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vad 50 02-06-2018
 
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देश
 
दलित प्रेम का जाल
  • प्रेम भारद्वाज

सच तो यह है कि आजादी के बाद से ही देश के दलितों को अपना सही रहनुमा आज तक नहीं मिला। बाबू जगजीवनराम से लेकर मायावती&रामविलास पासवान तक सबका यही हाल है। सबने दलितों पर दया ही की जो एक सामंती भाव है। उन्हें सिर्फ वोट बैंक ही समझा गया। तमाम राजनीतिक पार्टियों ने उन्हें सपने दिखाकर उनकी बदौलत सत्ता की सवारी की। दलित कभी इधर तो कभी उधर भटकते रहे। इन दिनों एक बार फिर से उन पर दया दिखाने का एक अभियान चलाया जा रहा है।

दया करना ^राजा^ का काम है] या सामर्थ्यवान लोगों का। भारतीय जनता पार्टी ने फरमान जारी किया है कि उनके मंत्री&मुख्यमंत्री] नेता दलितों के ?kj जाकर उनके साथ बैठकर खाना खाएं। यह समय के पहिये को उल्टी दिशा में द्घुमाने जैसा है। राम ने भी शबरी जो भिलनी थी उसके जूठे बेर खाए थे। अब कलयुग के २०वीं शताब्दी में दलितों के साथ पंक्ति में आलथी &पालथी बैठकर खाने से ^राम^ होने का भाव दलितों के पक्ष में नहीं जा सकता।

आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा बहुत गंभीर है। एक लंबे समय से भाजपा को एक बड़े दलित चेहरे की जरूरत है। तमाम कोशिशों के बावजूद वह दलितों का कोई नेता नहीं बना पाया। राष्ट्रीय स्तर पर एकमात्र पहचान बनाने वाले बंगारू लक्ष्मण की स्टिंग ऑपरेशन में बड़ी फजीहत हुई। भाजपा के पास दलित नेता नहीं है] मगर उसे दलित वोट चाहिए। इसलिए अब वह दलितों के ?kj जाकर उनके साथ खाना खा रही है। इसे दलितों को सम्मान और आत्मीय मानना बताया जा रहा है। अगर यह भाजपा नेताओं या किसी के भी भीतर स्वतःस्फूर्त होता तो वह दूसरी बात थी। लेकिन इस अपनेपन और सम्मान के जारिए सियासत करना ठीक नहीं। सवाल उठता है कि आखिर भाजपा के भीतर दलित प्रेम क्यों प्रकट हुआ। इसके मूल में जाएं तो समझ में यह आता है कि भाजपा की जो छवि बन या बना दी गई है यह दलित &मुस्लिम विरोधी की है। दलित सिर्फ सांप्रदायिकता यानी हिंदू मुस्लिम के मुद्दे पर ही मुसलमान के खिलाफ जाते हुए। बेमन से ही सही भाजपा के साथ होते हैं। 

भाजपा के वरिष्ठ नेता भी इस बात को स्वीकारने लगे हैं कि देश भर में द्घटी कुछ द्घटनाओं और विरोधियों के प्रचार से दलित को लेकर जो पार्टी की छवि बना रही] वो पार्टी के लिए चिंता की बात है। उससे पार्टी की इमेज डैमेज हुई है। उसी डैमेज कंट्रोल के तहत दलित ?kjksa में भाजपा नेता भ्रमण कर रहे हैं।

मामला सिर्फ भाजपा का ही नहीं है। देश में आजादी के बाद जो भी पार्टी सत्ता में आई उसने दलितों के साथ ईमानदारी से कुछ नहीं किया। सिर्फ उनके आगे सपनों वादों के कुछ चारे फेंके। और उनकी वोटों का शिकार किया। किसी भी पार्टी के शासन में दलितों की हालत नहीं बदली। दो राय नहीं कि राजनीति और 

राजनेताओं के दलित प्रेम की बुनियाद ही दलितों के वोट बैंक पर टिकी है। यही दलितों का सबसे बड़ा दुःख भी है। जिसमें कोई भी दल उनको निजात नहीं दिला सका। यहां तक कि खुद दलित  नेता भी नहीं। दलित नेता मायावती ने उत्तर प्रदेश में काफी समय तक शासन किया। उनके शासनकाल में दलितों का मनोबल थोड़ा जरूर बढ़ा। लेकिन उनकी दशा नहीं बदली। राम विलास पासवान भी अक्सर केंद्र के मंत्री रहे मगर वह भी दलितों के पक्ष में बयान देने से ज्यादा कुछ नहीं कर सके। दलित नेता जो सत्ता में पहुंचे] उनकी क्लास बदल गई। नव ब्राह्मण के शिकार हो गए। मायावती &पासवान का आचरण भी अपने दलितों लोगों के प्रति ब्राह्मणों जैसे ही हो गया।

देश में हर १५ मिनट में किसी न किसी दलित के खिलाफ अपराध की ?kVuk,a होती हैं। हर दिन ६ दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है। वर्ष २००७ से लेकर २०१७ के दरम्यान दस सालों में दलित उत्पीड़न की द्घटनाओं में ६६ प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गयी। वर्ष २००७ से २०१२ तक रहे मायावती के चौथे कार्यकाल में पूरे देश में दलितों के उत्पीड़न की सबसे ज्यादा ?kVuk,a उत्तर प्रदेश में ?kfVr हुई। इन पांच सालों में इस प्रदेश में हर वर्ष ७१०० से ज्यादा दलित हिंसा की वारदातें हुई। अखिलेश शासन के दौरान भी २०१५ में ८३५८ दलित हिंसा की ?kVuk,a ?kfVr हुई। यह अलग तस्वीर खुद को दलितों का मसीहा कहने वाले दलों के शासनकाल की है।

दलित इस बात को बखूबी जानते हैं कि उनका सच्चा हमदर्द कोई नहीं है। पिछले कई दशकों से वह एक के बाद एक दलों को अपना ही रहे हैं। किसी ने उनको वोट बैंक से ज्यादा नहीं समझा। क्या कांग्रेस] क्या भाजपा] क्या सपा&बसपा] लोजपा सबने उनके वोटों की सवारी की और सिंहासन तक पहुंचे। अब वे थोड़ा ठहरकर सोचने&समझने के मूड में हैं। वे भाजपा के दलितों के ?kj भोजन अभियान के पीछे का सच समझ रहे हैं। भाजपा दलितों पर राजनीतिक जाल बिछा रही है। दलित पहले कांग्रेस समेत कई दलों के जाल में फंस चुके हैं। वे भाजपा के जाल में फंसते हैं या कोई दूसरा रास्ता अख्तियार करते हैं] यह देखने वाली बात होगी।

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,क्या उत्तराखंड में ऐसी कोई सरकार आयेगी जो जंगलों को जलने से रोक सके

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  • गुंजन कुमार

देश में पुलिस सुधार की जरूरत लंबे समय से महसूस की जाती रही है। इस संबंध में सर्वोच्च अदालत के निर्देशों और आयोगों की सिफारिशों पर अब तक की सरकारें

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