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मेरी बात अपूर्व जोशी
 
खेल निजी महत्वाकांक्षा का

लालकृष्ण आडवाणी इस सच को पचा नहीं पा रहे हैं कि वे अब ८६ वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक उम्मीदवार नहीं समझे जा सकते हैं। वे यह भी मानने को तैयार नहीं कि उनके पास अटल बिहारी वाजपेयी जैसी उदार एवं करिश्माई छवि नहीं जिसके सहारे भाजपा को वोट मिल सकें और वह २०१४ के लोकसभा चुनाव में सरकार बनाने लायक बहुमत पा सके। उनके सिर पर प्रधानमंत्री बनने का भूत सवार है जो उन्हें किसी भी सच को स्वीकारने से रोक देता है। रही बात नरेन्द्र मोदी की तो यह समझना जरूरी है कि उनकी जिस लोकप्रियता का बार-बार राजनाथ सिंह हवाला दे रहे हैं और जिस दरियादिली का परिचय दे उन्हें २०१४ के चुनाव में भाजपा का चेहरा बनाने में जुटे हैं उसके पीछे राजनाथ की महत्वाकांक्षा का होना है। और यह महत्वाकांक्षा है देश का प्रधानमंत्री बनना

 

भारतीय जनता पार्टी के भीतर चल रहा शह-मात द्घात-प्रतिद्घात का खेल दरअसल किसी आदर्श अथवा सिद्धांत से भटकाव की देन नहीं बल्कि पार्टी नेताओं की निजी महत्वाकांक्षा के चलते है। जो कुछ राष्ट्रीय स्तर में भाजपा के भीतर चल रहा है उसे यदि उत्तराखण्ड कांग्रेस में मचे घमासान से जोड़ कर देखा जाए तो यह समझना कठिन नहीं कि दोनों ही सत्ता संघर्ष और स्वार्थ की राजनीति की देन हैं। 

 

लालकूष्ण आडवाणी ने अपने इस्तीफे में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी दीनदयाल उपाध्याय और नानाजी देशमुख के आदर्शों का जिक्र करते हुए लिखा कि जो आदर्शवादी पार्टी इन नेताओं ने बनाई थी भाजपा अब वह पार्टी नहीं रही। प्रश्न यह उठता है कि आडवाणी जी को इतनी देर से यह समझ में क्यों आया? जब वे देश के उप प्रधानमंत्री थे और उनकी सरकार पर सरकारी कंपनियों के विनिवेश को लेकर गंभीर आरोप लग रहे थे तब उन्हें यह अहसास क्योंकर नहीं हुआ? कारगिल के शहीदों की कफन खरीद में लूट-खसोट के आरोप तक उनकी सरकार पर लगे तब आडवाणी जी को क्योंकर डॉ मुखर्जी अथवा दीनदयाल उपाध्याय याद नहीं आए? उत्तराखण्ड में उनकी पार्टी की सरकार ने पूरे पांच साल तक शासन किया। गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप इस दौरान मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडलीय सदस्यों पर लगे कई बार राज्य के उच्च न्यायालय ने सरकार के कामकाज पर कठोर टिप्पणी तक की लेकिन लालकूष्ण आडवाणी खामोश रहेक्यों? दक्षिण भारत में पहली बार भाजपा को कर्नाटक में अपने दम पर सरकार बनाने का मौका मिला था। बीएस येदियुरप्पा के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार शायद आजाद भारत में किसी भी राज्य की सबसे भ्रष्टतम सरकार रही। जब मीडिया दे दना दन येदियुरप्पा के काले कारनामों का खुलासा कर रहा था तब लालकूष्ण आडवाणी खुलकर कभी कुछ न बोले न ही अपने ब्लॉग पर ही उन्होंने कुछ लिखा क्यों? क्यों नहीं बेल्लारी के कुख्यात रेड्डी बंधुओं को पार्टी में शामिल कराए जाने का उन्होंने विरोध किया? और क्यों अपनी करीबी सुषमा स्वराज को फटकारा नहीं? बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं की सुषमा स्वराज से नजदीकी कोई राज की बात तो थी नहीं। और इन सबसे कहीं गंभीर बात उनके द्वारा २००२ के गुजरात दंगों बाद इन्हीं नरेन्द्र भाई मोदी का साथ देना है। आज पार्टी में अलग-थलग पड़ जाने के बाद आडवाणी जी लिख रहे हैं कि अब पार्टी नेताओं का मुख्य उद्देश्य अपना निजी एजेंडा है। यह बात उन्हें तब क्यों नजर नहीं आई जब स्वयं प्रधानमंत्री बनने की छटपटाहट में हर वह काम करने को तैयार थे जो किसी भी दृष्टि से आदर्शवादी राजनीति की परिभाषा में खरा नहीं उतरता। क्या यह सच नहीं कि उन्होंने अपने सबसे पुराने मित्र और राजनीतिक यात्रा के सहयात्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को अस्थिर करने के काम किए? और क्या आडवाणी जी ने इस बार नरेन्द्र मोदी के पार्टी भीतर बढ़ रहे कद से व्यथित हो इस्तीफे का यह ड्रामा नहीं रचा? सच तो यह है कि लालकूष्ण आडवाणी इस सच को पचा नहीं पा रहे हैं कि वे अब ८६ वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक उम्मीदवार नहीं समझे जा सकते हैं। वे यह भी मानने को तैयार नहीं कि उनके पास अटल बिहारी वाजपेयी जैसी उदार एवं करिश्माई छवि नहीं जिसके सहारे भाजपा को वोट मिल सकें और वह २०१४ के लोकसभा चुनाव में सरकार बनाने लायक बहुमत पा सके। उनके सिर पर प्रधानमंत्री बनने का भूत सवार है जो उन्हें किसी भी सच को स्वीकारने से रोक देता है। 

 

रही बात नरेन्द्र मोदी की तो यह समझना जरूरी है कि उनकी जिस लोकप्रियता का बार-बार राजनाथ सिंह हवाला दे रहे हैं और जिस दरियादिली का परिचय दे उन्हें २०१४ के चुनाव में भाजपा का चेहरा बनाने में जुटे हैं उसके पीछे राजनाथ की महत्वाकांक्षा का होना है। और यह महत्वाकांक्षा है देश का प्रधानमंत्री बनना। राजनाथ सिंह राजनीति के शातिर खिलाड़ी हैं। वे जानते हैं कि अकेले भाजपा शायद ही २७२ का जादुई आंकड़ा पार कर सके। ऐसे में सरकार गठबंधन की ही बनेगी। और गठबंधन सरकार के सहयोगी एक कट्टरपंथी छवि वाले नेता को सरकार की कमान सौंपने को राजी होंगे नहीं। ऐसे में पार्टी अध्यक्ष होने के नाते उनकी दावेदारी मजबूत हो जाती है। पार्टी की दूसरी बड़ी नेता सुषमा स्वराज भी कुछ ऐसा ही खेल खेलती दिखाई पड़ रही हैं। यूं उन्होंने आडवाणी जी को दरकिनार किए जाने का विरोध किया लेकिन वे भी यह समझती हैं कि मोदी के नाम पर वोट ज्यादा पड़ेगा ही पड़ेगा। उनकी गणित भी सहयोगी दलों द्वारा मोदी के अपेक्षित विरोध पर टिकी है। सुषमा स्वराज को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने की वकालत शिवसेना कर चुकी है। अन्य सहयोगी दलों को भी उनके नाम पर ऐतराज होगा ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता। अरुण जेटली भी कुछ ऐसी ही महत्वाकांक्षा पाले और गणित लगाए बैठे हैं। ये सभी नेता अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके हैं और इन सभी ने बीएस येदियुुरप्पा या उन जैसे अन्य भ्रष्ट्र मुख्यमंत्री/मंत्री को अपना आशीर्वाद दिया। इसलिए मैं इसे निजी महत्वाकांक्षा का खेल कहता हूं।

 

उत्तराखण्ड में भी कुछ ऐसा ही खेल चल रहा है। या यूं कहूं तो ज्यादा सही होगा कि पिछले १२ बरस से यह खेल निरंतर चलता आ रहा है। पहली निर्वाचित सरकार के मुखिया एनडी तिवारी ने पूरे पांच साल भले ही राज किया लेकिन उनकी सरकार कभी भी स्थिर नहीं रही। उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी हरीश रावत के समर्थक विधायकों ने रावत को सीएम बनाने के लिए हर संभव प्रयास किए। नतीजा रहा सरकार का अस्थिर रहना और तिवारी जी का अपनी सरकार बचाए रखने के लिए कई ऐसे निर्णय लेना जिसके चलते राजकोष पर खराब असर पड़ा। उनके बाद भाजपा को सत्ता में जनता ने बैठाया। भाजपा में भी सीएम पद के दावेदारों की निजी महत्वाकांक्षा ने सरकार को अस्थिर रखा। पहले खण्डूड़ी जी सीएम बनाए गए। तब सबसे भारी दावेदारी कोश्यारी की थी। लेकिन उन्हें हाशिए में डाल दिया गया। हरीश रावत की तरह कोश्यारी की भी विधायक दल में मजबूत पकड़ थी। उन्होंने खण्डूड़ी सरकार को चैन से काम नहीं करने दिया। नतीजा खण्डूड़ी की विदाई और डॉ निशंक की ताजपोशी रही। निजी महत्वाकांक्षा के इस खेल ने दो धुर विरोधियों को एक कर दिया। कोश्यारी और खण्डूड़ी ने हाथ मिला लिए। नतीजा निंशक का भूतपूर्व होना और एक बार फिर खण्डूड़ी जी का सीएम बनना रहा। इससे राज्य में विकास की गति का अवरुद्ध होना विकास कार्य ठप पड़ जाना रहा। और फिर २०१२ में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस को सत्ता में ले आए। हरीश रावत को एक बार फिर इग्नोर कर कांग्रेस आलाकमान ने एक जनाधारविहीन नेता विजय बहुगुणा को राज्य सरकार की कमान सौंप दी। एक बार फिर से वही पुराना खेल शुरू हो चुका है। रावत खेमे के विधायक अपने-अपने क्षेत्र का अपेक्षित विकास न कर पाने के चलते अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल बैठे हैं। प्रत्यक्ष तौर पर उनकी नाराजगी जायज नजर आती है। यदि लोकतंत्र में जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि अपने क्षेत्र के लिए विकास योजनाएं ला पाने में अक्षम रहता है तो उसके जनप्रतिनिधि बने रहने का क्या औचित्य? लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं अर्द्धसत्य है। इसमें कोई शंका नहीं कि बहुगुणा सरकार हर मोर्चे पर विफल रही है और सरकार में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। लेकिन केवल इसी के चलते विधायक नाराज हों ऐसा नहीं है। सच यह भी है कि हरीश रावत भले ही केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री बन गए हों उनकी नजर उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पद पर बनी हुई है। चूंकि उनसे अधिक जनाधार वाला कोई नेता उत्तराखण्ड में है नहीं इसलिए वे इस कुर्सी पर अपना हक मानते हैं और उन्हें अपनी पार्टी से शिकायत है कि उनके जायज हक को मार एक ऐसे व्यक्ति को सीएम बना दिया गया जो अपने दम पर एक पंचायत तक की सीट नहीं जिता सकता। यानी यहां भी निजी महत्वाकांक्षा का खेल खेला जा रहा है।

 

कुल मिलाकर राजनीति हमारे मुल्क में केवल और केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति और स्वार्थ सिद्धि का माध्यम बनकर रह गई है। हालांकि राजनीति और राजनेताओं का इस स्तर पर गिरना केवल हमारे यहां तक ही सीमित हो ऐसा नहीं है। सोवियत संघ के पहले महासचिव निकिता खुश्चेव ने कई दशक पहले कहा था कि राजेनता हर जगह एक जैसे ही होते हैं। वे वहां भी पुल बनाने का वादा कर देते हैं जहां नदी होती ही नहीं। लेकिन यह सच है कि आजाद भारत की ६५ बरस की यात्रा में यह अकेला ऐसा क्षेत्र है जिसमें केवल और केवल गिरावट ही दर्ज हुई है नैतिकता और ईमानदारी यहां से पूरी तरह गायब हो चली है।

 

अपूर्व जोशी

 
         
 
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