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vad 50 02-06-2018
 
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चिंतन
 
पहला पाठ

  • हरीश रावत

पूर्व मुख्यमंत्री] उत्तराखण्ड

पहली बैठक में ही मैं समझ गया कि सदस्यों का विश्वास जीतना है तो] उनके सुझावों एवं पत्रों की कद्र करनी है। मैंने सक्रिय सार्वजनिक जीवन विशेषतः प्रत्येक सार्वजनिक पद पर आने के बाद] श्री हीराबल्लभ सती खनोलिया की सीख का अक्षरशः पालन किया। मैंने निर्वाचित जनप्रतिनिधि के रूप में पहली क्लास में पढ़े हुए पाठ के रूप में हमेशा याद रखा कि जनता के सवालों को हमेशा नोट करो। लोगों के दिए पत्रों को सहेज कर रखो और उन पर संस्तुति पत्र लगाकर संबंधित विभागों को भेजो। संस्तुति पत्र की प्रति संबंधित व्यक्ति को भी भेजो। मैं प्रत्येक दिन भ्रमण के दौरान कहीं भी रात गुजारता था तो दिन भर के पत्रों पर एक नजर जरूर डालता था और सुबह कक्ष को अच्छी तरह देख लेता था कि कोई कागज छूट तो नहीं गया। मुझे काम न होने के लिए जरूर बहुत सारे लोगों ने टोका] परंतु उनके पत्र पर मैंने कुछ नहीं किया] इसकी शिकायत किसी ने नहीं की। आज भी अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र के हजारों लोगों की जेबों या ?kj में मेरे पत्रों की प्रतियां मिल जाएंगी। धन्य हो सती जी आपका सिखाया पहला पाठ सार्वजनिक जीवन में मेरे बड़े काम आया

 

जनप्रतिनिधित्व का पहला पाठ मुझे ब्लॉक प्रमुख बनते ही पढ़ना पड़ा। यूं मेरा प्रमुख बनना ही दुर्द्घटना थी। हमारी दो गांवों की ग्रामसभा है] लोगों ने सर्वसम्मत तय किया कि श्री नाथू सिंह जी (नत्थू का) ग्राम प्रधान होंगे] उन्होंने शर्त रखी कि मेरे उपप्रधान बनने की हालत में ही वे प्रधान बनेंगे। मैं अभी-अभी लखनऊ से एलएलबी प्रथम वर्ष का इम्तिहान देकर गांव आया था। ?kj की हालात देखकर नौकरी का जुगाड़ देख रहा था। नत्थू का के जोर देने पर हम दोनों चाचा भतीजे] एक और चाचा मोहन का के साथ भिकियासैंण ब्लॉक चल पड़े। पहले रामगंगा में नहाया फिर बीडीओ साहब के कार्यालय में प्रधानी का फॉर्म लेने पहुंच गए।

वीडीओ साहब के साथ क्षेत्र के कुछ बहुत संभ्रांत लोग बैठे थे। उनमें एक व्यक्ति जिन्हें मैं बाद में पहचान पाया] श्री मोती राम रिखाड़ी जी प्रधानाचार्य थे। श्री रिखाड़ी जी ने मुझे देखकर कहा कि क्या ब्लॉक प्रमुख का फॉर्म लेने आए हो] मैं उस समय २२ वर्ष का था। मैंने यूं ही हां कह दिया। मेरा नाम] गांव एवं पिता का नाम पूछा गया। इल्कट्रोरौल में मेरे नाम के आगे ३० वर्ष उम्र देखकर बीडीओ ने मुझसे पूछा कि कितनी उम्र है। जब तक मैं कुछ बताता] मेरे साथ गए मोहन चाचा ने कहा पर्चा काटो और ये पैसे लो। उनकी बात पर सब लोग हंसने लगे। एक-दो लोगों ने कहा ब्लॉक प्रमुख क्या होता है। कुछ जानते भी हो] हंसी-हंसी में प्रमुखी का पर्चा कट गया] गए थे प्रधानी एवं उपप्रधानी के लिए] प्रमुखी का पर्चा गले पड़ गया। खेल-खेल में बड़े पचड़े में फंस गया और ऐसा फंसा कि सारी जीवनधारा बदल गई।

नत्थू चाचा तो निर्विरोध प्रधान बन गए] मैं उपप्रधान। प्रमुखी के पर्चे का क्या करें] कुछ समझ में नहीं आ रहा था। चौनलियां को इंटर बनाओ के साथ जुड़े हुए हम कुछ लोग बैठे। मोहन थोकदार] जगत दा] दुर्गा सिंह] जीवन सिंह] पीताम्बर पाण्डे जी] आनंद असवाल] रामलाल नेता जी आदि ने तय किया कि इलाके के बड़े लोगों प्रेम सिंह रौतेला जी] ख्याली राम जी] नरदेव जी] खीम सिंह जी] जगत सिंह जी] चामू सिंह जी] चंद्र सिंह जी] कुंवर सिंह जी से बात की जाए। मोहन सिंह थोकदार को यह काम सौंपा गया। प्रेम सिंह रौतेला जी] जिला पंचायत के सदस्य एवं कुंवर सिंह जी कनिष्ठ प्रमुख रह चुके थे। इन्हें इलाके के लोग जानते थे] पहले इनसे मिले। जब बनना होता है] हालात खुद ब खुद बनने लगते हैं। ककलासौं की दोनों पट्टियों के प्रधान हमारे साथ जुटते गए। फिर हमने नया एवं दौरा पट्टियों के प्रधानों से भी संपर्क साधना प्रारंभ किया। प्रधानों से वोट मांगते हुए हम गांव के लोगों से भी संपर्क करते थे। धीरे-धीरे मेरे पक्ष में हवा बनने लगी। हमारा प्रधानों से एक ही आग्रह होता था कि यदि पहली पसंद न सही] आप हमें अपनी आखरी पसंद के रूप में मेरे नाम के आगे ३ का अंक लिख दीजिएगा। बहुत सारे लोग हमसे वचनवद्ध हो गए। खेल-खेल में बात आगे बढ़ती गई। 

मैंने जिन लोगों के विरुद्ध नामांकन किया] उनमें निवर्तमान प्रमुख श्री जय दत्त वैला एडवोकेट] मूर्धन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं प्रदेश कांग्रेस के नेता थे। लोगों में उनका बड़ा सम्मान था। श्री हरीश लक्चौरा जी एक धनाड्य वकील थे] उनका व्यापक संपर्क था। दोनों सारे क्षेत्र में सुपरिचित नाम थे। मुझसे उनका व्यक्तित्व बहुत बड़ा था। मगर होनी को कुछ और मंजूर था। मैं बड़े अंतर से ब्लॉक प्रमुख बन गया। ओवर नाईट सारे जिले एवं मंडल में चर्चित हो गया। उस समय मेरी उम्र में प्रमुख बनना कुछ अनहोना सा था। लोग दूर-दूर से यह देखने आते थी कि भिकियासैंण का ब्लॉक प्रमुख कौन सा अजूबा बन गया। मेरे दाेस्त और इलाके वाले बहुत खुश थे। मैं उत्सुकता का केंद्र था। मैं प्रमुख तो बन गया] परंतु मुझे वोट देने वाले भी तय नहीं कर पा रहे थे कि अच्छा किया या गलती की। 

मैंने प्रमुख बनते ही तीन दिन लगाए] ब्लॉक की कार्यप्रणाली और कार्यक्षेत्र को समझने में। फिर मैं अपने साथियों के साथ धन्यवाद देने सारे ब्लॉक में निकल पड़ा। उस समय ऐसा करना कुछ असामान्य सा था। मैं जिस गांव में जाता था] कुछ उम्र के कौतूहल के कारण] कुछ गांवों में आने वाला पहला प्रमुख होने के कारण लोग अच्छी संख्या में जुड़ जाते थे। मैंने उन्हीं लोगों को अपना टीचर मानकर उनसे गांव] खेती] पशुधन] क्षेत्र की समस्याओं की जानकारी ली। फिर दिन आया प्रमुख के रूप में पहली बीडीसी बैठक का। मन में बड़ा डर था] बैठक की कार्यवाही के प्रारंभ में ही मैंने धन्यवाद भाषण देने की इच्छा जाहिर की। कुछ वरिष्ठ मगर वाचाल प्रधानों ने कुछ कहना चाहा] मगर मैंने अपना धन्यवाद भाषण प्रारंभ कर दिया। कौतूहल के कारण बैठक में (पिन ड्रॉप साईलेन्स) पूर्ण चुप्पी छा गई। मैंने धन्यवाद की कुछ लाइनों के बाद धीरे-धीरे ब्लॉक के हर क्षेत्र की समस्याएं] गांवों के नाम एवं प्रधानों का संदर्भ देना प्रारंभ कर दिया। मेरा मंत्र काम कर गया। जिस व्यक्ति को प्रमुख बने अभी दो सप्ताह ही हुआ था। उसके मुंह से समस्याओं का ब्यौरा एवं नामों की फेहरिस्त सुनना लोगों को अच्छा लगा। जिन्हें अच्छा नहीं भी लग रहा था] उनका कौतूहल उन्हें मेरे साथ बांध चुका था। 

जब तक मैं बोलता रहा] सब सामान्य रहा। एसडीएम भी बैठक में थे। उन दिनों भिकियासैंण ब्लॉक रानीखेत तहसील का हिस्सा था। रानीखेत में आईएएस एसडीएम होता था। यह परंपरा अब बदली है। बीडीओ] एडीओ और कुछ विभागों के अधिकारी भी बैठक में उपस्थित थे। मैंने बीडीओ से सबका परिचय करवाने और प्रधानों से अपना परिचय देने का आग्रह किया। अधिकारियों का परिचय समाप्त होते ही] ज्येष्ठ ब्लॉक प्रमुख शम्भू सिंह जी उठे और उन्होंने अपना परिचय देते हुए मुझे अभिमुन्य की संज्ञा दी और इशारा किया कि मेरी ज्यादा दिनों तक खैर नहीं है। उन्होंने मेरी उम्र का संकेत कर मुझे जता दिया कि आगे क्या होने वाला है। इस बैठक के दस दिन बाद उनके संकेत का रहस्य सामने आया। श्री हरीश लक्चौरा जी दूसरे नंबर पर थे] चुनाव में उन्होंने मेरी उम्र को लेकर सिविल जज नैनीताल की अदालत में चुनाव याचिका दायर कर दी थी। श्री शम्भू सिंह जी के लंबे उपदेशात्मक भाषण के बाद उतने ही खगाड़ प्रधान शिव सिंह बिष्ट खड़े हुए। उन्होंने अपने भाषण में मुझे जता दिया कि अभी मैं बच्चा हूं। बाड़खड़ी] अ आ] क ख रटने एवं उन्हें सुनाकर आप एक दिन तो निकाल सकते हो] जब तक कुछ करके नहीं दिखाओगे खैरियत नहीं है। यही था उनके भाषण का लब्बे-लुबाव। मैंने भी जोर-जोर से सर हिलाकर उन्हें जता दिया कि मैं उनका संकेत अच्छी तरह समझ चुका हूं। उनके बाद श्री नर सिंह जी उठे] उन्होंने अपने परिचय के साथ शुभकामना दी और सहयोग का भरोसा दिया। मैं थोड़ा सहज हुआ ही था कि खनोलिया के प्रधान हीराबल्लभ सती जी उठे] उन्होंने कई ठहाकेदार बातों से सभी को खूब हंसाया और हंसी-हंसी में मुझे समझाया कि अभी बच्चे हो] कॉलेज की राजनीति अलग है] यहां लड़कपन नहीं चलेगा और यह कहते- कहते सती जी ने अपनी जेब से कागजों का एक पुलिंदा निकाला और कहा कि इस सिस्टम में हमें काम का भरोसा नहीं है। आप यदि मेरे इन कागजों को चूहों के काटने से बचाकर रखोगे तो यही बड़ी बात है। वैसे मैं समय-समय पर आपसे अपने कागजों का ब्यौरा मांगता रहूंगा। करीब एक दर्जन लोगों ने अपने परिचय के साथ कुछ न कुछ कहा] शेष ने सिर्फ अपना परिचय दिया। बीडीओ ने कुछ एजेंडा पेपर रखे] विभागों के उपस्थित अधिकारियों ने उनके विभाग द्वारा ब्लॉक में चलाए जा रहे कार्य बताए। एसडीएम का भी मार्गदर्शन भाषण हुआ। मैंने सभी सदस्यों को पुनः धन्यवाद दिया और सभी की अर्जियों को चूहों से बचाए रखने का वादा किया। 

इस पहली बीडीसी के एक माह बाद मैं एक रोज ब्लॉक में बैठा हुआ था] सती जी आ धमके] अपनी टोपी उतार कर मेरी मेज पर रखी और सर खुजलाते हुए कहा] प्रमुख साहब जो कागज मैंने आपको दिए थे] उन्हें मंगवाएं। उनमें एक अर्जी जिलाधिकारी के नाम पर थी। गलती से वह शेष कागजों के साथ आपको दे दी। मुझे बड़ी हंसी आई] मैंने हंसते हुए कहा कि पंडित जी आप यह देखना चाहते हैं कि मैंने आपके कागजों को चूहों से बचाया या नहीं। मैंने उनके गांव की फाइल मंगाई तो] उन्हें आश्चर्य हुआ कि मैंने उनके गांव की अलग फाईल बनाई है। जब उन्हें पता चला कि अब प्रमुख की अलमारी में सभी प्रधानों और ग्रामसभाओं की अलग फाइलें बन गई हैं तो] बड़े खुश हुए। जब उन्होंने देखा उनके दिए सभी पत्रों पर डीओ लगाकर सभी विभागों को चले गए हैं और उनकी प्रति उनको भी पोस्ट हुई हैं और कॉपी फाईल में हैं] तो उन्होंने खुश होकर मुझे आशीर्वाद दिया और कहा कि आगे भी हमारे ब्लॉक प्रमुख बने रहोगे। शायद उन्हें अंदाज नहीं था कि मैं तो प्रमुख भी कुछ ही महीने रहने वाला हूं। 

पहली बैठक में ही मैं समझ गया कि सदस्यों का विश्वास जीतना है तो] उनके सुझावों एवं पत्रों की कद्र करनी है। मैंने सक्रिय सार्वजनिक जीवन विशेषतः प्रत्येक सार्वजनिक पद पर आने के बाद] श्री हीराबल्लभ सती खनोलिया की सीख का अक्षरशः पालन किया। मैंने निर्वाचित जनप्रतिनिधि के रूप में पहली क्लास में पढ़े हुए पाठ के रूप में हमेशा याद रखा कि जनता के सवालों को हमेशा नोट करो। लोगों के दिए पत्रों को सहेज कर रखो और उन पर संस्तुति पत्र लगाकर संबंधित विभागों को भेजो। संस्तुति पत्र की प्रति संबंधित व्यक्ति को भी भेजो। मैं प्रत्येक दिन भ्रमण के दौरान कहीं भी रात गुजारता था तो दिन भर के पत्रों पर एक नजर जरूर डालता था और सुबह कक्ष को अच्छी तरह देख लेता था कि कोई कागज छूट तो नहीं गया। मुझे काम न होने के लिए जरूर बहुत सारे लोगों ने टोका] परंतु उनके पत्र पर मैंने कुछ नहीं किया] इसकी शिकायत किसी ने नहीं की। आज भी अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र के हजारों लोगों की जेबों या
?kj में मेरे पत्रों की प्रतियां मिल जाएंगी। धन्य हो सती जी आपका सिखाया पहला पाठ सार्वजनिक जीवन में मेरे बड़े काम आया। 

 
         
 
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