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vad 14 23-09-2017
 
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पड़ोस
 
चीन की चाल

 

  • हरिनाथ कुमार

 

 

भले ही मनमोहन सरकार चीनी प्रधानमंत्री के मौजूदा दौरे को उपलब्धि बता रही है। लेकिन हकीकत सभी को पता है। दोनों देशों ने विभिन्न मुद्दों से जुड़े आठ समझौतों पर हस्ताक्षर किए। मोटे तौर पर इस त्रिदिवसीय दौरे से भारत को कुछ विशेष हासिल होता नहीं दिख रहा। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद के मुतल्लिक भले ही चीन कुछ पीछे हट गया हो मगर भारत के लिए भी लक्ष्मण रेखा खिंचती गई। नतीजतन अब भारत अपनी ही सीमा में आगे नहीं बढ़ पाएगा

 

एक ऐसे समय में जब पिछले दिनों लद्दाख सीमा पर तनाव चरम पर था, चीन के प्रधानमंत्री का भारत दौरा काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा था। चीनी प्रधानमंत्री ली किथियांग के इस दौर में उनकी चतुराई ही उभर कर सामने आई जिसे व्यापारिक समझौते से ढंकने की कोशिशें की गईं। सीमा विवाद पर तस्वीर अब भी उलझी है और भारत पहले की तरह बैकफुट पर बना हुआ है। चीन ने बेशक भाई-भाई का राग अलापा मगर अब सब जानते हैं इस नारे की हकीकत से जुड़ी १९६२ की असल सच्चाई।

 

पिछले साल मार्च में चीन के प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद लीलिधिमांग १९ मई २०१३ को अपनी पहली अधिकारिक विदेश यात्रा पर भारत आए। इस दौरान उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह से कई मसलों पर बातचीत और समझौते किए। लेकिन कई ऐसे अहम मुद्दे छोड़ दिए गए जिस पर बातचीत करना जरूरी था। जैसे दक्षिण चीन सागर के द्वीपों का मसला, तिब्बत को लेकर चीन का रुख, भारत-चीन नया सीमा समझौता और स्टेपल वीजा का मामला यही नहीं तिब्बती छात्रों ने दिल्ली में कई जगहों पर प्रधानमंत्री ली कचियांग के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी किए और तिब्बत की आजादी के नारे लगाए। 

 

वर्तमान दौरे में भी डॉ मनमोहन सिंह ने ली कचियांग को हाल ही में भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के लद्दाख में चीनी सैनिकों की द्घुसपैठ पर भारत की गंभीर चिंताओं से अवगत कराया। पहले दिन की बैठक में दोनों नेताओं के बीच एक द्घंटे तक चली बातचीत में सीमा मुद्दे के साथ-साथ ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन द्वारा बनाए जा रहे बांधों का मसला भी उठा। साथ ही दोनों देशों के बीच व्यापार द्घाटे पर भी बात हुई। इसके बाद दूसरे दिन की बैठक में दोनों देशों के बीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की बातचीत हुई। इसमें दोनों देशों के बीच व्यापार, कूषि, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक आदान- प्रदान से संबंधित कई करार किए गए। 

 

दोनों ही नेताओं ने द्विपक्षीय बातचीत में व्यापारिक संबंधों को एक नई दिशा देने पर जोर दिया। लेकिन दोनों एशियाई ताकतों के बीच क्या कोई ऐसी संभावना बन सकती है कि वे आपसी सहयोग से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अपना साझा वर्चस्व कायम कर सकें? भारत और चीन के बीच अगर व्यापार की बात करें, तो ये २००३-२००४ के सात अरब डॉलर से बढ़कर २०१२-२०१३ में ६७ .८ अरब डॉलर तक पहुंच गया है। जून २०१२ में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को २०१५ तक बढ़ाकर १०० अरब डॉलर करने का लक्ष्य निर्धारित किया था जो अब हालिया ट्रेंड्स के मुताबिक एक हकीकत बनता नजर आ रहा है। दोनों देशों की आर्थिक शक्ति के बारे में जानकार कहते हैं कि पिछले चार-पांच साल से पश्चिम के देश आर्थिक विकास के मामले में संकट से जूझ रहे है। जबकि भारत और चीन आगे बढ़े हैं। पश्चिम भारत और चीन की तरफ देख रहा। हालांकि पिछले दो-तीन साल में भारत और चीन में भी आर्थिक विकास में कमी आई है लेकिन इसके बावजूद वृद्धि इन्हीं देशों में है।

 

चीन और भारत के बीच बड़े आर्थिक विकास की संभावना है। लेकिन इस संभावनाओं में सबसे बड़ी अड़चन दोनों देशों की राजनीतिक व्यवस्था ही है। अब सवाल उठता है कि क्या व्यापार और वाणिज्य की स्थिति कभी ऐसी होगी कि विवाद के बाकी मुद्दे हाशिए पर चले जाएंगे। आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि व्यापार और वाणिज्य अगर महत्वपूर्ण हो जाएंगे तो बाकी चीजें हाशिए पर भले न जाएं लेकिन काफी कुछ नियंत्रित हो जाएंगी। जैसे चीन और जापान के बीच लंबे अरसे से एक-दूसरे से तनावपूर्ण संबंध हैं, आज भी हैं। लेकिन जापान चीन का सबसे बड़ा कारोबारी पार्टनर है। हाल ही में चीन और जापान के बीच सीमा को लेकर गंभीर तनाव पैदा हुआ था जैसा कि चीन और भारत के बीच लद्दाख में द्घुसपैठ को लेकर हुआ। जापान का चीन के साथ उससे कई गुना ज्यादा तनावपूर्ण संबंध रहा है। सिनकाकू द्वीप समूह को लेकर चीन में जापान के खिलाफ इस मुद्दे पर लंबे अरसे तक प्रदर्शन हुए हैं। चीन में जापानी सामान के बहिष्कार की बात भी हुई, लेकिन उसके बावजूद जापान का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर चीन ही है।

 

चीन के नए प्रधानमंत्री ली कचियांग पहली बार भारत दौरे पर तो आए, साथ ही वह ७० चीनी कंपनियों के प्रतिनिधियों को भी ले आए। इनमें विमानन से लेकर मत्स्य पालन क्षेत्र, एयर चाइना, जेडटीई, हुआवेई टेक्नोलॉजी, शांगहाई इलेक्ट्रिक कॉरपोरेशन, चाइना डेवलपमेंट बैंक आदि शामिल हैं। भारत-चीन सीईओ फोरम और बिजनेस समिट में कई एमओयू पर हस्ताक्षर हुए। भारत-चीन के द्विपक्षीय कारोबारी संबंध अभी भी पुरानी समस्याओं की चपेट में है। साल दर साल के हिसाब से २०१२-१३ में आयात-निर्यात द्घटने के बाद भी भारत के विरुद्ध भारी कारोबारी असंतुलन की समस्याएं प्रमुख चुनौती बनी हुई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार चाहे जिस भी तरह का कदम उठाने का दावा करे, भारत के खिलाफ व्यापार द्घाटे में बढ़ोतरी जारी है।

 

भारत और चीन ने साल २००३ में संयुक्त अध्ययन समूह का गठन किया था। इस समूह को यह विश्लेषण करने का काम सौंपा गया था कि अगर दोनों देश एमएफएन टैरिफ पर कारोबार करें तो उन्हें कितना आर्थिक लाभ हासिल होगा। मार्च २००६ में यह समूह पहली बार भारतीय वाणिज्य मंत्रालय और चीन के वाणिज्य मंत्रालय से मिला। साल २००६ में तत्कालीन राष्ट्रपति हू जिनताओ के आधिकारिक भारत दौरे के वक्त दोनों पक्षों ने संयुक्त द्घोषणा पत्र के जरिए साल २००७ तक अध्ययन पूरा करने का लक्ष्य द्घोषित किया। समूह ने संबंधित सरकारों को साल २००७ में रिपोर्ट सौंपी, जिसमें दोनों पक्षों को क्षेत्रीय कारोबारी समझौते करने की सिफारिश की गई थी। लेकिन भारतीय उद्योगों की तरफ से कोई खास कदम नहीं उठे। इसका कारण यह था कि भारतीय बाजार चीनी कंपनियों के माल से पट जाएगा। और अब यही नतीजा भारत के सामने है। देश का भारी उद्योग कच्चे माल और तैयार उत्पाद के लिए चीन पर काफी ज्यादा आश्रित है। 

 

इसी बीच लॉवी इंस्टीट्यूट और ऑस्ट्रेलिया इंडिया इंस्टीट्यूट के संयुक्त सर्वेक्षण की रिपोर्ट जारी हुई। इसमें कहा गया है कि भारतीय, एशिया में चीन की महत्वाकांक्षा और भारत के प्रति उसकी नीति को लेकर आशंकित हैं। सर्वेक्षण यह भी कहता है कि ८३ फीसदी भारतीय चीन को सुरक्षा की दृष्टि से खतरा मानते हैं। इस सर्वेक्षण के अनुसार चीन के प्रति भारतीयों के अविश्वास के कई कारण हैं जिनमें चीन के पास परमाणु हथियार होना, तीसरी दुनिया के देशों में संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा, हिंद महासागर क्षेत्र में अन्य देशों के साथ संबंध मजबूत करने के उसके प्रयास और चीन-भारत सीमा विवाद जैसी बातें शामिल हैं। वैसे तो चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, लेकिन महज ३१ फीसदी भारतीय ही चीन की प्रगति को भारत के लिए अच्छा मानते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार ६५ प्रतिशत भारतीय मानते हैं कि भारत को चीन का प्रभाव रोकने के लिए अन्य देशों से हाथ मिलाना चाहिए जबकि ६४ प्रतिशत लोगों का मानना है कि भारत को विश्व में अहम भूमिका निभाने के लिए चीन के साथ सहयोग करना चाहिए। इस सर्वे से भी लब्बोलुआब यही निकलता है कि दोनों देश छोटी-मोटी हरकतों के बावजूद एक अच्छे दोस्त हैं।

 

इन समझौतों पर लगी मुहर

 

  • व्यापार बढ़ाने के लिए तीन कार्य समूहों का गठन होगा
  • चीन कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं बढ़ाएगा। उन्हें वायरलेस सेट और स्थानीय सिम कॉर्ड भी दिए जाएंगे
  • चीन ब्रह्मापुत्र के जलस्तर और बारिश की जानकारी एक जून से १५ अक्टूबर के बीच दिन में दो बार भारत को देगा
  • लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के लिए दोनों देशों के शहरों और राज्यों में सहयोग की संभावनाएं तलाशी जाएंगी
  • खेती में कम से कम पानी इस्तेमाल कर पैदावार बढ़ाने की तकनीक पर होगा सहयोग
  • मीट-मछली उत्पादों के व्यापार में सहयोग बढ़ाया जाएगा
  • सीवेज ट्रीटमेंट और शहरी क्षेत्र के अपने अनुभवों को दोनों देश आपस में साझा करेंगे
  • दोनों देश अगले पांच साल में एक-दूसरे की २५ किताबों का चीनी और भारतीय भाषाओं में अनुवाद और प्रकाशन करेंगे

 

 

 
         
 
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