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देश-दुनिया 
 
अमेरिका चीन के बढ़ते कदम

कैलिफोर्निया में बिना तामझाम के विश्व की प्रमुख दो अर्थव्यवस्थाओं के राष्ट्रपतियों ने ७ और ८ जून को बैठक की। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और चीनी राष्ट्रपति शी जिनफिंग ने दोनों देशों के बीच संबंधों के प्रति नए रुख का आह्वान किया। इससे स्पष्ट हो गया है कि दोनों देशों के समक्ष स्वस्थ्य आर्थिक प्रतिस्पर्धा होगी। हाल ही में दोनों देशों के बीच साइबर सुरक्षा के मुद्दे ने टकराव पैदा किया था। इसीलिए यह मुद्दा इस बैठक में अहम बना रहा। अमेरिका एक ऐसी अंतररष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था चाहता है जिसमें एक ही नियम का पालन हो जहां व्यापार मुक्त और निष्पक्ष हो और जिसमें अमेरिका और चीन साइबर सुरक्षा और बौद्धिक सम्पदा जैसे मुद्दों के समाधान के लिए एक साथ कार्य करें। 

 

पिछले कुछ सालों में देशों की आर्थिक स्थिति में काफी अंतर आया है। अमेरिका जहां इस समय सबसे ज्यादा कर्जदार देशों में है तो चीन उसे कर्ज देने वालों में प्रमुख देश। अनुमान लगाए जा रहे हैं कि अगले दस सालों में चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका को पछाड़ कर दुनिया की सबसे सशक्त अर्थव्यवस्था बन जाएगी। यही कारण है कि दोनों देशों के राष्ट्रपतियों ने अपनी मुलाकात निजी माहौल में ही की। दरअसल इसकी तैयारी एक साल पहले तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की मौजूदगी में ही शुरू हो गई थी। इस बातचीत के संदर्भ में क्लिंटन ने खुद कहा था कि अमेरिका और चीन दुनिया के सामने इस सवाल का एक बेमिसाल जवाब रखना चाहते हैं कि जब कोई पहले से बड़ी ताकत तेजी से बढ़ रही ताकत के साथ मिलती है तो क्या होता है। इतिहास इसका प्रमाण है कि इस सवाल का जवाब हमेशा मतभेद संघर्ष और युद्ध के रूप में ही मिला है। अमेरिका और चीन के बीच संबंध दोनों की भविष्य की योजनाओं से जुड़े पारस्परिक शक पर टिका है। राजनीतिक जानकार इस तरह के संबंध को कूटनीतिक अविश्वास का नाम देते हैं।

 

एक तरफ बीजिंग यह कहता आया है कि अमेरिकी सरकार चीन की बढ़ रही ताकत का फायदा उठा कर अपनी आर्थिक और राजनीतिक स्थिति को मजबूत करना चाहती है। राष्ट्रपति ओबामा की एशियाई देशों के लिए पुनर्संतुलन की विदेश नीति चीन के इस शक को आधार भी देती है। दूसरी ओर अमेरिका को भी इस बात का अंदाजा है कि एशिया में चीन के बढ़ रहे प्रभाव से अमेरिकी प्रभाव को खतरा हो सकता है। अमेरिका की काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस संस्था में एशियन स्टडीज की निदेशक एलिजाबेथ इकोनॉमी मानती हैं कि इस वार्ता के बाद दोनों देश आपसी अविश्वास को कम कर लेंगे। हालांकि इकोनॉमी यह भी मानती हैं कि अमेरिका एकलौता ऐसा देश नहीं है जिसका चीन के साथ अविश्वास का मसला है। साइबर हमलों प्रादेशिक सीमा और अधिकारों के क्षेत्र में खराब छवि के कारण चीन के कई और देशों के साथ भी संबंध बहुत अच्छे नहीं हैं। शी जिनफिंग इससे पहले ओबामा से २०१२ में चीन के उपराष्ट्रपति के रूप में मिले थे। 

 

अमेरिका और चीन के बीच आपसी मतभेदों को दूर करने के लिए जरूरी है कि दोनों एक दूसरे के लक्ष्यों को बेहतर ढंग से समझें। कैलिफोर्निया में हुई मुलाकात में दोनों राष्ट्रपतियों एक दूसरे के बीच पारस्परिक विश्वास बनाने में सफल भी रहे। ओबामा ने कहा कि सामरिक चिंताओं के अलावा दोनों देश आर्थिक चुनौतियों को साझा करते हैं। अमेरिका मानवाधिकार के महत्व पर जोर देना जारी रखेगा। वहीं चीन के राष्ट्रपति ने दोनों देशों के बीच संबंधों का भविष्य की रूपरेखा तय करने और प्रशांत महासागर के पार अपना सहयोग जारी रखने पर जोर दिया। 

 

वर्तमान समय में चीन-अमेरिका संबंध एक नये ऐतिहासिक प्रारंभ बिंदु पर पहुंचे हैं। दोनों देशों के व्यापक साझा हित हैं जिसमें स्वेदश में अपनी आर्थिक विकास दर को प्रोत्साहित करने से लेकर वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिरता सुनिश्चित करना अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय ज्वलंत मुद्दे से लेकर सभी तरह की वैश्विक चुनौतियों का सामना करना शामिल है। इन सभी मुद्दों पर दोनों देशों के बीच आदान-प्रदान और सहयोग बढ़ाने के लिए बातचीत हुई।


हरिनाथ कुमार

 

 

मोदी पर महाभारत

 

भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से नरेन्द्र मोदी की मुखरता ने भाजपा समेत देश की सियासत को हिलाकर रख दिया। मोदी के हाथ भाजपा की चुनाव कमान आते ही पहले अपनी उपेक्षा से आहत आडवाणी ने इस्तीफा दिया। बाद में मान-मनैव्वल के बाद माने और अब राजग गठबंधन टूट के कगार पर है। माना जा रहा है कि भाजपा का एक अध्याय समाप्त हुआ और अब नए अध्याय के पन्ने खुलने बाकी हैं।

 

भाजपा के वर्तमान को समझने के लिए इसके अतीत के पन्नों को पलटना होगा। जिस नरेन्द्र मोदी के कारण आडवाणी अपमानित महसूस कर रहे हैं। वे इन्हीं की देन हैं। पहला दृश्य ९ जून २०१३ का है। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को दरकिनार कर गोवा में पार्टी कार्यकारिणी ने फैसला किया है कि नरेन्द्र मोदी ही लोकसभा चुनाव-१४ की कमान संभालेंगे। लगभग ग्यारह साल पहले वर्ष २००२ का गोवा का ही एक दूसरा दृश्य भी है जिसमें पूरी भाजपा कार्यकारिणी मोदी के खिलाफ है सिर्फ आडवाणी ने ही मोदी का बचाव किया जिसके बाद ही उन्हें नया जीवनदान मिला। मोदी के जीवन का यह भी एक टर्निंग प्वाइंट था जिसके बाद उन्हें आज मीडिया में जपा जा रहा नमो क्रिएट करने का मौका मिल पाया। उसी गोवा में आडवाणी को साइड लाइन कर मोदी को २०१४ लोकसभा चुनावों की कमान सौंपी गई है।

 

अरस्तू ने अपनी मशहूर किताब पॉलिटिक्स में राजनीति को अस्थायी हुकूमत बताया है। जिन्ना कांड और २००९ की हार के बाद शायद यह तीसरा मौका है जब पितामह कहे जाने वाले आडवाणी को भाजपा में हाशिए पर धकेल दिया गया है। हालत यह है कि हिंदू सेना के कार्यकर्ता ८ जून को आडवाणी के घर के बाहर प्रदर्शन करते हैं और दादू मान जाओ के नारे भी लगाते हैं। हालांकि भाजपा ने इस प्रदर्शन से तत्काल पल्ला झाड़ लिया लेकिन मोदी का पोस्टर हाथ में लेकर प्रदर्शन कर रहे लोग आडवाणी को एक दिन पहले ही कार्यकारिणी का फैसला सुना चुके थे। मोदी पर फैसले के बाद प्रेस कांफ्रेस में अध्यक्ष राजनाथ सिंह के साथ दोनों सदनों के नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और अरुण जेटली और पूर्व पार्टी अध्यक्ष एम वेकैंया नायडू भी मौजूद रहे। राजनाथ ने द्घोषणा के बाद आखिर में कहा कि जो भी हुआ हैआम सहमति के आधार पर हुआ है। अगर इस आम सहमति को परखा जाए तो इसमें आडवाणी जसवंत सिंह शत्रुघ्न सिन्हा और उमा भारती जैसे वरिष्ठ नेता शामिल दिखाई नहीं देते। इसके अलावा एनडीए में शामिल सिर्फ अकाली और एडीएमके ने ही इसका खुले तौर पर स्वागत किया है। गौर करने लायक बात यह भी है कि द्घोषणा के बाद जब मोदी कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे तब मंच और आस-पास लगे पोस्टर्स में से अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी गायब हो चुके थे। मोदी ने अपने भाषण में कहा कि गोवा मेरे लिए हमेशा लकी रहा है। २००२ में गोवा में ही मुझे गुजरात को आगे ले जाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। आज गुजरात विकास की ऊंचाइयां छू रहा है।

 

बहरहाल मोदी के सामने धरातल से जुड़ी कुछ ऐसी सच्चाइयां भी हैं जिन्हें अनदेखा कर आगे बढ़ना उनके लिए लगभग नामुमकिन ही है। नियुक्ति से पहले जिस तरह से आडवाणी खेमे ने नाराजगी दिखाई है उससे अब मोदी के लिए सबसे पहली चुनौती यही है कि उन्हें इस मजबूत खेमे को भी साथ लाना होगा। पूरी संभावना है कि यह खेमा आने वाले दिनों में सक्रिय हो और मोदी को आंतरिक मोर्चे पर भी कई उलझनों का सामना करना पड़े। मोदी के सामने दूसरी सबसे बड़ी चुनौती पार्टी संगठन को मजबूती बनाना होगी। गुजरात में भले ही उन्होंने अपना संगठन मजबूत किया और एक रणनीति के तहत विपक्ष को कमजोर करके लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीते। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा करना आसान नहीं है। यह चुनौती इसलिए भी गंभीर है क्योंकि अब लोकसभा चुनाव को एक साल से भी कम वक्त रह गया है। ऐसे में उन्हें सभी राज्यों के नेताओं को अपने साथ लाकर वहां काम करना होगा। फिलहाल पार्टी में जोरदार गुटबंदी है। इसी गुटबंदी की वजह से बीते एक साल में ही पार्टी के हाथ से तीन राज्य हिमाचल प्रदेश उत्तराखंड और कर्नाटक रह गए हैं। यही नहीं अब महज तीन ही राज्य हैं जहां इस पार्टी की सरकार बची है। मोदी की सबसे पहली परीक्षा तो इसी साल के अंत में होने वाले चार राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं। इनमें छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकारें हैं जबकि राजस्थान और दिल्ली में भाजपा क्रमशः ५ और १४ साल से वनवास झेल रही है। अगर इन चुनावों में से पार्टी ने दो या उससे कम राज्यों के चुनाव जीते तो यह संदेश जाएगा कि मोदी का जादू नहीं चला। नीतीश कुमार भी निर्णायक मूड में हैं। जदयू का भाजपा से अलग होना तय लगता है। कभी एनडीए में शामिल बीजद के ओडीशा मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने एक इंटरव्यू के दौरान मोदी से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए कई अहम संकेत दिए। पटनायक ने कहा कि विकास के लिए सिर्फ मोदी जिम्मेदार नहीं हैं। गुजरात के लोग पहले से ही दूसरे प्रांतों के लोगों की तुलना में ज्यादा संपन्न थे। इसके लिए अगर कोई श्रेय का हकदार है तो वह गुजरात की जनता है। आप देख सकते हैं कि उत्तर प्रदेश और बिहार में वह किस तरह से निष्प्रभावी रहे। इसी तरह वीएचपी अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया ने मोदी पर तंज कसते हुए ट्विटर पर लिखा है कि लहरें समुद्र का अंश होती हैं विकल्प नहीं।

अंकित फ्रांसिस

 
         
 
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