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खास खबर 
 
शिक्षा पर भ्रष्टाचार का ग्रहण

उत्तराखण्ड में सर्वशिक्षा अभियान भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है। महालेखा नियंत्रक और केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान के निरीक्षणों से पता चला है कि राज्य के स्कूलों में बेहद घटिया निर्माण कार्य हो रहे हैं। केंद्र से भारी-भरकम बजट मिलने के बावजूद राज्य का शिक्षा विभाग बच्चों को बुनियादी सुविधाएं नहीं दे पाया है। शौचालय जो एक माह में बन जाने चाहिए थे वे वर्षों बाद भी अधूरे पड़े हैं। २५ प्रतिशत विद्यालयों में पीने का पानी और ७४ प्रतिशत में बिजली नहीं है। राज्य के जिन मुख्यमंत्रियों को अभियान की सफलता के लिए माह में कम से कम दो बैठकें करनी चाहिए थीं वे पिछले १२ साल में महज एक ही बैठक कर पाए। इसके बावजूद राज्य के शिक्षा मंत्री दावा कर रहे हैं कि सब कुछ ठीक हो जाएगा

 

 

केन्द्र सरकार ने जनवरी २००१ में शिक्षा का स्तर सुधारने के उद्देश्य से जो सर्वशिक्षा अभियान शुरू किया था वह उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है। यहां सुगम-दुर्गम के किस्से कहानियों और शिक्षकों के स्थानांतरण में मोटा खेल होने के आरोप तो समय-समय सामने आते ही रहते हैं। लेकिन हकीकत और भी चिंताजनक है। सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे मूलभूत सुविधाओं से महरूम हैं। इसका मुख्य कारण भ्रष्टाचार और लापरवाही ही है। सर्वशिक्षा अभियान का उत्तराखण्ड में सही रूप से क्रियान्वयन करने के लिए फरवरी २००१ में शिक्षा परिषद का गठन किया गया। इस परिषद का मुख्य उद्देश्य सर्वशिक्षा अभियान को सही रूप से लागू करने के लिए अनुदेश और मार्गदर्शन करने के साथ ही इस योजना के अधीन चलाए जाने वाले कार्यक्रमों का वित्तीय और भौतिक सत्यापन और राज्य सरकार की अनुसंशाओं के अनुसार योजना के नियम तथा उद्देश्यों की पूर्ति हेतु कार्यक्रमों का नीति निर्धारण करना भी था। परिषद में उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री अध्यक्ष शिक्षा मंत्री उपाध्यक्ष बनाए गए कार्यकारी समिति के अध्यक्ष राज्य के मुख्य सचिव और उपाध्यक्ष शिक्षा सचिव बनाये गये। इस परिषद को सर्वशिक्षा अभियान के कार्यक्रमों के क्रियान्वयन और भौतिक सत्यापन इत्यादि को लेकर वर्ष में दो बैठकें करनी थी। अब मुख्यमंत्री स्तर पर ही लापरवाही का आलम देखिए कि राज्य को शिक्षा के क्षेत्र में मजबूत बनाने और योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में २००१ में गठित परिषद की बैठक एक वर्ष में दो बार होने के बजाय १२ वर्ष में एक ही बार २९ अक्टूबर २००३ को हुई। सर्वशिक्षा अभियान को राज्य में लागू करने में सरकारी लापरवाही का ही परिणाम रहा कि इस महत्वपूर्ण योजना के अंतर्गत जारी भारी-भरकम बजट भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया तो कुछ धन बिना उपयोगिता के ही सरकारी खाते में पड़ा रहा। 

 

सर्वशिक्षा अभियान के तहत राज्य के उन दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा प्रत्याभूति योजना केंद्र खोले जाने के प्रस्ताव थे जहां एक किलोमीटर की परिधि में प्राथमिक विद्यालय नहीं थे। लेकिन इस पर सरकार उदासीन रही। बात अगर २००६-०७ की करें तो समूचे राज्य में १८०८ शि प्र य़ो ़ केन्द्र खोले गए जिनमें से दिसंबर २०११ तक मात्र ७७० क्रियाशील पाए गए। १०३९ केन्द्र बंद कर दिए गए। सरकारी लापरवाही का आलम देखिए कि सर्वशिक्षा अभियान योजना लागू होने के प्रथम चरण से ही इस विभाग द्वारा बच्चों को शिक्षा केन्द्रों तक लाए जाने हेतु चलाई जा रही तमाम योजनाएं परवान न चढ़ सकीं। उदाहरण के तौर पर इस महत्वपूर्ण योजना के क्रियान्वयन के लिए वित्तीय वर्ष २००१-०२ में २५ करोड़ जारी किए गए तो वहीं यह राशि २०११-१२ में २५१ करोड़ तक जा पहुंची। जिसमें १५४ ़७७ करोड़ रुपए खर्च ही नहीं हो सका। एक तरफ शिक्षा विभाग इस योजना के बजट प्लान को बढ़ाता गया तो वहीं अवमुक्त धनराशि पूर्ण रूप से खर्च भी न की जा सकी। उत्तराखण्ड में शिक्षा विभाग की लेखा परीक्षा के दौरान भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार वित्तीय वर्ष २००६-११ के अनुमोदित बजट १६०५ ़९१ करोड़ के सापेक्ष उपलब्ध १३४२ ़९४ करोड़ में से भी मात्र १२३६ ़५० करोड़ रुपए छह वर्ष में व्यय किया गया। प्राप्त बजट को पूर्ण रूप से खर्च न करने पर भारत सरकार ने २०११-१२ के लिए अवमुक्त की जाने वाली धनराशि में से २३९ ़४७ करोड़ की कटौती कर दी।

 

शिक्षा विभाग के अधिकारियों द्वारा उच्च स्तर पर बरती गई लापरवाही के चलते ही उत्तराखण्ड सरकार को सरकारी विद्यालयों के बालिका शौचालयों और पीने के पानी की उपलब्धता को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में फटकार तक खानी पड़ी। लेकिन इसके बाद भी शिक्षा विभाग के नकारा अधिकारियों में कोई परिवर्तन नहीं आया। कैग से प्राप्त आकड़ों के अनुसार २००६ से ३१ मार्च २०११ तक राज्य में २५८ नए प्राथमिक विद्यालय बनाए जाने थे। लेकिन इन छह वर्षों के दौरान एक भी विद्यालय के निर्माण का कार्य पूर्ण नहीं हुआ। परिणामस्वरूप २५८ प्रा ़वि ़ ३१ मार्च २०११ तक अपूर्ण ही रहे। जबकि इन विद्यालयों का निर्माण छह माह में कराया जाना था। इसी प्रकार राज्य भर के सरकारी विद्यालयों में २००६ से २०११ तक ५८८८ बालिका शौचालयों का निर्माण कराया जाना था। इन शौचालयों के निर्माण कार्यों को पूरा करने हेतु १ माह का समय निर्धारित किया गया था। परंतु ३१ मार्च २०११ तक सभी ५८८८ बालिका शौचालय अपूर्ण स्थिति में थे। वित्तीय वर्ष २०११-२०१२ बालिका शौचालयों के निर्माण का प्लान १३५०३ तक पहुंच गया इनमें ४३२६ शौचालय निर्माणाधीन और ३२३४ शौचालयों के निर्माण का कार्य ३१ मार्च २०१३ तक भी प्रारंभ नहीं हो सका। शिक्षा विभाग के अधिकारियों की इसी लापरवाही के चलते जहां एक ओर सर्व शिक्षा अभियान के बजट में केंद्र सरकार कटौती कर चुकी है तो दूसरी ओर राज्य के स्कूलों में अध्यनरत बच्चे मूलभूत सुविधाओं से महरूम हैं।

 

राज्य के स्कूलों में बालिका शौचालय निर्माण में लापरवाही को तो छोड़िए वित्तीय वर्ष २००७-०८ में आठ सामान्य शौचालय और २०१०-११ में ६८ सामान्य शौचालय निर्मित किए जाने थे लेकिन ३१ मार्च २०११ तक ये सभी शौचालय अपूर्ण स्थिति में थे और बजट ठिकाने लगाया जा चुका था। राज्य के सरकारी विद्यालयों में पीने के पानी की उपलब्धता को लेकर भी सर्वोच्च न्यायालय टिप्पणी कर चुका है। इसके बावजूद पिछले पांच वर्ष में सरकारी विद्यालयों में पेयजल उपलब्ध कराने के लिए स्वीकृत ६६९ पेयजल योजनाएं सरकारी लापरवाही के चलते अपूर्ण स्थिति में थी। वित्तीय वर्ष २०१२-१३ तक भी जहां ३३० योजनाएं निर्माणाधीन बतलाई गईं तो वहीं ३१३ पेयजल योजनाओं पर कार्य भी शुरू न हो सका। सरकारी लापरवाही नौनिहालों पर भारी पड़ी और वे स्कूलों में पीने के पानी को तरसते रहे। ऐसा नहीं है कि इन योजनाओं को पूर्ण करने के लिए पैसे की कोई कमी सामने आई हो। बजट तो भरपूर मिला परंतु उच्च स्तर पर योजना बनाने और उसके क्रियान्वयन में बरती जा रही 

 

लापरवाही का ही आलम रहा कि वित्तीय वर्ष २०१२-१३ में अवमुक्त बजट ३२०३२ लाख में से ११२८ ़२६ लाख खर्च भी न हो सका। परिणामस्वरूप राज्य के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र/छात्राओं को उन योजनाओं का लाभ नहीं मिल सका जिनको लागू करने के नेतागण दावे करते रहे हैं। परिणामस्वरूप दुर्गम क्षेत्रों में नौनिहालों का दुर्गम क्षेत्रों में स्कूल जर्जर हैं। नौनिहालों का भविष्य और जान जोखिम में हैं। सितंबर २०१० में दैवीय आपदा से क्षतिग्रस्त प्राथमिक विद्यालय चौड़ामूढ़ चम्पावत की ही बात करें तो इसका मरम्मत का कार्य आज तक शुरू नहीं हो पाया है। हैरानी की बात है कि पांच वर्षों में प्रा ़विद्यालयों और शौचालय निर्माण आदि के लिए आवंटित ३०६ ़३२ करोड़ के निर्माण कार्यों में से ७३ ़८३ करोड़ के कार्य आरंभ ही नहीं किए गए थे। इसके बावजूद भी अधिकारियों ने ७३ ़८३ करोड़ का उपयोग किया और इस संबंध में शासन को रिपोर्ट प्रेषित कर दी गई। 

 

निर्माण कार्य गुणवत्ताविहीन है। भारत के महालेखा नियंत्रक द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड में निर्मित नए विद्यालयों के निर्माण में गुणवत्ता के साथ खिलवाड़ किया गया। चमोली जनपद में ७ बागेश्वर में ३ रुद्रप्रयाग में ४ पौड़ी में २ टिहरी में २ अल्मोड़ा में १ उत्तरकाशी में २ ऊधमसिंहनगर में ३ पिथौरागढ़ में २८ चंपावत में १ यहां तक कि प्रदेश की राजधानी देहरादून में भी ३ नवनिर्मित विद्यालय भवन केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान द्वारा किए गए स्थलीय निरीक्षण के दौरान असुरक्षित पाए गए। जिस कारण यह प्रयोग में नहीं आ सके। गुणवत्ता जांच में असुरक्षित पाए गए विद्यालयों के निर्माण के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है। आज भी राज्य में २५ प्रतिशत विद्यालयों में पेयजल सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। १० प्रतिशत विद्यालयों में जल संयोजन तो है लेकिन पानी उपलब्ध नहीं राज्य में स्थित कुल विद्यालयों में से ७४ प्रतिशत विद्यालयों में बिजली नहीं है। राज्य में शिक्षा को बढ़ावा दिए जाने के तमाम दावों के बावजूद नौनिहालों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने स्थिति की यह है कि राज्य कुल विद्यालयों में से ५७ प्रतिशत विद्यालयों में ही पृथक बालिका शौचालय उपलब्ध थे। लेकिन इनमें से ४४ प्रतिशत प्रयोग के लायक नहीं पाए गए। सर्व शिक्षा अभियान के १० वर्ष बाद भी छात्र-छात्राएं पीने के पानी शौचालय बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं से महरूम हैं तो इसी से इस कार्यक्रम की सफलता पर प्रश्न चिह्न लग जाता है।

 

 

 

बात अपनी अपनी

सुविधाओं में कमी का कारण केन्द्र सरकार का बजट कम करना है। अगर बजट है भी तो नियम इतने कठोर हैं कि वह खर्च करना मुश्किल हो रहा है। मैंने बजट खर्च करने के नियमों में शिथिलता की बात की है। बालिका शौचालय तथा नवनिर्मित विद्यालय भवनों की गुणवत्ता को लेकर मामला मेरे संज्ञान में है। वह रिपोर्ट मैंने देखी है। लेकिन अब स्थिति में सुधार है।

मंत्री प्रसाद नैथानी शिक्षा मंत्री 

 

सर्वशिक्षा अभियान अपने अंतिम चरण में है। अफसोसजनक स्थिति है कि बच्चों को विद्यालयों में टाटपट्टी भी उपलब्ध नहीं है। शौचालय बने हैं लेकिन उनमें पानी व सफाई का कोई प्रबंध न हाने के चलते वे प्रयोग में नहीं है। इस ओर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। जहां तक विद्यालय भवनों की गुणवत्ता का सवाल है तो एसएसए के अंतर्गत समुदाय की भागीदारी योजना इसका मुख्य कारण है। 

प्रेम सिंह गुसाईं अध्यक्ष राजकीय प्राथमिक शिक्षक संघ

 

क्या होना चाहिए

 

  • १२ साल में २४ बार मुख्यमंत्रियों की बैठक
  • खोले गए १००० शि.प्रो.यो. केन्द्र
  • २०११-१२ में जारी कए गए २५१ करोड़ रुपये
  • १३४२.९४ करोड़ में से ६ सालों में हुए खर्च १२३६.५० करोड़
  • २००६ से ३१ मार्च तक बनने थे २५८ नए प्राथमिक विद्यालय
  • २००६ से २०११ तक होना था ५८८८ बालिका शौचालयों का
  • ५ वर्षों से स्वीकृत हुई ६६९ पेजयल योजनाएं होनी थीं पूरी
  • २०१२-१७ में अवमुक्त हुआ कुल बजट ३२०.३२ लाख
  • शौचालय निर्माण में ३०६ ़३२ करोड़ की सापेक्ष ७३.८३

 

क्या हुआ

 

  • एक बार हुई बैठक
  • क्रियाशील पाए गए ७७०
  • १५४.७७ करोड़ खर्च नहीं हुए
  • २०११-१२ के लिए दी जाने वाली राशि में से २३८.४७ करोड़ की कटौती
  • ६ वर्षों के दौरान नहीं हुआ एक भी विधायक कार्य का निर्माण पूरा
  • ३१ मार्च २०११ तक सभी शौचालय अपूर्ण स्थिति में निर्माण
  • अब तक ३३० योजनाएं निर्माणाधीन ३१३ पर कार्य शुरू नहीं हआ
  • जिसमें से ११२८.२६ लाख नहीं हुआ खर्च
  • ७३.८३ करोड़ के कार्य दिखा दिए कागजों में के कार्य नहीं हुए आरंभ

 

 
         
 
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