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आवरण कथा
 
जलागम में लूट की छूट

विश्व बैंक का जो पैसा पहाड़ में पेयजल सिंचाई कृषि और रोजगार सृजन पर खर्च होना था वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। विकेन्द्रीकृत जलागम विकास परियोजना के अंतर्गत होने वाले विकास कार्य जमीन पर नहीं बल्कि कागजों पर हुए। परियोजना के बजट को ठिकाने लगाने के लिए प्रचार सामग्री ऐसी प्रेस में छपवाई गई जो कहीं थी ही नहीं। एक पेन ड्राइव तक नौ हजार रुपये में खरीदी गई। बिजली उपकरण उन दुकानों से खरीदे गए जिनकी हैसियत इन्हें आपूर्ति करने की नहीं थी। दोपहिया वाहनों से माल ढुलाई और आवागमन दिखाकर खुलेआम लूट मचाई गई। आश्चर्यजनक है कि सैकड़ों किलोमीटर दूर दोपहिया वाहनों से माल ढुलाई हुई। घोटाले की जांच में परियोजना निदेशक सहित कई अन्य अधिकारियों को दोषी पाया गया। लेकिन लोकायुक्त ने एक ईमानदार अधिकारी की जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई करने के बजाए विस्तृत जांच के नाम पर तीन सदस्यीय कमेटी के गठन के आदेश दे दिये। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि कहीं यह कमेटी जांच पर लीपापोती करने के मकसद से तो नहीं बनाई गई है। जलागम में लूट के इस खेल को हम एक नए अंदाज और नई शैली में पाठकों के सामने रख रहे हैं। ऐसा इसलिए कि यह मामला बेहद पेचीदा है। हम इसे सरस भाषा में आमजन तक पहुंचा रहे हैं

 

पात्र-परिचय

 

एमएम घिल्डियाल उत्तराखण्ड के पूर्व एडवोकेट जनरल ललिता प्रसाद नैथानी के इलाहाबाद हाईकोर्ट में जूनियर अधिवक्ता रहे। राज्य बनने के बाद उत्तराखण्ड हाईकोर्ट में मुख्य स्थाई अधिवक्ता बनाए गए। इन्हें हाईकोर्ट नैनीताल का जज नियुक्त किया गया। २००८ में हाईकोर्ट से अवकाश प्राप्त करने के बाद लोकायुक्त उत्तराखण्ड बनाए गए। इनके पांच साल के कार्यकाल में किसी भी मामले में कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई और न ही सरकार को किसी तरह की क्षतिपूर्ति हो पाई। 

 

घिल्डियाल ऐसे शख्स हैं जिन्होंने जलागम में करोड़ों रुपए के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वाले ईमानदार जांच अधिकारी की रिपोर्ट को दरकिनार कर विस्तृत जांच कराने के नाम पर तीन सदस्यीय कमेटी का गठन करने के आदेश दे दिये। 

 

विनीत कुमार पांगती १९८८ बैच के आईएफएस हैं। राज्य के पूर्व मंत्री केदार सिंह फोनिया के दामाद हैं। वर्ष २००३ से लेकर २ जनवरी २०१० तक मुनिकी रेती में तैनात रहे। सबसे पहले डिप्टी डायरेक्टर मुख्यालय देहरादून २००४ से जनवरी २०१० तक मुनिकी रेती में विकेन्द्रीकृत जलागम विकास परियोजना के डायरेक्टर रहे। जनवरी २०१० से अक्टूबर २०११ तक वन संरक्षण भागीरथी वृत्त मुनिकी रेती रहे। जब इनके खिलाफ लोकायुक्त में शिकायत हुई तो राजनीतिक पहुंच के बल पर इन्होंने अभिलेखों को दुरुस्त करने के लिए अपनी तैनाती पुनः निदेशक विकेन्द्रीकृत जलागम विकास परियोजना मुनिकी रेती के पद पर करा ली। करोड़ों के गबन में लिप्त पाए जाने के बाद अभी तक इस पद पर तैनात हैं। लोकायुक्त की कृपा दृष्टि इन पर बनी हुई है।

 

मान सिंह रावत उत्तराखण्ड में एक ईमानदार वरिष्ठ पुलिस इंस्पेक्टर हैं जो लोकायुक्त उत्तराखण्ड की जांच एजेंसी में प्रतिनियुक्ति पर तैनात थे। जलागम में हुए भ्रष्टाचार की जांच कर इन्होंने परियोजना निदेशक विनीत कुमार पांगती सहित आठ अधिकारियों और आपूर्तिकर्ताओं को दोषी पाया। उन्हें आईपीसी की आधा दर्जन धाराओं के अंतर्गत आरोपी ठहराया। इन्होंने एक अवर अभियंता को भी रिश्वत देने के प्रयास में जेल भिजवाया। मातला स्वजल योजना की जांच करते हुए चार अभियंताओं को ३२ लाख के गबन का दोषी पाया। 

 

पटकथा

 

विश्व बैंक से वित्त पोषित केंद्र सरकार की जलागम विकास परियोजना को वर्ष २००५ में १२५० करोड़ रुपए उपलब्ध कराए गए थे। यह राशि इस एवज में मुहैया कराई गई थी कि इससे पहाड़ में सिंचाई के साधन बढ़ेंगे। कृषि चारागाहों और चारागाहों का विकास होगा। भूजल संरक्षण के साथ ही पेयजल और सिंचाई के पानी में दोगुना वृद्धि होगी। स्वरोजगार का सृजन होगा और आठ हजार बीपीएल परिवारों की आय में वृद्धि होगी। योजना के प्रथम चरण में ४८८ करोड़ रुपए खर्च भी हो चुके हैं। लेकिन योजना के तहत किये जाने वाले विकास कार्य धरातल पर नहीं दिखाई दे रहे हैं। योजना का क्रियान्वयन करने वाले अधिकारियों की नामी और बेनामी संपत्ति बढ़ती गई। लेकिन जिन लोगों के लिए विश्व बैंक ने उदारता से पैसा दिया वे गरीब ही रह गए। भ्रष्टाचार की इंतहा हुई तो परियोजना के ही एक अधिकारी आरडी पाठक ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उन्होंने इसकी शिकायत लोकायुक्त से की।

 

लोकायुक्त ने इसकी जांच कराई। जांच अधिकारी मान सिंह रावत ने पाया कि इस परियोजना में भारी घोटाला हुआ है। उन्होंने आरोपी अधिकारियों के खिलाफ आईपीसी की धाराएं ४०९ ४२० ४६७ ४८ ४७१ और १२०बी के तहत कार्रवाई करने की संस्तुति कर १६ जनवरी २०१२ को जांच रिपोर्ट उत्तराखण्ड के लोकायुक्त को सौंप दी। लेकिन लोकायुक्त ने १७ महीने बाद जांच अधिकारी की रिपोर्ट को दरकिनार कर विस्तृत जांच के नाम पर तीन सदस्यीय कमेटी गठित कर उनकी निष्ठा पर सवाल खड़े कर दिए। जांच अधिकारी मान सिंह रावत की रिपोर्ट विकेन्द्रीकृत जलागम विकास परियोजना में घोटाले के लिए जिन अधिकारियों को दोषी ठहराया गया है उनमें परियोजना निदेशक वीके पांगती मुनिकी रेती के स्टोर कीपर ऋषिराम उनियाल अजय त्यागी अगस्तमुनि रुद्रप्रयाग के यूनिट अधिकारी हरीश चंद्र रतूड़ी चिन्यालीसौड (उत्तरकाशी के यूनिट अधिकारी सुन्दर सिंह शाह गैरसैंण जिला चमोली के प्रशासनिक अधिकारी रमेश कुमार और आपूर्तिकर्ता जितेन्द्र चौहान पुत्र भरत सिंह चौहान और सुनील गोयल शामिल हैं।

 

दिलचस्प यह है कि योजना के प्रचार-प्रसार के लिए जिस प्रिंटिंग प्रेस से सामग्री छपवाई गई वह प्रेस कहीं है ही नहीं। यही नहीं प्रिंटर्स के तौर पर जिन गोयल प्रिंटर्स और चारु प्रिंटर्स के पते दिये गये हैं वे भी फर्जी पाए गए। ये दोनों प्रिंटर्स पति-पत्नी हैं। प्रिंटर्स सुनील गोयल पुत्र राम गोपाल को ९ लाख ९८ हजार का भुगतान किया गया। इसके अलावा देहरादून के ११८ पार्क रोड के पते पर चारु प्रिंटर्स को सात लाख तैतीस हजार सात सौ रुपए प्रचार प्रसार सामग्री आपूर्ति के लिए भुगतान किया गया। लेकिन इस पते पर श्रीमती वंदना गोयल रहती हैं जबकि यहां प्रिंटिंग प्रेस का कहीं अता-पता नहीं था। 

 

शेष भाग आगे...

आकाश नागर

 
         
 
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