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पड़ोस
 
निजाम ए नवाज

 

नवाज शरीफ की पाक चुनाव में जीत के कई मायने हैं। कट्टरपंथी ताकतों पर जम्हूरियत की जीत पाक राजनीति की नयी करवट और पड़ोसी देश भारत के लिए बेहतर रिश्तों की गुंजाइश। सत्ता में अपनी हैट्रिक लगाने जा रहे नवाज शरीफ ने भारत से रिश्ते सुधारने का चुनावी वादा किया था जिसे निभाना उनके लिए आसान नहीं होगा। भारत से दोस्ती का खामियाजा उन्हें चौदह साल तक सत्ता खो कर भुगतना पड़ा था। इस वक्त भी जम्हूरियत की दुश्मन रही सेना के जनरल कयानी पावर में हैं। तय बात है कि वहां की आतंकवादी संगठनों और सेना को भारत रास नहीं आएगा

 

जम्हूरियत के लिए जद्दोजहद करते पाकिस्तान में नवाज शरीफ की जीत को लोकतांत्रिक राजनीति की एक नयी करवट के रूप में देखा जा रहा है। पाक की आवाम ने कट्टरपंथी ताकतों को नजरअंदाज करते हुए लोकतंत्र को जिताया है। पड़ोसी देश होने के नाते भारत भी खुश है क्योंकि तुलनात्मक रूप से नवाज शरीफ के रिश्ते भारत से बेहतर ही रहे हैं। मगर इससे इंकार नहीं कि दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्ते की डगर अभी भी कठिन है।

 

भारत-पाक विभाजन (१९४७ के बाद से ही पाकिस्तान की आवाम ने लगातार लोकतंत्र के लिए संद्घर्ष किया है। जिन मुख्य ताकतों ने पाकिस्तान की स्थापना की थी उन्होंने लियाकत अली खान को प्रधानमंत्री बनाया। अली खान की रावलपिंडी में वर्ष १९५१ में एक रैली के दौरान हत्या कर दी गई। अस्थिरता के सात सालों बाद ही १९५८ में राष्ट्रपति इसकंदर मिर्जा का तख्ता पलट कर अयूब खान ने पाकिस्तान में पहली सैनिक ने तानाशाह सरकार बनाई। इसके बाद तो पाकिस्तानी आवाम ने लोकतांत्रिक सरकारें और सैनिक तानाशाही दोनों को ही मौसम की तरह आते-जाते देखा। पाकिस्तान के ६५ साल के राजनीतिक सफर में पहली बार ऐसा देखने को मिला है कि लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई किसी सरकार ने पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा किया है। 

 

१०० से ज्यादा लोगों की मौत और ६० से ज्यादा बम हमलों के बावजूद ११ मई को संपन्न हुए पाकिस्तान के आम चुनावों में फिलहाल पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए १२४ सीटों पर जीत हासिल की है। पीएमएल-एन बहुमत (१३७ से सिर्फ १३ सीटें दूर रह गई है और नवाज शरीफ का सत्ता में लौटना तय हो गया है। पाकिस्तान की दूसरी बड़ी पार्टियों जैसे जरदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी-३३ इमरान खान की तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई-२९ और शहरी इलाकों में मजबूत मानी जाने वाली मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम-१७ को चुनावों में लोगों की तरफ से निराशा ही हाथ लगी है। पिछली बार सरकार में शामिल पाकिस्तान मुस्लिम लीग- कायदे आजम (पीएमएल-क्यू एक बड़ा नुकसान उठाते हुए पिछले चुनावों में मिलीं ४२ सीटों के मुकाबले इस बार सिर्फ एक सीट पर सिमट गई है। निर्दलीय उम्मीदवारों ने अच्छा प्रदर्शन करते हुए २७ सीटों पर कब्जा जमाया है। सूत्रों के अनुसार नवाज ने सरकार बनाने की कवायद में किसी बड़ी पार्टी को साथ न लेते हुए निर्दलीय उम्मीदवारों से बात करना शुरू भी कर दिया है। स्पष्ट है कि पीपीपी और पीटीआई का इसके बाद विपक्ष में बैठना तय है। हालांकि अंतिम नतीजे आना अभी बाकी हैं।

 

पाकिस्तानी प्रांतों की बात करें तो इनमें खैबर पख्तूनख्वा में पीटीआई बलूचिस्तान और पंजाब में पीएमएलएन और सिंध में पीपीपी ने सरकार बनाने लायक समर्थन हासिल कर लिया है। 

 

गौरतलब है कि पाकिस्तानी राजनीति के कई बड़े नामों को इस बार चुनाव में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। इनमें पूर्व पीएम राजा परवेज अशरफ और युसुफ रजा गिलानी का नाम सबसे ऊपर है। अशरफ को रावलपिंडी सीट पर हार का मुंह देखना पड़ा। शुरुआती नतीजों के मुताबिक पीएमएल (एनकैंडिडेट राजा मोहम्मद जावेद इखलास ने अशरफ को शिकस्त दी। 

 

पीपीपी के कुछ दूसरे बड़े नेता भी उलटफेर का शिकार बने है। इसमें सूचना मंत्री रह चुके कमर जमन कैरा और फिरदौस आशिक अवान के अलावा पंजाब प्रांत के पार्टी प्रेजिडेंट मंजूर अहमद वट्टू पूर्व केंद्रीय मंत्री नजर मुहम्मद गोंदल और तसलीम कुरैशी भी शामिल हैं। पूर्व विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी भी चुनाव हार गए हैं। उधर चुनावों में खुद को तुरुप का पत्ता बताकर प्रचारित करने वाले परवेज मुशर्रफ की पार्टी ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग ने यूं तो चुनावों का बहिष्कार किया था लेकिन कुछ उम्मीदवार फिर भी मैदान में थे जिनमें से सिर्फ दो ही को जीत हासिल हुई है।

 

चुनाव के नतीजों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने फोन पर नवाज को बधाई दी है। उधर इमरान खान ने कहा है कि वे मतदान के दौरान लोगों के बड़ी संख्या में वोट डाले जाने से खुश हैं लेकिन 'चुनाव धांधली' की रिपोटोर्ं से निराश हैं। उन्होंने बड़ी संख्या में मतदान करने के लिए महिलाओं की खास ताैर से तारीफ की। साथ ही इमरान ने चुनाव में धांधली के आरोपों पर एक श्वेत पत्र लाने का अनुरोध किया। पाकिस्तान के इन आम चुनावों की सबसे खास बात यह रही कि सभी बड़ी पार्टियों ने इन्हें पीपीपी के भ्रष्टाचार को केन्द्र में रखकर लड़ा। जबकि धार्मिक पार्टियों ने पाकिस्तान में अमेरिका की तरफ से हुए ड्रोन हमलों को चुनावी मुद्दा बनाया था। हालांकि तालिबान से बातचीत का शिगूफा छोड़कर इमरान ने कट्टर मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश की लेकिन उन्हें इसमें कोई खास सफलता नहीं मिली। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी भी पाकिस्तान के सत्ता परिवर्तन को लेकर लगातार निगरानी कर रहीं थीं। यूरोपीय संद्घ ने पाकिस्तान में चुनावों के लिए अपने ११० पर्यवेक्षक भेजे थे। इसके अलावा अमेरिका के नेशनल डेमोक्रेटिक इंस्टिच्यूट ने भी ५७ पर्यवेक्षकों को चुनाव की निरानी के लिए भेजा था। दरअसल अफगानिस्तान में नाटो सेना की मौजूदगी अगले साल उनकी वापसी और पूरे आतंकविरोधी अभियान में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय हमेशा से सतर्कता बरतता आया है।

 

वर्ष १९९९ में परवेज मुशर्रफ के तख्ता पलट के शिकार और परिवार सहित सऊदी अरब निवार्सित किए गए नवाज फीनिक्स पक्षी की तरह अपनी राख से एक बार फिर जीवित हुए हैं। नवाज तीसरी बार पाकिस्तान की सत्ता में लौटे हैं। लेकिन फिलहाल उनके सामने मुश्किलों का अंबार है। आतंकवाद अर्थव्यवस्था भ्रष्टाचार लचर प्रशासन सेना से रिश्ते और ऊर्जा संकट कुछ ऐसे मुद्दे होंगे जिनसे कुर्सी संभालते ही नवाज का सामना होगा। फिलहाल पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या उसकी अर्थव्यवस्था ही है जो कि दक्षिण एशियाई देशों में सबसे कमजोर है। नवाज एक उद्योगपति हैं और उनसे उम्मीद की जा रही है कि वे लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था के लिए जरदारी से बेहतर प्रबंधक साबित होंगे। लेकिन कयानी और मुशर्रफ से निपटना भी उनके लिए कम मुश्किलों भरा साबित नहीं होने वाला है।

 

भारत के लिए नई उम्मीद

नवाज का पाकिस्तान की सत्ता में वापस भारत के नजरिये से बेहतर मानी जा रही है। इस बार के चुनाव प्रचार में ऐसी कोई बात नहीं दिखी जिसे भारत विरोधी कहा जा सकता है। सभी मुख्य पार्टियां भारत से रिश्तों को बेहतर बनाने के हक में हैं। हालांकि कश्मीर मुद्दे का जिक्र तीनों ही अहम पार्टियों पीएमएल (एन पीपीपी और तहरीक-ए-इंसाफ के घोषणा पत्र में दिखाई देता है लेकिन फिर भी कश्मीर मुद्दा इन चुनावों से गायब ही रहा। पाक राजनीतिक जानकार मरियाना बाबर कहती हैं कि भारत अफगानिस्तान और अमेरिका के साथ पाकिस्तान की क्या नीति रहेगी इसका फैसला अक्सर पाकिस्तान सेना मुख्यालय में होता रहा है। नवाज शरीफ भारत से अच्छे रिश्तों के पैरोकार हैं और जब नवाज शरीफ दो बार प्रधानमंत्री रहे तो उन्होंने भारत से रिश्ते सुधारने की कोशिश की। आज पाकिस्तानी सेना का दुश्मन भारत नहीं है बल्कि दुश्मन देश के अंदर हैं यानी तालिबान और अल कायदा।

 

भारतीय जानकार भी मानते रहे हैं कि पाकिस्तान के साथ संबंध सुधरने के लिए वहां लोकतांत्रिक ताकतों का मजबूत होना बेहद जरूरी है। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर बताते हैं कि नवाज शरीफ भारत के साथ बेहतरी रिश्तों की बात करने वालों में नवाज शरीफ ही सबसे बुलंद आवाज हैं। उन्हीं के प्रधानमंत्री रहते फरवरी १९९९ में प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी बस से लाहौर गए थे। हालांकि वे शक जताते हुए कहते हैं कि नवाज शरीफ के विदेश मंत्री सरताज अजीज की आत्मकथा से बाद में हमें ये पता चला कि परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ के मंत्रिमंडल को भरोसा दिलाया था कि वे एक हफ्ते में श्रीनगर को हासिल कर लेंगे और इस पर नवाज शरीफ ने ही उन्हें आगे बढ़ने को कहा था और इसी के बाद कारिगल युद्ध हुआ। लेकिन सेना के साथ नवाज की जो तल्खी रही है वह पाकिस्तानी लोकतंत्रिक शक्तियों और भारत के पक्ष में दिखाई पड़ती हैं।

 

बहरहाल एक खास बात पर ध्यान देना जरूरी है कि तहरीके तालिबान पाकिस्तान के लोकतांत्रिक चुनावों के बहिष्कार और राजनीतिक रैलियों पर लगातार हमलों के बावजूद भी पाकिस्तान में ५० फीसदी से अधिक मतदान हुआ है। इसमें जनता ने लोकतंत्र की समर्थक पार्टियों को समर्थन दिया है। उम्मीद की जा रही है कि नवाज के सत्ता में आने के बाद कारोबारी संबंधों और कूटनीतिक बैठकों का एक नया और अपेक्षाकृत लचीला दौर शुरू होगा। लेकिन इन सब के बावजूद दोनों ही देशों की ओर से इस बातचीत को तवज्जो देना सबसे महत्वपूर्ण बात रहेगी। कारण कि भारत का रिकॉर्ड भी इस मामले में बहुत खुशनुमा ओर स्वच्छ नहीं है।

 

 
         
 
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