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आवरण कथा
 
खतरे में कुर्सी

मुख्यमंत्री बहुगुणा के लिए आने वाले दिन सुखद नहीं हैं। एक तरफ उन्हें अपनी ही पार्टी के असंतुष्ट विधायकों और विरोधी खेमे से जूझना पड़ रहा है तो दूसरी तरफ भाजपा सत्ता की चूलें हिलाने में जुटी हुई है। भाजपा को संभावनाएं दिख रही हैं कि हरक सिंह रावत और सरिता आर्य की विधानसभा सदस्यता खत्म हो सकती है। इसके अलावा मुख्यमंत्री से नाराज कांग्रेस के दो विधायक भी इस्तीफा देकर उन्हें गच्चा दे सकते हैं। सरकार के अल्पमत में आने पर उसे प्रदेश को संभालने का मौका मिल जयेगा। बसपा और निर्दलीय विधायकों की पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और भगत सिंह कोश्यारी से हाल में हुई मुलाकातों को इसी दृष्टि से देखा जा रहा है। ऐसे में जरा सी चूक बहुगुणा के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है

 

उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के लिए अपनी कुर्सी बचाये रखना मुश्किल हो सकता है। उनके सत्ता संभालते वक्त कांग्रेस के भीतर जिस प्रकार बवाल मचा उसको देखते हुए शुरू से ही कयास लगाए जा रहे थे कि यदि वे जनता और कांग्रेस की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे तो पार्टी आलाकमान देर-सबेर उन्हें चलता कर देगा। हालांकि पहले टिहरी लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव और फिर निकाय चुनावों में पार्टी की करारी हार और सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बावजूद केंद्रीय मंत्री हरीश रावत का खेमा उनकी कुर्सी हिलाने में कामयाब नहीं हो पाया। लेकिन इस बीच मुख्यमंत्री की मुश्किलें बढ़ी हैं। जहां एक ओर कांग्रेस में उनका विरोधी खेमा मुखर हुआ है वहीं भाजपा भी सत्ता की चूलें हिलाकर राज्य में सरकार बनाने की संभावनाएं तलाशने में जुट गई है।

 

गौरतलब है कि हरीश रावत खेमा विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाए जाने के खिलाफ रहा है। मुख्यमंत्री पद के लिए बहुगुणा के नाम का ऐलान होने पर इस खेमे ने खुली बगावत कर दी थी। यह खेमा एक बार फिर मैदान में आ डटा है। यहां तक कि रावत के खास माने जाने वाले विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल भी चुप नहीं रह पाए। उनके हाल के इस बयान ने राज्य की राजनीति गर्मा दी है कि उत्तराखण्ड देश का सबसे भ्रष्ट राज्य बन चुका है। संवैधानिक तौर पर किसी भी दल का नेता न होने के बावजूद उनके इस तरह के बयान के गहरे अर्थ निकाले जा रहे हैं। कांग्रेस उनके इस बयान से किनारा करने में भी पूरी तरह सफल नहीं हो पा रही है। रावत खेमा मुखर है और नेतृत्व परिवर्तन की मांग जोर पकड़ रही है। हरीश रावत के देहरादून के माजरा क्षेत्र में कार्यालय खोलने को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

 

रावत टिहरी लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव निकाय चुनावों में पार्टी की हार सरकार की एक साल की नाकामयाबियों मुख्यमंत्री की अलोकप्रियता और कांग्रेस के घटते जनाधार के बारे में आलाकमान को अवगत करा चुके हैं। आलाकमान इस पर मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से नाराजगी भी जता चुका है। बताया जाता है कि निकाय चुनावों के बाद कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी से विजय बहुगुणा को मुलाकात के लिए सिर्फ पांच मिनट का ही समय मिल पाया था। निकाय चुनाव की हार का ठीकरा एक दूसरे के सिर फोड़ने की होड़ में पार्टी की गुटबाजी खुलकर सामने आई। हरीश रावत गुट के नेताओं को हार के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए बहुगुणा ने नोटिस थमाया कि चुनावों में वे पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहे। नोटिस पाने वाले नेताओं में काबीना मंत्री दिनेश अग्रवाल भी शामिल थे। उन पर निकाय चुनाव में पार्टी प्रत्याशी के विरुद्ध काम करने का आरोप लगाया गया। दिनेश अग्रवाल मुख्यमंत्री बहुगुणा और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्य के निशाने पर हैं। यह अलग बात है कि बाद में रावत खेमे के नेताओं को मिले नोटिसों को रद्द करवाकर मामले को शांत करने का प्रयास किया गया। लेकिन इससे दिलों की खटास बढ़ती रही। 

 

कांग्रेस के भीतर बढ़ी खेमेबाजी और बदले राजनीतिक राजनीति माहौल में भाजपा राज्य में अपनी सरकार बनने की संभावनाएं देखने लगी है। पार्टी बसपा और निर्दलीय विधायकों से संपर्क साधकर नई संभावनाएं तलाश रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि निकाय चुनावों के नतीजों से उत्साहित भाजपा कांग्रेस के दो विधायकों को अपने पाले में लाने के प्रयास में भी जुटी हुई है। दूसरी तरफ कांग्रेस भी भाजपा के चार विधायकों को अपने पाले में लाने के लिए शिद्दत से प्रयासरत है। जाहिर है कि आने वाले दिनों में उत्तराखण्ड राज्य विधायकों की खरीद-फरोख्त या उन्हें प्रलोभन दिये जाने को लेकर मीडिया की सुर्खियों में आ सकता है।

 

दरअसल भाजपा को संभावनाएं दिखाई दे रही हैं कि कुंजवाल का बयान यूं ही नहीं आया। कांग्रेस सरकार और संगठन से असंतुष्ट विधायक सरकार को अल्पमत करने के लिए तैयार हैं। यहां तक कि दो विधायक विधानसभा से इस्तीफा तक देने को तैयार हैं। भाजपा इस बात को लेकर भी उत्साहित है कि कांग्रेस के दिग्गज हरक सिंह रावत के लाभ के पद पर होने के मामले में उत्तराखण्ड हाईकोर्ट में उसने जो अपील की है उससे रावत की दिक्कतें बढ़ सकती हैं। उनकी विधानसभा सदस्यता भी जा सकती है। ऐसी ही संभावनाएं नैनीताल से विधायक सरिता आर्य के मामले में भी जताई जा रही हैं। इसके अलावा संगठन और सरकार से नाराज कांग्रेस के दो विधायक सरकार को बेदखल करने के लिए विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने को तैयार बैठे हुए हैं।

 

सूत्रों के मुताबिक भाजपा सरकार बनाने की संभावनाओं की तलाश में जोर-शोर से जुटी हुई है। बसपा के सुरेन्द्र राकेश उक्रांद के प्रीतम सिंह पंवार और निर्दलीय मंत्री प्रसाद नैथानी राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और भगत सिंह कोश्यारी के संपर्क में बताए जाते हैं। बहुगुणा सरकार के इन तीन मंत्रियों ने निशंक और कोश्यारी से क्यों मुलाकातें कीं इसका खुलासा अभी नहीं हुआ है। लेकिन भाजपा नेता निशंक काबीना मंत्री हरक सिंह मामले में जिस तरह मुखर होकर उन्हें घेरने की राणनीति में मशगूल रहे उसका यही निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि भाजपा आलाकमान से उन्हें राज्य में सत्ता परिवर्तन के लिए हरी झंडी मिल चुकी है। यदि पार्टी इसमें कामयाब रहती है तो प्रदेश की बागडोर निशंक के हाथों में होगी। पार्टी नेतृत्व के सम्मुख एक विकल्प यह भी हे कि वह पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूड़ी को रुद्रप्रयाग से हरक सिंह के मुकाबले उपचुनाव में उतारे।

 

भाजपा को उम्मीद की किरणें इस बात में भी दिखाई दे रही हैं कि मुख्यमंत्री बहुगुणा से उनकी सरकार के मंत्री और विधायक नाराज चल रहे हैं। मुख्यमंत्री के समक्ष हरक सिंह रावत ने इस बात को लेकर कड़े शब्दों में रोष जताया था कि मुख्य सचिव उनके फोन नहीं सुनते हैं। मंत्री प्रसाद नैथानी प्रीतम सिंह पंवार और सुरेन्द्र राकेश अधिकारियों द्वारा खुद को तव्वजो न दिये जाने की शिकायत मुख्यमंत्री से कर चुके हैं। निर्दलीय दिनेश धनै अपनी उपेक्षा के चलते खासे नाराज हैं। निर्दलीय और बसपा विधायकों को भाजपा अपने पक्ष में करने की संभावनाएं देख रही है। अगर वह अपनी इस रणनीति में कामयाब हो जाती है तो प्रदेश में सत्ता परितर्वन की प्रबल संभावनाएं हैं। मौजूदा विधानसभा में कांग्रेस के ३३ तो भाजपा के ३० विधायक हैं। कांग्रेस को तीन निर्दलीय तीन बसपा और एक उक्रांद विधायक का समर्थन हासिल है। अगर हरक सिंह रावत और सरिता आर्य की सदस्यता जाती है तो कांग्रेस के पास विधानसभा में अपने ३१ सदस्य ही रह जाएंगे। ऐसे में ३० सीटों वाली भाजपा किसी भी वक्त उलटफेर करने की स्थिति में रहेगी। बहुगुणा से नाराज कोई भी विधायक विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर अपनी ही सरकार की नाव डुबो सकता है। इसके अलावा हरक सिंह और सरिता आर्य की सदस्यता समाप्त होने की स्थिति में भाजपा उन सीटों को जीतने में पूरा दमखम लगा देगी। प्रदेश में वैसे भी कांग्रेस के खिलाफ माहौल चल रहा है। खैर जो भी हो मुख्यमंत्री बहुगुणा के लिए आने वाले दिन बेहद कष्टकारी साबित हो सकते हैं।

 

सूत्रों के मुताबिक प्रदेश में पैदा हुई इस राजनीतिक हलचल के बीच हरीश रावत खेमा अब कांग्रेस आलाकमान पर दबाव बना रहा है कि पार्टी के जनाधार को मजबूत करने के लिए जल्द ही प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन किया जाए। अगर ऐसा नहीं होता है तो भाजपा निर्दलीय और बसपा विधायकों को साथ लेकर किसी भी वक्त तख्ता पलट कर सकती है।

 

                                                                                                                           कृष्ण कुमार

 
         
 
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