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राजनीति
 
हरीश और सतपाल का पलायन

 

कांग्रेस के दो दिग्गज हरीश रावत और सतपाल महाराज अपने राजनीतिक या कहें चुनावी भविष्य को लेकर इस कदर भयभीत हैं कि उनका यह भय पार्टी के लिए भी मुश्किलों का सबब बन सकता है। पराजय की आशंकाओं से द्घिरे ये दोनों दिग्गज आगामी लोकसभा चुनाव में अपने-अपने क्षेत्रों से पलायन के मूड में हैं। हरीश रावत नैनीताल या गाजियाबाद से चुनाव लड़ने की जुगत में हैं तो वहीं सतपाल महाराज राज्यसभा सांसद बनने की सोच रहे हैं

 

हरीश रावत और सतपाल महाराज दोनों ही नेताओं में राजनीतिक तौर पर क्या समानताएं हो सकती हैं यह एक बहस का विषय हो सकता है। लेकिन इन दिनों दोनों ही नेताओं में एक ऐसी समानता देखी जा रही है जिससे प्रदेश की राजनीति भी प्रभावित हो सकती है। वह समानता यह है कि दोनों अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर खासे चिंतित हैं। दोनों का ही मकसद किसी तरह से अपने को राजनीतिक तौर पर सुरक्षित करना है। इसके लिए हरीश रावत आने वाले लोकसभा चुनाव में अपना क्षेत्र बदलने की कवायद में गुपचुप ढंग से लगे हैं तो सतपाल महाराज भी राज्यसभा चुनाव के जरिये यानी पिछले दरवाजे से सांसद बन कर अपना भविष्य सुरक्षित करने में जुटे हैं। दोनों ही नेताओं ने अपनी योजनाओं पर पूरी तरह से काम करना भी शुरू कर दिया है और इस संबंध में वे अपने-अपने खास समर्थकों से फीडबैक भी ले रहे हैं।

बेशक हरीश रावत प्रदेश में कांग्रेस के सबसे मजबूत और दिग्गज नेता हैं। लेकिन जिस तरह से निकाय चुनावों में हरिद्वार से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हुआ है उससे पार्टी की काफी फजीहत तो हुई ही है साथ ही रावत के जनाधार पर भी सवालिया निशान उठने लगे हैं और उनकी चिंता भी बढ़ी है। मुस्लिम मतदाताओं ने भी कांग्रेस को हरिद्वार में नकार दिया है जिससे कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक तो खिसका ही है अब २०१४ के लोकसभा चुनाव को देखते हुए हरीश रावत मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में अपने आप को फिर से मजबूत करने के इरादे से जुट गये हैं। 

 

देहरादून के धरमपुर विधानसभा क्षेत्र के माजरा में जहां मुस्लिम वोटों की तादात ठीक- ठाक है वहां भी कांग्रेस को निकाय चुनाव में करारी हार मिल चुकी है। यहां अपना कार्यालय खोलने और हर सप्ताह रावत के कार्यालय में बैठने को बैचैनी के रूप में देखा जा रहा है। रावत की यह कोशिश अपने द्घटते जनाधार के डैमेज कंट्रोल की सामान्य कोशिश है या कोई गंभीर प्रयास यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन जिस तरह रावत अपने चुनाव क्षेत्र को बदलने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं उससे तो यही लगता है कि वे आगामी लोकसभा चुनाव में हरिद्वार सीट को अपने अनुकूल नहीं मान रहे हैं। और अपनी जीत के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं।

अपने चार वर्ष के संसदीय कार्यकाल के दौरान हरीश रावत क्षेत्र के लिए कोई बड़ी और खास योजनाएं लाने मे असफल रहे हैं और जो योजनाएं लाए भी हैं तो उनके लिए प्रदेश सरकार और नौकरशाही पर कई बार लापरवाही और अनदेखी के आरोप भी लगा चुके हैं। कई केन्द्रीय योजनाओं के लिए भूमि का चयन ही नहीं हो पाया है। इस संबंध में हरीश रावत का सीधा आरोप राज्य सरकार और नैकरशाही पर है जो योजनाओं को लेकर हरीश रावत के आरोपों की फेहरिस्त मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को भेज चुके हैं। निकाय चुनावों में रावत और मुख्यमंत्री बहुगुणा के बीच पत्र की राजनीति भी शुरू हुई और इसका ही नतीजा रहा कि निकाय चुनावों में कांग्रेस का हरिद्वार से सूपड़ा तक साफ हो गया।

 

रावत और कांग्रेस सभी जान चुके थे कि हरिद्वार से चुनावों में काग्रेस का जीत हासिल करना बहुत मुश्किल है। इसी कारण हरीश रावत ने निकायों में प्रत्याशियों के चयन में अपने को पूरी तरह अलग रखा और विदेश दौरे पर जाना ही उचित समझा। हालांकि चुनाव प्रचार के दौरान रावत ने कांग्रेस प्रत्याशियों के पक्ष में जमकर प्रचार किया भाजपा के पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष कमल जौरा को कांग्रेस में भी शामिल करके कांग्रेस को मनोवैज्ञानिक बढ़त दिलाने में भी वे कामयाब रहे। बावजूद इसके कांग्रेस की चुनावों में बुरी तरह हार हुई। इस से हरीश रावत गुट में खासी बैचैनी है।

 

राजनीतिक सूत्रों की माने तो आने वाले लोकसभा चुनावों में हरीश रावत नैनीताल से चुनाव लड़ने की इच्छा रखते हैं। लेकिन नैनीताल से कांगेस के केसी बाबा लगातार दो बार चुनाव जीत कर सांसद बने हैं। लिहाजा नैनीताल सीट पर बदलाव की संभावनाएं कम ही दिखाई देती हैं साथ ही कांग्रेस संगठन में भी रावत के संबंधों में कुछ खास सुधार नहीं दिखाई देता है। बहुगुणा के साथ छत्तीस का आंकड़ा भी रावत की राह में एक बड़ा रोड़ा बन सकता है। इसी के चलते हरीश रावत अपने लिए सुरक्षित और आसान सीट की तलाश में माथापच्ची कर रहे हैं।

 

उत्तर प्रदेश की गाजियाबाद सीट जिसमें पर्वतीय मूल के मतदाताओं की खासी संख्या होने से भी रावत की पंसद है। साथ ही वर्तमान सांसद और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने की बात कह चुके हैं। इससे रावत के लिए गाजियाबाद सीट आसानी से सुलभ हो सकती है। हरीश रावत कई फायदे देख रहे हैं। एक तो राज्य में जिस तरह से कांग्रेस सरकार का दो चुनावों में ग्राफ गिरा है और मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की लोकप्रियता में गिरावट आई है उससे कांग्रेसी नेताओं को राज्य में जीत हासिल करने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ सकता है। चरम पर पहुंची गुटबाजी से भितरद्घात होने की भी प्रबल सभावनाएं हैं। इससे बचने के लिये भी गाजियाबाद आसान सीट है। हो सकता है कि उत्तराखण्ड कांग्रेस का यह बड़ा क्षत्रप अपने राजनीतिक भविष्य के लिए राज्य के उन निवासियों की ही तरह पलायन कर जाये जो कि वर्षों से अपने भविष्य के लिए पलायन को विवश है।

 

सतपाल महाराज के भी कुछ ऐसे ही हालात हैं। महाराज तो अपने राजनीतिक भविष्य के लिए दोहरा दांव खेलने के लिए पूरी तरह से पासे लगा रहे हैं। पौड़ी संसदीय क्षेत्र से निकाय चुनावों में कांग्रेस की करारी हार हुई है जबकि भाजपा को ८ सीटों पर जीत हासिल हुई है। साथ ही कांग्रेस का तुरूप का पत्ता गैरसैंण भी निकाय चुनाव में कांग्रेस के लिये पूरी तरह फेल रहा। गैरसैंण में कांग्रेस के प्रत्याशी की जमानत तक जब्त हुई। ऐसा ही कोटद्वार में हुआ जहां से २०१२ के विधान सभा चुनावों में भाजपा के बीसी खण्डूड़ी चुनाव हारे थे उसी कोटद्वार से पहली बार नगरपालिका बसपा के खाते में चली गई। कांग्रेस के सुरेन्द्र सिंह नेगी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। इसके बावजूद कोटद्वार में कांग्रेस की करारी हार हुई। इसके अलावा पौड़ी नगर में जहां कांग्रेस के विधायक सुंदरलाल मंद्रवाल हैं वहां भी कांग्रेस का सूपड़ा साफ हुआ। इससे कांग्रेस और सतपाल महाराज में भारी बेचैनी है।

 

निकाय चुनावों का लोकसभा चुनाव पर होने वाले असर के चलते ही सतपाल महाराज चुनावों से कन्नी काट सकते हैं। वे लोकसभा चुनाव लड़ने के बजाय २०१४ में खाली होने वाली राज्यसभा सीट से सांसद बनने की जुगत में बताए जाते हैं। कांग्रेसी सूत्रों की मानें तो सतपाल महाराज पौड़ी से अपनी जीत को लेकर संशय में हैं। जिस तरह से पौड़ी संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस का ग्राफ गिरा है इससे हार की संभावनाएं भी बढ़ गई हैं। इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी की हार से उठी सहानुभूति की लहर भी पूरे क्षेत्र में फैली हुई है। जनता में बनी सहानुभूति की लहर का ही असर कि गैरसैंण में बीसी खण्डूड़ी की पसंद के प्रत्याशी को जनता ने भारी मतों से नगर पंचायत चुनाव जिता दिया और कांग्रेस के प्रत्याशी की जमानत तक जब्त करवा दी। गैरसैंण से कांग्रेस के प्रत्याशी को सतपाल महाराज और उनके समर्थक विधायक अनुसूया प्रसाद मैखुरी जो कि वर्तमान में उत्तराखण्ड विधानसभा के उपसभापति हैं के असर को जनता ने पूरी तरह नकार दिया है। सतपाल महाराज द्वारा कर्णप्रयाग तक रेल मार्ग की घोषणा को भी जनता ने गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि अभी तक कोई काम आरम्भ ही नहीं हो पाया है। यहां तक कि भारत सरकार के वार्षिक बजट और रेल बजट में कर्णप्रयाग रेलवे लाइन का उल्लेख तक नहीं किया गया है। इससे भी जनता सतपाल महाराज की घोषणाओं को गंभीरता से नहीं ले पाई और उसने पूरे पौड़ी संसदीय क्षेत्र में निकाय चुनावों में कांग्रेस को धूल चटाने में कोई कोताही नहीं बरती। कांग्रेस की हार के चलते अब पौड़ी संसदीय सीट सतपाल महाराज के लिये आसान नहीं रह गई है। अगर चुनावों में हार नसीब हुई तो राजनीतिक तौर पर बेहद कमजोर होने तथा प्रदेश की राजनीति में दखल भी कम होने की संभावनाएं हैं। यह छटपटाहट ही सतपाल महाराज को राज्यसभा से सांसद बनने के लिये प्रेरित कर रही है।

 

२०१४ में भाजपा के भगत सिंह कोश्यारी राज्यसभा से अपना कार्यकाल पूरा करने वाले हैं। राज्यसभा की इस सीट पर सतपाल महाराज की नजर है और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार के चलते उनका राज्यसभा से सांसद बनना पूरी तरह आसान भी है। सतपाल महाराज के लिये यह दांव उनके राजनीतिक भविष्य के लिये बेहद मुफीद साबित हो सकता है। एक तीर से दो शिकार की नीति के तहत वे अपना वर्चस्व बनाये रख सकते हैं। इसमें दो कारण दिखाई दे रहे हैं। एक तो बहुगुणा सरकार के साथ उनके संबंध हरीश रावत की अपेक्षा बेहतर हैं और वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य के साथ भी उनका तालमेल बेहतर तरीके से चल रहा है। कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी सतपाल महाराज को प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने पर सहमति जता चुके हैं। इसका प्रमाण राहुल गांधी के देहरादून दौरे के समय सामने आ चुका है। 

 

राहुल के दौरे के समय सतपाल महाराज को प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने की चर्चा भी हुई थी। स्वयं सतपाल महाराज भी प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने पर सभी से शुभकामनाएं लेते दिखाई दे रहे थे। निकाय चुनावों के मद्देनजर प्रदेश अध्यक्ष पद पर बदलाव को राहुल गांधी ने उस समय रोक दिया था लेकिन सतपाल महाराज का नाम प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर लगभग घोषित हो गया था और जिसे कांग्रेस ने भी मान लिया था।

 

अब सतपाल महाराज की महत्वाकांक्षाएं प्रदेश अध्यक्ष के पद पर आसीन होने के लिये बलवती हो चुकी हैं और वे इसके लिये कई तरह से अपनी बात रख चुके हैं। कांग्रेसी सूत्रों के अनुसार सतपाल महाराज प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी को किसी भी हालत में पाने के लिये हर प्रकार का समझौता करने को तैयार हैं। इसके चलते ही वे लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने और राज्यसभा से सांसद बनने का निणर्य कांग्रेस आलाकमान को दे चुके हैं। अब देखना यह है कि कांग्रेस आलाकमान हरीश रावत और सतपाल महाराज दोनों दिग्गज नेताओं के राजनीतिक भविष्य को लेकर क्या निर्णय लेता है।

 

 

 
         
 
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एक है बिहारी बाबू। जाहिर है बिहार प्रदेश से ही होंगे। लेकिन आप नीतीश कुमार को मत समझ लीजिएगा। बात उन बिहारी बाबू की हो रही है] जो भाजपा में हैं। और भाजपा में होकर भी भाजपा से बाहर हैं।

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