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vad 14 23-09-2017
 
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उपेक्षा
 
समस्याओं के तिरपन साल

 

सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण चीन की सीमा से सटे पिथौरागढ़ को जिला बने ५३ साल हो गए हैं। इस दौरान जनपदवासियों को मूलभूत सुविधाओं के नाम पर छला जाता रहा है। यहां के कई स्कूलों को भवन और शिक्षक नसीब नहीं हैं। अस्पतालों में डॉक्टर और दवाइयों का अभाव है। बिजली के खंभे और द्घर में बल्ब तो लटके हैं लेकिन कई इलाकों में लाइट न होने से वर्षों से बल्ब नहीं जले। आम लोग इन समस्याओं से त्रस्त हैं। आखिरकार उन्हें सड़कों पर उतरने को मजबूर होना पड़ा

 

आजकल पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय धरना और प्रदर्शनों से अटा पड़ा है। नागरिक संगठन बिजली कटौती के लिए धरना दे दिये तो छात्र शिक्षकों की निुयक्ति के लिए रैली निकाले गए एएनएम और आंगनबाड़ी कार्यकत्री अपनी मांगों के साथ हड़ताल पर गईं। महिलाएं महंगाई और गैस की कालाबाजारी से परेशान होकर सड़कों पर रहीं। लेकिन सरकार सत्ता के नशे में मस्त है। कभी किसी ने इनकी समस्याओं को दूर करने का प्रयास नहीं किया। हां चुनाव के समय वादे जरूर किए जाते हैं।

 

पिछले दिनों जिलाधिकारी कार्यालय एवं विकास भवन पर लोगों का हुजूम इकट्ठा था। ये सभी विरोध के लिए एकत्रित हुए थे। नागरिक संगठन क्षेत्र में बिजली कटौती से परेशान होकर धरने पर बैठने को मजबूर हुए। २८० मेगावाट की धौली गंगा जल विद्युत परियोजना जनपद में होने के बावजूद यहां के लोगों को इससे एक यूनिट बिजली भी नहीं मिलती। परीक्षा होती रही शहरी इलाकों में भी १०-१२ द्घंटे बिजली कटौती हो रही है। ग्रामीण इलाके के छात्र तो लालटेन और मोमबत्ती से ही परीक्षा बीता दिए इसीलिए पिछले दिनों कई संगठनों ने धौली गंगा से बिजली देने के लिए धरना-प्रदर्शन किया। कई लोगों का कहना है कि अलग राज्य या जिला बनने से आम लोगों को कोई लाभ नहीं मिला। धौली गंगा के अलावा भी जनपद में तीन अन्य परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। लेकिन इनसे भी लोगों को उम्मीद नहीं।

 

सन् १९६० में पिथौरागढ़ के अलग जनपद बनने का लोगों का सपना साकार तो हुआ लेकिन विकास की किरणें जिला मुख्यालय सहित दूरदराज के गांवों में नहीं पहुंच पाई। जब जिला बना तो लोगों को लगा कि नौनिहालों के भविष्य को पंख लगाने और ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की रोशनी पहुंचने में देर नहीं है। साथ ही यह आस भी जगी कि जनपद के गांव-गांव तक बेहतर सड़क बनेगी। पक्के रास्ते होंगे शिक्षा के केन्द्रों से बेरोजगारों की नहीं प्रतिभाशाली युवाओं की एक फौज तैयार होगी। पानी बिजली स्वास्थ्य की व्यवस्था गांव-गांव में सर्वसुलभ होगी। नगरों के साथ ही गांवों का सौन्दर्यीकरण भी होगा। लेकिन धीरे-धीरे ये सब जनपदवासियों के लिए मुंगेरी लाल के हसीन सपने साबित होते गये। 

 

जनपद के आठ विकास खंडों के १६३५ गांव पलायन की त्रासदी झेल रहे हैं। ४६०११ बेरोजगार काम की तलाश में रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत हैं। ४४१२९ परिवार गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने के लिए विवश हैं। ३२०३ स्वयं सेवी संस्थाएं भी ग्रास रूट पर अपना असर नहीं दिखा पाई हैं। जिले की यातायात व्यवस्था भी बुरी तरह से प्रभावित हुई है। जिले भर में १३ हजार से अधिक वाहन दौड़ रहे हैं लेकिन न तो सड़कों की स्थिति ठीक है न गाड़ियों की मेंटीनेंस को लेकर ध्यान दिया जा रहा है। जनपद में पार्किंग स्थलों के अभाव के चलते गाड़ियां सड़कों पर आड़ी-तिरछी खड़ी रहती हैं। टै्रफिक नियंत्रण के लिए जनपद भर में मात्र १९ जवान तैनात हैं। जनपद के ११९० प्राथमिक स्कूल २९६ माध्यमिक स्कूल ९६ हाईस्कूल ९६ इंटरमीडिएट स्कूल बच्चों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा दिला पाने में विफल रहे हैं। ये सभी स्कूल आधारभूत ढांचे और शिक्षकों की कमी झेल रहे हैं। आए दिन मंत्रियों एवं जिलाधिकारियों को सौंपे जा रहे ज्ञापन आंदोलन इस बात की तस्दीक करते हैं। राज्य परिवहन निगम के पास जनपद में ८४ बसों के बेड़े में से ११ बसें अपनी उम्र पूरी कर चुकी हैं। सीमांत क्षेत्रों से चलने वाली कई महत्वपूर्ण बसों का संचालन बंद कर दिया गया है। जनपद में आज भी कई गांव छिलका युग में जी रहे हैं। वर्ष २०११ में चंडाक में एक सब स्टेशन बना था जिसका उद्देश्य धौलीगंगा परियोजना की बिजली जनपदवासियों तक पहुंचाना था। लेकिन यह अभी भी सपना ही बना हुआ है।

 

जनपद की उच्च शिक्षा संविदा शिक्षकों के भरोसे टिन शेडों में चल रही है। चिकित्सकों के १०० से अधिक पद खाली पड़े हैं। जनपद के ५७ आयुर्वेदिक अस्पतालों में से अधिकतर में डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं। यहां तक कि आयुर्वेदिक विभाग का अपना भवन नहीं हैं। यही नहीं जनपद में खोली गई पांच पंचकर्म यूनिटें आज भी भवनहीन हैं। यहां रोगियों को भर्ती करने की सुविधा तक नहीं है। कुल मिलाकर जनपद स्वास्थ्य के मामले में पिछड़ा हुआ है। आठ से अधिक नदियों का यह उद्गम स्थल रेता-बजरी कारोबारियों के लिए भले ही भाग्यशाली साबित हुआ हो लेकिन आम आदमी को इसका लाभ नहीं के बराबर मिला है। इधर अस्कोट अभ्यारण्य के चलते १११ गांवों का विकास कई सालों से प्रभावित है। ७११० वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला यह जनपद हर मामले में पिछड़ रहा है। 

 

जिला मुख्यालय के विकास को देखें तो ११.१३ करोड़ रुपए नर्सिंग कॉलेज के लिए स्वीकृत होने की बात हो या फिर ५६ लाख की रई और २६ लाख की थरकोट झील की डीपीआर घाट पंपिंग योजना के पंप बदलने की बात हो या फिर ट्रामा सेंटर की मंजूरी के साथ ही स्पोर्ट्स कॉलेज की कक्षाएं संचालित होने की बात सब कुछ अभी तक हवा-हवाई ही है। घाट-आंवला पंपिंग योजना को जरूर मंजूरी मिली है लेकिन यह कब हकीकत में उतरेगी इस पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। जिला मुख्यालय के लिए १९७० में बनाई गई घाट लिफ्ट पंपिंग पेयजल योजना अब जवाब दे चुकी है इसके अलावा ठुलीगाड़ से वर्ष १९९८ में बनी योजना भी दम तोड़ रही है। २००६ में केन्द्र सरकार ने सीवेज लाइन बनाने की मंजूरी दी थी जिसके तहत जिला मुख्यालय में ५५ किमी लाईन बिछाई जानी थी। मात्र १४ किमी लाइन बिछाने के बाद इसे छोड़ दिया गया। वर्ष २००७ से पैसा न मिल पाने के चलते यह योजना भी अधूरी लटकी हुई है। 

 

स्थानीय निवासी और पत्रकार ललित जोशी कहते हैं विकास के नाम पर सिर्फ मकानों और गाड़ियों में इजाफा हुआ है। जहां नजर डालो अव्यवस्थाओं का आलम है। व्यवसायी भुवन चन्द्र पाण्डेय बताते हैं कि जनपद के पिछड़ने की एक बड़ी वजह राजनीति रही है दूसरा आम आदमी विकास के नाम पर जागरूक नहीं हो पाया है। विकास के लिए जरूरी है कि जनप्रतिनिधियों पर दबाव बनाया जाए। बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एडवोकेट मोहन चन्द्र भट्ट कहते हैं जिस गति से विकास होना चाहिए था नहीं हुआ। शिक्षा के दृष्टिकोण से भी जनपद पिछड़ा हुआ है। लेकिन इतिहासकार डॉ ़ मदन चन्द्र भट्ट का सोचना थोड़ा अलग है। वे कहते हैं कि जनपद का चहुंमुखी विकास हुआ है। यहां के लोग पढ़-लिख कर देश-विदेश में सेवाएं दे रहे हैं। शिक्षा के नए केन्द्र खुलने के बाद शिक्षा लेने वालों की संख्या बढ़ी है। आर्थिक रूप से समृद्धि हुए हैं लोग। छोटे-छोटे बाजार विकसित हुए हैं। राज्य आंदोलनकारी चिन्हीकरण संद्घर्ष समिति के अध्यक्ष राजेन्द्र भट्ट कहते हैं जनप्रतिनिधि विकास की प्लानिंग नहीं कर पा रहे हैं। कोई भी दल ऐसा नहीं है जो सही मायने में जनपद के विकास के लिए समर्पित है। छोटी-छोटी झीलें बनाकर टूरिस्टों को आकर्षित किया जा सकता है। जिला मुख्यालय में आड़े-तिरछे भवन निर्माण के बजाय शहर को सुनियोजित ढंग से विकसित किया जाना जरूरी है। 

 

उत्तराखंड क्रांति दल के जिलाध्यक्ष चन्द्रशेखर पुनेड़ा बताते हैं कि यह जनपद सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है लेकिन आज तक इसका समग्र विकास नहीं हो पाया। चीन ने लिपुलेख तक रेल पहुंचा दी है और हम सड़क तक नहीं पहुंचा पाए हैं। भाजपा नेता खुशाल सिंह पिलिया कहते हैं सुदूरवर्ती क्षेत्रों तक पांच दशक बाद भी सड़क नहीं पहुंच पाई है। सन् १९६२ में चीन युद्ध के बाद अवश्य विकास को लेकर सोचा गया लेकिन विकास फाइलों तक ही सिमटा रहा। कांगे्रसी नेता जगत सिंह खाती कहते हैं कि इन सालों में बहुत कुछ हुआ है। लोगों के जीवन स्तर में परिवर्तन आया है। लेकिन जो परिवर्तन आना चाहिए था वह नहीं आ पाया। इसके लिए जनप्रतिनिधियों और ब्यूरोक्रेट्स को अपनी जिम्मेदारियों का सही ढंग से निर्वहन करना होगा।

 

 

 
         
 
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