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खास खबर 
 
संगीता की मौत से उठे सवाल

संगीता की मौत से साफ हो गया है कि उत्तराखण्ड में शराब का विरोध करने वाली महिलाओं को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। शासन-प्रशासन और शराब माफिया उनकी आवाज को दबाने के लिए हर हथकंड़े आजमाते रहे हैं। ६०-७० के दशक में उन्हें जेलों में ठूंसा गया। १९९४-९५ में धरने पर बैठी एक महिला का अपहरण कर उसके साथ दुष्कर्म किया गया अब तो हालत यह है कि खौफ पैदा करने के लिए घरों के भीतर घुसकर आंदोलनकारी महिलाओं की हत्याएं की जा रही हैं। हैरानी की बात यह है कि पुलिस- प्रशासन सब कुछ जानते हुए भी हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है

 

शराब के खिलाफ नशा नहीं रोजगार दो जैसे ऐतिहासिक आंदोलन चलाने वाली उत्तराखण्ड की जनता को आज भी इस बुराई से छुटकारा नहीं मिल पाया है। शराब तस्कर और माफिया अपने अवैध धंधे को फैलाने के लिए जनता के साथ हिंसक पशुओं जैसा बर्ताव कर रहे हैं। शराब के खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाने के लिए वे लोगों में दहशत पैदा कर रहे हैं। घरों में घुस कर महिलाओं की हत्याएं कर रहे हैं। बागेश्वर जिले के बानरी (मंडलसेरा गांव की आशा कार्यकत्री संगीता मलडा की मौत इसका ज्वलंत उदाहरण है। २९ वर्षीय संगीता का कसूर यह था कि उसने अपने गांव में ही परचून की दुकान पर अवैध शराब का धंधा करने वालों के खिलाफ मोर्चा खोलकर पुलिस-प्रशासन में शिकायत की थी। पुलिस-प्रशासन ने संगीता की शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की जिससे शराब माफिया के हौसले बुलंद हो गए। नतीजा वह हुआ जिससे लोगों के कलेजे हिल गए। २९ मई को संगीता अपने घर में संदेहास्पद अवस्था में मृत पाई गई। 

 

गांव की महिलाएं दुखी थीं कि उनके पति नशे के आदी हो गए और शराब पीकर अपने घरों में मारपीट करते थे। इस पर संगीता ने गांव की महिलाओं को एकजुट किया फिर अवैध शराब का धंधा करने वालों के खिलाफ उपजिलाधिकारी एवं जिलाधिकारी को शिकायती पत्र भेजा। जिस पर उसने कई महिलाओं के भी हस्ताक्षर थे। कई दिनों तक जब महिलाओं की शिकायत पर कुछ नहीं हुआ तो २० मई २०१३ को उन्होंने बागेश्वर के उपजिलाधिकारी के सम्मुख प्रदर्शन कर गांव में शराब का धंधा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग दोहराई। इसके बाद प्रशासन ने बहाना बनाया कि शिकायती पत्र पर शराब का अवैध धंधा करने वालों के नाम दर्ज नहीं हैं। जिसके कारण वह कार्रवाई करने में सक्षम नहीं है। इसके बाद २४ मई को एक बार फिर बागेश्वर के जिलाधिकारी को गांव में शराब का अवैध कारोबार करने वालों का नामोल्लेख करते हुए ज्ञापन सौंपा गया। इसके साथ ही संगीता ने जिलाधिकारी से अपनी और शराब के विरोध में उतरी महिलाओं की सुरक्षा की मांग भी की। लेकिन जिला प्रशासन उदासीन बना रहा।

 

प्रशासन की इसी उदासीनता का परिणाम २९ मई को सामने आया। शराब तस्करों ने संगीता के घर में घुसकर उसके साथ जोर जबरदस्ती और मारपीट करनी शुरू कर दी। संगीता का पति प्रकाश मलडा उस वक्त घर में नहीं था। प्रकाश बागनाथ स्थित एक प्रेस में कार्य करता है। संगीता ने फोन पर प्रकाश को जानकारी दी कि वे लोग घर में घुस कर उसके साथ मारपीट कर रहे हैं। उसकी जान को खतरा है। हालांकि फोन सुनते ही ही प्रकाश बागनाथ से अपने घर को चल दिया लेकिन उसने पुलिस को इसकी जानकारी नहीं दी। बताया जाता है कि संगीता ने अपने साथ हो रही मारपीट की सूचना ग्राम प्रधान के पति किशन सिंह मलडा को भी दी थी। लेकिन प्रधानपति ने भी उसकी सहायता के लिए कोई कोशिश नहीं की। जबकि ग्राम प्रधानपति संगीता का रिश्ते में जेठ लगता है।

 

संगीता का पति प्रकाश जब तक घर पहुंचा तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। उसने घर में संगीता को मृत अवस्था में पाया। प्रकाश के अनुसार जब वह घर पहुंचा तो घर का सारा सामान बिखरा पड़ा था। राशन-पानी तक इधर-उधर छिटका हुआ था। मृतका के नोचे गए बाल घर में बिखरे पड़े थे। उसके मुंह से झाग निकल रहा था। संगीता के गले का हार भी गायब था। यह स्थिति संगीता की हत्या की कहानी कह रही थी। लेकिन बताया जाता है कि तस्करों से संबंध रखने वाले गांव के कुछ लोगों ने मामले को दबाने के लिए आनन-फानन में ही संगीता का अंतिम संस्कार करवा दिया। इसके साथ ही तस्करों के इशारों पर गांव के कुछ लोगों ने यह भी प्रचारित करा दिया कि संगीता ने महिला समूह का पैसा खा लिया था इसके चलते ही उसको आत्महत्या करनी पड़ी। जबकि महिला समूह की कोषाध्यक्ष रमुली देवी के अनुसार समूह का सारा पैसा बैंक में जमा है और संगीता द्वारा पैसे के हेर-फेर का सवाल ही नहीं उठता।

 

गौरतलब है कि संगीता स्वयं सहायता समूह की अपने गांव की अध्यक्ष भी थी। गांव की महिलाएं बताती हैं कि संगीता पूरे उल्लास के साथ संघर्षमय जीवन जीती थी। इसलिए कई वर्षों पूवर् पढ़ाई छूट जाने के बाद उसने इसी साल हाईस्कूल की परीक्षा पास की थी। वह २८ मई को पूरे गांव में रिजल्ट लेकर खुशी से द्घूम रही थी। ऐसे में वह कैसे आत्महत्या कर सकती है? दरअसल जब शराब के खिलाफ मुहिम शुरू की तभी माफिया ने संगीता मौत की साजिश रच डाली थी।

 

शराब माफिया द्वारा किसी महिला को मौत के द्घाट उतारने की यह कोई पहली घटना नहीं है। देवभूमि में इससे पूर्व भी शराब माफिया ने शराब विरोधी आंदोलन में उतरी महिलाओं के साथ अत्याचार किये। ६०-७० के दशक में हुए शराब विरोधी आंदोलन में महिलाओं को जेलों में डाला गया। वर्ष १९६८ में इसकी कमान महिलाओं के ही हाथ में थी। बाद में यह आंदोलन नशा नहीं रोजगार दो के नारे के साथ ७० के दशक का बड़ा आंदोलन बना। १९९४-९५ में काफलीखान में शराब विरोधी आंदोलन में बैठी महिलाओं से दुर्व्यवहार करने की पुलिस ने कोई भी कसर नहीं छोड़ी थी। तब शराब माफिया के इशारे पर पुलिस ने आंदोलनकारी महिलाओं के पतियों को गिरफ्तार कर थाने में ले जाकर प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था। लेकिन इसका चौतरफा विरोध होने के बाद पुलिस ने उन्हें थाने से रिहा कर दिया था। शराब माफिया ने उस समय तो अति ही कर दी थी जब शराब के विरोध में धरने पर बैठी एक महिला का अपहरण कर उसके साथ दुष्कर्म कर अमानवीयता की सारे हदें पार की गईं। प्रत्येक वर्ष मार्च माह के बाद खुलने वाले शराब के नए ठेकों के विरोध में सड़कों पर उतरने में महिलाएं ही आगे रहती हैं। पिछले दो-तीन वर्षों में दन्या ताकुला बसोली भतरोजखान सहित कई अन्य जगहों पर महिलाओं के नेतृत्व में धरना-प्रदर्शन हुए। जिसमें शराब माफिया को झुकना पड़ा।

 

संगीता प्रकरण में सुलगता सवाल यह है कि उपजिलाधिकारी और जिलाधिकारी सहित पुलिस के आला अधिकारियों को शराब की तस्करी और अवैध बिक्री में लिप्त आरोपी लोगों के नाम लिखित रूप से दिए जाने के बावजूद उन पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? गांव के लोगों की इस बात का जवाब कौन देगा कि शराब तस्करों द्वारा पुलिसकर्मियों को हर माह एक तयशुदा रकम दी जाती थी। पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से न लेते हुए आत्महत्या सिद्ध करने की कोशिश की। हालांकि इस मामले में पुलिस को उस समय मुंह की खानी पड़ी जब गांव की महिलाओं आशा कार्यकत्रिओं के साथ ही भाकपा (माले के कार्यकर्ताओं ने संगीता की हत्या का मामला दर्ज कराने के लिए थाने का द्घेराव किया। इससे घबराकर पुलिस-प्रशासन ने मामले को आत्महत्या से हत्या में तब्दील कर तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया लेकिन अभी भी कई आरोपियों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। संगीता प्रकरण में पुलिस ने बिना कोई जांच पड़ताल किए ही जिस तरह इसे आत्महत्या का मामला दर्शाया है वह कानून व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाता है। संगीता के पति और प्रधानपति की संवेदनहीनता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। वह यह कि जब संगीता ने उन दोनों को फोन पर ही यह सूचना दे दी थी कि आरोपी उसके साथ मारपीट कर रहे हैं तो उसको बचाने का प्रयास क्यों नहीं किया गया? संगीता की मौत के मामले में घटनास्थल पर जोर-जबरदस्ती के जो सबूत मिले उनको जांच में शामिल न करना और आनन -फानन में ही मृतका का अंतिम संस्कार कराने के पीछे की कहानी क्या है?

 

 

बात अपनी अपनी

इस मामले में पुलिस-प्रशासन की लापरवाही रही है। अगर मामले को गंभीरता से लेकर समय से कार्रवाई की जाती तो संगीता की जान नहीं जाती। पुलिस की नाकामी की वजह से इस क्षेत्र में हर परचून की दुकान पर शराब बिक रही है। सरकार का शराब माफिया को पूरी तरह संरक्षण मिल रहा है। जिसके कारण वे बेखौफ होकर आपराधिक कार्यों को अंजाम दे रहे हैं।

चंदन रामदास विधायक बागेश्वर

 

संगीता मामले में हमने तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया है और अभी एक की गिरफ्तारी होनी बाकी है। जो लोग अब आरोपियों के खिलाफ मुखर हो रहे हैं वे घटना वाले दिन सामने नहीं आए। कारण हमें इन्वेस्टीगेशन में दिक्कतें आ रही हैं।

नवोदिता कुकरेती पुलिस अधीक्षक बागेश्वर

 

संगीता की शराब माफिया ने उसके घर में हत्या की है। इसका सबूत घर में पड़े उसके बाल बिखरा सामान लूटे गए आभूषण हैं। हत्या को आत्महत्या का रूप देने के लिए मुंह में नुवान (कीटनाशक दवा डाल दिया गया और प्रचारित कर दिया गया कि संगीता ने जहर खाकर आत्महत्या की है।

जगत मर्तोलिया सचिव भाकपा (माले कुमाऊं

 

कांग्रेस सरकार शराब माफिया को संरक्षण देने का काम कर रही है। सरकार खुद चाहती है कि शराब परचून की दुकानों पर मिले। इसके चलते ही बार आदि के लाइसेंस थोक के भाव में बांटे जा रहे हैं। सरकार ने शराब की तस्करी को गैर जमानती नहीं बनाया। जब तक राजनीतिक परिवर्तन नहीं आयेगा तब तक संगीताएं यूं ही मारी जाती रहेंगी।

पी.सी. तिवारी अध्यक्ष परिवर्तन पार्टी


आकाश नागर साथ में रवि जोशी और नीरज पाण्डेय

 
         
 
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