fnYyh uks,Mk nsgjknwu ls izdkf'kr
चौदह o"kksZa ls izdkf'kr jk"Vªh; lkIrkfgd lekpkj i=
vad 6 29-07-2017
 
rktk [kcj  
 
आवरण कथा
 
पतन सरकार या पत्रकारिता का

उत्तराखण्ड में पत्रकारिता जन आंदोलनों से प्रेरित रही है। लेकिन राज्य गठन के बाद सरकार ने इसका स्वरूप खराब करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। जहां एक ओर मीडिया रानों को अरबों रुपये के विज्ञापन देकर उपकृत किया जाता रहा है तो वहीं दूसरी तरफ रिपोर्टिंग के नाम पर उन मीडिया रानों के पत्रकार सूचना विभाग की टैक्सियों में सैर-सपाटे कर रहे हैं। उनमें अपने परिजनों और रिश्तेदारों को घुमा रहे हैं। जनवरी २००८ से लेकर अप्रैल २०१३ तक करीब डेढ़ सौ पत्रकारों ने अपने निजी कामों के लिए सूचना विभाग से टैक्सियां लेकर सरकार पर करोड़ों रुपए का आर्थिक बोझ डाला

 

उत्तराखण्ड राज्य का सूचना विभाग एक तरफ दूर-दराज के क्षेत्रों में पहुंचने वाले छोटे मंझोले समाचार पत्रों के विज्ञापनों में कटौती करता रहा है और दूसरी ओर दैनिक अखबारों और न्यूज चैनल्स पर करोड़ों रुपए लुटाता रहा है। इससे भी बड़ी हैरानी की बात यह है कि इन अखबारों और चैनलों के पत्रकारों को न्यूज कवरेज के लिए नियम विरुद्ध वाहन सुविधाएं उपलब्ध कराकर सूचना विभाग करोड़ों रुपए फूंक चुका है। ये पत्रकार खबर तो अपने संस्थानों के लिए संकलित करते हैं लेकिन इसके लिए टैक्सियां सूचना विभाग से लेते हैं। इतना ही नहीं कुछ तो इन टैक्सियों का दुरुपयोग सैर-सपाटे और अपने परिजनों एवं रिश्तेदारों को लाने-ले जाने के लिए भी करते हैं। जनवरी २००८ से लेकर अप्रैल २०१३ तक करीब डेढ़ सौ पत्रकारों ने अपने रुतबे का दुरुपयोग कर ८५० बार सरकारी वाहनों से उत्तराखण्ड और उत्तराखण्ड के बाहर विभिन्न जगहों पर घूमे जिससे सरकार को करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ। वाहनों का दुरुपयोग करने में न सिर्फ अखबारों और न्यूज चैनल्स के पत्रकार बल्कि पत्रकार संगठनों के पदाधिकारी भी पीछे नहीं रहे हैं।

 

उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड राज्य में पत्रकारिता आजादी के राष्ट्रीय आंदोलन के साथ ही यहां की धरती पर उपजे तमाम जन आंदोलनों से प्रेरित रही है। इसके अलावा यहां के पत्रकारों ने समय-समय पर जन आंदोलनों में अहम भूमिका निभाई है। राज्य गठन के बाद जनता को अपेक्षाएं थीं कि पत्रकारिता उसकी समस्याओं को उठाने के साथ ही सरकार की गलत नीतियों और जनविरोधी फैसलों पर अंकुश लगाने का काम करेगी। लेकिन जनता का दुर्भाग्य ही रहा कि यहां ऐसी गलत परंपरा चल पड़ी कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के प्रहरी ही सरकारी सुविधाओं के दुरुपयोग में मशगूल हो गए। सूचना का अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी के मुताबिक जनवरी २००८ से लेकर अप्रैल २०१३ तक पत्रकारों ने नियम विरुद्ध सरकारी वाहन टैक्सी सेवाओं का दुरुपयोग कर सरकार को करोड़ों रुपये का चूना लगाया। ऐसे में सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे सरकार के जनविरोधी कामों और भ्रष्टाचार के विरुद्ध कितने साहस से अपनी कलम चला पाए होंगे। 

 

सरकारी वाहन टैक्सी का इस्तेमाल करने वालों में सबसे अव्वल उस अंग्रेजी दैनिक अखबार दि हिंदू के पत्रकार हैं जिसका उत्तराखण्ड में नाम मात्र का प्रसार (सर्कुलेशन है। 

 

राजधानी देहरादून के अतिरिक्त इसकी प्रतियां शायद ही राज्य में कहीं अन्य दिखाई देती हों। लेकिन 'दि हिंदू' के पत्रकार ने सरकारी टैक्सी से कई बार अल्मोड़ा हल्द्वानी चंपावत पिथौरागढ़ और दिल्ली के दौरे किये। सूचना विभाग ने अकेले 'दि हिंदू' के पत्रकार पर जनवरी २००८ से अप्रैल २०१३ तक अलग-अलग तिथियों पर टैक्सी उपलब्ध कराने के नाम पर ३ लाख ९४ हजार ७८४ रुपए खर्च किए।

दि हिंदू के बाद हिंदी दैनिक अखबार हिन्दुस्तान के पत्रकार का नंबर आता है। 'हिन्दुस्तान' के पत्रकार ने ४ अप्रैल २००८ से लेकर ३१ अक्टूबर २००९ के बीच ही विभिन्न तिथियों में हरिद्वार मसूरी रुड़की कोटद्वार रामनगर आदि जगहों पर समाचार संकलन के नाम पर टैक्सी ली। यह सुविधा उपलब्ध कराने में सूचना विभाग को २ लाख १८ हजार २८६ रुपए खर्च करने पड़े। सरकारी टैक्सी प्राप्त करने का सिलसिला २२ मार्च २०१३ तक जारी था। 

 

खर्च के हिसाब से 'हिन्दुस्तान' के बाद सरकारी टैक्सी का दुरुपयोग करने में श्रमजीवी पत्रकार संघ का नाम आता है। जून २००१ से लेकर अप्रैल २०१३ तक संघ के एक पदाधिकारी ने अल्मोड़ा ऊधमसिंहनगर नैनीताल कोटद्वार मसूरी हरिद्वार आदि जगहों के लिए कई बार सूचना विभाग से टैक्सी ली। हैरानी की बात तो यह है कि उन्होंने ३० मई से १ जून २०१० तक दिल्ली के लिए टैक्सी सुविधा ली और ३० मई २०१० को ही सूचना विभाग ने उन्हें मसूरी के लिए भी टैक्सी उपलब्ध कराई। इससे स्पष्ट होता है कि आखिर एक ही समय और एक तिथि में एक पत्रकार दो टैक्सियों में दो अलग-अलग स्थानों पर कैसे मौजूद रह सकता है। यह जांच के बाद ही पता चल सकता है कि आखिर श्रमजीवी संघ का वह पदाधिकारी दोनों जगहों में से कहां पर थे। वर्ष २००८ से २०१३ तक दर्जनों बार यूनियन के नाम पर टैक्सी प्राप्त करने वाले संघ के उक्त पदाधिकारी अप्रैल २०१३ में भी अपने इस सिलसिले को कायम रखे हुए हैं। १२ से १४ अप्रैल २०१३ तक उन्होंने सूचना विभाग से टैक्सी ली फिर १८ से १९ अप्रैल को भी विभाग से टैक्सी ली। अब सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि हफ्ते में ४ दिन के लिए टैक्सी लेने वाले पत्रकार ने दोनों बार अपनी दिल्ली यात्रा का मकसद यूनियन की बैठक में भाग लेना दिखाया है। यहां सवाल उठता है कि यूनियन की बैठक १२ से १४ अप्रैल को थी या फिर १८ से १९ अप्रैल। गौरतलब है कि पत्रकार संगठनों की बैठक में भाग लेने के लिए सूचना विभाग द्वारा पत्रकारों को टैक्सी उपलब्ध कराए जाने का कोई नियम या आदेश नहीं है।

 

हिन्दी समाचार चैनल 'वॉयस ऑफ नेशन' के पत्रकार को भी ऐसी सुविधा उपलब्ध कराई है। सूचना विभाग की टैक्सियों में इस मीडिया हाउस के पत्रकार ने न सिर्फ राज्य के ऋषिकेश हल्द्वानी नैनीताल टिहरी जैसे शहरों की बल्कि उत्तर प्रदेश दिल्ली हरियाणा और चण्डीगढ़ की भी सैर की। यहां सवाल उठता है कि 'वॉयस ऑफ नेशन' के पत्रकार पत्रकारिता उत्तराखण्ड में कर रहे थे या फिर सहारनपुर दिल्ली चण्ड़ीगढ़ जैसे शहरों में? अगर वे दूसरे राज्यों में सरकारी सुविधाओं के साथ पत्रकारिता कर रहे थे तो उनकी पत्रकारिता कितनी निष्पक्ष रही होगी इसका अंदाजा हर कोई लगा सकता है। वैसे देखने में तो यही लगता है कि उनकी किसी भी यात्रा में पत्रकारिता का कहीं दूर-दूर तक नाम नहीं था। 

 

इसके बाद इस कड़ी में एएनआई न्यूज एजेंसी के पत्रकार भी हैं। इस एजेंसी के कैमरामैन समाचार संकलन के नाम पर सरकारी टैक्सी में दिल्ली-यूपी और समूचे उत्तराखण्ड में कई जगहों पर घूम चुके हैं। इसी तरह आईबीएन-७ राष्ट्रीय चैनल के देहरादून प्रतिनिधि ने भी सरकारी टैक्सी का जमकर लुत्फ उठाया। उत्तराखण्ड समेत हरियाणा दिल्ली और चण्डीगढ़ में समाचार संकलन के लिए सूचना विभाग से टैक्सी लेते रहे। सूत्रों के मुताबिक समाचार संकलन के नाम पर कई पत्रकारों ने न सिर्फ अपने परिजनों को पर्यटन और तीर्थ स्थलों की सैर करवाई बल्कि अपने रिश्तेदारों को भी जरूरत पड़ने पर सूचना विभाग की टैक्सियां लेकर दीं। सूचना विभाग से इस सुविधा का लाभ उठाने वाले ८५० पत्रकारों में जनसत्ता सहारा समय न्यूज चैनल आज तक इंडिया टीवी ईटीवी दैनिक जागरण शाह टाइम्स और कई स्वतंत्र पत्रकार आदि शामिल हैं।

 

इस संबंध में सरकारी आदेशों की ओर भी नजर डालें तो कहीं भी पत्रकारों को व्यक्तिगत रूप से सरकारी वाहन उपलब्ध कराने अथवा टैक्सी उपलब्ध कराने का जिक्र तक नहीं है। २० फरवरी २००६ के शासनादेश के अनुसार प्रदेश की विकास योजनाओं का प्रचार-प्रसार करने के उद्देश्य प्रेस को कहीं ले जाने की जरूरत पड़ी तो इसके लिए महानिदेशक सूचना द्वारा प्रेस टूर का आयोजन किया जाएगा। टूर में जाने वाले पत्रकारों की संख्या-३ से कम नहीं होगी। यह टूर भ्रमण कार्यक्रम तीन दिन से अधिक का नहीं होगा। ऐसे भ्रमण कार्यक्रमों में एक या दो सरकारी कर्मचारी महानिदेशक सूचना के निर्णयानुसार रहेंगे। विकास योजनाओं के इस भ्रमण कार्यक्रम की समाप्ति के १० दिन के भीतर भ्रमण दल के संयोजक अधिकारी द्वारा भ्रमण समीक्षा महानिदेशक को प्रस्तुत की जाएगी। जिसमें शामिल पत्र/पत्रिकाओं के प्रतिनिधियों के नाम और उनके द्वारा किए गए अध्ययन का पूर्ण उल्लेख किया जाएगा। सरकारी आदेश में प्रेस टूअर जिसमें सूचना विभाग का एक कर्मचारी कम से कम शामिल रहना चाहिए के अतिरिक्त पत्रकारों को दिल्ली गुड़गांव चण्डीगढ़ यूपी और उत्तराखण्ड में ही कहीं भी व्यक्तिगत रूप से सरकारी वाहन/टैक्सी उपलब्ध कराने का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। इसका मतलब साफ है कि प्रेस टूअर के नाम पर सूचना विभाग की मिलीभगत पर राजधानी के पत्रकार ही सरकार को करोड़ों का चूना लगाने में मशगूल हैं। समय-समय पर मीडिया पर सरकारी खामियां छिपाने और सरकार विरोधी समाचार न छापने के आरोप लगते रहे हैं तो इसका मुख्य कारण नियम विरुद्ध धड़ल्ले से उपलब्ध कराई जा रही टैक्सियां ही हैं।

 

बात अगर व्यवस्था की करें तो न्यूज कवरेज और सरकारी कार्यक्रमों की कवरेज के लिए राज्य सरकार की ओर से पत्रकारों को अधिकृत किया जाता है। जिसके अंतर्गत मान्यता प्राप्त पत्रकार को ३ हजार किमी तक का सफर उत्तराखण्ड परिवहन निगम की सभी श्रेणी की बसों में निःशुल्क कर सकते हैं। एक वर्ष में दो बार ५० प्रतिशत की छूट के साथ रेल में भी यात्रा की सुविधा प्रदान की गई है। एक ओर तो सूचना विभाग परिवहन विभाग को पत्रकारों द्वारा बसों से की गई यात्रा की एवज में प्रति वर्ष लाखों रुपए का भुगतान कर रहा है तो वहीं दूसरी ओर राजधानी में बैठे पत्रकार टैक्सियों में यात्रा कर सरकार को करोड़ों का चूना लगा रहे हैं।

 

बात अपनी अपनी

पत्रकारों को मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों की कवरेज के लिए विभाग द्वारा टैक्सी उपलब्ध कराई जाती है। जहां तक पत्रकारों द्वारा टैक्सी का दुरुपयोग का सवाल है तो इस संबंध में दिशा- निर्देश जारी कर दिए गए हैं। पूर्व के मुकाबले पत्रकारों को दी जाने वाली टैक्सी व्यवस्था में कमी आई है।

 

विनोद शर्मा महानिदेशक सूचना एवं लोक संपर्क विभाग


 यह नियम विरुद्ध है। कोई भी सुविधा हो सभी को एक समान मिलनी चाहिए।

ए. रमन राष्ट्रीय पार्षद आईएफ डब्ल्यू जे


पत्रकारों को टैक्सी व्यवस्था उपलब्ध कराने पर आपत्ति ऑडिट आब्जेक्शन लग गई है। यह व्यवस्था पत्रकार यूनियनों के प्रतिनिधियों के लिए थी। इसकी आड़ में विभिन्न पत्रकार इस व्यवस्था का लाभ उठा रहे हैं जो कि नियम विरुद्ध है।

विश्वजीत नेगी प्रदेश महामंत्री श्रमजीवी पत्रकार सं उत्तराखण्ड


टैक्सी व्यवस्था पर तत्काल रोक लगाई जाए। यह सरकारी धन का दुरुपयोग है। जिन पत्रकारों ने टैक्सी की सुविधा ली है उनसे धन की रिकवरी की जाए।

विक्रम छाछर वरिष्ठ पत्रकार

 

अहसान अंसारी

 
         
 
ges tkus | vkids lq>ko | lEidZ djsa | foKkiu
 
fn laMs iksLV fo'ks"k
 
 
fiNyk vad pquss
o"kZ  
 
 
 
vkidk er

क्या मुख्यमंत्री हरीश रावत के सचिव के स्टिंग आॅपरेशन की खबर से कांग्रेस की छवि प्रभावित हुई है?

gkW uk
 
 
vc rd er ifj.kke
gkW & 66%
uk & 13%
 
 
fiNyk vad

ऐसा लगता है कि लालू प्रसाद और उनके  परिवार के बुरे दिन शुरू हो गए हैं। सरकार में उनके दो&दो पुत्रों के मंत्री बनने पर लगता था कि उनके अच्छे दिन लौट आए थे। मगर अच्छे दिनों की मियाद बहुत

foLrkkj ls
 
 
vkidh jkf'k
foLrkkj ls
 
 
U;wtysVj
Enter your Email Address
 
 
osclkbV ns[kh xbZ
1742155
ckj