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vad 41 02-04-2017
 
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राजनीति
 
आत्मघाती उक्रांद

हाल में हुए निकाय चुनावों के स्पष्ट संकेत हैं कि जनता राज्य में तीसरा विकल्प चाहती है। लेकिन उक्रांद नेता अतीत की अपनी गलतियों से सबक लेने को तैयार नहीं हैं। सत्ता की मलाई चखने और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की उनकी प्रवृत्ति ने उक्रांद का बेड़ा गर्क कर डाला है। दल में कई बार टूट हुई। अब तो स्थिति यह है कि इसके टुकड़े कहां-कहां गिरे हैं इसमें भी लोगों की दिलचस्पी नहीं

 

उत्तराखण्ड क्रांति दल (उक्रांद का गठन पृथक राज्य निर्माण के एजेंडे को लेकर हुआ था। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रीदेव सुमन के शहादत दिवस पर २५ जुलाई १९७९ को कुमाऊं विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ ड़ीडी पंत और लोकप्रिय नेता इन्द्रमणि बडोनी आदि ने मसूरी में इस दल की नींव रखी थी। दल ने पृथक राज्य की मांग को आगे बढ़ाने के साथ ही समय-समय पर जनता के जमीनी मुद्दों को लेकर भी संद्घर्ष किया। जिसके परिणामस्वरूप वह पहाड़ में एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनता गया। उत्तर प्रदेश विधानसभा में दल के विधायकों ने दस्तक दी। सन् १९८० में जसवंत सिंह बिष्ट और वर्ष १९८४ में काशी सिंह ऐरी विधानसभा में पहुंचे। सन् १९८९ के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में दल ने कांग्रेस को सीधी चुनौती दी। दल के दो नेता फिर विधानसभा में पहुंचे और उत्तराखण्ड क्षेत्र की १९ में से ११ सीटों पर उसके प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे। कुछ सीटें तो उन्होंने मामूली वोटों के अंतर से हारी। इसी दौर में कई ब्लॉकों में भी दल के कार्यकर्ता प्रमुख बने। उस वक्त उक्रांद निरंतर जनविश्वास हासिल कर रहा था। ८० के दशक में बड़ी संख्या में युवा उससे जुड़े। लेकिन दल के नेता जनता के विश्वास को बनाए नहीं रख पाए और इसी का नतीजा है कि जहां एक ओर वे हाशिए पर पड़े हैं वहीं दूसरी तरफ दल में निरंतर टूट होती गई।

 

दरअसल उक्रांद की टूट और राजनैतिक दुर्गति का मुख्य कारण नेताओं का सत्ता के इर्द-गिर्द मंडराने का लालच रहा।  लोग इस बात को पचा नहीं पाए कि जनसंद्घर्ष का नेतृत्व संभालने वाले नेता सत्ता की कठपुतली बन जाएं। काशी सिंह ऐरी जब उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायक थे तो मुलायम सिंह से मिलीभगत को लेकर खुद उन्ही के दल के नेताओं ने खुलकर नाराजगी व्यक्त की थी। इसके चलते उक्रांद के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की मांग उठी और अंततः जब राज्य आंदोलन चरम पर था ठीक उसी वक्त दल दो फाड़ हो गया। दिवाकर भट्ट पूरण सिंह डंगवाल खिमानंद खुल्वे जैसे वरिष्ठ नेताओं ने अलग गुट बना लिया। 

 

वर्ष २००२ में उत्तराखण्ड राज्य की विधानसभा के लिए हुए चुनाव से पहले दोनों धड़ों में एकता हुई। चार विधायक विधानसभा में भी पहुंचे। लेकिन नेतृत्व के सवाल पर फिर टूट हो गई। सन् २००७ के दूसरे विधानसभा चुनाव को देखते हुए फिर एकता हुई। इस बार पार्टी के तीन विधायक चुनकर आए और उनमें से एक दिवाकर भट्ट को भाजपा नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में मंत्री बनने का मौका मिला। इसके अलावा विजेन्द्र रतूड़ी भागीरथी द्घाटी विकास प्राधिकरण और काशी सिंह ऐरी को हिल्ट्रॉन के अध्यक्ष का दायित्व भी दिया गया। लेकिन सत्ता का सुख भोगने के चक्कर में किसी को बदहजमी हुई तो कोई लार टपकाकर ही रह गया। नतीजा फिर टूट तक जा पहुंचा। अंततः २०१० में दल ने भाजपा से समर्थन वापस लिया। लेकिन एक धड़ा दिवाकर भट्ट के नेतृत्व में उक्रांद(डी के तौर पर सत्ता के साथ ही बना रहा तो दूसरा धड़ा उक्रांद (पी त्रिवेन्द्र सिंह पंवार के नेतृत्व में अलग हो गया। इस झगड़े में चुनाव आयोग ने दल का चुनाव चिन्ह कुर्सी जब्त कर दिया। उक्रांद (डी के दो विधायकों दिवाकर भट्ट और ओम गोपाल रावत ने २०१२ का विधानसभा चुनाव भाजपा के चुनाव चिह्न पर लड़ा लेकिन हार गए। दूसरे धड़े के विधायक पुष्पेश त्रिपाठी को भी हार का स्वाद चखना पड़ा। इसके बावजूद उक्रांद नेताओं ने सबक नहीं लिया। 

 

२०१२ के चुनाव में त्रिशंकु विधानसभा आई तो यमुनोत्री से चुनकर आए उक्रांद (डी के एकमात्र विधायक प्रीतम सिंह को मंत्री बनने का मौका मिला। उक्रांद (पी के कोटे से लालबत्ती पाने के चक्कर में नेताओं की अहम टकराये। सूत्रों के मुताबिक कई बड़े नेता सरकार में शामिल दल के एकमात्र मंत्री प्रीतम सिंह पंवार से अपेक्षा रखने लगे कि वे उन्हें लालबत्ती दिलवाएं। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने लालबत्तियों को लेकर अपने पत्ते खोले भी नहीं थे कि उक्रांद (पी में एक अनार सौ बीमार वाली कहावत चरितार्थ होने लगी। पार्टी नेताओं को लगा कि भला पंवार ही कैबिनेट मंत्री बनकर अकेले सत्ता का सुख क्यों भोगें तो कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार के एक साल पूरे होते ही सरकार से समर्थन वापसी की बात जोर-शोर से उठने लगी। फलस्वरूप नेताओं में सरकार से समर्थन वापसी को लेकर सहमति बनी। दल के अध्यक्ष त्रिवेन्द्र सिंह पंवार के लिए मंत्री को सबक सिखाने का यह एक अच्छा मौका था। बताया जाता है कि पंवार इस बात से बेहद खफा थे कि जब वे टिहरी लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव में पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर अकेले जूझ रहे थे तो तब उनकी मदद के लिए न तो काशी सिंह ऐरी एवं पुष्पेश त्रिपाठी जैसे नेता आगे आए और न मंत्री प्रीतम सिंह पंवार। यहां तक कि मंत्री ने मुख्यमंत्री के पुत्र साकेत बहुगुणा को समर्थन दिया था। इससे उक्रांद अध्यक्ष पंवार को चुनाव में महज पांच हजार मतों से संतोष करना पड़ा था। नाराज पंवार ने पार्टी के नेताओं की सहमति से मंत्री को पार्टी से निलंबित कर सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी। अब बाजी पलट गई। मंत्री के निलंबन प्रस्ताव पर काशी सिंह ऐरी के भी हस्ताक्षर बताए जाते हैं। लेकिन जब ऐरी को लगा कि पंवार और मंत्री के रिश्तों में आई दरार उनके लिए लालबत्ती पाने में फायदेमंद हो सकती है तो उन्होंने पाला बदल डाला। मंत्री के प्रति उनकी दरियादिली फूट पड़ी। इससे नाराज अध्यक्ष पंवार ने ऐरी समेत दस नेताओं को पार्टी विरोधी के आरोप में निष्कासित कर दिया। 

 

दस नेताओं को निष्कासित कर अध्यक्ष पंवार ने परांपरागत ढंग से २४-२५ जुलाई को दल के महाधिवेशन की घोषणा भी कर दी। इससे चिंतित ऐरी गुट ने १९-२० मई को ही पार्टी का अधिवेशन करने का फैसला कर डाला। देहरादून के शास्त्रीनगर में ऐरी गुट का महाधिवेशन हुआ। जिसमें २१ में से १८ जिलाध्यक्षों और ६६ में से ५५ पदाधिकारियों की शिरकत का दावा किया गया है। अधिवेशन में ऐरी को अध्यक्ष चुना गया। दूसरी तरफ त्रिवेन्द्र पंवार इस अधिवेशन को असंवैधानिक करार दे रहे हैं। उनके मुताबिक पार्टी से निष्कासित कोई भी व्यक्ति अधिवेशन नहीं बुला सकता है। चुनाव आयोग ने उनके नेतृत्व वाली कार्यकारिणी को ही उक्रांद की मान्यता दी है। इसलिए अधिवेशन बुलाने का फैसला यही कार्यकारिणी करेगी। इसके उलट काशी सिंह ऐरी कहते हैं कि उक्रांद के संविधान के अनुसार कार्यकारिणी के दो तिहाई पदाधिकारी अध्यक्ष से किसी भी वक्त अधिवेशन या बैठक बुलाने को कह सकते हैं। यदि अध्यक्ष उनकी बात नहीं मानते हैं तो  खुद ही बैठक या अधिवेशन बुला सकते हैं। हमने भी यही किया है।

 

पंवार और ऐरी गुट की खींचतान यहीं तक सीमित नहीं है। पार्टी कार्यालय पर ऐरी गुट का काबिज होना पंवार गुट को अच्छा नहीं लगा और उन्होंने कार्यालय के बाहर धरना दे दिया। दोनों धड़े अपनी-अपनी शर्तों पर फिर से बातचीत के लिए आगे आना चाहते हैं पंवार गुट चाहता है कि ऐरी गुट हाल के अपने अधिवेशन को अवैध घोषित करे जबकि ऐरी गुट की मांग है कि पंवार गुट सिटी मजिस्ट्रेट के पास दर्ज मुकदमा वापस ले। जाहिर है कि ऐसे में दोनों धड़ों के बीच कोई सहमति बननी फिलहाल तो असंभव ही दिख रही है।

 

दोनों धड़ों के झगड़े में मंत्री प्रीतम सिंह कुछ नहीं बोल रहे हैं। राजनीतिक पंडितों के मुताबिक वे अभी 'वेट एण्ड वॉच' की स्थिति में हैं। ऐरी के लिए भी आगे की राह आसान नहीं है। वे बेशक एक धड़े के अध्यक्ष बन गए हों लेकिन उक्रांद से पूर्व में अलग हुए तमाम धड़ों को एकजुट करने के लिए उन्हें नाकों चने चबाने पड़ेंगे। बीते दो वर्षों में ही उक्रांद तीन धड़ों में बंटा है। इनमें से एक दिवाकर भट्ट का उत्तराखण्ड जनक्रांति दल दूसरा शक्ति शैल कपरवाण का उक्रांद डेमोक्रेटिक तो तीसरा ललित बिष्ट का उक्रांद एकता है। इस बीच उक्रांद एकता ने ऐरी गुट में आस्था जताई है। लेकिन अन्य धड़ों को एक करना टेढ़ी खीर है। ऐसे में ऐरी किस बूते समस्त उत्तराखण्ड के नेता बन पाएंगे यह समझ से परे है। लेकिन राजनीति में अक्सर ऐसा होता रहा है कि जब अस्तित्व पर आती है तो पुराने दुश्मन भी दोस्त बनाने पड़ते हैं। ऐरी गुट की कोशिश है कि पूर्व मंत्री दिवाकर भट्ट से बात कर ली जाए। लेकिन यह इतना आसान नहीं है। भट्ट और ऐरी के मतभेद कई मौकों पर खुलकर सामने आये हैं। दिवाकर भट्ट से जब इस बारे में बात की गई तो उन्होंने क्षेत्रीय दल की टूट पर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा १९७८ में मैंने डॉ ़ डीडी पंत के साथ मिलकर उक्रांद की नींव रखी। लेकिन मुझे भी पार्टी से निष्कासित किया गया।' यदि राज्य में भाजपा और कांग्रेस का विकल्प खड़ा करना है तो सभी को दिल से एकजुट होकर साथ आना होगा। नए लोगों को नेतृत्व का मौका देकर पुराने नेताओं को संरक्षक की भूमिका निभानी चाहिए। चिंता ऐरी करें या दिवाकर भट्ट अभी तक की स्थितियों से स्पष्ट है कि उक्रांद नेताओं ने खुद अपने राजनीतिक भविष्य पर कुल्हाड़ी चलाकर आत्महत्या का रास्ता अख्तियार करते आए हैं। जनता ने उनके नेतृत्व में जो विश्वास व्यक्त किया था वे उसे बनाकर नहीं रख पाए और सत्ता की मलाई चखने के चक्कर में दल बार-बार टूटता रहा।

 

 

बात अपनी अपनी

काशी सिंह ऐरी पार्टी से निष्कासित हैं। उन्होंने जो अधिवेशन बुलाया है वह पार्टी संविधान का उल्लंद्घन है। पार्टी का विधिवत अधिवेशन २४-२५ जुलाई को होगा। इससे पहले जिला अध्यक्षों के चुनाव होंगे।

त्रिवेन्द्र सिंह पंवार केंद्रीय अध्यक्ष उक्रांद 

 

त्रिवेन्द्र सिंह पंवार अफवाह फैला रहे हैं। पार्टी संविधान के मुताबिक ही दो दिवसीय अधिवेशन बुलाया गया था। जिसमें त्रिवेन्द्र सिंह पंवार को भी बुलाया गया लेकिन वे नहीं आए। मैं अभी भी पुराने सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं से अपील करता हूं कि वे हमारे साथ आएं और उक्रांद को मजबूत करें।

काशी सिंह ऐरी केंद्रीय अध्यक्ष उक्रांद (ऐरी गुट

 

निर्वाचन आयोग से जिस उक्रांद को मान्यता मिली है उसके अध्यक्ष त्रिवेन्द्र सिंह पंवार हैं। ऐसे में जब तक पंवार अध्यक्ष पद से इस्तीफा नहीं देते और इसकी जानकारी निर्वाचन आयोग को नहीं देते तब तक तकनीकी और कानूनी रूप से वे ही अध्यक्ष रहेंगे।

दिवाकर भट्ट पूर्व मंत्री

 

मैं काशी दा या पंवार जी में से किसी के साथ नहीं बल्कि दल के साथ हूं। बाकी आप उन दोनों से ही बात कर लें तो बेहतर होगा।

पुष्पेश त्रिपाठी पूर्व विधायक द्वाराहाट

 

त्रिवेन्द्र सिंह पंवार ही उक्रांद के असली अध्यक्ष हैं। कुछ लोगों ने देहरादून में पार्टी कार्यालय पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया है जिसकी शिकायत डीजीपी से कर दी गई है। जहां तक समर्थन वापसी और विधायक के निलंबन की बात है तो इस संबंध में १० फरवरी को हुई बैठक में काशी सिंह ऐरी ने भी सहमति दी थी। 

ए.पी. जुयाल कार्यकारी अध्यक्ष उक्रांद

 

आकाश नागर एवं गुंजन कुमार

 
         
 
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