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आवरण कथा
 
जलागम में लूट की छूट

हाइलैण्डर कम्युनिकेशन नई दिल्ली को भी प्रचार- प्रसार सामग्री आपूर्ति की एवज में तीन बिलों के द्वारा दो लाख ५३ हजार ५०० का भुगतान दिखाया गया है। एक बिल संख्या ४३ में ९० हजार और दूसरे बिल संख्या ४४ में एक लाख ८० हजार का भुगतान किया गया। जबकि दोनों बिलों की आदेश संख्या ५३/२००४-०५ एक ही है। इस तरह एक ही बिल के दो भुगतान करा दिए गए। ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन आपूर्ति के लिए आईआईटी रुड़की के बजाए रुड़की इंडस्ट्रीज से काम कराया गया। इसके चलते एक लाख ५३ हजार रुपये का अधिक भुगतान किया गया। इसी तरह रुड़की इंडस्ट्रीज को डिजिटल रेन गेज प्रतिसेट के लिए ५५ हजार रुपए का भुगतान किया गया जबकि इस फर्म द्वारा गोविंद बल्लभ पंत हिमालय इन्वायरमेंट डेवलपेड कोसी (अल्मोड़ा को यही साफ्टवेयर प्रति सेट ३२ हजार रुपए में आपूर्ति किया गया। डिजिटल रेन गेज सेट खरीद में प्रति सेट २३ हजार रुपये अधिक का भुगतान कर हेराफेरी की गई।

 

यूनिवर्सल एडवरटाइजर कालाढूंगी रोड हल्द्वानी से प्रचार-प्रसार सामग्री मंगाकर मानकों से कई गुना अधिक १२ लाख ३२ हजार रुपये का भुगतान किया। इसमें धांधली का स्पष्ट प्रमाण है कि एक ही आदेश संख्या १५५ के आधार पर दो बिलों का भुगतान करा दिया गया। बिल संख्या २२४१ में ९० हजार तथा बिल संख्या २२७४ में एक लाख ८० हजार का भुगतान कर सरकारी धन का गबन किया गया। 

 

प्रचार सामग्री ग्रामीणों के लिए प्रशिक्षण सामग्री डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने की सामग्री के ढुलान किताबों के ढुलान और अधिकारियों एवं ग्रामीणों के आवागमन आदि के लिए जिन टैक्सी कार जीप आदि को किराये पर लेकर भुगतान किया गया वे भी फर्जी पाए गए। परिवहन विभाग से जब इन वाहनों के नंबर की जांच कराई गई तो पता चला कि उनमें से अधिकतर दोपहिया वाहन जैसे कि हीरो पुक एलएमएल वेस्पा बजाज सुपर एवं चेतक स्कूटर या हीरो होण्डा मोटरसाइकिलें हैं। परियोजना की ओर से आयोजित कार्यशाला में भाग लेने वाले प्रतिभागियों को कार्यशाला तक लाने और वापस ले जाने के के जिन वाहनों का उपयोग किया गया उनके नंबर फर्जी थे। मसलन डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने के नाम पर धांधली हुई। टीम का सामान ढोने और ग्रामवासियों के आवागमन के लिए जीप वाहन संख्या ०७-९९८७ को ३१०० रुपये का भुगतान किया गया। लेकिन जब परिवहन विभाग देहरादून से इस बाबत पूछा गया तो पता चला कि यह चेतक स्कूटर का नंबर है। इस तरह सैकड़ों उदाहरण हैं।

 

वर्ष २००५-०६ में कार्ययोजना के तहत ३४ ़४० करोड़ का बजट दिया गया जिसमें से कुल १६ ़६० करोड़ का ही व्यय हुआ। इस १६ ़६० करोड़ में से ५ ़६६ करोड़ भी वित्तीय वर्ष के अंतिम माह (मार्च २००६ में व्यय किया गया। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कार्ययोजना वास्तविकता पर आधारित न होकर कागजी कार्यवाही तक सिमटी रही। अकेले मार्च २००६ में वाहनों के उपयोग पर ४५ लाख रुपए का खर्च दिखाया गया। यही नहीं कार्य योजना के तहत वित्तीय नियमों एवं विश्व बैंक से किये गये एग्रीमेंट के विपरीत ३० दिन के बजाए १५ दिन की अल्प अवधि की निविदा सूचना जारी कर काम करवाने की औपचारिकताएं पूरी कर ली गईं। स्वाभाविक है कि कार्ययोजना का प्रचार न होने से चुनिंदा लोगों को ही इसका लाभ मिला होगा। इसी तरह पिथौरागढ़ के परियोजना निदेशक द्वारा ४ लाख ९० हजार में पोली हाउस का निर्माण कोटेशन की शर्तों के विपरीत बिना किसी एग्रीमेंट के करा दिया गया। ४ फरवरी २००६ को बागेश्वर स्थित उपपरियोजना निदेशक कार्यालय से सात लाख रुपया संदिग्ध परिस्थितियों में चोरी हो गया। जिसके लिए आज तक भी किसी अधिकारी या कर्मचारी की जिम्मेदारी निर्धारित नहीं की गई।

परत दर परत घोटाला

 

  • २५० रुपये की कीमत की एक जीबी पेन ड्राइव ९००० में खरीदी गई। 
  • ४ हजार रुपये मूल्य के बिजली सामान के लिए ढाई लाख का फर्जी भुगतान किया गया।
  • मार्च २००६ में दिखाया गया ५ ़६६ करोड़ का कागजी व्यय।
  • ४ फरवरी २००६ को बागेश्वर कार्यालय से दिखाई गई ४ लाख रुपये की चोरी।
  • निजी मोटर साइकिल स्कूटर हीरोपुक के फर्जी नंबरों से दिखाया गया ढुलान।
  • कार्यशालाओं के फर्जी आयोजन भोजन ठहरने आदि पर लुटाया गया पैसा।
  • गोयल प्रिंटर्स और चारु प्रिंटर्स के मालिक का पता भी फर्जी।
  • एक ही बिल संख्या ४३ पर किया गया दो बार भुगतान।
  • डिजिटल रेन गेज प्रति सेट खरीद में २३ हजार से अधिक का भुगतान।
  • यूनिवर्सल एडवरटाइजर कालाढूंगी रोड हल्द्वानी को प्रचार-प्रसार सामग्री में मानकों से कई गुना ज्यादा भुगतान।
  • सरकारी समान की आपूर्ति के लिए कोई समिति नहीं की गई गठित।
  • बिना टेंडर के ही खरीदे गए लाखों के सामान।
  • पंजीकृत फर्मों से खरीदे गए सामान बिलों का भुगतान चेक के बजाय किया गया नगद।
  • कर्मचारियों ने फर्जी दस्तावेज तैयार करके किया सरकारी धन का गबन।

 

 

 

व्हिसल ब्लोअर

वर्ष १९८६ बैच के प्रांतीय वन सेवा अधिकारी आरडी पाठक ने १९९०-९१ में वन विभाग में उप प्रभारी वनाधिकारी रहते हुए कॉमर्शियल मोटर देहरादून द्वारा हथियाई गई ९० बी जमीन खाली करवाई। वर्तमान में इस जमीन की कीमत १०० करोड़ के आस-पास है। इसी वर्ष उन्होंने पूर्व मंत्री चौधरी गिरधारी लाल द्वारा रानी प्रोखरी देहरादून में कब्जाई गई ८० बी जमीन खाली कराई। १९९५ में खटीमा में लगभग ३० हेक्टेयर जमीन को पूरबिया लोगों से अतिक्रमण मुक्त कराकर विभाग के सुपुर्द किया १९९६-९७ में पूर्वी तराई वन प्रभाग हल्द्वानी में भारी अवैध कटान पकड़ा जिसमें तत्कालीन प्रभागीय वनाधिकारी जेएस सुहाग लिप्त थे। इन पर कार्यवाही आज भी लंबित है लेकिन वे दो बार पदोन्नति पाने में सफल हो गए। इसी वर्ष आरडी पाठक ने गोला नदी से निकलने वाले उप खनिज पर ट्रांजिट फीस कम करने से होने वाली राजस्व क्षति का मामला उठाया। उनके इस प्रयास से विभाग को अब तक १२ करोड़ २८ लाख का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हुआ। लेकिन २ ़५० करोड़ की राजस्व क्षति के मामले में दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही होनी अभी बाकी है। २००२ में पाठक ने डीएफओ बड़कोट के रूप में ६ हेक्टेयर वन भूमि खाली करवाई तथा देवदार के अवैध कटान पर प्रतिबंध लगाया। २००७-०८ में टोंस वन प्रभाग पुरौला में १३ हेक्टेयर वन भूमि अतिक्रमण से मुक्त कराकर उन पर वृक्षारोपण कराया। २००९ में डीएफओ हरिद्वार के रूप में २२५ बी वन भूमि वन माफियाओं के कब्जे से छुड़ाकर वृक्षारोपण कराया। २०१०-११ में डीएफओ नरेन्द्र नगर रहते हुए २०० बी वन भूमि माफिया मुक्त करायी। वर्तमान में प्रमुख वन संरक्षण परियोजनाएं उत्तराखण्ड देहरादून में कार्यरत हैं। जलागम परियोजना के खिलाफ भी पाठक ने ही मोर्चा खोला। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले इन ईमानदार अधिकारी के खिलाफ विरोधी सक्रिय रहे हैं। विरोधियों ने उनके विरुद्ध कई फर्जी शिकायतें दर्ज करवाईं। नौ बार वे उनके खिलाफ जांच करवा चुके हैं। जिनमें ६ जांच विभागीय २ विजलेंस और एक पुलिस द्वारा की गई। सभी में उन्हें क्लीन चिट दे दी गई। अभी भी विरोधी उन्हें किसी फर्जी मामले में फंसाने के फेर में हैं। 

 

बात अपनी अपनी

अपने जांच अधिकारी की रिपोर्ट पर हमें संदेह नहीं है लेकिन कुछ-कुछ कंफ्यूजन के चलते हमने तीन सदस्यीय समिति से विस्तृत जांच कराने को कहा है।

एम.एम. घिल्डियाल लोकायुक्त उत्तराखण्ड

हमने धनराशि का सदुपयोग किया है। कुछ गाड़ियों के नंबरों में मिस प्रिटिंग अवश्य हुई है।  लेकिन वास्तव में वे दोपहिया वाहन नहीं थे।

वी.के. पांगती परियोजना निदेशक 

अभी तीन सदस्यीय समिति भी जांच कर रही है। उसके बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकेगा।

आर.बी.एस. रावत प्रमुख वन संरक्षक 

लोकायुक्त ने जांच रिपोर्ट के आधार पर आरोपी अधिकारियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने की सिफारिश करने के बजाय मामले को रफा-दफा करने के लिए एक कमेटी बैठा दी जिसका कोई औचित्य नहीं है।

आर.डी. पाठक डीएफओ परियोजनाएं

वीके पांगती को राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है। जिसके चलते वे बेखौफ होकर द्घपले- घोटाले कर रहे हैं। हमने उत्तराखण्ड सरकार से मांग की है कि पांगती सहित सभी आरोपी अधिकारियों को जेल में डाल दिया जाए।

जयप्रकाश डबराल अध्यक्ष हिमालय चिपको फाउंडेशन

इस मामले में लोकायुक्त न केवल अपनी साख गवां चुके हैं बल्कि जनता के बीच अपना विश्वास भी खो रहे हैं। इस मामले में लोकायुक्त का पांगती के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर है। इस घोटाले में सीबीआई जांच होनी चाहिए। हमने सरकार से सीबीआई जांच की मांग की है।

डॉ. एस.के. पाण्डे चेयरमैन आरडीसी एवं प्राचार्य सिद्धार्थ लॉ कॉलेज


शेष भाग आगे...

आकाश नागर
 
         
 
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