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जनपदों से 
 
मौत के मुहाने पर मठ गांव

चमोली। विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना के अंतर्गत हो रहे सड़क निर्माण कार्य से मठ गांव के लोगों का भविष्य खतरे में पड़ गया है। निर्माता कंपनी तीन साल से लोगों को आश्वासन देकर गुमराह करने में लगी है। समय रहते अगर  सड़क निर्माण से हुए भूस्खलन का ट्रीटमेंट नहीं किया गया तो डर है कि बरसात आने पर गांव कभी भी मौत के मुंह में समा सकता है। 

 

दरअसल ४४४ मेगावाट बिजली उत्पादन करने वाली विष्णुगाड पीपलकोटी परियोजना के तहत तेंदुली से मेनागाड़ तक के लिए वर्ष २००९ में सड़क निर्माण का कार्य आरंभ किया गया था। ग्रामीणों ने इस शर्त पर सड़क निर्माण शुरू करने दिया था कि कंपनी सड़क से प्रभावित होने वालों को चारा पत्ती के भुगतान के साथ ही हर परिवार से एक बेरोजगार को रोजगार भी दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त सड़क निर्माण से जो वन भूमि प्रभावित होगी उस पर दीवार लगाकर सुरक्षा की जायेगी। लेकिन निर्माण हुए तीन साल से ज्यादा हो गए लेकिन कंपनी ने किसी भी शर्त को पूरा नहीं किया है। सबसे बड़ी बात यह है कि सड़क निर्माण के बाद हुए भू-धसाव को रोकने के लिए भी निर्माण कंपनी ने कोई दीवार नहीं बनाई है। इसी के चलते मठ गांव आने वाली किसी भी बरसात में बड़े हादसे का शिकार हो सकता है। 

 

गौरतलब है कि जुलाई २००९ में पूरे मसले को लेकर महिला मंगल दल टीएचडीसी और जिला प्रशासन की उपस्थिति में वार्ता भी हुई थी। जिसमें प्रभावित लोगों के मकानों का ५ से १५ लाख तक का बीमा किया जाना तय हुआ था। इसके अलावा कंपनी को टनल निर्माण से पहले पेयजल स्रोतों की वीडियोग्राफी करानी थी। निर्माण के बाद अगर किसी प्राकृतिक जल स्रोत को नुकसान पंहुचता तो इसकी जिम्मेदारी कंपनी की थी। दूसरी ओर पुनर्वास और पुनर्स्थापना नीति के अनुसार हर द्घर को पांच वर्ष तक १०० दिन की न्यूनतम कृषि मजदूरी देने की बात भी की गई थी। बेरोजगारों को परियोजना शुरू हाने पर काम भी दिया जाना था। कंपनी और प्रशासन ने इन सभी शर्तों को पूरा करने का वादा किया था जो सिर्फ वादा बनकर ही रह गया है। 

 

स्थिति यह है कि गांव और भूस्खलन के बीच अब सिर्फ ५० मीटर से भी कम का फासला बचा हुआ है। कंपनी ने सड़क निर्माण के दौरान एक स्थानीय मंदिर को भी नष्ट कर दिया जिसकी शिकायत प्रशासन और कंपनी दोनों से की गई लेकिन किसी तरफ से अभी तक कोई कदम नहीं उठाया गया। परियोजना निर्माता कंपनी ने सड़क निर्माण के लिए भारत कंस्ट्रक्शन को ठेका दिया था जिसने सड़क निर्माण के लिए स्थानीय लोगों को ही काम पर रखा था। सड़क निर्माण का कार्य पूरा हुए दो साल हो गए हैं लेकिन भारत कंस्ट्रक्शन ने भी किसी का भुगतान नहीं किया। स्थानीय लोगों में कंपनी और प्रशासन के इस रवैये को लेकर खासा रोष है। लोगों का आरोप है कि कंपनी और प्रशासन की मिलीभगत के चलते ही आज पूरा गांव मौत के मुंह पर खड़ा है। ग्रामीण इस समस्या को लेकर प्रशासन से कई बार शिकायत कर चुके हैं लेकिन इतनी गंभीर समस्या पर प्रशासन क्यों चुप है यह उसकी नीयत पर सवाल खड़ा करने के लिए काफी है। फिलहाल तो मठ गांव के लोगों ने आंदोलन करने की तैयारी शुरू कर दी है और समस्या सुलझने तक बारिश न आने की दुआएं ही कर रहे हैं। 

 

बात अपनी अपनी

ग्रामीणों ने इस उम्मीद से कंपनी के साथ लिखित समझौता किया था कि कंपनी गांव के हित में कार्य करेगी। तीन साल बीत जाने पर भी ग्रामीणों को न चारा पत्ती का भुगतान किया गया और न ही कोई स्वरोजगार प्रशिक्षण कैंप चलाया गया। अब तो स्थिति पूरी तरह खराब हो गई है। लोग जल्द ही इसके खिलाफ आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं। 

पुष्पा देवी महिला मंगल दल 

 

सड़क निर्माण से गांव भूस्खलन की जद में आ गया है। जिससे गांव का भविष्य खतरे में पड़ गया है। टीएचडीसी से बार-बार कहने पर भी कोई इस तरफ ध्यान देने को तैयार नहीं है। इस संबंध में जिला प्रशासन को भी अवगत कराया गया है लेकिन उन्होंने भी कोई गंभीरता नहीं दिखाई। 

रणजीत चौहान समाजिक कार्यकर्ता 

 

हमने भारत कंस्ट्रक्शन कंपनी के साथ टीएचडीसी के कहने पर दीवार निर्माण का कार्य किया। टीएचडीसी ने कंपनी को दीवार निर्माण का भुगतान किया है किन्तु हमें दो साल बाद भी भुगतान नहीं किया गया। 

सुधीर सिंह स्थानीय निवासी

संतोष सिंह


अवैध खनन जारी

टनकपुर (चम्पावत। चम्पावत जिले के टनकपुर में खुलेआम अवैध खनन का काला कारोबार जारी है। वन एवं पर्यावरण विभाग के नियमों को ताक पर रख शारदा नदी की अप स्ट्रीम से अवैध खनन किया जा रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि खनन माफिया को राजनैतिक संरक्षण भी प्राप्त है। 

सूबे की कोशी दाबका गोला शारदा गंगा सहित अन्य सहायक नदियों में उपखनिजों के खनन कारोबार के चलते राज्य सरकार को हर साल लाखों रुपयों के राजस्व की प्राप्ति भी हाेती है। लेकिन इन सबके बावजूद प्रदेश सरकार को इन इलाकों में होने वाले अवैध खनन की कोई खबर नहीं होती। दरअसल खनन माफिया को इस इलाके के कुछ राजनीतिक रसूखदारों का संरक्षण मिला हुआ है इसी के चलते प्रशासन की तरफ से कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। टनकपुर के प्रतिबंधित शारदा नदी खनन इलाकों में खुलेआम खनन माफिया का खेल चल रहा है। हैरानी की बात है कि अवैध खनन का यह कारोबार प्रदेश के वन एंव पर्यावरण सचिव हेमेश खर्कवाल के विधानसभा क्षेत्र में ही चल रहा है। खनन माफिया के हौसले इतने बुंलद हैं कि वह शारदा नदी के डाउन स्टीम के प्रतिबंधित इलाके से अवैध खनन को खुलेआम अंजाम दे रहे हैं वहीं शारदा नदी के कटाव को रोकने के लिए बने बैरीकैट्स और पत्थरों को भी हटा दिया है। क्षेत्रीय वन रेंजर से इस बाबत बात करने पर वे इस तरह की किसी द्घटना से साफ इनकार कर देते हैं। दि संडे पोस्ट ने अवैध खनन को लेकर एसडीएम से भी बात की। टनकपुर के एसडीएम ने बताया कि अवैध खनन से जुड़ी सूचनाएं उनके पास भी आई हैं और प्रशासन इसकी जांच कर रहा है। बहरहाल अवैध खनन पूरे प्रदेश में पांव फैलाता जा रहा जिस पर सरकार का फिलहाल कोई नियंत्रण नहीं रह गया है। स्थानीय लोगों का मानना है कि राजनीतिक संरक्षण ही इसके फलने-फूलने की सबसे बड़ी वजह है। नौकरशाह और नेताओं का गठजोड़ इसे बढ़ावा दे रहा है। पिछले दिनों भ्रष्टाचार में लिप्त नौकराशाहों की एक सूची मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने मंगवाई है और इन पर कार्रवाई करने के भी स्पष्ट संकेत दिए हैं। लेकिन अभी तक तो इसकी सिर्फ उम्मीद ही की जा सकती है।

 

विनय शुक्ला


नियमों की धज्जियां

रुद्रपुर (ऊधमसिंह नगर। जनपद में वाहनों पर अवैध रूप से सायरन लगाकर घूम रहे राजनीकि पार्टियों के छुटभैये नेता परिवहन विभाग के आदेश की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं। प्रशासन भी इसकी अनदेखी कर रहा है। 

परिवहन विभाग के आदेश सं० २४६/३-१०/में साफतौर पर कहा गया है कि तेज ध्वनि वाले प्रेशर सायरन वाहन में इस्तेमाल करने  की अनुमति राज्य में केवल महामहिम राज्यपाल और मुख्यमंत्री को ही है। किसी और के वाहनों पर इन सायरनों को लगाना पूरी तरह से अवैध है। नियम के अनुसार पुलिस वाहन एम्बुलेंस वाहन और आग बुझाने वाले वाहन पर परिवहन विभाग से अनुमति प्राप्त कर आपातकालीन स्थितियों में ही इस सायरन का उपयोग किया जा सकता है। लेकिन क्षेत्र में छुटभैये नेता खुलेआम ऐसे सायरन बजाते घूम रहे है लेकिन प्रशासन ऐसे वाहनों पर कोई कार्रवाई करता नजर नहीं आ रहा। एआरटीओ (प्रशासनिक नन्द किशोर बताते हैं कि हम ऐसे वाहनों के खिलाफ चालान काट सकते हैं और उनके सायरनों को भी उतार सकते हैं लेकिन कुछ दिनों बाद फिर से सायरन लगा लिया जाता है। आजकल ऐसे वाहन भी हैं जिनमें प्रेशर सायरन आंतरिक रूप से लगे होते हैं जिन्हें पहचानना बहुत मुश्किल है। लोगों का कहना है कि जिस भी पार्टी की सरकार आती है उसी के छुटभैये नेता रसूख दिखाने के लिए ऐसा करते हैं और सत्ता पार्टी का होने के कारण प्रशासन भी इनका कुछ नहीं कर पाता। 

गोपाल भारती

 
         
 
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