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देश-दुनिया 
 
अंतर्कलह की शिकार भाजपा

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी ने १ जून को ग्वालियर में एक कार्यक्रम के दौरान फिर कुछ ऐसा कह दिया जिससे पार्टी की अंतर्कलह सतह पर दिखाई देने लगी है। आडवाणी ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को न सिर्फ नरेन्द्र मोदी से बेहतर मुख्यमंत्री बताया बल्कि शिवराज की तुलना अटल बिहारी वाजपेयी तक से कर डाली।

 

पार्टी कार्यकर्ताओं के एक बड़े सम्मेलन को संबोधित करते हुए आडवाणी ने कहा कि मैं गुजरात से हूं लेकिन मैं चाहता हूं कि मध्य प्रदेश दुनिया में अपना स्थान हासिल करे। मैं अक्सर नरेंद्र मोदी से कहता हूं कि जब उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर गुजरात भेजा गया था तब गुजरात पहले से आर्थिक रूप से मजबूत राज्य था। उन्होंने उसे और बेहतर बनाया। लेकिन मध्य प्रदेश तो एक 'बीमारू' राज्य था। अब यहां कायापलट हो गई है और यह आर्थिक रूप से मजबूत राज्य के रूप में सामने आया है जिसका पूरा श्रेय मैं शिवराज सिंह चौहान को देता हूं। इतना ही नहीं आडवाणी ने परोक्ष तौर पर भी मोदी की खिंचाई की और शिवराज सिंह को उनके मुकाबले आगे बढ़ाने की कोशिश की। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू इंदिरा गांधी की कमजोरियों की चर्चा करते हुए बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी में इनके जैसी कोई कमजोरी नहीं थी और उनकी सबसे बड़ी खासियत थी उनकी विनम्रता। आडवाणी ने कहा कि यही खासियत शिवराज सिंह चौहान में भी है। आडवाणी ने कहा कि मध्य प्रदेश का पूरा रूपांतरण कर देने के बावजूद वह आज भी उतने ही विनम्र उतने ही मृदुभाषी हैं। उन्होंने अहंकार को अपने आस-पास फटकने नहीं दिया है। सूत्रों के मुताबिक मोदी ने आडवाणी को पत्र लिखकर इस बयान पर आपत्ति दर्ज की है। साथ ही इससे पहुंचने वाले नुकसान की भरपाई करने को भी कहा है। 

 

गौरतलब है कि आडवाणी के इस बयान के बाद भाजपा का शीर्ष नेतृत्व एक बार फिर कोई प्रतिक्रया देने से मुंह चुराता नजर आ रहा है। सिर्फ पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी पर जारी रस्साकशी पर कहा कि इस मामले को लेकर पार्टी में कोई शीत युद्ध नहीं चल रहा है। नरेंद्र मोदी काफी लोकप्रिय नेता हैं। आडवाणी जी के भाषण का गलत मतलब निकाला गया है। बहरहाल आडवाणी भाजपा के ऐसे नेताओं में शुमार होते जा रहे हैं जिनके बयानों पर कई बार बड़ा बवाल हो चुका है। जिन्ना को सेक्यूलर कहना हो या सप्रंग-२ को 'नाजायज' सभी के बाद एक बड़ा हंगामा हुआ और आडवाणी को माफी तक भी मांगनी पड़ गई। अगस्त २०१२ में भाजपा की अंदरूनी कलह को लेकर अपने ब्लॉग पर लिखा गया आडवाणी का लेख भी काफी सुर्खियों में रहा था। इस लेख में तो आडवाणी ने साफ तौर पर माना था कि अगर यही हालात रहे तो २०१४ में कांग्रेस के साथ- साथ भाजपा का आना भी मुश्किलों भरा है। इसी लेख में उन्होंने नाम न लेते हुए भी मोदी की पार्टी से बड़ी होती छवि पर सवाल उठाया था। पिछले दिनों कर्नाटक में भाजपा को मिली करारी हार के बाद भी आडवाणी का बयान आया कि अगर भाजपा कर्नाटक में जीतती तो मुझे आश्चर्य होता। जानकारों का मानना है कि इन सभी बयानों में आडवाणी की पार्टी में बढ़ती उपेक्षा के प्रति पनपा गुस्सा साफ दिखाई पड़ता है। लेकिन साथ ही इस तरह के बयानों से भाजपा के लिए एक त्वरित नकारात्मक माहौल पैदा होता है। इसमें भी कोई दो राय नहीं है। दूसरी तरफ आडवाणी के शिवराज को मोदी पर तरजीह दिए जाने से एनडीए के अहम द्घटक दल जनता दल यूनाइटेड की मानो बांछे खिल गई हैं। जेडीयू भी खुलेआम आडवाणी के सुर में सुर मिलाकर मोदी पर निशाना साधने में जुट गई। जेडीयू नेता अली अनवर ने कहा कि मैं आडवाणीजी के बयान से बिल्कुल सहमत हूं। गुजरात तो पहले से विकसित था। तो नरेंद्र मोदी ने ऐसा क्या खास किया? कांग्रेस की तरफ से सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने भी ट्विटर पर लिखा कि आडवाणीजी द्वारा भाजपा की कहानी- चौहान जी बनाम मोदी बनाम राजनाथ जी बनाम सुषमा जी बनाम जेटली जी बनाम गडकरी जी। आरएसएस बनाम भाजपा जी और 'परिवार जी' में गृहयुद्ध।

 

दरअसल पिछले कुछ महीनों में भाजपा को सुर्खियों में बनाए रखने की वजहों में मोदी सबसे ज्यादा शुमार रहे हैं। पिछले दिनों सामने आए कुछ सर्वे में तो बाकायदा मोदी के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार बनने पर ही भाजपा के लोकसभा चुनावों में बढ़त बनाने तक के निष्कर्ष सामने आए हैं। ऐसे में भाजपा नरेन्द्र मोदी और प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी को लेकर पार्टी की स्थिति पर अभी तक चुप्पी साधे हुए है। हालांकि गाहे-बगाहे पार्टी के कई वरिष्ठ नेता मोदीगान करते दिख जाते हैं लेकिन मोदी के पार्टी से बढ़ते कद को लेकर भाजपा के भीतर भी चिंताएं बढ़ती जा रही हैं। 

 

भाजपा का दिल्ली नेतृत्व दल चिंताओं में कुछ ज्यादा ही मशगूल है। शिवराज को साइड रखकर भी बात की जाए तो खुद आडवाणी ने भी अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे या नहीं। ऐसे में आडवाणी ने इशारों में ही सही शिवराज को मोदी से बेहतर बताकर यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी तय करना आने वाले समय में भाजपा के लिए टेढ़ी खीर साबित होने वाला है। 

अंकित फ्रांसिस

 

अब तुर्की में प्रदर्शन

मिस्र का तहरीर स्क्वायर हो बांग्लादेश में शाहबाग स्क्वायर ये सभी उस ऐतिहासिक क्षण के गवाह बने थे जब इन देशों की जनता ने सत्ता के खिलाफ एक बुलंद आवाज उठाई थी। ये आवाजें दमनकारी नीतियों और कानूनों में बदलाव के लिए उठी थीं। लेकिन अब यूरेशियाई देश तुर्की में मशहूर तक्सीम स्क्वायर पर सरकार के पुनर्विकास की योजना पर लाखों लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। इसमें दो लोगों की मौत हो चुकी है और अब तक १७०० लोग गिरफ्तार कर लिए गए हैं। 

 

दरअसल पुनर्विकास परियोजना के नाम पर सरकार द्वारा पेड़ों के काटे जाने का विरोध करना और पर्यावरण के लिए चिंता करना तुर्की में हजारों लोगों को महंगा पड़ गया। शांतिपूर्ण ढंग से सरकार के आगे अपनी बात रखने का नतीजा उन्हें भुगतना पड़ा। आंसू गैस और पानी की बौछारों ने इन्हें बेहाल कर दिया। इन निहत्थे लोगों पर लाठियां भी भांजी गईं। गौरतलब है कि तुर्की के इस्तांबुल में तक्सीम स्क्वायर पर पेड़ काटने के मामले में दूसरे दिन राजधानी अंकारा समेत कई स्थानों पर प्रदर्शन हुए। इस्तांबुल मेट्रोपॉलिटन म्यूनिसिपिलिटी ने तक्सीम स्क्वायर स्थित गेजी पार्क पुनर्विकास परियोजना के नाम पर शहर के बीच हरे-भरे पार्क को भी तोड़ दिया और पेड़ काट दिए। जब लोगों ने इसका विरोध किया तो पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे। इसके बाद लोगों का गुस्सा और भड़क गया। इस मामले में हजारों लोगों ने प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी खिलाफ प्रदर्शन किया। पुलिस को प्रदर्शनकारियों पर काबू पाने के लिए वाटर केनन का सहारा लेना पड़ा। 

 

तुर्की की इस्लाम आधारित सरकार के खिलाफ जारी विरोध इस इस दशक के सबसे जोरदार विरोध के रूप में में सामने आया है। इस्तांबुल के तक्सीम चौराहे से पुलिस के हटने के बाद यहां पूरे देश से बड़ी संख्या में लोग जमा रहे। इस चौराहे पर लोगों को 'सरकार इस्तीफा दे' इस्तांबुल हमारा है' तक्सीम हमारा है' जैसे नारे लगाते हुए देखा जा सकता है। पूरे देश के ४८ शहरों में ९० से ज्यादा जगहों पर चल रहे इन प्रदर्शनों का मुख्य स्थल तक्सीम चौराहा ही रहा। द्घटना से जुड़े हुए लोगों का मानना है कि सरकार से कई लोग तंग आ चुके हैं। इन लोगों का मानना है कि सरकार दिन फिर दिन निरंकुश होती जा रही है और वे आधिकारिक तौर पर एक धर्मनिरपेक्ष देश पर कट्टरवादी इस्लामी मुल्य थोपना चाहती है।

 

पिछले हफ्ते सरकार ने जल्दबाजी में शराब की ब्रिकी और विज्ञापन पर रोक लगाने संबंधी एक विधेयक पारित किया था। विश्लेषकों का कहना है कि सरकार के इस कदम ने धर्मनिरपेक्ष ताकतों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। प्रधानमंत्री रेसेप ताइपे एडोर्गन ने इस विवादास्पद विधेयक के बचाव में पीने वाले लोगों को 'शराबी' कहा था जिससे लोगों ने अपमानित महसूस किया था। 

 

प्रधानमंत्री रेसेप ताइपे एडोर्गन के २००२ में सत्ता में आने के बाद उनके खिलाफ यह सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन है। प्रदर्शनकारियों से प्रदर्शन बंद करने की अपील करते हुए एडोर्गन ने अपने भाषण में कहा कि वे मुझे तानाशाह बुलाते हैं। यदि वे एक विनीत सेवादार को तानाशाह बुलाते हैं फिर तो मेरे पास कोई शब्द ही नहीं है। साथ ही एडोर्गन ने प्रदर्शनकारियों के इस विरोध की निंदा करते हुए इसे अलोकतांत्रिक कदम बताया। सरकार ने इसे विपक्षी पार्टी के उकसाए जाने पर किया जाने वाला प्रदर्शन करार दिया है। इस बीच अमेरिका ने तुर्की के सभी पक्षों से शांति की अपील की है।

हरिनाथ कुमार

 
         
 
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