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vad 46 07-05-2017
 
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संवाद
 
हमारी ही कमी से टूटा दल

उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में विधायक रह चुके काशी सिंह ऐरी पृथक राज्य आंदोलन के शीर्ष नेताओं में माने जाते हैं। कुछ साल पहले तक उक्रांद में उनकी तूती बोलती थी। लेकिन आज हालत यह है कि दल के अध्यक्ष ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया है। अब उनके समक्ष अपने अस्तित्व की नई चुनौती खड़ी है। ऐरी से उक्रांद की टूट राजनीतिक विफलता संगठन की खामियों और तमाम अन्य मुद्दों पर गुंजन कुमार की बातचीत के अंश 

 

उत्तराखण्ड क्रांति दल उक्रांद राज्य आंदोलन के दौरान भी टूटा लेकिन वे क्या कारण रहे कि राज्य निर्माण के बाद पार्टी पूरी तरह बिखर गई?

इसके कई कारण हो सकते हैं। हमारे नेताओं का अति महत्वाकांक्षी होना और गैर राजनीतिक रवैया रखना मुख्य कारण है। पार्टी के मुखिया यानी अध्यक्ष बनने के बाद नेताओं ने अपनी मनमर्जी से जिसको चाहा पार्टी से निकाल दिया। अपनी मनमर्जी से पार्टी को चलाने का एटीट्यूड रहा है। यही कारण अहम रहा है। जिस व्यक्ति को हमने अध्यक्ष बनाया उसने हमें पार्टी से निकाल दिया। वह भी बिना किसी बात के और बिना कोई नोटिस भेजे। इस प्रकार के गैर राजनीतिक रवैये से उत्तराखण्ड क्रांति दल (उक्रांद) को नुकसान हुआ है। कई बार पार्टी टूटी। इसे ठीक किया गया लेकिन फिर टूटी। अब हम लोग इन सभी चीजों को ध्यान में रखते हुए और इससे सबक सीखकर आगे अच्छा करने का प्रयास करेंगे।

 

उक्रांद आज आधा दर्जन आंकड़ों में बंट चुका है। आज आखिर असली उक्रांद कौन है?

असली उक्रांद वही है जिसके साथ कार्यकर्ता हैं। जिसने राज्य आंदोलन में अहम भूमिका निभाई। हम लोगों ने विकट परिस्थितियों में भी कभी किसी दूसरे राजनीतिक दल के बारे में नहीं सोचा। ऐसे लोग जिधर हैं वही असली उक्रांद है। कई लोगों ने उक्रांद के नाम पर (आगे-पीछे कुछ जोड़कर) अलग-अलग पार्टियों का रजिस्ट्रेशन करा लिया है। वे उक्रांद के नाम का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं।

 

महात्मा गांधी स्वतंत्रता आंदोलन की अगुआ कांग्रेस पार्टी को आजादी के बाद भंग कर देना चाहते थे। उसी प्रकार राज्य गठन के बाद उक्रांद के कुछ नेता भी पार्टी को खत्म करने के पक्षधर थे। आज के संदर्भ में क्या उस समय उक्रांद को भंग करना सही फैसला होता?

यह प्रस्ताव मैंने ही पार्टी के सीनियर नेताओं के सामने रखा था। राज्य गठन से पहले जब उत्तराखण्ड राज्य की घोषणा औपचारिकता भर रह गई थी तभी मैंने अपने प्रस्ताव में कहा था कि हमने जिस ऐतिहासिक कार्य के लिए उक्रांद बनाया था वह पूर्र्ण हो गया है। इसलिए इसे भंग कर देना चाहिए। उससे बाद उक्रांद के कार्यकर्ता और पदाधिकारी अपने-अपने हिसाब से राजनीति कर सकते हैं। लेकिन राज्य पुनर्गठन विधेयक में बहुत सी खामियां और कमियां थी। इसलिए सबने कहा कि अभी राज्य पूरा नहीं बना है। यदि दल को खत्म कर देंगे तो विधेयक में मौजूद खामियों और कमियों के खिलाफ कौन लड़ेगा? इसलिए हमने दल को भंग नहीं किया। इन बारह सालों में हमने कुछ काम किए कुछ अभी बाकी हैं। यह भी सही है कि हम संगठन के स्तर पर अपने को सशक्त नहीं बना पाए। नतीजतन पार्टी कई बार टूटी। यह हमारी अपनी कमी है। जनता ने हमारा साथ दिया। हम जनता को कन्विंश करने में कामयाब नहीं रहे।

 

कुछ माह पूर्व उक्रांद अध्यक्ष त्रिवेन्द्र सिंह पंवार ने पार्टी के इकलौते विधायक और सरकार में मंत्री प्रीतम सिंह पंवार को पार्टी से निकालने का प्रस्ताव पारित किया था। हमारी जानकारी के मुताबिक उस प्रस्ताव में आपके भी हस्ताक्षर थे। क्या यह सही है?

नहीं! यह बिल्कुल गलत है। त्रिवेन्द्र पंवार ने अपने पूरे कार्यकाल में सिर्फ एक मीटिंग की है। मैं उसमें उपस्थित जरूर था। लेकिन प्रीतम पंवार को हटाने पर मेरी सहमति नहीं थी। दरअसल होता यह था कि वे बैठक शुरू होने से पहले सभी के हस्ताक्षर ले लेते थे और घर जाकर उसके नीचे प्रस्ताव लिख देते थे। यह तो उनका रवैया रहा है। मैंने प्रीतम सिंह पंवार को निकालने का विरोध किया था। मैंने यह भी कहा था कि आप किस कारण से उन्हें पार्टी से निकाल रहे हैं। यदि कुछ कमियां हैं तो बैठकर बात कर लेते हैं। आखिर वे हमारी पार्टी के विधायक और मंत्री हैं। बिना किसी कारण और नोटिस के आप उन्हें नहीं निकाल सकते।

 

उक्रांद का अधिवेशन हमेशा २४-२५ जुलाई को होता था। यदि आपका उक्रांद असली है तो आपने अधिवेशन निश्चित तारीख से पहले क्यों कर लिया?

चौबीस-पच्चीस को हमारी पार्टी का अधिवेशन होता रहा है लेकिन सात-आठ साल पहले हमारी पार्टी ने एक प्रस्ताव पास किया था कि जुलाई में बहुत ज्यादा बारिश होती है इसलिए अक्टूबर- नवंबर में जब पहाड़ का मौसम अच्छा होता है उस दौरान अधिवेशन कर लें। कई अधिवेशन अक्टूबर-नवम्बर में हुए हैं। पिछला अधिवेशन जिसमें त्रिवेन्द्र सिंह पंवार अध्यक्ष चुने गए थे वह पहले फरवरी में होना तय हुआ था। उस वक्त दिवाकर भट्ट अध्यक्ष बनना चाहते थे। लेकिन विरोध के कारण वह अधिवेशन स्थगित होकर जुलाई में हुआ था। इसलिए यह कहना कि हमने पार्टी लाइन से हटकर अधिवेशन किया है गलत होगा। 

 

राज्य गठन के बारह सालों में प्रदेश में जिस किसी की भी सरकार रही उसने घपले-घोटाले किए। जनता सरकार और नौकरशाहों के भ्रष्टाचार से त्रस्त है। उसे एक राजनीतिक विकल्प चाहिए। फिर भी उक्रांद विकल्प नहीं दे पा रहा है ऐसा क्यों?

भ्रष्टाचार का आलम यह है कि विधानसभा अध्यक्ष सरकार और नौकरशाहों के भ्रष्टाचार का जिक्र कर रहे हैं। भाजपा कांग्रेस के ५६ घोटालों की जांच कर रही थी और अब कांग्रेस भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार की जांच करा रही है। लेकिन अभी तक किसी जांच की रिपोर्ट नहीं आई है। असल बात यह है कि भाजपा-कांग्रेस दोनों मिलकर भ्रष्टाचार कर रहे हैं। इसमें दोनों एक-दूसरे के सहयोगी हैं। दोनों एक-दूसरे को बचा रहे है। उन्हें पता है कि एक-दूसरे पर हमला करने से दोनों का नुकसान है।

 

आपकी पार्टी भाजपा-कांग्रेस दोनों सरकारों में शामिल रही है। इसलिए भ्रष्टाचार का दाग आपकी पार्टी पर भी लगता है?

सन्‌ २००७ में संवैधानिक संकट को देखते हुए हमने भाजपा को समर्थन दिया। इस बार भी वही हुआ। हम सरकार में शामिल जरूर रहे हैं लेकिन हमने अपने मुद्दे नहीं छोड़े। मुद्दों को लेकर हमने आंदोलन भी किए। भ्रष्टाचार गैरसैंण रोजगार पलायन जैसे जन मुद्दों को उठाया। हम सरकार में शामिल थेभ्रष्टाचार में नहीं। वैसे भी आप समझ सकते हैं कि सरकार में एक कैबिनेट मंत्री कितना प्रभावी हो सकता है। इसलिए सरकार पर ज्यादा दबाव नहीं डाल सके। यदि स्थिति ऐसी होती कि हमारे मंत्री के इस्तीफा देने से सरकार गिर जाती तब हम लोग मजबूत रहते लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

 

तो आपने सरकार में बने रहने के लिए अपनी विचारधारा से समझौता किया?

नहीं! हमने सरकार को चलाने के साथ-साथ पार्टी स्तर पर मुद्दे भी उठाए। हमने विधानसभा का द्घेराव किया। सड़क पर उतरे। उक्रांद ने कभी विचारधारा और अपने मुद्दों को नहीं छोड़ा।

 

आपको नहीं लगता कि पार्टी सरकार बनाने के लिए समर्थन देती है और पार्टी कोटे का मंत्री कुछ दिनों बाद पार्टी से बड़ा हो जाता है?

मैंने शुरू में ही बताया कि कुछ लोगों की अति महत्वाकांक्षा ने उक्रांद को कमजोर किया है। कोई भी मंत्री या विधायक पार्टी से बड़ा नहीं हो सकता। यह सभी को समझना चाहिए।

 

अब आप एक नए उक्रांद के केंद्रीय अध्यक्ष बन गए हैं। भविष्य में पार्टी को लेकर क्या योजनाएं हैं?

उत्तराखण्ड क्रांति दल को लोगों तक पहुंचाना साथ ही इसकी विचारधारा और मुद्दों से लोगों को अवगत कराना है। इसके अलावा जो नेता कार्यकर्ता और संगठन उक्रांद के समान विचार रखते हों या जो उत्तराखण्ड के लिए कुछ करने को तत्पर हों उन सबको इकट्ठा करके पार्टी को मजबूत बनाएंगे।

 

पार्टी से निष्काषित किसी नेता को क्या आप अपनी पार्टी में शामिल करेंगे?

क्योंकि कुछ लोगों का काम पार्टी तोड़ने का रहा है। ऐसे लोगों की पार्टी सावधानीपूर्वक समीक्षा करेगी। साथ ही पार्टी यह भी तय करेगी कि किसे पार्टी में शामिल किया जाए और किसे नहीं।

 

यानी दिवाकर भट्ट को आप अपनी पार्टी में नहीं लाने वाले हैं?

(हंसते हुए) यह किसी खास व्यक्ति के लिए नहीं कहा गया है।

 

मंत्री प्रीतम सिंह पंवार क्या आपके साथ हैं?

निलंबित हैं। हमने निलंबन रोका है। वर्ष २०१२ के बाद जितने भी फैसले लिए गए हैं सबको निरस्त कर दिया है। कुछ समय बाद उन सभी फैसलों की समीक्षा करेंगे। जो फैसला दल के हित में होगा उसे रखेंगे बाकी को निरस्त कर देंगे।

 

लेकिन मंत्री जी ने तो बयान दिया है कि वह किसी के साथ नहीं हैं?

मंत्री हैं। किसी कंट्रोवर्सी से बचना चाह रहे होंगे। ऐसे में तकनीकी रूप से वह हमारे साथ हैं। बाद में क्या होगा यह देखा जाएगा। 

 

उक्रांद के संविधान के मुताबिक कोई बड़ा फैसला या अधिवेशन बुलाने का फैसला अध्यक्ष करता है। इसके मद्देनजर आपका अधिवेशन या आपके अध्यक्ष का चुनाव असंवैधानिक नहीं है?

संविधान में यह भी है कि यदि अध्यक्ष मनमानी करता है तो कार्यकारिणी एक तिहाई बहुमत से बैठक बुलाने के लिए कह सकती है। यदि अध्यक्ष तब भी बैठक नहीं बुलाते तो कार्यकारिणी को तिहाई बहुमत से बैठक बुला सकता है और निर्णय ले सकता है। 

 

अगले साल आम चुनाव है। क्या आपकी पार्टी चुनाव मैदान में उतरेगी?

अभी हमारी स्थिति कमजोर है। क्षेत्र में बहुत काम करने हैं। समय बहुत कम है। जल्दी-जल्दी काम करना होगा। चुनाव के दौरान ही इस पर फैसला लेंगे। त्रिवेन्द्र पंवार ने अपने पूरे कार्यकाल में सिर्फ एक मीटिंग की है। मैं उसमें उपस्थित जरूर था लेकिन प्रीतम पंवार को हटाने पर मेरी सहमति नहीं थी। दरअसल होता यह था कि वे बैठक शुरू होने से पहले सभी के हस्ताक्षर ले लेते थे और घर जाकर उसके नीचे प्रस्ताव लिख देते थे। यह तो उनका रवैया रहा है। मैंने प्रीतम सिंह पंवार को निकालने का विरोध किया था। मैंने यह भी कहा था कि आप किस कारण से उन्हें पार्टी से निकाल रहे हैं

 

गुंजन कुमार की बातचीत के अंश 

 
         
 
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  • सिराज माही

जफर गोरखपुरी बहुमुखी प्रतिभा वाले शायर हैं। वह ऐसे कामयाब शायर हैं कि पिछले पचास सालों से उनकी रचनाएं महाराष्ट्र सरकार के स्कूली पाठ्यक्रम
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