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प्रदेश 
 
अब आंदोलनकारियों के पाले में गेंद

प्राथमिकता सरकारी लाभ लेने वाले लोगों को नहीं बल्कि उन्हें मिलनी चाहिए जिन्होंने राज्य आंदोलन में नुकसान उठाया

 

उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकारियों ने किसी सम्मान और सुविधाओं के लिए पृथक प्रदेश के लिए संघर्ष नहीं किया था। लेकिन उत्तराखण्ड सरकार ने उन्हें सम्मान पेंशन और सरकारी नौकरियां देने की शुरुआत की। इसी के साथ असंतोष के स्वर भी उठने लगे कि आंदोलनकारियों को चिन्हित करने के मानक सही नहीं हैं। पहाड़ से लेकर प्रवास तक आंदोलनकारियों ने आक्रोश व्यक्त किया कि जिन लोगों के आका शासन-प्रशासन में उच्च पदों पर हैं उन्हें तो आसानी से आंदोलनकारी होने का लाभ मिल जाता है लेकिन वास्तविक रूप से जिन्होंने संघर्ष किया वे हाशिये पर पड़े हुए हैं। 

 

आंदोलनकारियों की तमाम समस्याओं के समाधान के उद्देश्य से हमने दि संडे पोस्ट के इसी कॉलम में दिनांक ३० दिसंबर २०१२ को कैसे चिन्हित हों आंदोलनकारी शीर्षक के तहत सरकार को सुझाव दिये थे कि आंदोलनकारियों को चिह्नित किये जाने में भेदभाव से उपजे असंतोष का बेहतर समाधान यही होगा कि यह काम आंदोलनकारी संगठनों ही को दे दिया जाए। वे अच्छी तरह जानते हैं कि आंदोलन में कौन मरा और कौन खपा। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संगठनों की सलाह पर स्वतंत्रता सेनानियों को ताम्रपत्र और पेंशन देकर सम्मानित किया था। उत्तराखण्ड सरकार भी यह परंपरा अपना सकती है। इसी तरह दिनांक ६ जनवरी २०१३ को कैसे पारदर्शी बने आंदोलनकारी कल्याण परिषद शीर्षक के तहत सरकार को सुझाव दिया गया था कि आंदोलनकारी कल्याण परिषद में आंदोलनकारी संगठनों के प्रतिनिधि सदस्य हों। वे आंदोलनकारियों की समस्याओं के साथ ही जनहित के मसलों के समाधान में सरकार को सहयोग भी करें। मंगलवार ४ जून २०१३ को नई दिल्ली स्थित उत्तराखण्ड निवास में प्रवासी आंदोलनकारी संगठनों के साथ हुई बैठक में राज्य के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने भी इस विषय पर अपनी सहमति दी कि आंदोनकारियों को चिन्हित किये जाने और आंदोलनकारी होने के मानक तय करने में सरकार आंदोलनकारियों का सहयोग लेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके लिए आंदोलनकारी संगठनों की एक समन्वय समिति बनाई जाएगी। समिति में हर संगठन के दो प्रतिनिधि होंगे। इसके अलावा हर संगठन के पांच प्रतिनिधियों को सरकार आंदोलनकारी के तौर पर सम्मानित करेगी जिनमें दो महिलाएं होंगी। उन्होंने आश्वासन दिया कि आंदोलनकारियों को आ रही दिक्कतों को दूर करने के लिए अधिकारी तैनात किये जायेंगे। दिल्ली के उत्तराखण्ड निवास में एक अधिकारी इस काम के लिए बैठेगा।

 

मुख्यमंत्री के इस ऐलान पर आंदोलनकारी संगठनों ने प्रसन्नता जाहिर की है। आंदोलनकारी राज्य गठन के बाद सरकार को अपने साथ सीधी बातचीत में तो ले आए हैं लेकिन उन्हें इस बात का भी अहसास होना चाहिए कि अब गेंद उनके पाले में है। उनके सामने यह तय करने की चुनौतियां हैं कि समन्वय समिति में कौन से प्रतिनिधि भेजे जाएं जो आंदोलनकारियों के हितों की मजबूती से पैरवी कर सकें? किन पांच आंदोलनकारियों को प्राथमिकता के आधार पर संगठन के जरिये सम्मान दिलवाया जाए? किन आंदोलनकारियों का नाम सबसे पहले नौकरी या पेंशन के लिए बढ़ाया जाएं ताकि वे बदहाली से उबर सकें? इस तरह के तमाम सवाल हैं जिन पर आंदोलनकारी संगठनों को गंभीरता से विचार-मंथन कर कदम उठाने होंगे। बहुत से ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने स्थाई और अस्थाई रूप से सरकारी सेवा में रहते आंदोलन में सहयोग किया। उनका सहयोग सराहनीय है लेकिन विचार का बिंदु यह है कि जो व्यक्ति स्थाई या अस्थाई तौर पर किसी भी ढंग से सरकारी सेवाओं का लाभ उठाता रहा हो या उठा रहा हो उसे उन लोगों को प्राथमिकता देने की बात करनी चाहिए जिनका संपूर्ण जीवन ही आंदोलन के लिए कुर्बान हो चुका है। जिन्होंने हर मौके पर नुकसान झेला है। कायदे से सरकारी लाभ लेते रहे लोगों को सम्मान पत्र तो दिये जाने चाहिए। लेकिन पेंशन और अन्य आर्थिक लाभ नहीं। उन्हें समन्वय समिति या आंदोलनकारी कल्याण परिषद में भी नहीं भेजा जाना चाहिए। यह हर सरकारी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों और एनजीओ में काम करने वालों पर भी लागू होना चाहिए। आखिर एनजीओ भी सरकारी बजट का ही उपयोग करते हैं। इसलिए यदि कोई भी आंदोलनकारी सरकारी लाभ लेने का हक जताता है तो पहले उससे यह शपथ पत्र भी लिया जाना चाहिए कि उसने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आंदोलन के दौरान कभी सरकारी सेवा नहीं की या किसी एनजीओ को अपनी सेवाएं नहीं दीं। 

दाताराम चमोली

 

राजाजी पार्क में अवैध कब्जे

 

राजाजी नेशनल पार्क में अवैध निर्माणों का मुद्दा न सिर्फ लोकसभा में उठा बल्कि सुप्रीम कोर्ट भी इसको लेकर पार्क प्रशासन को फटकार लगा चुका है। इसके बावजूद इस प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के अंतर्गत अवैध निर्माण होते रहे। पार्क प्रशासन इसके लिए जिम्मेदार लोगों को नोटिस थमाकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है

 

उत्तराखण्ड का प्रसिद्ध राजाजी नेशनल पार्क पर्यटकों के आकर्षण का विशेष केंद्र रहा है। प्रति वर्ष हजारों पर्यटक यहां आते हैं। लेकिन पार्क में निरंतर अतिक्रमण होते रहे हैं। कई ट्रस्टों के संचालकों ने यहां मंदिरों का निर्माण कर लिया है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट पार्क प्रशासन को नौ साल पहले फटकार लगा चुका है। लोकसभा में भी यह मामला उठा।

 

लोकसभा में ग्रीष्मकालीन सत्र के दौरान १ अगस्त २०११ को सांसद जगदानंद सिंह मंगनी लाल मंडल और हरिश्चन्द्र चवन ने पार्क में वन विभाग की जमीन पर हुए अवैध अतिक्रमण की जानकारी मांगी थी। इसके जवाब में राजाजी नेशनल पार्क के निदेशक ने बताया कि पार्क के अंतर्गत ० ़९७० हेक्टेयर जमीन पर वाल्मिकि बस्ती बस गई है। जिसमें सैकड़ों कच्चे-पक्के मकान बना दिए गए हैं। इसी के साथ भीमगौड़ा में ० ़२० हेक्टेयर दुधाधारी में १ ़६० हेक्टेयर पंचमुखी हनुमान मंदिर में ० ़११ हेक्टेयर जमीन पर अतिक्रमण किया गया है। इतना ही नहीं अधिशासी अभियंता जल विभाग ने भी ० ़१० हेक्टेयर जमीन पर अवैध कब्जा कर रखा है। इस तरह कुल २ ़९८ हेक्टेयर यानी ७ ़४५६ एकड़ जमीन अतिक्रमण के दायरे में है।

 

लोकसभा में पूछे गए सवाल कि राजाजी राष्ट्रीय उद्यान से अवैध अतिक्रमणों को हटाने के लिए क्या कार्यवाही की जा रही है जवाब में राजा जी नेशनल पार्क के निदेशक ने यह कहकर इतिश्री कर दी कि अतिक्रमणकारियों पर भारतीय वन अधिनियम १९२७ के तहत कार्रवाई की जा रही है।

पार्क परिसर में अवैध अतिक्रमणों की बाबत हल्द्वानी निवासी आरटीआई एक्टिविस्ट गुरविंदर सिंह चड्ढा द्वारा सूचना अधिकार के तहत इस मामले में जानकारी ली गई। इस पर १ मार्च २०१३ को राजाजी नेशनल पार्क के उप निदेशक हर्षेन्द्र कुमार सिंह ने पत्रांक संख्या १७२१/२२(५ के तहत बताया कि राजाजी नेशनल पार्क से अवैध अतिक्रमण के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा वर्ष २००४ में ही निर्देश दिए जा चुके है। लेकिन आज तक भी पार्क के भीतर से कोई अतिक्रमण नहीं हटाया गया है। इन अतिक्रमणों में अधिकतर धार्मिक स्थल हैं। 

 

गौरतलब है कि हरिद्वार के भूपतवाला स्थित श्री दूधाधारी जी बर्फानी गौशाला ट्रस्ट को शासनादेश संख्या ६३७४/१४-२ दिनांक ४-९-१९७६ के द्वारा आरक्षित वन क्षेत्र खड़खड़ी वन ब्लॉक  के कक्ष संख्या १ए में ४ एकड़ वन भूमि लीज पर दी गई थी। यह लीज भूमि १ अप्रैल १९७६ से ३१ मार्च १९८६ तक १० साल की लीज पर दी गई थी। इस लीज की अवधि ३१ मार्च १९८६ को ही समाप्त हो चुकी है। इसके बाद भी न तो  लीज का नवीनीकरण कराया गया और न ही इस बाबत कोई कार्यवाही की गई। फलस्वरूप आज तक यह ट्रस्ट अवैध रूप से वन विभाग की जमीन पर कब्जा जमाए हुए है। चौंकाने वाली बात यह है कि पार्क प्रशासन इस मामले में पूरे २५ साल तक कुंभकरणी नींद में है। २५ साल बाद राजाजी नेशनल उद्यान के अधिकारियों ने दूधाधारी जी बर्फानी गौशाला ट्रस्ट को पत्रांक संख्या ५१४(१ २-२ के जरिए १७ मार्च २०११ को पहला नोटिस थमाया। २८ मार्च २०११ को राजाजी राष्ट्रीय पार्क के देहरादून स्थित कार्यालय में ट्रस्ट के प्रतिनिधि हेमंत रूग्टा उपस्थित हुए तथा अपना पक्ष रखते हुए अभिलेख दर्ज कराने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की। इस बाबत हेमंत रूग्टा ने २० अप्रैल २०११ को पार्क कार्यालय में पत्र भेजकर १५ दिन का समय मांगा। इसके बाद पार्क प्रशासन ने रूग्टा को यह हिदायत देते हुए १५ दिन का समय दे दिया कि अगर उन्होंने इस दौरान अपना पक्ष नहीं रखा तो ट्रस्ट के विरुद्ध भारतीय वन अधिनियम २००१ की धारा ६१क (२ के अंतर्गत के कार्यवाही की जाएगी। यही नहीं ऐसी स्थिति में उसके विरुद्ध बेदखली का आदेश भी पारित कर दिया जायेगा। इसके बाद सुनवाई की अंतिम तिथि ६ मई २०११ निर्धारित की गई। इसके बाद मामला ठण्डे बस्ते में चला गया।

 

इस मामले में सबसे बड़ी बात यह है कि लीज की शर्तों में वनादेश संख्या ६३७५/१४/२/ ५५/४/७५ दिनांक ४/९/१९७६ के तहत स्पष्ट किया गया था कि इस जमीन पर केवल अस्थाई और कच्चे निर्माण किए जा सकते हैं। लेकिन लीज की शर्तों के विरुद्ध दूधाधारी आश्रम के संचालकों ने झोपड़ियों के स्थान पर पक्के निर्माण करा लिए। इस तरह दूधाधारी जी बर्फानी गौशाला ट्रस्ट द्वारा अतिक्रमण के साथ ही लीज की शर्तों का भी खुला उल्लंघन किया गया। इसी तरह पार्क प्रशासन ने भीमगौड़ा पंचमुखी सहित बाल्मिकी बस्ती और जल निगम अधिशासी अभियंता के कार्यालयों को भी अतिक्रमण से संबंधित नोटिस थमाकर इतिश्री कर दी। पार्क प्रशासन की इस मामले में उदासीनता का आलम यह है कि दूधाधारी के अलावा वाल्मीकि बस्ती भीमगौड़ा पंचुमुखी सहित सभी अतिक्रमणकारियों के विरुद्ध कार्यवाही के नाम पर भारतीय वन अधिनियम १९२७ के तहत नोटिसों की तारीखों पर तारीखें दी जा रही हैं। सवाल यह है कि आखिर यह कब तक चलता रहेगा। पिछले ९ सालों से सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन कब तक यूं ही होता रहेगा?

 

राजाजी राष्ट्रीय पार्क के निदेशक एसपी सुबुद्धि के अनुसार पार्क में अवैध कब्जों पर प्रशासन बहुत सख्त है। इन्हें कब्जों से हटाने के लिए न्यायालय में बेदखली की फाइलें तैयार हो रही हैं। हम माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करने के लिए गंभीरता से प्रयास कर रहे हैं।

आकाश नागर

 
         
 
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