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आवरण कथा
 
बदहाल कानून व्यवस्था

पौड़ी। प्रदेश में कानून व्यवस्था के हालातों की बानगी और पुलिस कार्यप्रणाली की विफलता को कोटद्वार में हुई पिछली कई वारदातों से समझा जा सकता है। क्षेत्र में स्त्रियों की सुरक्षा पर तो प्रश्नचिन्ह ही लग गया है। पौड़ी जिले के ११ थाना क्षेत्रों पौड़ी कोटद्वार लैंसडाउन लक्ष्मण झूला श्रीनगर महिला थाना श्रीनगरसतपुली धुमाकोट और रिखणीखाल में वर्ष २००७ से लेकर अप्रैल २०१३ तक गुमशुदगी के कुल ३५३ मामले दर्ज किये गये। इनमें से ११८ नाबालिग बालिकाओं के गुम होने का मामला सामने आया है जो चिंताजनक है। एक ऐसा मामला सामने आया है जो इन गुमशुदगियों की वजहों की तरफ इशारा करता है। १४ मई को कोटद्वार में एक १७ वर्षीय नाबालिग लड़की को अन्य दो लड़कियों द्वारा बेचने का मामला प्रकाश में आया। मामला कोटद्वार के कौडिया पुल काशीरामपुर तल्ला का है। मूलरूप से धालकोट खगड़िया बिहार की रहने वाली प्रीति (काल्पनिक नाम)दो महीने पहले अपनी दीदी और जीजा के द्घर कोटद्वार आई थी। १४ मई की सुबह जब प्रीति द्घर का सामान लेने पास की दुकान पर गई तो पड़ोस में रहने वालीं सोनी और गुलनाज ने प्रीति को बहका कर नशे की दवा मिली कोल्ड ड्रिंक पिला दी। फिर दोनों लड़कियों ने उसे कोटद्वार के गाड़ीद्घाट क्षेत्र में ले जाकर २५ हजार रुपये में बेचने की कोशिश की। लेकिन वहां बात न बनने पर वे उसे लेकर नजीबाबाद में अपने रिश्तेदारों के यहां पंहुची जहां उसकी जबरन शादी करवाने की ेंकोशिश भी की गई। लेकिन प्रीति मौका पाकर वहां से भाग निकली और नगीना को जाने वाली ट्रेन में बैठ गई। बाद में नगीना पुलिस ने पीड़ित लड़की के परिजनों को पूरे मामले की जानकारी दी। इसके बाद प्रीति के जीजा सुशील कुमार ने कोटद्वार कोतवाली में इस पूरे मामले की तहरीर दी है। पुलिस का मानना है कि यह मामला मानव तस्करी का हो सकता है। पुलिस पर आरोप है कि पीड़ित पक्ष द्वारा द्घटना के बाद कोतवाली में मामले की तहरीर दी गयी लेकिन कोटद्वार पुलिस ने तहरीर के अनुसार मामला दर्ज न कर पीड़ित लड़की और उसके परिजनों पर दबाव बनाकर मामले को हल्का करने की कोशिश की। मामला धारा ३७० के अंतर्गत मानव तस्करी का था लेकिन पुलिस ने इस मामले को धारा ३६६ ए और ३६६ में बदल दिया गया। विभिन्न सामाजिक संगठनों और लोगों के दबाब के बाद दोनों आरोपियों की गिरफ्तारी हुई और नाबालिग होने के चलते उन्हें नारी निकेतन भेज दिया गया। 

 

वहीं इस पूरे मामले में सामाजिक कार्यकर्ता अमित संजवाण का कहना है कि पीड़ित लड़की और उसके परिजनों के साथ जिस तरह का व्यवहार किया गयाऐसे में थाना प्रभारी सहित अन्य स्टॉफ पर मामला दर्ज किया जाना चाहिए। दूसरी तरफ कोतवाल अंशु चौधरी का कहना है कि लड़की के साथ पूछताछ के दौरान किसी भी तरह की मारपीट नहीं की गई है। यह मामला १४ मई २०१३ का था और इस मामले की तहरीर १५ मई शाम को दी गयी। जिसमें पीड़िता के बयान के आधार पर दोनों आरोपी लड़कियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। मामले की निष्पक्ष जांच की जा रही है। 

 

दूसरी ओर पूरे मामले से जुड़े रहे एक दूसरे सामाजिक कार्यकर्ता पंकज बग्वाड़ी आरोप लगाते हैं कि कोटद्वार की थाना प्रभारी ने पीड़िता को छह द्घंटे थाने में प्रताड़ित किया और उसकी पिटाई भी की इसलिए थाना प्रभारी पर मामला दर्ज कर कार्रवाई की जानी चाहिए। इसके अलावा दोनों लड़कियां बालिग हैं और पुलिस ने जानबूझकर उन्हें नाबालिग बताया है। उन्होंने सीओ के बयान का भी खंडन किया है जिसमें कहा गया था कि पीड़िता ने अलग- अलग बयान दिया है। लड़की ने थाना नगीना में एक ही बयान दिया है कि उसे सोनी और गुलनाज ने नशीला पदार्थ खिलाकर उसे बेचने की कोशिश की। इसके अलावा नजीबाबाद थाने में लड़की कभी गई ही नहीं है। सीओ सफेद झूठ बोल रही हैं। इस पूरे मामले को लेकर सामाजिक संगठन महिला समाख्या यूथ कांग्रेसपरिवर्तन छात्र संगठन क्रांंतिकारी लोक अधिकार संगठन आदि लगातार पुलिस पर दबाव बनाए हुए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर पुलिस ने जल्द से जल्द इस मामले में उचित कार्रवाई नहीं की तो उन्हें उग्र आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। 


शेष भाग पार्ट २

वर्ष २००८-०९ के लिए कार्ययोजना का बजट ७७ ़२२१ करोड़ था। फरवरी २००९ में इसे पुनरीक्षित कर ७१ ़९६ करोड़ किया गया। वित्तीय लक्ष्य की कमी को छिपाने के लिए इसका अनुमोदन वित्तीय वर्ष समाप्ति के छह माह बाद सितंबर २००९ में किया गया। अपर अभियंता सिविल के तैनात नहीं किए गए जिससे गांव की समितियों द्वारा कराए गए निर्माण कार्य तकनीकी अभाव के कारण गुणवत्ताविहीन हुए। कई कार्य कसौटी पर खरे नहीं उतरे। कई योजनाएं ऐसी हैं जिनमें नियम विरुद्ध कार्य कर घोटालों को अंजाम दिया गया। हालांकि इसके लिए दोषी अधिकारियों कर्मचारियों और समितियों के सदस्यों को जांच में चिन्हित कर उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाकर कार्रवाई करने की संस्तुति भी की गई। लेकिन हुआ कुछ नहीं। 

 

सामाजिक कार्यकर्ता एसके पाण्डे ने योजना में व्याप्त भ्रष्टाचार को देखते हुए १७ अक्टूबर २०१२ को मुख्य सचिव उत्तराखण्ड को एक विस्तुत पत्र भी लिखा। प्रचार-प्रसार सामग्री की खरीद फरोख्त में भी फर्जीवाड़े की असलियत यह है कि परियोजना निदेशक के लिए एक जीबी का पेन ड्राइव ९ हजार रुपये में खरीदा गया। करीब ४ हजार रुपए मूल्य के बिजली सामान के लिए ढाई लाख तक के फर्जी भुगतान किए गए। ऋषिकेश के पंवार इलेक्ट्रीकल्स से बिजली उपकरण और पंखों की आपूर्ति दिखाकर ८४ बिलों के माध्यम से दो लाख ५० हजार का भुगतान किया गया। जबकि पंवार इलेक्ट्रीकल्स के स्वामी रघुवीर सिंह पंवार ने उक्त सामान भार्गव इलेक्ट्रिक कंपनी (ऋषिकेश से कुल ३ हजार ९ सौ ७० रुपये में लिया जाना स्वीकार किया है। यही नहीं बल्कि वाणिज्य विभाग के अनुसार रघुवीर सिंह पंवार किसी वस्तु की आपूर्ति के लिए पंजीकृत ही नहीं हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि उनसे ढाई लाख रुपए का सामान कैसे खरीदा गया?

जलागम परियोजना निदेशक विनीत कुमार पांगती द्वारा सरकारी सामान की आपूर्ति के लिए कोई समिति नहीं वहीं गठित की गई। यही नहीं बल्कि बिना टेण्डर के सामान बुक किए गए। उन पर आरोप है कि उन्होंने न केवल अपंजीकृत फर्मों से सामान खरीदा बल्कि बिलों का भुगतान चेक के बजाए नगद किया गया। इस तरह उन्होंने वित्तीय नियमों के विपरीत सामान क्रय करके विभाग को लाखों रुपये की चपत लगाई। 

 

उपसंहार

 

घोटाले की इस महागाथा को राज्य की जनता को समझना जरूरी है। यह घोटाला २००५ से लेकर २०१२ के बीच हुआ। इस दौरान राज्य में कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों की सरकारें रहीं। वरिष्ठ कांग्रेस नेता नारायण दत्त तिवारी और अपनी ईमानदारी के लिए चर्चित रहे बीसी खण्डूड़ी भी इस दौरान मुख्यमंत्री रहे। क्या यह माना जाय कि पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी अपने राजनीतिक दोस्त एवं बदरीनाथ के तत्कालीन विधायक केदारनाथ सिंह फोनिया की वजह से धृतराष्ट्र बन आंखों पर पट्टी बांधे रहे। इस घोटाले के मुख्य सूत्रधार पांगती पूर्व मंत्री फोनिया के दामाद हैं। शायद यही वजह रही कि जिस अधिकारी पर जांच चल रही थी उसकी दोबारा उसी विभाग में नियुक्ति कर दी गई। क्या इससे जांच प्रभावित नहीं हुई होगी?

 

लोकायुक्त के जांच अधिकारी मान सिंह रावत ने ३ नवंबर २०११ को प्रथम दृष्टया ही इस मामले में भारी घोटाले के संकेत दिये थे। इसकी तह में जाकर उन्होंने १६ जनवरी २०१२ को स्पष्ट भी कर दिया कि इसमें भारी घोटाला हुआ। उन्होंने इसके लिए परियोजना निदेशक पांगती सहित आठ लोगों को जालसाजीफर्जीवाड़े और गबन की कई धाराओं में आरोपी ठहराया और लोकायुक्त से उनके विरुद्ध अभियोग दर्ज कराने की सिफारिश की। ऐसे में उत्तराखण्ड के लोकायुक्त एमएम घिल्डियाल को चाहिए था कि वे या तो अपने जांच अधिकारी की रिपोर्ट को स्वीकार करते या फिर निरस्त। चूंकि रिपोर्ट को निरस्त करने का उन्हें कारण बताना पड़ता लिहाजा उन्होंने बीच का रास्ता निकाल लिया और अपने ही जांच अधिकारी की जांच को धता बताते हुए विस्तृत जांच के नाम पर शासन से एक तीन सदस्यीय कमेटी बनाने की सिफारिश कर दी। इसे मामले पर लीपापोती करने के रूप में देखा जा रहा है।

 

इस मामले का चिंताजनक पहलू यह है कि विश्व बैंक की इस योजना के लिए १२५० करोड़ रुपया स्वीकृत हुआ था। जिसके प्रथम चरण में ४८८ करोड़ रुपये की बंदरबांट कर दी गई है। जबकि जल्द ही बाकी ७५० करोड़ रुपए आना है। अगर प्रथम चरण की धनराशि की जांच करने में लापरवाही का यही आलम रहा तो फिर धनराशि की दूसरी किस्त में का दुरुपयोग रुक पाएगा यह संभव नहीं लगता। जलागम में कई वरिष्ठ अधिकारियों का वर्षों से कुंडली मारकर जमे रहनाइसकी तरफ इशारा भी करता है। इस मामले में सरकार को चाहिए कि वह सिर्फ लोकायुक्त की जांच के भरोसे न रहे बल्कि केन्द्र की किसी बड़ी इकाई से जांच कराकर पहाड़ के लोगों के हित सुरक्षित करे।

 

यह विरोधाभास क्यों?

एक तरफ तो लोकायुक्त ने अपने ही जांच अधिकारी मान सिंह रावत की रिपोर्ट पर संदेह व्यक्त करते हुए तीन सदस्य कमेटी गठित करने के आदेश दिए लेकिन दूसरी तरफ मातला स्वजल योजना में हुए ३२ लाख के गबन पर उन्होंने इन्हीं जांच अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर चार अभियंताओं के विरुद्ध अभियोग दर्ज कराने और विभागीय कार्यवाही की संस्तुति भी कर दी। सवाल यह है कि एक ही जांच अधिकारी की रिपोर्टों पर यह अलग-अलग नजरिया क्यों?

 

स्वजल योजना के तहत जब उत्तरकाशी जिले में गुन्नुगाड स्रोत से ग्राम मातला डिक्कमा तक पेजयल योजना का प्रस्ताव पेयजल विभाग उत्तरकाशी को भेजा गया तो विभाग ने प्रस्ताव को स्वीकार कर ८९३० मीटर का प्राक्कलन तैयार कर वन विभाग के साथ संयुक्त जांच रिपोर्ट तैयार की। इसी दौरान ग्राम पाणी वालों ने इस योजना के लिए गुन्नुगाड से पानी देने के लिए मना कर दिया। इस योजना में भ्रष्टाचार की तस्वीर यह है कि योजना की पाइप लाइन वास्तविक दूरी (लंबाई से ढाई गुना अधिक दिखाई गई है। इतना ही नहीं इस बाबत ४० लाख ५८ हजार का प्राक्कलन प्लान तैयार कर काम शुरू कर दिया गया। इसमें न तो मानकों के अनुसार पाइप लाइनों को दबाया गया और न ही सुरक्षा दीवारें बनाई गई। हुडौली से मातला पैदल मार्ग ५ किलोमीटर दिखाया गया जबकि यह मार्ग १.७ किलोमीटर है। हुडोली से मातला के लिए मोटर रोड है जबकि प्राक्कलन में पाइप रेता बजरी सीमेंट लोहे का ढुलान पैदल दिखाया गया। भ्रष्टाचार की जांच में यह भी पाया गया कि बच्चन सिंह मिश्री लाल और चमन सिंह जैसे दैनिक श्रमिकों को २० नवंबर २०१० से ३० नवंबर २०१० तक की अवधि तक मातला पेयजल आपूर्ति एवं स्वच्छता उप समिति के मस्टररोल में कार्य पर दिखाया गया। जबकि इसी अवधि के दौरान इन्हीं श्रमिकों को हुडौली ग्राम पंचायत में मास्टररोल पर कार्य करते हुए दिखाया गया। तीनों श्रमिकों को दोनों जगह मजदूरी का भुगतान किया गया जो कतई संभव नहीं है। जांच के बाद १६ अप्रैल २०१२ को उत्तराखण्ड के लोक आयुक्त एमएम घिल्डियाल द्वारा विभाग के अभियंता नीटू सिंह अवर अभियंता राजेन्द्र सिंह सहायक अभियंता अशोक नारायण एवं अधिशासी अभियंता सीताराम के खिलाफ कार्यवाही करने के आदेश दिए गये थे। इतना ही नहीं बल्कि सभी लोगों के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता १८६० के अध्याय ११ के अंतर्गत सुसंगत धाराओं में कार्यवाही के लिए भी कहा गया। लेकिन इन्हीं लोकायुक्त घिल्डियाल ने जलागम में भ्रष्टाचार पर जांच अधिकारी मान सिंह रावत की रिपोर्ट के बाद तीन सदस्यीय कमेटी बना दी।

 

 
         
 
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