमति से पास ही नहीं हो सकते हैं।

 

करोड़ों की भूमि को सस्ती भूमि से बदलने की यह साजिश छुप न सकी और मामले ने एक बार फिर से जोर पकड़ा। स्थानीय निवासियों ने मामले को उठाते हुए इसकी शिकायत शासन- प्रशासन के अलावा मुख्यमंत्री और महामहिम राज्यपाल से भी की।

 

स्थानीय निवासी शमशाद अली पुत्र स्वर्गीय फकरूदीन अजबपुर कलां ने इस प्रकरण की जानकारी सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त की। लेकिन इसमें भी प्रशासन ने सूचना छिपाने का काम किया और आधी-अधूरी और भ्रामक सूचना दे दी। शमशाद अली ने अपने प्रयासों से कई महत्वपूर्ण दास्तावेज प्राप्त किये और ९ जून २०१२ को इस पूरे प्रकरण की शिकायत मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से की।

 

उन्होंने अपने शिकायती पत्र में सभी बातों का उल्लेख करते हुये इस पर कार्रवाई करने की मांग की। इस पर मुख्यमंत्री ने १५ जून २०१२ को  पत्रांक ( म् १७४३ध्गगगअध्२०१२;१ के तहत जिलाधिकारी देहरादून को इस पूरे प्रकरण में जांच के आदेश दिये।

 

मुख्यमंत्री के सीधे हस्तेक्षप से तत्कालीन जिलाधिकारी ने तत्कालीन उपजिलाधिकारी (सदर गिरीश चंद गुणवंत को इस मामले की जांच के आदेश दिये। उपजिलाधिकारी ने इस प्रकरण की पूरी गम्भीरता से जांच की और अपनी जांच आख्या पत्रांक संख्या ७२/ जांच/ २०१२ दिनांक ३० नवंबर २०१२ के तहत जिलाधिकारी देहरादून को सौंप दी। इस जांच आख्या में स्पष्ट है कि कूड़े खान द्वारा वक्फनामे की शर्तों का पूरी तरह उल्लंद्घन किया जा रहा है। जांच आख्या में स्कूल संचालन कमेटी को भंग कर नई कमेटी बनाने की संस्तुति भी की गई।

 

कायदे से उपजिलाधिकारी की इस जांच आख्या को जिलाधिकारी द्वारा सीधे मुख्यमंत्री को प्रेषित किया जाना था लेकिन जांच को द्घुमाने और प्रभावित करने के लिए जिलाधिकारी ने तत्कालीन एडीएम देहरादून अर्चना गहरवार को फिर से जांच करने के आदेश दे दिये। मामला एक बार फिर से जांच फाइलों में ही लटक गया और कमेटी के संचालकों पर किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं हो पाई।

 

जिला प्रशासन के इस रवैये से शमशाद अली ने फिर से मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मामले को दबाने के प्रयासों पर रोष व्यक्त किया। मुख्यमंत्री ने इस पत्र के आधार पर आयुक्त गढ़वाल मंडल कुणाल शर्मा को पत्रांक ळ म् १७८३८.२ ध्गगगअध्२०१२;१द्ध दिनांक २८ दिसंबर २०१२ के तहत आवश्यक कार्र्रवाई करने के आदेश दिये। आयुक्त द्वारा मामले को संज्ञान में लेने पर जिला प्रशासन ने फिर से जांच की। जांच का दायरा बढ़ाया गया। इस बार मामले में वक्फ बोर्ड भी शामिल हुआ। बोर्ड ने इस प्रकरण में उत्तराखण्ड वक्फ बोर्ड निरीक्षक मोहम्मद अली को जांच करने के आदेश भी दिये। जांच के बाद वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यपालक अधिकारी सादिया राशिद खान द्वारा स्कूल की संचालन कमेटी को कारण बताओ नेटिस जारी कर ३० दिन के भीतर जवाब देने को कहा गया।

 

तब से लेकर अब तक न ही इस्लामिया स्कूल कमेटी को भंग किया गया है और न ही कोई कार्रवाई की गई है। जबकि सभी जांचों में पाया गया कि कमेटी असंवैधानिक तौर पर काम कर रही है क्योंकि कमेटी का कार्यकाल वर्ष २०११ में ही समाप्त हो गया था। ऐसे में वह किस आधार पर शासन और वक्फ बोर्ड से पत्राचार कर रही है। यहां तक कि उसने स्कूल की भूमि को बदलने के लिये प्रस्ताव पास कर दिया।

 

इस पूरे प्रकरण में उत्तराखण्ड वक्फ बोर्ड की भूमिका भी संदेह में है। बोर्ड के निरीक्षक मोहम्मद अली ने इस प्रकरण में स्थानीय निवासियों के आरोपों पर कोई जांच नहीं की। आरोप लगाया गया था कि जसंवत सिंह उर्फ दीपू से स्कूल कमेटी के संचालकों ने गुपचुप तरीके से भारी भरकम धनराशि कमीशन के तौर पर प्राप्त की। स्थानीय काश्तकार जो स्कूल की भूमि पर वर्षों से कम कर रहा है। उससे कमेटी ने किसी प्रकार का कोई अनुबंध तक नहीं किया। जबकि कास्तकार इस भूमि से काश्त के नाम पर लाखों रुपये प्राप्त करता है। मोहम्मद अली ने इस संबंध में किसी भी व्यक्ति का बयान अपनी जांच में नहीं लिये। वक्फ बोर्ड की मुख्य कार्यपालक अधिकारी सादिया राशिद खान ने इस प्रकरण में कार्रवाई करने का पूरा प्रयास किया लेकिन कार्रवाई उनको वक्फ बोर्ड से ही हटा दिया गया।

 

मामले को गौर से देखने पर साफ हो जाता है कि स्कूल कमेटी द्वारा पूरे प्रकरण में फर्जीवाड़ा किया गया। स्वर्गीय कूड़ेखान ने फरवरी १९५१ को व वक्फनामा किया था। लेकिन इस्लामिया स्कूल कमेटी ने सूचना में दिये गये वक्फनामे की छाया प्रति में इसकी तारीख १९५५ की दिखाई है। इससे यह भी साफ हो जाता है कि कमेटी ने कूटरचित तरीके से वक्फनामे को अपने हितों के तहत बनाया है। इसके अलावा वक्फ बोर्ड की अनुमति के बिना नई संचालन कमेटी का गठन कर उसे बाकायदा पंजीकृत भी किया गया। इस बावजूद वक्फ बोर्ड ने स्कूल संचालकों को सिर्फ नोटिस भेजकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लिया।

 

मामले के तूल पकड़ने की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए अब सूत्रों की मानें तो स्कूल कमेटी और वक्फ बोर्ड के साथ-साथ इस भूमि के सौदे से जुड़े लोग चिंतित हैं कि अगर इस्लामिया स्कूल कमेटी को भंग कर दिया जाता है तो उन सबके हितों को चोट पहुंच सकती है। जिस के चलते अब शासन-प्रशासन के साथ-साथ वेंेंेंक्फ बोर्ड के सदस्यों और अधिकारियों के साथ भी गुपचुप तरीके से जमीन की अदला-बदली के लिये सहमति बनाने के पूरे प्रयास चल रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के कार्यकाल में भूमि के काले कारोबार के मामलों में एक और अध्याय जुड़ जायेगा।

 

बात अपनी अपनी

अभी बोर्ड के पास सीओ नहीं है। जैसे ही नये सीओ की पेस्टिंग हो जायेगी इस मामले में कार्रवाई की जायेगी। और भी मामले हैं जिन पर कार्यवाही होनी है। सदिया खान को हटाने का कारण यह था कि यह सब उसी का किया कराया है। उसने ही कई वक्फ बोर्ड की जमीनों पर कब्जे करवाये हैं। मसूरी देहरादून और कलियर में भी उसने कब्जे करवाये हैं। 

राव काले खां अध्यक्ष वक्फ बोर्ड उत्तराखण्ड

 

मामला आयोग के संज्ञान में है और आयोग ने इस पर जिलाधिकारी देहरादून को उचित कार्रवाई के लिये पत्र भेजा है। ऐसे मामलों को कतई नहीं बख्शा जायेगा।

सरदार नरेन्द्रजीत सिंह बिंद्रा अध्यक्ष उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक आयोग

 

इस पूरे मामले में वक्फ बोर्ड और इस्लामिया स्कूल कमेटी मिले हुये हैं। जानबूझ कर मामले की जांच को लटकाने की कोशिश की जा रही है। कमेटी के लोगों ने जसवंत सिंह उर्फ दीपू के साथ मिल कर जमीन का सौदा कर लिया है और लाखों रुपये कमीशन के तौर पर लिये हैं। अब मामले को फंसा देखकर सभी शासन-प्रशासन से अपना काम निकलवाने के लिये सांठ-गांठ करने में लगे हुए हैं। स्कूल संचालन कमेटी फर्जी है और जांच में यह पाया गया है। लेकिन अभी तक कमेटी को भंग नहीं किया गया है। मुख्यमंत्री जी ने कार्यवाही के आदेश दिये हैं लेकिन उन पर अमल नहीं हो रहा है। सरकार इस मामले में कोई ठोस कार्यवाही नहीं कर रही है। 

शमशाद अली आरटीआई कार्यकर्ता 

कृष्ण कुमार

 
         
 
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