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देश-दुनिया 
 
हमले से उपजे सवाल

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में २५ मई को करीब १२०० नक्सलियों की एक टुकड़ी ने कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हमला कर दिया। हमले में २८ लोग मारे गए जिनमें छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष नंद कुमार पटेल नेता विपक्ष रहे और नक्सलियों के खिलाफ सलवा जुडूम मुहिम छेड़ने वाले महेंद्र कर्मा और पूर्व कांग्रेसी विधायक उदय मुदलियार जैसे लोग भी शामिल हैं। इस हमले के बाद १९ पुलिसकर्मियों और कई कांग्रेस कार्यकर्ता भी लापता बताए जा रहे हैं।

 

दरअसल परिवर्तन यात्रा २५ मई की शाम को सुकमा जिले में सभा करके जगदलपुर की ओर रवाना हुई थी। छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इस यात्रा का आयोजन किया गया था। यात्रा में छत्तीसगढ़ कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल और विधानसभा में पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा समेत लगभग १२० लोग शामिल थे। लगभग २० गाड़ियों में सवार यात्रा जब गीदम द्घाटी के करीब पहुंची तभी नक्सलियों ने पेड़ गिराकर रास्ता रोक लिया और यात्रा पर गोलीबारी कर दी। हमले में द्घायल हुए कांग्रेसी नेता विद्याचरण शुक्ल की हालत अभी भी गंभीर बताई जा रही है। हमले की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राहुल गांधी सोनिया गांधी भाजपा सपा सभी ने द्घोर निंदा की है। राहुल ने तो दो कदम आगे बढ़ते हुए इसे लोकतंत्र पर हमला बताया है। सरकार ने मृतकों के लिए पांच-पांच और द्घायलों के लिए ५० हजार रुपए के मुआवजे की द्घोषणा कर दी है। सरकार ने आनन-फानन में सीआरपीएफ के ६००० जवानों को भी बस्तर के लिए रवाना कर दिया है। द्घटना के बाद राहुल और सोनिया ने २७ मई को रायपुर का दौरा भी किया। इसी के साथ बस्तर को सेना के सुपुर्द किए जाने की चर्चा भी जोर पकड़ने लगी है। रमन सिंह सरकार ने राज्य में तीन दिन के शोक का ऐलान किया। साथ ही मारे गए सभी लोगों का राजकीय सम्मान से अंतिम संस्कार की व्यवस्था भी की गई। सुरक्षा कारणों के मद्देनजर भाजपा ने फिलहाल अपनी विकास यात्रा रद्द कर दी है।

 

गौरतलब है कि भारत में नक्सली हिंसा की शुरुआत १९६७ में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई जिससे इस आंदोलन को इसका नाम मिला। हालांकि इस विद्रोह को पुलिस ने बर्बरता से कुचल दिया लेकिन इसी आंदोलन के कुछ बचे हुए लोग झारखंड पश्चिम बंगाल ओडिशा बिहार छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में बिखर गए और आंदोलन को जीवित रखा। माना जाता है कि भारत के कुल छह सौ से ज्यादा जिलों में से एक तिहाई नक्सलवादी समस्या से जूझ रहे हैं। विश्लेषक मानते हैं कि नक्सलवादियों की सफलता की वजह उन्हें स्थानीय स्तर पर मिलने वाला समर्थन है। नक्सलियों का कहना है कि वे उन आदिवासियों और गरीबों के लिए लड़ रहे हैं जिन्हें सरकार ने दशकों से अनदेखा किया है। पिछले वर्षों में हालांकि नक्सली हिंसा में कमी देखी गई है फिर भी वर्ष २००९ में पश्चिम बंगाल के लालगढ़ पर नक्सलियों का कब्जा साल २०१० में छत्तीसगढ़ के द्घने जंगलों में सुरक्षाबलों पर द्घात लगा कर हमले जिसमें ७६ सुरक्षाकर्मी मारे गए और २००७ में छत्तीसगढ़ में ही पुलिस के एक नाके पर हमाले में ५५ पुलिसकर्मियों की मौत जैसी कुछ बड़ी वारदातें सामने आई हैं। दूसरी तरफ २००५ में महेन्द्र कर्मा के नेतृत्व में बने सलवा जुडूम और सीआरपीएफ के जवानों की हिंसक गतिविधियां भी चर्चा का विषय रही हैं।

 

जानकार इस हमले के बाद कई ऐसे सवाल उठा रहे हैं जो कि सरकार की कार्यशैली और इस समस्या के प्रति उसके व्यवहार को शक के दायरे में खड़ा कर देता है। जानकारों का मानना है कि देश में लोगों के मन में एक धारणा बनी हुई है कि हमारे नेताओं ने लोकतंत्र को सत्ता हासिल करने का एक जरिया बना लिया है। सवाल है कि नेता मारे गए तो लोकतंत्र याद आया है लेकिन जब सुरक्षाकर्मी या आम आदिवासी नागरिक मारे जाते हैं तब लोकतंत्र खतरे में क्यों नहीं पड़ता? सवाल यह भी है कि जिस बस्तर में १२ में से ११ विधानसभा सीटों पर भाजपा की जीत हुई हो जहां कांग्रेस का सांसद ही नहीं है वहां कांग्रेस के नेताओं से नक्सलियों की इतनी नाराजगी की क्या वजह है? हालांकि यह कहना एकदम सही है कि महेन्द्र कर्मा नक्सलियों का निशाना हमेशा से रहे थे और ऐसा सलवा जुडूम की बस्तर में की गई हिंसक कार्रवाइयों की वजह से ही था। 

 

दूसरा सवाल इस क्षेत्र में कायम अर्थशास्त्र का है। नक्सल प्रभावित हर जिलों को केंद्र और राज्य सरकार इतना पैसा देती है कि अगर उसे पूरी तरह खर्च किया जाए तो लोगों की हालत में सुधार लाया जा सकता है। लेकिन इन सब के बावजूद बस्तर की बहुसंख्य आबादी आज भी बिना बिजली और शौचालय के रहती है। अस्पताल जाने के लिए मीलों चलती है और दवाओं के लिए नक्सलियों पर निर्भर है। कहां क्या खर्च हो रहा है इसका कोई हिसाब नहीं है क्योंकि जहां पैसे कथित तौर पर खर्च किए जा रहे हैं वहां पंहुचकर निरीक्षण करना संभव नहीं है। दरअसल पूरा मामला पैसा नेता-अफसर और ठेकेदारों की तिकड़ी की कमाई से ही जुड़ा है। बताया जाता है कि इस पैसे में से एक बड़ा हिस्सा नक्सलियों को भी जाता है। इसके बदले अक्सर वे भी आदिवासियों के असल शोषण से आंखें मूंदे रहते हैं। सरकार के हठकारी रवैये के चलते ही आंदोलन अपने एक हिंसक दौर में पंहुच गया है। सरकार आज तक मानने को तैयार ही नहीं है कि ये समस्या सामाजिक-आर्थिक समस्या है कानूनी नहीं। इस सवाल पर राजनीतिक पार्टियों के बीच भी विवाद है। सिर्फ बस्तर ही नहीं राज्य के इसी दमनकारी रवैये ने देश की कई राजनीतिक-अर्थिक-सामाजिक समस्याओं को विकराल रूप दे दिया है जिसका इस्तेमाल वोट बैंक की राजनीति के लिए बखूबी किया जाता रहा है। 

अंकित फ्रांसिस

जापान यात्रा के मायने

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के नजरिए से मई महीना भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा। इस महीने में जहां चीन के प्रधानमंत्री ली कचियांग भारत दौरे पर आए वहीं अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई ने भी भारत आ रिश्तों को प्रगाढ़ करने की कोशिश की। चीन को लेकर उपजी ताजा चिंताओं के मद्देनजर भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह २७ मई से पांच दिवसीय जापान और थाइलैंड की यात्रा पर रहे।

 

इस संजीदा समय में भारत के लिए ये दौरे अहम साबित हो सकते हैं। चीन जिस अंदाज में जापान और भारत जैसे पड़ोसियों को अपनी ताकत दिखाने की कोशिश कर रहा है वह भारत जापान अमेरिका और कई आसियान देशों में आशंकाएं पैदा कर रहा है। ऐसे में इन देशों को कूटनीतिक तौर पर लामबंद होने की जरूरत तो है ही चीन के प्रत्यक्ष निशाने पर आने वाले देशों (भारत और जापान) को अपने सुरक्षा ढांचे को मजबूत बनाने की भी आवश्यकता है। 

 

भारत ने हाल में कई देशों के साथ रक्षा समझौते किए हैं। इसी क्रम में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी जापान यात्रा पर असैन्य परमाणु सहयोग पर द्विपक्षीय समझौते को जल्द अंतिम रूप देने और दोनों देशों के बीच सामरिक सहयोग को नया आयाम देने पर चर्चा की। इस यात्रा के दौरान सिंह अपने जापानी समकक्ष शिंजो आबे के साथ आपसी हितों से जुड़े विविध विषयों पर बातचीत की। 

सबसे दिलचस्प बात यह कि दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच वह पहला शिखर सम्मेलन रहा जो पिछले साल नवंबर में स्थगित हो गया था। इस दौरे पर प्रधानमंत्री के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन पुलक चटर्जी प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव और अन्य अधिकारी भी मौजूद थे। 

 

असैन्य परमाणु सहयोग करार पर बातचीत में मार्च २०११ में फुकुशिमा परमाणु हादसे के बाद से कोई प्रगति नहीं हुई थी। इस दौरे में इस विषय पर बातचीत हुई। इस संबंध में विदेश सचिव रंजन मथाई ने कहा समझौते में हमेशा कुछ समय लगता है। चर्चा को हाल में कुछ गति मिली है लेकिन समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले कई चरणों से गुजरना होता है। मैं कोई तिथि निर्धारित नहीं कर रहा हूं लेकिन हम निश्चित तौर पर आगे बढ़ना चाहते हैं। 

 

विदेश सचिव का बयान इस बात का संकेत है कि इस विषय पर अभी और काम किया जाना है। जापानी अधिकारियों ने इस बात पर सहमति जतायी कि टोक्यो परमाणु सुरक्षा पर चिंताओं के बीच परमाणु सहयोग करार के लिए प्रतिबद्ध है। जापान ने जहां भारत- अमेरिकी परमाणु करार और अंतरराष्ट्रीय प्रौद्योगिकी प्रतिबंधों से भारत को मिली छूट का समर्थन किया है। वहीं जापान को देश की परमाणु अप्रसार लॉबी के इस बारे में कड़े विरोध के कारण राजनीतिक समर्थन हासिल करने में कठिनाई पेश आ रही है।

 

चीन के प्रधानमंत्री ली कुचियांग की भारत यात्रा के तुरंत बाद हुई उनकी इस यात्रा पर एशियाई देशों विशेषकर चीन की खास नजर रही है। यही कारण है कि भारत ने जापानी नेताओं के साथ रक्षा सहयोग को और बढ़ाने पर विशेष रूप से बातचीत की। इसी का नतीजा है कि दोनों देश संयुक्त नौसेना अभ्यास को संस्थागत रुप देने की कोशिश कर रहे हैं। हिंद महासागर और चीन सागर में निर्बाध नौकावाहन के मसले पर भी दोनों देशों के बीच बातचीत हुई।

 

असैन्य परमाणु करार को लेकर दोनों देश बातचीत के टूटे सिलसिले को दोबारा शुरू करने की उम्मीद जगाए हैं। भारत परमाणु अप्रसार संधि का हिस्सा नहीं है इसलिए जापान भारत को परमाणु संयंत्र और सामग्री देने से हिचकिचाता रहा है। भारत को उम्मीद है कि इस वर्ष के अंत तक परमाणु सहयोग में ठोस प्रगति हो सकेगी लेकिन करार पर हस्ताक्षर करने में अभी कुछ समय लग सकता है।

वर्ष २००० से जापान और भारत के बीच संबंध तेजी से मजबूत हुए हैं। जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री योशिरो मोरी और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नई दिल्ली में ग्लोबल पार्टनरशिप इन २१ सेंचुरी पर सहमति व्यक्त करते हुए संबंधों का द्वार खोला था। यह संबंध लगातार बढ़ता गया। स्थिति यह है कि २००६ से भारत और जापान हर साल वार्षिक सम्मेलन करते हैं। रूस के बाद जापान दूसरा ऐसा देश है जिसके साथ भारत वार्षिक सम्मेलन करता है।

 

जापान भी भारत को बेहतर सहयोगी के रूप में देखता है। इसका उदाहरण है कि पिछले एक दशक में जापान ने ऑफिशियल डेवेलपमेंट असिसटेंस (ओडीए) से सबसे ज्यादा सहायता भारत को दी है। वर्ष २००३-०४ से लेकर २०१२ तक भारत जापान से ३५ बिलियन डॉलर की सहायता पा चुका है। जापान की सहायता से भारत में ५९ प्रोजेक्ट चल रहे हैं जिस पर जापान ने लगभग १२ बिलियन डॉलर का लोन दिया है। २००८ में मंदी के दौरान जब जापान की अर्थव्यवस्था गड़बड़ा गयी थी और वह दुनिया की दूसरी आर्थिक ताकत से तीसरे स्थान पर पहुंच गया। उसके बावजूद उसने भारत की सहायता जारी रखी। जापान ने नयी दिल्ली में मेट्रो रेल परियोजना के लिए आर्थिक और तकनीकी सहायता दी है।

 

इन्हीं के नतीजों ने हाल के वर्षो में जापान-भारत के संबंध को प्रगाढ़ किए हैं। इसीलिए दोनों देश एक दूसरे को ग्लोबल पार्टनर के रूप में देख रहे हैं। जापान एशिया का नंबर दो और भारत नंबर तीन आर्थिक ताकत बन कर उभरा है। वर्तमान में भारत- जापान के बीच १७ .५ बिलियन डॉलर का व्यापार हो रहा है। भारत चाहता है कि यह व्यापार और बढ़े साथ ही भारतीय उत्पादों के लिए जापान का बाजार और खुले ताकि व्यापार का संतुलन बना रहे। 

हरिनाथ कुमार

 
         
 
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