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आवरण कथा
 
खुराना की खुराफात

 

  • गुंजन कुमार

 

उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार का आलम यह है कि खुद विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल इसके बढ़ने की बात स्वीकारते हैं। इस पर अंकुश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के तमाम दावे खोखले साबित हो रहे हैं। हालत यह है कि देहरादून के जिन कोतवाल केवल खुराना को १९ मई के दिन मुख्यमंत्री ने उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित किया उनके करियर पर भ्रष्टाचार का गहरा दाग है। खुराना ने दो साल पहले एक विभागीय परीक्षा में सात लोगों को गैर कानूनी ढंग से मदद की थी। लेकिन विभाग ने उन्हें महज चेतावनी देकर मामले को रफा-दफा कर दिया

 

 

पात्र-परिचय


केवल खुराना वर्तमान में देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक हैं। इससे पहले हरिद्वार में भी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रह चुके हैं। जनवरी २०११ में ये टिहरी के पुलिस अधीक्षक हुआ करते थे। इसी दौरान टिहरी में आयोजित एक विभागीय उपनिरीक्षक की परीक्षा में इन्होंने सात अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाने के लिए नियम-कानून की धज्जियां उड़ाई। इस मामले में केवल खुराना ही मुख्य आरोपी हैं।

 

सतबीर सिंह वर्तमान में पुलिस अधीक्षक अभियोजन (प्रोस्ट्यूशन हैं। तैनाती पुलिस मुख्यालय देहरादून में है। जनवरी २०११ में जब क्षेत्राधिकारी नरेन्द्र नगर थे तब इनका रैंक पुलिस उपाधीक्षक का था। अब पदोन्नति पाकर पुलिस अधीक्षक (एसपी का रैंक प्राप्त कर चुके हैं। इन पर आरोप है कि परीक्षा में धांधली करने में इन्होंने केवल खुराना की मदद की। 

 

राजन सिंह वर्तमान में सीओ विकास नगर के पद पर तैनात हैं। इससे पहले पुलिस उपाधीक्षक सर्तकता भी रह चुके हैं। जनवरी २०११ में प्रतिसार निरीक्षक पुलिस लाइन चम्बा के पद पर तैनात थे। इनका रैंक निरीक्षक (इंस्पेक्टर का था। जिसके बाद इन्हें भी पदोन्नति देकर पुलिस उपाधीक्षक (डीसीपी बना दिया गया। राजन सिंह उक्त विभागीय परीक्षा में नियम-कायदे तोड़ने वाले आरोपी नंबर तीन हैं।

 

इन तीनों ने परीक्षा केंद्र चम्बा में तैनात उत्तराखण्ड पुलिस के अन्य सभी चौदह कर्मचारियों पर दबाव डालकर परीक्षा में धांधली करने को मजबूर किया। जिनमें छह कर्मचारियों को छोड़कर शेष आठ विभागीय जांच में गवाह बन गए। बताया जाता है कि गवाह बने सभी आठ कर्मचारियों को सीनियर्स के कोपभाजन का शिकार भी बनना पड़ा और इन्हें सस्पेंड कर दिया गया।

 

पटकथा 

भ्रष्टाचार के इस खेल की पटकथा २३ जनवरी २०११ को उत्तराखण्ड पुलिस रैंकर विभागीय उपनिरीक्षक परीक्षा के लिए लिखी गई थी। यह परीक्षा के करीब एक सप्ताह पूर्व ही लिख ली गई थी। आरोपों के मुताबिक इसके मुख्य रचयिता वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक केवल खुराना थे। जिन्होंने अपने दो मातहतों (सतबीर सिंह और राजन लाल की मदद से इसे अंजाम दिया। 

 

पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार २३ जनवरी २०११ को उत्तराखण्ड पुलिस ने उपनिरीक्षक पद के लिए विभागीय परीक्षा का आयोजन किया था। टिहरी जनपद का परीक्षा केंद्र पुलिस लाइन चम्बा (परीक्षा केंद्र संख्या-३४ निर्धारित किया गया। जनपद के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक केवल खुराना को ही परीक्षा केन्द्र चम्बा का व्यवस्थापक बनाया गया था। इन्हें नियम-कानून के तहत और अपने उच्चाधिकारियों के निर्देशों का पालन करते हुए परीक्षा सम्पन्न करानी थी लेकिन परीक्षा में भाग लेने वाले सात अभ्यर्थियों को छोड़कर सभी ने आरोप लगाया कि केवल खुराना ने नियमों के हेर-फेर से अपने खास अभ्यर्थियों को फायदा पंहुचाया है। अभ्यर्थियों के आरोपों के मुताबिक केवल खुराना ने नरेन्द्र नगर के क्षेत्राधिकारी सतबीर सिंह और चम्बा के प्रतिसार निरीक्षक राजन सिंह के साथ मिलकर अपने पद का दुरुपयोग किया। इन लोगों ने परीक्षा हॉल में सात कर्मचारियों को लाभ पहुंचाने के लिए षड्यंत्र रचा। ये सात कर्मचारी कांस्टेबल अजय राज (थाना मुनिकीरेती कांस्टेबल चन्द्र शेखर भट्ट (गनर पुलिस अधीक्षक हेड कांस्टेबल राजीव कुमार (एसओजी टिहरी कांस्टेबल मनोज बेनिवाल (एसओजी टिहरी कांस्टेबल योगेन्द्र सिंह (थाना नरेन्द्र नगर कांस्टेबल दिनेश सिंह (पुलिस लाईन चंबा और कांस्टेबल दीपक ममगांई (गनर एडीजी देहरादून हैं।

 

गौरतलब है कि इन सातों की परीक्षा अन्य अभ्यर्थियों के साथ नहीं ली गई। प्रथम दृष्टि में इन सातों को सभी कक्ष निरीक्षकों ने अनुपस्थित दिखाया। लेकिन परीक्षा संपन्न होने के बाद ये सभी परीक्षा हॉल के बाहर प्रश्नपत्र के साथ मौजूद थे। अन्य सभी अभ्यर्थियों ने पुलिस महानिदेशक उत्तराखण्ड से इस प्रकरण में जांच की मांग की। अभ्यर्थियों ने परीक्षा केंद्र व्यवस्थापक केवल खुराना पर आरोप लगाया कि मानकों के अनुसार परीक्षा से १५ मिनट पहले ही (कम्प्यूटरीकूत जांच के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कापियां-उत्तर पुस्तिका आवंटित की जाती है। लेकिन सुनियोजित षड्यंत्र के तहत उस दिन कुछ खास लोगों को प्रश्नपत्र आधा घंटा पहले ही वितरित कर दिया गया। इसका सीधा अर्थ है कि अलग कक्षा में बैठे सातों अभ्यर्थियों के लिए ही ऐसा किया गया। जांच में यह मांग भी की गई है कि परीक्षा में आवंटित क्रमांक के मुताबिक जिस पंक्ति में सातों अर्भ्यर्थियों की सीट निर्धारित थीं उन्हीं से मिलान करते हुए आगे-पीछे वाले अभ्यर्थियों की ओएमआर सीट क्रमांक की जांच की जानी चाहिए। परीक्षा केंद्र के सभी अभ्यर्थियों ने यह आरोप लगाते हुए परीक्षा के एक दिन बाद ही उत्तराखण्ड पुलिस के डीजीपी से इसकी जांच कराने का आग्रह किया था। इनके आरोप पत्र पर डीआईजी (पीएसी ने गोपनीय जांच की अनुशंसा कर दी। इनके अलावा डीजी उत्तराखण्ड पुलिस ने भी उक्त शिकायती पत्र पर जांच के आदेश २७ जनवरी २०११ को ही दे दिए थे। डीआईजी (पीएसी और डीजी उत्तराखण्ड पुलिस के आदेशानुसार इसकी जांच सीबीसीआईडी (अपराध अनुसंधान विभाग को सौंप दी गई। १६ फरवरी २०११ को जांच संबंधी कागजात सीबीसीआईडी के देहरादून कार्यालय को भेजे गए। जिस पर खण्डाधिकारी देहरादून ने १७ फरवरी २०११ को यह जांच इंस्पेक्टर वीर सिंह नेगी को सौंपी। अभ्यर्थियों के लगाए गए सभी आरोप सही पाए गए। जिसके आधार पर जांच अधिकारी ने आरोपी पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही की अनुशंसा की। मामला उस समय उल्टा पड़ गया जब आरोपियों को दण्डित किए जाने की जगह उन्हें पदोन्नत कर दिया गया। 

 

जांच

सीबीसीआईडी की यह गोपनीय जांच रिपोर्ट दि संडे पोस्ट के पास भी है। जांच में आरोपी अधिकारियों के कर्तव्य उनके द्वारा बरती गई अनियमितताएं और अनियमितताओं को साबित करते साक्ष्य का विश्लेषण किया गया है। जिसके बाद दण्ड की संस्तुति की गई है। जांच अधिकारी ने रिपोर्ट में कहा है कि रैंकर उपनिरीक्षक परीक्षा केंद्र टिहरी के केंद्र व्यवस्थापक के रूप में परीक्षा को उच्चाधिकारियों के निर्देशों के अनुरूप संपन्न कराया गया। परीक्षा केंद्र का व्यवस्थापक होने के कारण केंद्र पर हुई सभी अनियमितताओं के दोषी केवल खुराना ही हैं। जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि परीक्षा की वीडियोग्राफी कराई गई थी। लेकिन सिर्फ ११ बजे से लेकर १ बजे तक के बीच सिर्फ नौ मिनट की ही वीडियोग्राफी कराई गई। इसके अलावा सिर्फ परीक्षा प्रारंभ और समाप्ति की ही रिकॉर्डिंग की गयी है। परीक्षा होने प्रारंभ होने से ३० मिनट पहले ही प्रश्न पत्र और उत्तर पुस्तिका वितरित कर दी गई। जबकि निर्देशों से स्पष्ट था कि उत्तर पुस्तिका ३० मिनट पहले और प्रश्नपत्र सिर्फ १५ मिनट पहले ही वितरित किए जा सकते हैं। आरोपी अभ्यर्थियों (सातों को उत्तर पुस्तिका एक ही क्रम में वितरित गयी। जबकि सातों की सीट बैठने का कक्ष और क्रमांक अलग-अलग थे। वीडियोग्राफी की सीडी में जांचकर्ता ने पाया है कि आरोपियों की निर्धारित सीट्स खाली थीं। जांच अधिकारी ने यह भी पाया कि प्रश्नपत्र क्रम में नहीं थे। जबकि निर्देशानुसार पहले अभ्यर्थी को यदि ए क्रम का प्रश्न दिया जाए तो उसके पीछे वाले को बी उसके बाद को सी क्रम दिया जाता है। लेकिन आरोपी अभ्यार्थियों को क्रम में प्रश्नपत्र वितरित नहीं किए गए। रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि केवल खुराना की मौजूदगी में उक्त सातों आरोपी अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा केंद्र से अलग बैठाकर परीक्षा दिलाई गई। हालांकि १२ फरवरी २०११ को केवल खुराना ने डीजी उत्तराखण्ड पुलिस को पत्र लिखकर कहा था कि परीक्षा में अनियमितताओं की शिकायतें झूठी हैं।

 

तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक सतबीर सिंह को उक्त परीक्षा का पर्यवेक्षक अधिकारी बनाया गया था। जांच के दौरान इनकी गवाही भी ली गई। जिसमें इन्होंने सभी सातों आरोपियों के मुख्य परीक्षा केंद्र में बैठने की बात कही थी जबकि वीडियो रिकॉर्डिंग से साफ होता है कि आरोपी अभ्यर्थियों ने अपनी सीट पर बैठकर परीक्षा नहीं दी थी। इन्होंने एक आरोपी अभ्यर्थी हेड कांस्टेबल राजीव कुमार को पहले अपने निर्धारित सीट कक्ष संख्या सात में बैठा बताया लेकिन बाद में अपने ही बयान में उसे कक्ष संख्या आठ में उपस्थित बताया। जबकि इसके निर्धारित सीट के आगे बैठे कांस्टेबल पंकज कुमार और पीछे बैठे राज कुमार और कक्ष निरीक्षक धीरज बलूनी ने भी उक्त अभ्यर्थी को अनुपस्थित बताया। जांच में यह भी सामने आया कि सतबीर सिंह ने अपने सरकारी और निजी फोन से परीक्षा शुरू होने से पहले और बाद में कई बार आरोपी अभ्यर्थी से बात की। पूरी प्रक्रिया में राजन सिंह के जरिए केवल खुराना ने परीक्षा शुरू होने से पहले ही प्रश्न पत्र और उत्तर पुस्तिका वितरित करा दिए। जबकि राजन सिंह की कार्य उक्त परीक्षा में सिर्फ सिटिंग व्यवस्था करना था। राजन सिंह भी परीक्षा से पहले और बाद में कई अभ्यर्थियों से फोन पर बात कर रहा था। राजन ने परीक्षा के दो दिन पूर्व से लेकर परीक्षा के कई दिन बाद तक आरोपी अभ्यर्थियों से फोन पर लगातार बातचीत की। राजन ने ही सातों आरोपी अभ्यर्थियों के प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिकाएं अभ्यर्थी परीक्षा के बाद जमा कराए।

 

उक्त परीक्षा में चम्बा पुलिस लाइन के प्रधान लिपिक राजेन्द्र सिंह बिष्ट को सिटिंग व्यवस्था परीक्षा संबंधित सामग्री का रख-रखाव उसे कक्ष निरीक्षकों को वितरित करने और परीक्षा की समाप्ति पर उत्तर पुस्तिकाएं एवं उपस्थित सीट एकत्र कर उसे नगर पुलिस अधीक्षक के सामने सील कर सचिव तकनीकी संस्थान रुड़की को भेजने की जिम्मेदारी दी गई थी। इन्होंने जांच के दौरान बताया है कि जब उन्होंने राजन सिंह को प्रश्न पत्र और उत्तर पुस्तिका देने से मना कर दिया तो राजन सिंह ने मोबाइल से परीक्षा पर्यवेक्षक सतबीर सिंह को फोन किया। फोन करने के बाद सतबीर सिंह और केवल खुराना दोनों लिपिक राजेन्द्र सिंह बिष्ट के पास पहुंचे। केवल खुराना के निर्देश पर ही उन्होंने राजन सिंह को परीक्षा सामग्री उपलब्ध कराई और परीक्षा समाप्ति पर उक्त उत्तर पुस्तिकाएं राजन सिंह ने बिना कक्ष निरीक्षक के हस्ताक्षर कराए राजेन्द्र सिंह बिष्ट को सौंप दी। बाद में राजेन्द्र सिंह ने संबंधित कक्ष निरीक्षक से उत्तर पुस्तिका पर हस्ताक्षर करवाए।

 

उक्त परीक्षा केंद्र पर केवल खुराना सतबीर सिंह और राजन सिंह सहित १७ पुलिस अधिकारी या कर्मी तैनात किए गए थे। केवल खुराना ने ही सभी को इस धांधली में शामिल किया। कई पुलिस अधिकारी जिन्हें अनुशासन का पालन करते हुए अपने सीनियर के गलत आदेशों को मजबूरन मानना पड़ा था वे जांच के दौरान गवाह बन गए। इसमें प्रधान लिपिक राजेन्द्र सिंह बिष्ट एसआई प्रवीन सिंह नेगी कांस्टेबल वीरेन्द्र सिंह राणा निरीक्षक अर्जुन सिंह निरीक्षक महीपाल सिंह पाल उपनिरीक्षक धीरज मणी बलूनी उपनिरीक्षक देवेन्द्र सिंह नेगी उपनिरीक्षक श्यामलाल ने जांच में धांधली की गवाही दी। इनकी गवाही के अलावा वीडियोग्राफी उत्तर पुस्तिका के क्रमांक मोबाइल फोन खर्च आदि कई चीजें इस धांधली को उजागर करते हैं। जांच अधिकारी ने अनियमितताओं में लिप्त अधिकारियों और कर्मचारियों पर विभागीय कार्यवाही की संस्तुति भी की। लेकिन दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई उल्टे गवाह बने लोगों को निलंबन झेलना पड़ा। सीबीसीआईडी ने केवल खुराना के खिलाफ ऑल इंडिया सर्विस १९६९ नियम (६(डिसिप्लिन एण्ड अपील के अंतर्गत विभागीय कार्यवाही की संस्तुति की। इनके अलग सतबीर सिंह और राजन सिंह के खिलाफ सरकारी सेवक सेवा नियामावली ३ (ख के अंतर्गत विभागीय कार्यवाही की संस्तुति की गई है। जांच में दोषी पाए गए अन्य के खिलाफ भी विभिन्न नियमों के अंतर्गत विभागीय कार्यवाही की संस्तुति सीबीसीआईडी ने की। लेकिन जांच रिपोर्ट को दबा दिया गया और दोषी अधिकारियों को पदोन्नति दे दी गई। मुख्य आरोपी केवल खुराना को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बना दिया गया तो सतबीर सिंह को पुलिस उपाधीक्षक से पुलिस अधीक्षक बना दिया गया। इस धांधली और जांच रिपोर्ट के गोपनीय दस्तावेज हरिद्वार के सामाजिक कार्यकर्ता जेपी बडोनी के हाथ कुछ दिन पहले ही लगे। तब उन्होंने उत्तराखण्ड पुलिस से दोषियों पर कार्यवाही करने के लिए पत्र व्यवहार शुरू किया। इसके बावजूद अभी तक पुलिस विभाग की तरफ से कोई कार्रवाई देखने को नहीं मिली है। निकाय चुनाव में जिस प्रकार सरकार को मुंह की खानी पड़ी उससे सरकार अपनी छवि सुधारने के लिए भ्रष्ट अधिकारियों पर डंडा चला रही है। मुख्य सचिव से मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने भ्रष्ट अधिकारियों की सूची बनाकर कार्यवाही करने निर्देश दिए हैं। 

 
         
 
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