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vad 46 07-05-2017
 
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प्रदेश 
 
तपता हिमालय

तेजी से पिघलते हिमालयी ग्लेशियर भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। समय रहते हिमालय क्षेत्र के विकास की ऐसी ठोस नीति बनाई जानी चाहिए जो वहां के लोगों के व्यावहारिक अनुभवों पर आधारित हो

 

बढ़ती गर्मी से हिमालय की बर्फ पिघल रही है। मई माह में भागीरथी और अलकनंदा उफान पर हैं। भागीरथी के जलागम क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उत्तरकाशी में नदी का जलस्तर बढ़ने से कई घाट डूब चुके हैं। बाढ़ सुरक्षा कार्य प्रभावित हुए हैं। उत्तर प्रदेश में कई जगहों पर गंगा खतरे के निशान को छूने के लिए उतावली है। नदियों के असमय उफान पर आने से स्पष्ट है कि हिमालय की जलवायु तेजी से बदल रही है।

 

हालांकि जलवायु परिवर्तन और धरती के बढ़ते तापमान से पूरी दुनिया चिंतित है। ओजोन परत के क्षरण से दुनिया के मौसम में हो रहे परिवर्तन को लेकर वर्ष १९९२ में रियो ब्राजील की बैठक में विश्व समुदाय की जो चिंता सामने आई वह क्योटो कोपेनहेगन और बैंकॉक आदि जगहों से होकर आज दो दशक से अधिक का सफर तय कर चुकी है। फिर भी विकसित देश अपना अड़ियल रवैया छोड़ने को तैयार नहीं है। अपने औद्योगिक विकास के लिए वे कार्बन उत्सर्जन में कटौती नहीं कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के मौसम परिवर्तन पैनल की यह चेतावनी उन्हें विचलित नहीं करती कि विश्व का तापमान २ डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ना बेहद खतरनाक होगा।

 

सवाल यह है कि जब दुनिया के विकसित लोग आगे बढ़ने के लिए पर्यावरण की चिंता नहीं कर रहे हैं तो फिर अकेले हिमालय के लोग ही नदियों और ग्लेशियरों को बचाने की कीमत क्यों चुकाएं? विकास उनका भी हक है। लेकिन विकास की ऐसी बेतरतीब परिभाषाएं नहीं गढ़ी जानी चाहिए जिनसे हिमालय और हिमालवासियों के साथ ही पूरे देश के लिए खतरा पैदा हो जाए। इस वक्त हिमालयी राज्यों में करीब एक हजार बांध परियोजनाएं निर्माणाधीन या प्रस्तावित हैं। इन परियोजनाओं के निर्माण में विस्फोटकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से हिमालय की परिस्थितिकी पर बुरा असर पड़ रहा है। बड़ी मशीनों और विस्फोटकों ने पहाड़ खोखले कर दिये हैं। जंगल बड़ी संख्या में जंगल नष्ट हुए हैं। जैव विविधता खतरे में है। बांध हिमालय में गर्मी भी बढ़ा रहे हैं। दुनिया में जितनी ग्रीन हाउस गैसें मौसम परिवर्तन का कारण बन रही हैं उसमें भारत के बड़े बांधों की झीलों का हिस्सा १७ प्रतिशत है। बांध से बनी झील के पानी में ऑक्सीजन की भी कमी होती है।

 

दुखद है कि एक तरफ जहां पर्यावरण को बचाने के नाम पर हिमालयवासियों का विकास रोका जा रहा है वहीं बांध निर्माण कंपनियां हिमालय के पर्यावरण को लील रही हैं। हिमालयी राज्यों में कृषि भूमि को सिमटाकर ऐसे उद्योग लगाए जा रहे हैं जिनसे उत्सर्जित कार्बन पर्यावरण में जहर घोल रहा है। नीति-नियंता हिमालय के विकास और निर्माण की ऐसी नीतियां बना रहे हैं। जिनसे पहाड़ खप और तप रहे हैं। पिछले डेढ़ दशक के दौरान कुछ ऐसे अजीब परिवर्तन दिखाई दिये हैं। जिनसे स्थानीय लोग भी हैरान हुए हैं। मसलन उत्तराखण्ड राज्य में बुरांस का फूल समय से पहले फूलने लगा है। काफल के पेड़ मई जून के बाजाए जनवरी में ही फल देने लगे। बढ़ती गर्मी का असर फसलों पर भी पड़ा है। फसल चक्र अनियमित होने से पैदावार में कमी आई है। देखा जा रहा है कि जो सेब तीन-चार हजार मीटर ऊंचाई पर पैदा हो जाते थे वे अब सात-आठ हजार मीटर ऊंचाई पर हो रहे हैं। हिमालय के तपते वातावरण के चलते दस्तक दे रहे खतरों को देखते हुए अभी भी जाग जाने की जरूरत है। गंगा जैसी नदियों को जीवित रखने के लिए ग्लेशियरों का बचा रहना बहुत जरूरी है। गढ़वाल में गंगोत्री तो कुमाऊं में मिलन ग्लेशियर तेजी से सिमट रहा है। हिमालयी राज्यों के विकास के लिए जब तक एक ठोस नीति नहीं बनती है। तब तक यहां की प्राकृतिक धरोहरों को बचाने की बात बिल्कुल अव्यावहारिक है। इस नीति के निर्माण के हिमालय के लोगों को भी शामिल किया जाना चाहिए। लेकिन इसके विपरीत आज हिमालय के लोगों को उनकी जगहों से पलायन के लिए विवश कर प्राकृतिक संसाधनों की व्यावसायिक लूट की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया जा रहा है। हिमालय के लोगों को इसके विरोध में खुद खड़ा होना होगा और समाधान के रास्ते भी खोजने होंगे। हिमालय के लोग प्रकृति के संग जीने के अभ्यस्त रहे हैं। उनमें अपने ऐशो-आराम के लिए प्रकृति को नुकसान पहुंचाने की प्रवृति नहीं रही बल्कि वे खुद प्रकृति के अनुरूप ढल जाते हैं। राज्य और केंद्र सरकार को चाहिए कि वे सदियों से पर्यावरण की रक्षा कर रहे हिमालयवासियों के व्यावहारिक ज्ञान का उपयोग राष्ट्रहित में करें।

दाताराम चमोली

 

मुख्यमंत्री से परेशान किसान

मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के विधानसभा क्षेत्र में विकास की एक झलक यह है कि सड़कों के निर्माण में जो मिट्टी बंजर भूमि से लाई जानी चाहिए उसके लिए किसानों के खेतों को तबाह किया जा रहा है। इससे किसान हैरान और परेशान हैं। सड़क निर्माण में जुटी कंपनी ने उनके सामने आजीविका का संकट खड़ा कर दिया है

 

इससे तो हम पहले ही ठीक थे। कम से कम अपने खेतों में बिना किसी अवरोध के आ जा सकते थे। लेकिन जब से मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के विकास कार्य शुरू हुए हैं तब से हमारे लिए खेती करना दूभर हो गया है। हम अपने खेतों में ट्रैक्टर तक नहीं ले जा सकते हैं। इससे बड़ी परेशानी और क्या हो सकती है?'

 

यह कहना है शक्तिफार्म निवासी कमल विश्वास का। विश्वास की करीब साढ़े तीन एकड़ जमीन है। इस जमीन पर वह खेती-बाड़ी करके परिवार का जीवनयापन कर रहा है। लेकिन पिछले दो महीने से वह अपने खेत के बीच से निकल रही सड़क से परेशान है। यह कच्ची सड़क मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के कोटे से बन रही है। इस सड़क पर जेसीबी मशीन द्वारा कमल विश्वास के खेत से ही मिट्टी खोदकर डाल दी गई है। इस बेतरतीब निर्माण से सड़क के दोनों किनारों पर गहरे-गहरे गड्ढे बन गए हैं। विश्वास के सामने अब सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह और उसका परिवार इन गड्ढों को पार करके अपने खेतों में नहीं जा पा रहे हैं। पिछले एक पखवाड़े से इन खेतों की जुताई तक नहीं हो सकी है। कारण खेतों की जुताई के लिए टै्रक्टर आदि का गड्ढों से गुजरकर खेतों के बीच पहुंचना असंभव है।

 

टैगोर नगर निवासी शेखर रॉय का परिवार भी इसी तरह की समस्या से गुजर रहा है। वह बताते हैं कि जब से क्षेत्र में मुख्यमंत्री निधि से कच्चा मार्ग बन रहा है तब से उन जैसे दर्जनों किसानों का अपने खेतों से संपर्क कट गया है। रॉय के अनुसार कच्चे मार्ग पर मिट्टी डालने के लिए जेसीबी मशीनों से अवैध कार्य किया जा रहा है। कच्चे मार्ग बनाते समय जो मिट्टी डाली जानी थी वह ढुलान करके दूर-दराज से मंगवाई जानी थी। मिट्टी ऐसे बंजर क्षेत्र से मंगवाई जाती है जहां से उसकी ऊपरी परत की उर्वरक शक्ति खत्म हो जाती है। उसके बाद करीब एक से डेढ़ फुट तक मिट्टी उठवाई (चुगान) जाती है। यही मिट्टी ढुलान के जरिये निर्माणाधीन मार्ग पर डलवाई जाती। लेकिन यहां ऐसा नहीं हो रहा है। जिस खेत से होकर सड़क गुजर रही है उसी खेत से मिट्टी उठाकर सड़क पर डाली जा रही है। निर्माणाधीन कच्ची सड़क तो ऊंची हो जाती है लेकिन सड़कों के किनारे मिट्टी निकाले जाने से गहरे-गहरे गड्ढे बन जाते हैं। इससे किसानों का अपने खेतों से संपर्क कट जाता है।

 

भाजपा नेता किशोर राय के अनुसार जब भी कोई संपर्क मार्ग बनाया जाता है तो किसान को उसके खेत से निकलने वाले रास्ते के बदले में मुआवजा दिया जाता है। लेकिन यहां तो निर्माणादायी कंपनी सड़क बनाने के लिए किसानों के खेत से मिट्टी उठाकर उन्हें भूखे मरने को मजबूर कर रही है। उसके बेतरतीब निर्माण से न किसानों के खेतों में ट्रेक्टर जायेंगे और न ही उनके खेतों की जुताई-बुवाई हो सकेगी। रॉय इसे मुख्यमंत्री का किसान विरोधी रवैया बताते हैं।

 

रुदपुर निवासी हरकेश सिंह बताते हैं कि उनके साथ भी यही रवैया अख्तियार किया गया था। उन्होंने ८० हजार का कर्ज लेकर इन गड्ढों में मिट्टी डालकर समतल करवाया कुछ ऐसी ही समस्या से दो चार हुआ है अतरी देवी का परिवार। बैकुंठपुर निवासी अतरी देवी के अनुसार  वह जब भी खेतों में पानी लगाने जाती तो खेत का सारा पानी खेत में न जाकर गड्ढों में चला जाता। वह बताती है कि उसके खेतों में नहर का पानी तो जाता नहीं है। लेकिन वह अपने पड़ोसी किसान से किराए का पानी लेती है। डेढ़ सौ रुपया घटा के हिसाब से डीजल इंजन से पानी लिया जाता है। लेकिन वह पानी पूरे खेत में फैलने की बजाय गड्ढों में ही भर जाता है। गड्ढों के किनारे मिट्टी लगा देने से भी पानी नहीं रुक रहा है। अतरी का परिवार इस तरह दो-तीन बार अपने खेतों में पानी लगाने का प्रयास कर चुका है। लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली है।

 

गौरतलब है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के विधानसभा क्षेत्र सितारगंज में पिछले दो-तीन महीने से संपर्क मार्गों का निर्माण कार्य चल रहा है। इसकी घोषणा मुख्यमंत्री ने २५ अक्टूबर २०१२ को उस समय की थी जब वे सिडकुल फेस टू का उद्द्घाघाटन करने आए थे। बंगाली बाहुल्य शक्तिफार्म के आस-पास आजकल उपजाऊ जमीनों से कच्ची सड़कें निकाली जा रही हैं। जिससे वहां के किसानों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

 

 

बात अपनी अपनी

हमें इस बात का पता है। जिन किसानों के खेतों में से मिट्टी उठाई गई है हम उनके खेतों के किनारे हुए गड्ढों को भरवाने की व्यवस्था कर रहे हैं। इसके लिए हम मुख्यमंत्री से भी बात करेंगे।

किरण मंडल अध्यक्ष कुमाऊं मंडल विकास निगम 

 

इस संबंध में हमारे पास कुछ किसानों की िशकायत आई है। हम देख रहे हैं कि किसानों को इसमें कैसे राहत दी जा सकती है। फिलहाल सड़क निर्माण करने वाली कंपनी से हमने इस बाबत बोल दिया है कि वह किसानों के खेतों में हुए गड्ढों को भरवाए।

मनीष कुमार उपजिलाधिकारी सितारगंज

 

किसानों ने कई बार किरण मंडल सहित कांग्रेस नेताओं को इस बाबत अपनी समस्याओं से अवगत कराया है। लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है। किसान अभी तक भी अपने खेतों में टे्रैक्टर आदि नहीं ले जा सके हैं।

शिखा हलदर भाजपा नेता

 


आकाश नागर

 

 

 
         
 
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