fnYyh uks,Mk nsgjknwu ls izdkf'kr
चौदह o"kksZa ls izdkf'kr jk"Vªh; lkIrkfgd lekpkj i=
vad 15 30-09-2017
 
rktk [kcj  
 
प्रदेश 
 
खाली होता पहाड़

पहाड़ की जनसंख्या जिस तेजी से घट रही है उससे पर्वतीय राज्य का स्वरूप खतरे में है। अब भी यदि विधानसभा सीटों के परिसीमन में जनसंख्या घनत्व के साथ ही क्षेत्र की विषम भौगोलिक स्थितियों को आधार न बनाया गया तो २०२६ में राज्य निर्माण का सपना पूरी तरह से चकनाचूर हो जाएगा

 

जनगणना निदेशालय ने उत्तराखण्ड की जनसंख्या के जो आंकड़े जारी किये हैं वे बेहद चिंतित करने वाले हैं। २०११ की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल आबादी एक करोड़ ८६ लाख २९२ है। ग्रामीण क्षेत्रों में आबादी ११ ़५ तो शहरी क्षेत्रों में ३९ ़९ प्रतिशत के हिसाब से बढ़ी है। साफ है कि गांवों से पलायन हो रहा है और शहरों पर दबाव बढ़ रहा है। पहाड़ खाली हो रहे हैं और पहाड़ी राज्य का स्वरूप खतरे में है।

 

पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में लोग निरंतर पलायन कर रहे हैं। राज्य निर्माण के बाद यह सिलसिला और बढ़ा है। इससे पहाड़ के विकास को बड़ा झटका लग रहा है। उत्तराखण्ड राज्य की मांग वास्तव में पहाड़ के विकास को लेकर उठी थी। लेकिन आज भी वहां के विकास की योजनाएं उत्तर प्रदेश की तर्ज पर बनाई जा रही हैं। पलायन के चलते घटती जनसंख्या ने पहाड़ के विकास को और अधिक नुकसान पहुंचाया है। दरअसल वहां पर विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के लिए जो प्रक्रिया अपनाई गई है उसके चलते यह सोचने पर विवश होना पड़ रहा है कि आखिर भविष्य में उस पर्वतीय राज्य का स्वरूप कायम रह पाएगा जिसके लिए लोगों ने वर्षों संघर्ष कर कुर्बानियां दीं। २००१ के परिसीमन में जिस प्रक्रिया के तहत राज्य की विधानसभा सीटें घटीं उसके चलते २०२६ में होने वाले परिसीमन में यह सीटें इतनी कम हो जाएंगी कि पहाड़ी राज्य का नामोनिशान नहीं रह पाएगा। जाहिर है कि विधायकों की संख्या कम होने से विकास की निधि भी घटेगी। इससे विकास पर बुरा असर पड़ेगा। 

 

दुर्भाग्यवश परिसीमन आयोग में पहाड़ के जो चुने हुए जनप्रतिनिधि थे उन्होंने आयोग को उत्तराखण्ड की जमीनी सच्चाइयों से अवगत कराने की जरूरत महसूस नहीं की। वे आयोग को बता सकते थे कि इस सीमांत हिमालयी क्षेत्र में भी जम्मू-कश्मीर और सिक्किम की तरह छोटी-छोटी विधानसभा सीटें बनाई गईं। जनसंख्या के साथ ही क्षेत्र की विषम भौगोलिक स्थितियों को ध्यान में रखकर परिसीमन किया जाए। सिक्किम में १० हजार और जम्मू-कश्मीर में २५ हजार की आबादी पर विधानसभा सीटें बनाई गई। लेकिन उत्तराखण्ड के पर्वतीय लोगों के साथ परिसीमन आयोग ने जनसंख्या घनत्व के हिसाब से भी न्याय नहीं किया। राज्य गठन के बाद रुद्रप्रयाग एवं चंपावत जैसे विषम भौगोलिक स्थितियों वाले पहाड़ी जिलों में क्रमशः १ लाख १४ हजार एवं १ लाख १२ हजार की आबादी जबकि मैदानी जिले देहरादून में ५९१०६ की आबादी पर राजपुर सीट बनाई गई। विडंबना ही है कि हरिद्वार जहां कि १०० किलोमीटर की रफ्तार से गाड़ियां चलती हैं वहां विधानसभा क्षेत्र इतना कम क्षेत्रफल में है कि विधायक एक घटे में अपना पूरा क्षेत्र घूम सकता है। लेकिन १४३० वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले सीमांत पिथौरागढ़ जिले के धारचूला विधानसभा सीट के एक किनारे जौलजीवी से दूसरे किनारे चीन बॉर्डर तक जाने में वहां के विधायक को करीब १३५ किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। इसमें ४० किलोमीटर तक टुकड़ों में सड़क है। शेष ९५ किलोमीटर उसे पैदल ही जाना पड़ेगा। हरिद्वार में २६१ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में एक विधायक है जबकि सीमांत उत्तरकाशी में इसके दस गुना अर्थात २६४८ वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में एक विधानसभा सीट है। परिसीमन आयोग में रहे उत्तराखण्ड के जनप्रतिनिधि इन जमीनी सच्चाइयों को नहीं देख पाए। इससे राज्य निर्माण का जनता का सपना चकनाचूर हो गया है। पृथक राज्य आंदोलन का मकसद वास्तव में यही था कि राज्य में छोटी-छोटी विधानसभा सीटें होंगी। जो विधायक पांच साल में अपना पूरा क्षेत्र नहीं घूम सकते थे उन्हें आसानी होगी। विकास योजनाएं पर्वतीय  क्षेत्र की विषम भौगोलिक स्थितियों को ध्यान में रखकर बनेंगी लेकिन आज लोग खुद को छला हुआ महसूस कर रहे हैं। परिसीमन की प्रक्रिया से विधानसभा में पहाड़ का प्रतिनिधित्व निरंतर घटते रहने से वहां के विकास को बहुत बड़ा धक्का लगेगा। समय रहते ही इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो उत्तराखण्ड के समग्र विकास की बातें बिल्कुल ही बेमानी साबित होंगी।

दाताराम चमोली

किराए पर विकास

राजनीतिक लाभ लेने के लिए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने इस बार निकाय चुनाव से पूर्व चार नए नगर निगम कई नई नगर पालिका और नगर पंचायत बनाईं। मुख्यमंत्री को चुनाव में उम्मीद थी कि नए निकाय में उनकी पार्टी की जीत निश्चित होगी। लेकिन चुनाव में कांग्रेस को इसका लाभ नहीं मिला। अधिकतर जगहों पर पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। चुनाव के बाद अब जब निकाय स्थापित हुए दो महीने के करीब हो गए हैं लेकिन अभी तक यहां आधारभूत ढांचा स्थापित नहीं हो पाया है। कई नगर पंचायत के जनप्रतिनिधियों के बैठने के लिए भवन नहीं है तो कइयों में कर्मचारी नियुक्त नहीं हुए हैं। ऐसे में यह निकाय अपनी जिम्मेदारी कैसे निभाएगा पिथौरागढ़ जनपद का गंगोलीहाट ऐसी ही नई बनीं नगर पंचायत है।

 

गंगोलीहाट को पहली बार नगर पंचायत का दर्जा दिया गया है। यहां नगर पंचायत अध्यक्ष के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस को तीसरा स्थान प्राप्त हुआ। भाजपा के विमल रावल निर्दलीय पुरन सिंह रावल को हराकर जीत दर्ज की। चुनाव हुए दो महीने का वक्त गुजरने को है लेकिन अभी तक इसका खुद का कार्यालय नहीं खुल पाया है न ही स्टॉफ की नियुक्ति हो पाई है। नव निर्वाचित नगर पंचायत प्रतिनिधियों का अभी तक बैठने का कोई ठोर-ठिकाना नहीं है। कार्यालय एवं कर्मचारी न ठोने के कारण अभी तक नगर पंचायत के बोर्ड की एक भी बैठक नहीं हो पाई है। यहां तक कि इनका परिचयात्मक बैठक भी नहीं हुई है। जबकि हालिया निर्वाचित सभी निकायों के बोर्ड की बैठक हुए महीनों बीत चुके हैं। नगर पंचायत अध्यक्ष सहित कुल सात वार्ड सदस्यों के बैठने और रोजमर्रा के कार्यों को निपटाने के लिए कई कर्मचारियों की नियुक्ति होनी है। लेकिन यह कब तक होगा किसी को पता नहीं है। इस प्रकार की सरकारी उदासीनता नई नहीं है। क्षेत्र में कई अन्य संस्थाएं वर्षों से कार्य कर रही हैं लेकिन बिना संसाधनों के।

 

पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण गंगोलीहाट विकासखंड का विकास भगवान भरोसे चल रहा है। विकास के आधारभूत ढाचों की उपलब्धता वर्षों बाद भी नहीं बन पाई है। गंगोलीहाट के औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान के पास अपना भवन नहीं है। यह तीस वर्षों से किराए के भवन में चल रहा है। दो कमरों से संचालित हो रहे इस तकनीकी प्रशिक्षण संस्थान में विद्यार्थियों के लिए ढंग से बैठने की व्यवस्था तक नहीं है। प्रयोगशाला में काम करना तो दूर की बात है। 

 

वर्ष १९९५ में यहां रसोई गैस उपलब्ध कराने के लिए बना गैस गोदाम १८ सालों से लावारिस पड़ा है। तब इस भवन में करीब पांच लाख रुपए खर्च हुए थे। यही स्थिति राजीव नवोदय विद्यालय की भी है। बर्षों से यह भवनहीन चल रहा है। १२२ ग्राम पंचायतों वाले इस विकासखंड में एक पुलिस थाना भी नहीं है। जबकि लंबे समय से शराब के अवैध धंधों के साथ ही महिलाओं और बच्चियों के अवैध व्यापार के कई आपराधिक मामले यहां प्रकाश में आए हैं। उत्तर प्रदेश के समय  १९९५ में बस स्टेशन के निर्माण के लिए शिलान्यास का पत्थर लगा लेकिन इसका निर्माण तो दूर परिवहन निगम की बसों की संख्या घटाकर दो कर दी गई।

 

विकास मुख्यालय गंगोलीहाट स्थित महाकाली राजकीय इंटर कालेज शिक्षकों की कमी से जूझ रहा है। यहां प्रधानाचार्य सहित शिक्षकों के १३ पद खाली पड़े हैं। यही हालत विकास खंड के प्राइमरी जूनियर और इंटर कालेजों का भी है। अधिकांश विद्यालय प्रधानाचार्य एवं शिक्षक विहीन चल रहे हैं। आधे-अधूरे ढांचे में भविष्य के नौनिहालों को तैयार किया जा रहा है।

सड़कें किसी भी जिले या विकासखंड की पहचान होती हैं। विकास की दृष्टि से ये किसी भी क्षेत्र की लाइफ लाइन कहलाती हैं। लेकिन विकासखंड स्थित इन लाइफ लाइनों का बुरा हाल है। कुनल्ता-पोखरी मोटर मार्ग पव्वाधार-नैनी मोटर मार्ग बघर- डोबालखेत मोटर मार्ग गानूरा- मड़कनाली मोटर मार्ग सहित कई सड़कों के निर्माण को लेकर क्षेत्रीय जनता आंदोलित रही है। अच्छी- खासी दूनी-राईआगर सड़क  का चौड़ीकरण के नाम पर सत्यानाश कर दिया गया है। इस सड़क पर सफर करना जान जोखिम में डालना है। सीमांत एवं पिछड़ा क्षेत्र विकास निधि से एक करोड़ के विकास कार्य जिसमें से यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए ३५ लाख की लागत से रिंग रोड की बात  की गई थी वह भी अभी साकार नहीं हो पाई है। विकासखंड में बिजली पानी सड़क स्वास्थ्य जैसे मूलभूत बुनियादी सुविधाओं के लिए लोग संघर्षरत हैं। लेकिन विकास कार्यों को संपन्न कराने वाले आधारभूत ढांचे ही न बन पा रहे हों तो ऐसे में विकास कार्यों में गुणवत्ता और पारदर्शिता की बात तो परी कथाओं सी लगती है। बहरहाल विकास के नाम पर यहां के जनप्रतिनिधि कितनी ही फूल-मालाएं चढ़ाकर वाह-वाहवाही लूटने की नौटंकी कर रहे हों लेकिन  विकास की जमीनी हकीकत कुछ और ही बंया करती है।

 

बात अपनी अपनी

नगर पंचायत कार्यालय के लिए अखबारों में विज्ञप्ति निकाली गई थी। लेकिन अभी तक कोई रिस्पांस नहीं आया है जिस कारण कार्यालय की व्यवस्था नहीं हो पाई है। कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए जिलाधिकारी को अन्य नगर पंचायतों से कर्मी उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया है और नगर पंचायत भवन के लिए जमीन चयन से संबंधित पत्र शासन को तीन माह पूर्व भेज दिया गया है।

अनुराग आर्य एसडीएम गंगोलीहाट

 

जिलाधिकारी को कार्यालय एवं कर्मचारियों के लिए कई बार पत्र भेजा गया है लेकिन अभी तक उधर से कोई जवाब नहीं आया है। जिस कारण हमारे बोर्ड की कोई बैठक अभी तक नहीं हो पाई है। प्रदेश की कांग्रेस सरकार हमसे सौतेला व्यवहार कर रही है।

विमल रावल अध्यक्ष नगर पंचायत गंगोलीहाट

 

भाजपा ने सड़कों के निर्माण को लेकर काम किया था। वह कांगे्रस सरकार के कार्यकाल में ठप पड़ा है। पूरे जनपद में सड़क को लेकर पूरे साल कोई काम नहीं हो पाया। इस दुर्दशा के लिए प्रशासनिक स्थिति का शून्य होना जिम्मेदार है।

सुरेश जोशी वरिष्ठ नेता भाजपा

 

गंगोलीहाट में विकास शून्य है। राजनीतिक दलों ने विकास के नाम पर सिर्फ जनता को ठगने का काम किया है। अगर विकासखंड के लोगों को विकास चाहिए तो उन्हें जागरूक होना पड़ेगा। एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी।

पूरन सिंह रावल राजनीतिक कार्यकर्ता

 

दिनेश पंत

 
         
 
ges tkus | vkids lq>ko | lEidZ djsa | foKkiu
 
fn laMs iksLV fo'ks"k
 
 
fiNyk vad pquss
o"kZ  
 
 
 
vkidk er

क्या मुख्यमंत्री हरीश रावत के सचिव के स्टिंग आॅपरेशन की खबर से कांग्रेस की छवि प्रभावित हुई है?

gkW uk
 
 
vc rd er ifj.kke
gkW & 68%
uk & 14%
 
 
fiNyk vad

  • गुंजन कुमार

किडनी बेचने का रैकेट अब महानगरों से होकर देश के छोटे शहरों तक पहुंच गया है। इस अमानवीय धंधे में लिप्त गिरोह गरीबों की मजबूरी का फायदा उठाकर

foLrkkj ls
 
 
vkidh jkf'k
foLrkkj ls
 
 
U;wtysVj
Enter your Email Address
 
 
osclkbV ns[kh xbZ
1828404
ckj