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vad 37 05-03-2017
 
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प्रेरणा
 
जीने का अंदाज उमंग

 

  • रवि जोशी

 

कहते हैं कि दिल में कुछ खास करने का जज्बा हो तो सफलता खुद कदम चूमती है। उमंग ने इस सूत्र को व्यावहारिक धरातल पर सही सिद्ध किया है। वर्ष २००१ में महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए जैम-जैली अचार और ऊनी कपड़े जैसे उत्पादों के निर्माण और मार्केटिंग का जो अभियान इस संस्थान ने शुरू किया था वह अपने छोटे से सफर में इतनी बुलंदियों पर है कि आज इससे सैकड़ों महिलाओं को आर्थिक मजबूती मिल रही है। इतना ही नहीं उमंग एक ऐसी लिमिटेड कंपनी बन चुकी है जिसका टर्न ओवर करोड़ों में है

 

महिला सशक्तीकरण की तस्वीर महज वही नहीं है जो नगरों-महानगरों में नजर आती है और जिसे मीडिया हाईप मिलता है बल्कि दूर-दराज के गांवों-कस्बों में बहुत से ऐसे संस्थान और लोग हैं जो महिला उत्थान एवं बेहतर समाज के निर्माण में जुटे हुए हैं लेकिन प्रचार- प्रसार के अभाव में गुमनाम हैं। ऐसा ही एक संस्थान है उमंग। इस संस्थान ने अल्मोड़ा जिले में २००१ में मात्र ११ महिलाओं से अपने अभियान का आगाज किया था और आज उसके साथ हजारों महिलाएं जुड़ी हैं। इसने अब लिमिटेड कंपनी का दर्जा हासिल कर लिया है। जिसका करोड़ों का टर्न ओवर है। आज उमंग यहां के लोगों के जीने का अंदाज बन गया है।

 

देश की राजधानी दिल्ली में महिलाओं के बड़े-बड़े मोर्चे अक्सर सड़कों पर अपने हक की लड़ाई लड़ते नजर आ जाते हैं जिन्हें बहुत हो-हल्ले के साथ मीडिया में प्रस्तुत किया जाता है। इसके उलट उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिले के एक छोटे से गांव में कुछ महिलाओं के एक शांतिपूर्ण अभियान की शुरुआत आज विशाल रूप ले चुकी है। इस अनूठी शुरुआत ने आस-पास के कई गांवों की महिलाओं में आत्मविश्वास साहस और कुछ करने का जज्बा भर दिया है। इन महिलाओं ने अपने इस अभियान को नाम दिया है उमंग। यहां लोगों से बात करने पर खुद-ब-खुद एहसास हो जाता है कि वर्ष २००१ में हुई इस छोटी सी शुरुआत ने यहां की महिलाओं के जीवन में वाकई एक नई उमंग भर दी है।

 

उमंग के सफर के बारे में कंपनी की डायरेक्टर सुनीता कश्यप बताती हैं कि वर्ष २००१ में ११ लोगों ने इसकी शुरुआत की थी। इनके द्वारा तैयार किया जाने वाला पहला प्रोडक्ट ऊनी कपड़े और अचार था। लोगों ने इस काम को पसंद किया और तैयार किए गए प्रोडक्ट तुरंत ही अच्छे दामों पर बिके। इससे महिलाओं का हौसला बढ़ा और फिर साथ ही काम आगे बढ़ता गया। जैसे-जैसे काम ज्यादा हुआ तो और महिलाओं को भी इससे जोड़ना शुरू किया गया। ग्रामीण महिलाओं को पहले बुनाई आदि की ट्रेनिंग दी गई और फिर उन्हें काम देकर कुछ पैसे कमाने का मौका दिया गया। वर्ष २००१ से २००८ तक यह एक संगठन की तरह काम करता रहा। लेकिन अब तक उमंग इतना विस्तार ले चुका था कि इसे प्राइवेट लिमिटेड फर्म में तब्दील कर दिया गया। ९ जनवरी २००९ को यह संगठन महिला उमंग प्रोड्यूसर्स कंपनी लिमिटेड के नाम से रजिस्टर हुआ। पहले वर्ष (२००१) में कंपनी का टर्नओवर ४ लाख था जोकि २००८ में (कंपनी रजिस्टर होने के पहले वाले साल में) ३२ लाख तक पहुंच गया। पिछले वित्तीय वर्ष में इस कंपनी का टर्नओवर डेढ़ करोड़ तक पहुंच चुका है। 

 

उमंग अपनी कार्य प्रणाली के कारण ही दूसरी कंपनियों से अलग है। इसने प्रोडक्शन के प्रत्येक स्तर पर ग्रामीण महिलाओं को अपने साथ जोड़ा है। कंपनी की कार्यप्रणाली को दो हिस्सों में बांटकर आसानी से समझा जा सकता है। पहला हिस्सा है मार्केटिंग। मार्केटिंग के लिए आस-पास के पढ़े-लिखे लोगों को रखा गया है जो कि उमंग स्टोर एकाउंट्स आदि संभालते हैं। यह हिस्सा लगभग दूसरी कंपनियों जैसा ही है। दूसरा हिस्सा है प्रोडक्शन। इस कंपनी में तैयार किए गए उत्पाद पूरी तरह ग्रामीणों पर आश्रित हैं क्योंकि कच्चा माल तैयार करने से लेकर प्रोसेसिंग यूनिट फाइनल पैकिंग के काम में आस-पास के गांवों की महिलाएं ही कर रही हैं। 

 

वर्तमान में उमंग अपने प्रोडक्शन को चार भागों में बांटता है। इसमें पहला और सबसे महत्वपूर्ण बुनाई है इसके बाद हिमालयी खाद्य है तीसरे नंबर पर शहद और चौथे नंबर पर अचार जैम आदि शामिल हैं। इस संस्था से जुड़ी महिलाएं पहले ग्रामीण महिलाओं को बुनाई आदि का प्रशिक्षण देती हैं और इसके बाद उन्हें ऊन आदि देकर बुनाई कराती हैं। जिसके बदले में उन्हें पैसे दिये जाते हैं। अचार जैम आदि के लिए फल भी ग्रामीणों से ही खरीदे जाते हैं। ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूती देने के लिए ऐसे कई काम यह संस्था करती है।  

 

वर्तमान में इस कंपनी से २८०० महिला सदस्य जुड़ी हैं। इनमें से १२५४ महिलाएं कंपनी की शेयर होल्डर हैं। इस प्रकार कंपनी के सारे शेयर इन १२५४ महिलाओं में बराबर-बराबर बंटे हैं। बेहतर तरीके से सभी महिलाओं तक पहुंच बनाने के लिए सभी २८०० सदस्यों को २०० स्वयं सेवी समूहों में बांटा गया है। प्रत्येक समूह का एक प्रमुख होता है और वह अपने समूह की कार्यप्रणाली तय करता है। वर्ष के अंत में कंपनी को हुए लाभ का कुछ हिस्सा बोनस के रूप में इन सभी शेयर होल्डर महिलाओं में पहुंचाया जाता है। इसके अलावा प्रत्येक स्वयं सहायता समूह अपनी सदस्यों को बचत के लिए प्रोत्साहित भी करता है। सदस्यों को एक पास बुक दी गई है जिनमें प्रतिमाह बचत की राशि अंकित रहती है जिसे ये महिलाएं जरूरत पड़ने पर कभी भी ले सकती हैं। इसके अलावा सामान्य सदस्य के रूप में जुड़ी अन्य १११५ महिलाएं उमंग के दूसरे कार्यों में अपना श्रमदान करती हैं। उमंग के अन्य सामाजिक कार्यों में जंगल बनाए रखना पानी के स्रोतों को दोबारा से रीचार्ज करना और महिलाओं को उनके हक की लड़ाई में मजबूती देना शामिल है। 

 

इस तरह पिछले १३ सालों से उमंग व्यापार के साथ-साथ महिलाओं को सशक्त करने का काम कर रहा है। आज डेढ़ करोड़ के टर्न ओवर के साथ इस कंपनी के करीब ८० विभिन्न उत्पाद बाजार में हैं। पहले सिर्फ उत्तराखण्ड तक सीमित इनका बाजार आज टूरिस्टों को भी अपनी ओर आकर्षित कर चुका है। इसका प्रमाण कंपनी का बढ़ता टर्नओवर है। उत्तराखण्ड के कई बड़े होटल्स नैनी गांव स्थित उमंग का शोरूम और दिल्ली हाट में लगने वाला वार्षिक एक्जीबीशन उत्तराखण्ड के छोट-छोटे से गांवों से निकली महिलाओं की मेहनत को देश-विदेश तक पहुंचाने का जरिया हैं। महत्वपूर्ण है कि अपने १३ साल के सफर में महिला सशक्तीकरण के लिए लगातार काम कर रही इस संस्था ने न तो कोई सरकारी सहायता प्राप्त की है और न ही वह ऐसी कोई सहायता भविष्य में चाहती है।

 

 

हम उमंग को पूरे प्रदेश में फैलाना चाहते हैं

कंपनी की एमडी सुनीता कश्यम से बातचीत

उमंग क्या है और इसकी प्रेरणा कहां से मिली। 

उमंग यहां की महिलाओं के जीने का अंदाज है। हम कल्याण पॉल सर के एनजीओ ग्रासरूट के साथ काम कर रहे थे। अचानक कुछ महिलाओं ने अलग और नया करने की सोची। हमने अपना आइडिया पॉल सर को बताया। उन्होंने हमारी मदद की और यहीं से उमंग का सफर शुरू हुआ। 

 

उमंग के अब तक के सफर को आप कैसे देखती हैं?

शुरुआत सिर्फ ११ महिलाओं से हुई थी। हमने सबसे पहले करीब एक क्विंटल आम का अचार तैयार किया था। उसे अच्छे दामों में बेचने में हम सफल हुए। यहां से शुरू होकर अब हम डेढ़ करोड़ के टर्न ओवर वाली कंपनी बन गए। 

 

आपके यहां कौन-कौन से उत्पाद हैं और सबसे ज्यादा किस उत्पाद की खपत है?

सबसे ज्यादा खपत ऊनी कपड़ों की है। टूरिस्ट हाथ से बनाए इन कपड़ों को बहुत ज्यादा पसंद करते हैं। हिमालयी खाद्य शहद और पहाड़ी फलों से बनाई गई जैम जेली और अचार हमारे अन्य उत्पाद हैं। 

 

भविष्य की योजनाएं क्या हैं। 

मैं उत्तराखण्ड के प्रत्येक गांव की महिलाओं तक इस उमंग को पहुंचाना चाहती हूं। व्यापार उमंग का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे हम और बढ़ाना चाहते हैं। 

उमंग के उत्पादों का बाजार कहां है। 

नैनी गांव स्थित शोरूम हमारा सबसे बड़ा शोरूम है। इसके अलावा हमारे प्रोडक्ट उत्तराखण्ड के बड़े होटल्स से भी खरीद सकत हैं। हम वैन में ले जाकर इन उत्पादों को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश भी करते हैं। प्रदेश से बाहर दिल्ली हाट में मनाए जाने वाले हस्तशिल्प सप्ताह में हमें अपने उत्पादों के प्रदर्शन का मौका मिलता है। 

 

आत्मनिर्भर होती महिलाएं

ग्रामीण महिलाओं में उमंग ने आत्मविश्वास भरा है जो उनसे बात करने पर साफ दिखाई देता है। नैनी गांव में रह रहीं पार्वती देवी और उनकी बहू उमंग की शेयर होल्डर हैं। पार्वती देवी कहती हैं कि खाली समय में काम करते हैं इससे मन तो लगा रहता है साथ ही कुछ पैसे भी मिल जाते हैं। अपने खेत में लगे स्ट्रॉबेरी और अखरोट के पौधे दिखाते हुए पार्वती बड़े उत्साह से कहती हैं कि ये पौधे उन्होंने उमंग से खरीदे हैं पिछले साल उन्होंने गांव में स्ट्रॉबेरी लगवाई थी लेकिन इस बार यह सिर्फ उनके खेत में ही हुई है। 

 

इसी गांव की सरस्वती और उनकी अध्यापिका बहू भी उमंग के लिए बुनाई का काम करती हैं। सरस्वती ने बताया कि उम्र ज्यादा होने के कारण वह महीने में एक-दो स्वेटर ही बुन पाती हैं लेकिन उनकी बहू ज्यादा बेहतर काम करती है। टीचिंग के साथ-साथ वह उमंग में भी सक्रिय है। उन्होंने कहा कि इस उम्र में भी मैं कुछ करके पैसे कमा रही हूं तो यह बहुत अच्छा लगता है। पैसे भले ही थोड़ा मिलते हों लेकिन इस उम्र में भी कुछ करते रहना अच्छा है। 

 

मझोली गांव के जयप्रकाश पेशे से व्यापारी हैं। वे इस संस्था के बारे में बताते हैं कि यह बहुत अच्छा काम कर रही है। गांव की महिलाएं आत्मनिर्भर हो रही हैं। इस तरह के काम से जुड़ने के बाद वह समाज में ज्यादा सम्मान की हकदार बनी हैं और पुरुषों के साथ खड़ी दिखाई देती हैं। 

एक अन्य गांव के कृष्णा अधिकारी जो कि बीए के छात्र हैं उमंग के काम की प्रशंसा करते हैं। वे कहते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं हैं कि उमंग से जुड़ने के बाद गांव की महिलाओं में आत्मविश्वास आया है। 

 

 

 

 
         
 
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