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न्यूज़-एक्सरे 
 
मजहबी सियासत में तब्दील विवाद

पौड़ी स्थित धारी देवी मंदिर के स्थानांतरण (अपलिफ्टिंग का मामला अब बांध विकास से होता हुआ धर्म के दायरे में दाखिल होकर गरमा गया है। इसमें लालकृष्ण आडवाणी और उमा भारती भी कूद पड़े हैं। बांध समर्थक और विरोधियों में टकराव परवान चढ़ रहा है। बांध विरोधी इस बात से नाराज हैं कि लापरवाहियों के कारण ही अब धारी देवी का वजूद खतरे में है

 

उत्तराखण्ड के पौड़ी स्थित धारी देवी मंदिर के स्थानांतरण (अपलिफ्टिंग का विवाद अब बांध और विकास के मुद्दे से भटक कर धर्म आधारित राजनीति के पाले में जाता दिखाई दे रहा है। लालकूष्ण आडवाणी का इस मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलना उमा भारती का अनशन और १३ मई को धारी देवी पहुंचना इसके स्पष्ट संकेत हैं कि भाजपा इस पूरे मसले को किस दिशा में ले जाना चाह रही है। इसी के चलते स्थानीय जनता भी बांध समर्थक और बांध विरोधियों के स्पष्ट विभाजन की शिकार होती जा रही है।

 

दरअसल ३३० मेगावाट क्षमता वाली जीवीके समूह की श्रीनगर पनबिजली परियोजना के तहत धारी देवी मंदिर की अपलिफ्टिंग पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक केंद्र ने पहले ही रोक लगा दी है। १३ मई को धारी देवी न्यास समीति ने धारी देवी की मूर्ति अस्थाई परिसर में रखे जाने का मुहुर्त निकाला था। श्रीनगर के सब डिविजनल मजिस्ट्रेट राजा अब्बास ने बताया कि फिलहाल केंद्र ने कंपनी की धारी देवी मंदिर को हटाने की योजना को लेकर नया प्रतिबंध लगा दिया है। अब्बास का कहना है कि हाल ही में इस बांध का दौरा एक उच्च स्तरीय निगरानी समिति ने भी किया था। समिति ने इस सिलसिले में विभिन्न पक्षों से बातचीत की थी। उसकी सिफारिशों के बाद ही केंद्र ने मंदिर हटाने की कंपनी की योजना पर प्रतिबंध लगाया है। मंत्रालय के निदेशक बीबी बर्मन ने इस संबंध में १० मई को ही एएचपीसी सिकंदराबाद(आंध्र प्रदेश स्थित मुख्यालय को आदेश जारी कर दिए थे।

 

धारी देवी मंदिर अपलिफ्ट करने को लेकर लगभग ९५ प्रतिशत कार्य पूर्ण हो चुके हैं। १३ मई को मंदिर को करीब २० मीटर ऊपर उठाने की योजना थी। जीवीके के अधिकारियों ने दावा किया कि अलकनंदा नदी पर बन रही यह परियोजना पूरा होने को है। पिछले वर्ष राज्य के पेयजल मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी ने भी दावा किया था कि धारी देवी मंदिर को इस परियोजना के पूरा होने की राह में आड़े नहीं आने दिया जाएगा। नैथानी ने इस परियोजना को जल्द पूरा किए जाने की मांग को लेकर दिल्ली स्थित जंतर मंतर पर १० जुलाई २०१२ को एक दिन का अनशन भी किया था। फिलहाल स्थिति यह बन रही है कि बांध समर्थक और बांध पर सवाल उठा रहे लोगों के बीच तल्खियां दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही हैं। १३ मई को धारी देवी पहुंचे प्रोफेसर जीडी अग्रवाल और उमा भारती को बांध समर्थकों के गुस्से का सामना करना पड़ा। लोगों ने यहां उमा को काले झंडे दिखाए और 'उमा भारती वापस जाओ' के नारे भी लगाए। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को भी काफी मशक्कत करनी पड़ी। पूरे विवाद के बाद दोनों पक्षों ने एक दूसरे के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट भी दर्ज कराई है। पुलिस ने दोनों पक्षों की ओर से विरोध का नेतृत्व कर रहे प्रसन्ना रेड्डी रवीन्द्र सिलवाल मनोज रतूड़ी हेमंत ध्यानी आदि पर शांति भंग करने का मामला दर्ज कर लिया है। इसके बाद १५ मई को जिलाधिकारी चन्द्रेश कुमार यादव ने धारी देवी मंदिर समिति से वार्ता की और बताया कि आपसी सहमति के बनने के बाद ही मूर्ति को स्थानांतरित किया जा सकता है। उधर बांध समर्थकों का कहना था कि जीडी अग्रवाल और उमा भारती जैसे लोग धारी देवी का सहारा लेकर अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं। इससे पहले भी परियोजना निर्माण में धारी देवी मंदिर को डूब क्षेत्र से बाहर रखे जाने की मांग को लेकर २२ जून २०१२ को धारी देवी मंदिर पहुंचे जीडी अग्रवाल को परियोजना सर्मथकों के विरोध का सामना करना पड़ा था। साथ ही परियोजना के विरोध के आरोप में प्रो भरत झुनझुनवाला से मारपीट और अभद्रता भी की गयी थी। परियोजना पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा जून २०११ में लगाई गई धारा ५ (पर्यावरण मंत्रालय एक्ट १९८६ को हटाने को लेकर १० जुलाई २०१२ को ५०० लोगों ने दिल्ली जंतर मंतर पर प्रदर्शन भी किया था। असल में धारी देवी को आधार बनाकर जिस राजनीति की शुरुआत की जा रही है उसमें बांध को लेकर जो जायज सवाल हैं वे भी शोर का शिकार हो रहे हैं। गौरतलब है कि अविभाजित उत्तर प्रदेश शासन के समय स्वीकूत इस परियोजना के लिए वर्ष १९७८-८० के बीच ही भूमि खरीदी गई थी। वर्तमान में उत्तराखण्ड के दो जिलों (टिहरी और पौड़ी के ११ गावों के ११३१ परिवारों को परियोजना प्रभावितों की श्रेणी में रखा गया है। जिसमें टिहरी जिले की (२.३६ हेक्टयर भूमि तथा पौड़ी जिले की (२.३९ हेक्टेयर कूषि योग्य भूमि के साथ ही २७९ हेक्टेयर रिजर्व फॉरेस्ट की भूमि भी अधिग्रहित की गयी थी। शुरुआत में परियोजना का निर्माण कार्य सिंचाई विभाग द्वारा प्रारम्भ किया गया। बाद में अचानक ही सिंचाई विभाग ने सिर्फ आवासीय कॉलोनियों के निर्माण के बाद परियोजना से अपने हाथ पीछे खीच लिए। परियोजना निर्माण कार्य सिंचाई विभाग द्वारा छोड़ने के बाद परियोजना को निजी हाथों में देने की बात की गयी। जिसमें एक के बाद एक तीन अलग-अलग निजी कम्पनियों ने परियोजना निर्माण का काम लिया और बाद में काम आधे में लटकाकर पीछे हटती गईं। २६ साल बीत जाने के बाद यह योजना उत्तराखण्ड सरकार के अधीन आई और उसने मई २००६ में परियोजना को हरी झंडी दे दी। सरकार ने निर्माण का जिम्मा हैदराबाद की निजी कम्पनी जीवीके को दिया। जीवीके कम्पनी ने परियोजना की लागत बिजली उत्पादन तक ३५०० करोड़ रुपए बतायी थी। जीवीके के अनुसार अब तक ३००० करोड़ रुपए परियोजना निर्माण पर खर्च भी किया जा चुका है।

 

परियोजना निर्माण के लिए उत्तराखण्ड सरकार ने तीस सालों के लिए जीवीके को अपने जल-जंगल-जमीन मात्र साढ़े तेरह प्रतिशत रॉयल्टी लेकर सुपुर्द कर दिए। किसी भी राज्य में कोई परियोजना राष्ट्रहित या जनकल्याण को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। जिसमें कम से कम कूषि भूमि के चयन संबंधित क्षेत्रों में हाईटेंशन लाइन धार्मिक भवन आदि को ध्यान में रखकर ही योजना का निर्माण कार्य शुरू किया जाता है। लेकिन मजेदार बात यह है कि जीवीके निर्माण कार्य आगे बढ़ने के साथ ही अपनी मनमानी पर उतर आयी। जिसमें बिना स्वीकृति के परियोजना को २२० मेगावाट के स्थान पर ३३० मेगावाट किये जाने और इसके लिए फॅारेस्ट क्लीयरेंस तक न लेने जैसे कदम शामिल हैं। साथ ही बिना स्वीकृति के बांध की ऊंचाई ६३ मीटर से बढ़ाकर ९५ मीटर कर दी गई। इसके अलावा जीवीके अवैध खनन के चलते लगाए गए ८६ करोड़ रुपये का जुर्माना न वसूले जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं। गौरतलब है कि अभी तक जिला प्रशासन पौड़ी ने किसी अदृश्य दबाव के चलते इसे वसूलने में कोई रुचि नहीें दिखाई है। फिलहाल केंद्र के प्रतिबंध के बाद परियोजना के समर्थकों के तेवर तल्ख हैं। हालांकि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' और उमा भारती ने आरोप लगाया है कि उनके विरोध के लिए निर्माता कंपनी ने भाड़े पर लोग इकट्ठे किए हुए थे। जिनमें से अधिकतर ने तो शराब तक पी हुई थी। असल सवाल यही है कि बांध निर्माण निर्माण का ठेका निजी कंपनी के पास जाते ही आखिर किन कारणों से अचानक बांध की बिजली उत्पादन क्षमता और ऊंचाई बढ़ाने का फैसला लिया गया। जुलाई-अगस्त २०१२ में भारी बरसात के बावजूद बांध का गेट न खोलकर जानबूझकर धारी देवी मंदिर परिसर में पानी क्यों भरने दिया गया और क्यों धारी गांव के पुल को बह जाने दिया गया। ऐसे में क्या यह शक जायज नहीं है कि बांध की ऊंचाई और क्षमता बढ़ने के कारण ही मंदिर का अस्तित्व आज खतरे में है। बहरहाल इस मौजूदा शोर और कोलाहल में इन जरूरी सवालों के गुम होने और सियासत के लिए धर्म का बेवजह इस्तेमाल होने का डर लगातार बना हुआ है।

 

जून २०११ में धारा ५ लगाई गयी थी लेकिन प्रशासन को निर्माण कार्य बंद कराने को लेकर कोई आदेश नहीं दिया गया था। मंदिर में निर्माण कार्य को लेकर मंदिर समिति और कार्यदायी संस्था जीवीके के बीच ही निर्णय हुआ था। जिसके चलते कंपनी द्वारा मंदिर में निर्माण कार्य कराया जा रहा था। लेकिन अब केद्रीय पर्यावरण मत्रांलय के सख्त आदेशों के बाद निर्माण कार्य पर रोक लगा दी गयी है।

रज्जा अब्बास एसडीएम श्रीनगर

 

मंदिर समिति ने फैसला लिया है कि वह अपने खर्चे पर ही नए मंदिर का निर्माण करेगी। जल्द ही मूर्ति को शिफ्ट किया जाएगा लेकिन शिला को यथावत ही रहने दिया जाएगा। १३ मई को हुए विरोध में ज्यादातर वे लोग थे जिन्हे मुआवजा नहीं मिला है इसके अलावा दूसरी तरफ से कंपनी के अपने लोग ही शामिल थे।

वीपी पाण्डे अध्यक्ष मंदिर समिति

धारी देवी परियोजना का ८५ प्रतिशत काम होने के बाद अब परियोजना निर्माण कार्य बंद होना न्यायोचित नहीं है। जनभावनाओं को देखते हुए मंदिर का सौन्दर्यीकरण होना चाहिए। मंदिर की अपलिफ्टिंग को लेकर अकेले कंपनी और मंदिर पुजारियों में ही वार्ता हुई है। ग्राम प्रधान की इसमें कोई सहमति नहीं ली गयी।

दिनेश पैन्यूली क्षेत्रीय ग्राम प्रधान

 

हमारा विरोध करने वाले कंपनी के ही लोग हैं। इनमें आम लोग शामिल नहीं हैं।

रमेश पोखरियाल 'निशंक' पूर्व मुख्यमंत्री

 

हम लोग बांध या विकास विरोधी नहीं हैं। धारी देवी मंदिर लोगों की आस्था का प्रतीक है। इसलिए कंपनी को उसे बिना नुकसान पहुंचाए किसी और विकल्प पर काम करना चाहिए।

उमा भारती भाजपा नेत्री

 

गंगा या उसकी अन्य नदियों पर किसी भी तरह के बांध का निर्माण नहीं होना चाहिए। यह पर्यावरण के साथ-साथ स्थानीय लोगों के लिए नुकसानदायक है। हम बांध समर्थकों से नहीं डरने वाले हैं।

जी.डी. अग्रवाल पर्यावरणविद्

 

हम परियोजना का विरोध नहीं कर रहे हैं विरोध केवल मंदिर की शिला की अपलिफ्टिंग को लेकर है। हमारा कहना है कि केवल मूर्ति को ही अपलिफ्ट किया जाए और शिला को यथावत रखा जाय।

कुशलानाथ सामाजिक कार्यकर्ता

 

तेरह मई को धारी देवी मंदिर परिसर में परियोजना समर्थकों और विरोधियों के बीच हुए हंगामे को लेकर दोनों पक्षों ने नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई गयी है। घटना की वीडियोग्राफी देखने के बाद ही दोषियों के खिलाफ अग्रिम कार्रवाई की जायेगी।

अनिल कुमार जोशीथानाध्यक्ष श्रीनगर

 


 
         
 
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