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vad 37 05-03-2017
 
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आवरण कथा
 
आस्था की आड़ में लूट

 

हरिद्वार में साधु-संत आस्था और अपने राजनीतिक रसूख की बदौलत सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे कर भव्य इमारतों का निर्माण कर रहे हैं। सरकार से लेकर राज्यपाल तक पहुंच होने के चलते शासन- प्रशासन में बैठे अआिँाकारी उनके खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं कर पाते। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए हरिद्वार के जिलाधिकारी ने पूर्व अखाड़ा परिषद के महामंत्री हरिगिरी के अवैध निर्माण के विरुद्ध कार्रवाई का साहस जुटाया तो उन पर तबादले की तलवार लटक गई। आस्था की आड़ में जारी इस जमीन की लूट को अब राजनीतिक रंग देने की कोशिशें होने लगी 

 

दशकों पहले धर्म की रक्षा के लिए अखाड़ों की स्थापना की गई थी। इन अखाड़ों से जुड़े साधु-संतों के प्रति जनता की बड़ी आस्था होती है। लेकिन आस्था की इस आड़ में ये साधु-संत सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे कर भव्य आश्रमों का निर्माण कर रहे हैं। कोई जिम्मेदार अधिकारी उन्हें रोकने या उनके खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत दिखाता है तो शासन में ऊंचे ओहदों पर बैठे लोग अधिकारियों को जनता की धार्मिक आस्था पर चोट न करने के लिए निर्देश दे देते हैं। इतना ही नहीं तबादले का डर दिखाकर उन्हें चुप करा दिया जाता है।

 

तीर्थ नगरी हरिद्वार में धार्मिक संस्थान और साधु-संत न सिर्फ जमीनों पर अवैध कब्जे और निर्माण करते रहे हैं, बल्कि इसके लिए वे फर्जी कागजात तैयार करने में भी नहीं चूकते। हरिद्वार कोतवाली में एक ऐसा ही मामला दर्ज हुआ। जिसमें पूर्व अखाड़ा परषिद के महामंत्री हरिगिरी के साथ ही एक कांग्रेसी नेता तोषकुमार और पत्रकार गोपाल रावत के खिलाफ फर्जी दस्तावेज तैयार कर बिरला द्घाट पर सिंचाई विभाग की भूमि हड़पने का और आरोप है।

 

उल्लेखनीय है कि वर्ष २०१० में कुंभ मेले के दौरान प्रशासन ने धार्मिक गतिविधियों के बेहतर संचालन की दृष्टि से अखाड़ों और धार्मिक संस्थाओं को मेला क्षेत्र में अस्थाई अखाड़े आवंटित किये थे। इन भूखण्डों पर वे अस्थाई शिविर तो लगा सकते थे, लेकिन पक्के निर्माण नहीं करवा सकते थे। यह व्यवस्था हरिद्वार ही नहीं बल्कि उज्जैन, नासिक और प्रयाग में भी है। २०१० के कुंभ में उत्तराखण्ड के शासन- प्रशासन ने बिरलाद्घाट के ललतारौ पुल के समीप तत्कालीन जूना अखाड़े के संत और अखड़ा परिषद के महामंत्री हरिगिरी को भी भूखण्ड आवंटित किया था। इसी स्थान पर कुंभ मेले के दैरान मची भगदड़ के चलते कई श्रद्धालुओं की मौते हुई भी थी।

 

कुंभ मेला के समापन के बाद मेला क्षेत्र में आवंटित इन भूखण्डों को खाली करवाया जाना था, लेकिन अखाड़ा परिषद के महामंत्री जैसे अति महत्वपूर्ण पद होने के चलते हरिगिरी ने न सिर्फ अपने अस्थाई भूखण्ड पर चार मंजिलों वाले भव्य आश्रम का निर्माण करवा डाला बल्कि अन्य स्थानों पर भी पक्के निर्माण करके भूमि को अपने कब्जे में कर लिया। अभी तक राजनीतिक और धार्मिक रसूख के चलते प्रशासन हरिगिरी के अवैध कब्जों को ध्वस्त करने का साहस तक नहीं कर पाया।

 

इसी बिरला द्घाट पर जहां हरिद्वार नगर क्षेत्र का बरसाती नाला भी बहता है, वहां सिंचाई विभाग की करोड़ों की भूमि पर हरिगिरी की नजर पड़ी। उत्तराखण्ड बनने के बाद से ही उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के बीच परिसंपतियों के मामलों में विवाद रहा है। यह भूमि उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के आधीन है। इस पर आज भी विवाद चल रहा है। इसी विवाद का फायदा उठाकर हरिगिरी ने अपने खास चहेते गोपाल रावत जो कि एक समाचार पत्र में पत्रकार भी है और पूर्व कांग्रेसी नेता पारस कुमार जैन के पुत्र तोषकुमार जैन के साथ मिल कर फर्जी कागजात तैयार करवा लिए इस भूमि को अपना बता कब्जे में ले लिया। बताया जाता है कि यह भूमि आज अरबों की है। इस पर भव्य अपार्टमेंट और आश्रम बनाये जाने की योजना थी।

 

हरिगिरी और उनके साथियों की यह कोशिश लगभग कामयाब हो चुकी थी, लेकिन आरटीआई कार्यकर्ता जेपी बडोनी को इसकी भनक लगी तो उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी जुटाई और मामले को संदिग्ध पाकर इसकी शिकायत हरिद्वार प्रशासन से की। प्रशासन ने इस पर जांच के लिये तहसीलदार को भेजा और जांच में प्रथम दृष्टया पाया गया कि भूमि सिंचाई विभाग की है जिसको फर्जी तरीके से हरिगिरी, गोपाल रावत और तोष कुमार जैन ने अपने नाम करने का षड्यंत्र किया है।

 

हरिद्वार तहसील के पटवारी ने इस शिकायत पर जांच की और कोतवाली में हरिगिरी तोष कुमार जैन और पत्रकार गोपाल रावत के खिलाफ धारा ४२० और १२० के तहत धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र रचने का मुकदमा दर्ज करवाया। मामला दर्ज हुए एक माह से भी अधिक का समय हो चुका है, लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है।

 

हरिद्वार के जिलाधिकारी सचिन कुर्वे ने इस मामले को संज्ञान में लेते हुये विरलाद्घाट के ललतारौ पुल के नीचे हरिगिरी के अवैध चार मंजिले भव्य आश्रम को ध्वस्त करने की कार्रवाई कर उक्त निर्माण को पूरी तरह धवस्त कर दिया। लेकिन सिंचाई विभाग की भूमि को हड़पने के मामले में हरिगिरी के राजनीतिक दबाब और रसूख के कारण अभी तक कोई कार्रवाई अमल में नहीं आ पायी है।

 

जिलाधिकारी की इस कार्रवाई को हरिगिरी ने पूरे संत समाज और हिन्दू धर्म पर प्रहार बताकर मामले को धार्मिक रंग देने को पूरा प्रयास किया जिसमें वह पूरी तरह सफल भी हो गया। जिलाधिकारी पर अवैध भवन को तोड़ते वक्त वहां मौजूद मंदिरों और मूर्तियों को क्षतिग्रस्त करने के आरोप लगाकर विवाद खड़ा किया गया। जबकि प्रशासन ने उक्त अवैध आश्रम में स्थापित सभी मूर्तियों को सुरक्षित रखा हुआ है। बावजूद इसके हरिगिरी और मीडया एवं कांग्रेस से जुड़े उनके चहेते नेताओं ने मामले को पूरा राजनीतिक रंग दे दिया। बताया जाता है कि डीएम हरिद्वार का स्थानांतरण तक कर दिये जाने की बात भी हो चुकी थी परंतु, मामले की गंभीरता को देख कर सरकार को अपने कदम पीछे हटाने पड़े।

 

हरिगिरी के राजनीतिक रसूख की बात करें तो चाहे भाजपा सरकार हो या वर्तमान बहुगुणा सरकार सभी में उनका रुतबा कायम है। सरकार हरिगिरी के मामले में जिस तरह से ढील दे रही है और पुलिस भी इस मामले में कोई कार्रवाई करने से हिचक रही है उससे यह भी साफ हो जाता है कि संतों और मठाधीशों के आगे प्रशासन के साथ-साथ सरकार भी पूरी तरह नतमस्तक हो चुकी है।

 

मेला क्षेत्र के कई स्थानों और सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे कर निर्माण करने वाले हरिगिरी के मामले में अब राजनीति पूरी तरह सामने आ चुकी है। स्वयं महामहिम राज्यपाल अजीज कुरैशी ने भी इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए कहीं न कहीं जिलाधिकारी हरिद्वार की न्यायोचित कार्रवाई को गलत ठहराया है। हरिगिरी ने अपने पूरे राजनीतिक रसूख से मामले को ठण्डे बस्ते में डालने के लिये दबाब बनाया जिसमें कुछ हद तक तो वह सफल भी हुए, लेकिन जब जिलाधिकारी हरिद्वार ने आश्रम को ध्वस्त करने की कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निणर्य को हवाला दिया तो हरिगिरी ने राज्यपाल से जिलाधिकारी द्वारा उनके आश्रम और मंदिर को तोड़ने की शिकायत की।

 

राज्यपाल ने उक्त स्थान पर स्वयं आकर वस्तुस्थिति को जानने के का निणर्य लिया। हरिगिरी ने इस अवसर को जिला प्रशासन पर दबाव बनाने का सुनहरा मौका पाया और ध्वस्त आश्रम में ही एक कार्यक्रम करने का आयोजन करने की योजना बनाई। हरिद्वार प्रशासन, एलआईयू और आईबी रिपोर्टों का हवाला देते हुये माहामहिम राज्यपाल को हरिगिरी ने कार्यक्रम में नहीं आने की सूचना और सलाह दी। लेकिन राज्यपाल ने इस कार्यक्रम में आना उचित समझा। राज्यपाल ने कार्यक्रम में आकर अपने बयान से साफ कर दिया कि हरिगिरी का कितना राजनीतिक रसूख है। रज्यपाल ने कहा कि मुझे प्रशासन ने हरिद्वार अपने से मना किया था, लेकिन मैं आया हूं।

 

राज्यपाल के हरिद्वार दौरे से हरिगिरी और उनके साथियों के हौसले बुलंद हैं। लगता नहीं कि हरिगिरी और उनके अन्य साथियों की कभी गिरफ्तारी हो पायेगी। मामले में जिस प्रकार से हरिद्वार पुलिस कार्रवाई से बच रही है उससे तो लगाता है कि जिलाधिकारी सचिन कुर्वे के सहासिक प्रयासों पर पूरी तरह पानी फिर सकता है। जबकि जिला प्रशासन हरिगिरी के साथ-साथ अन्य कई संतों को भी सरकारी जमीनों को खाली करवाने के नोटिस थमा चुका है। जिला प्रशासन की इस कार्यवाही से उन संत समाज और धार्मिक संस्थाओं में हड़कंप मचा हुआ है जो सरकारी जमीनों पर अवैध तरीके से कब्जा करके अपने आश्रमों का निर्माण कर चुके हैं। बताया जाता है कि जिलाधिकारी द्वारा हरिद्वार में सरकारी जमीनों पर किए गये अवैध कब्जों को हटाने के लिये पूरी तरह कमर कस चुके हैं और इसके लिये एक सूची तक बनाई गई है। निकाय चुनाव के बाद अब फिर कार्यवाही अमल में आ सकती है लेकिन जिस तरह से सरकार और राजनेता इस मामले में दबाब बनाने के लगे हुए हैं। उससे लगता है कि पूर्व की ही भांति इस बार भी जिला प्रशासन को पीछे हटना पड़ेगा।

 

 

 
         
 
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