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खास खबर 
 
मुनार की अनसुनी बात

  • गुंजन कुमार@दीपक जोशी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात कार्यक्रम में बागेश्वर जिले के सीमांत मुनार गांव का जिक्र किया तो प्रदेश सरकार के भी कान खड़े हो गए। तब सहकारिता की अनूठी मिसाल पेश कर बिस्किट फैक्ट्री चला रही ग्रामीण महिलाओं के श्रम को सम्मान देने का ख्याल त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार को आया। तत्काल महिला स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष तारा ताकुली को देहरादून बुलाकर शॉल एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। सरकार ने उन्हें सम्मानित कर अपने कर्तव्य की इतिश्री तो कर ली] लेकिन अब उसे मुनार के मन की बात सुननी बाकी है। उसे देखना होगा कि ग्रामीण महिलाओं ने अपनी मेहनत और la?k"kZ के बूते स्वरोजगार के लिए जो बिस्किट फैक्ट्री स्थापित की है] वह किस कदर हिचकोले खा रही है

हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ^मन की बात^ कार्यक्रम में राष्ट्र को संबोधित करते हुए बागेश्वर जिले की कपकोट तहसील के दूरस्थ गांव मुनार का जिक्र किया। उन्होंने कहा] ^मुनार गांव की महिलाओं ने अपने संगठित प्रयासों से बिस्किट बनाने का काम शुरू किया है। एक फैक्ट्री मुनार में खोल दी है। इससे ९०० से अधिक परिवारों को स्वरोजगार मिल गया है। साल में १० से १५ लाख का टर्न&ओवर हो रहा है।^ प्रधानमंत्री के जिक्र के बाद प्रदेश सरकार की नींद खुली। मुख्यमंत्री ने मुनार में फैक्ट्री चला रही तारा ताकुली को सम्मानित किया। सम्मान में एक शॉल और प्रशस्ति पत्र देकर सरकार ने अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। मगर स्वयं के la?k"kZ और मेहनत के बल पर फैक्ट्री चला रही इन महिलाओं को किसी प्रकार का सहयोग नहीं किया। पिछले करीब एक साल से आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी के कारण यह बिस्किट यूनिट हिचकोले खाकर चल रही है। इस पर किसी का ध्यान नहीं है।

मन की बात कार्यक्रम में जिक्र आने के बाद ^दि संडे पोस्ट^ टीम ने मुनार गांव का दौरा किया। यह गांव बागेश्वर जिला मुख्यालय से करीब ४५ किमी की दूरी पर है। मुनार सरयू तट पर हिमालय की गोद में बसा एक सुंदर गांव है। कपकोट तहसील का यह गांव दूरस्थ है। जहां मोबाइल का टावर भी आया राम&गया राम के तर्ज पर आंख मिचौली खेलता है। गांव पहुंचने के बाद बिस्किट बनाने वाली फैक्ट्री में ताला लटका मिला। ताला लटका देख अनायास ही सवाल उठा कि क्या प्रधानमंत्री ने अपने मन की बात कार्यक्रम में गलत बयानी की। आस&पास के लोगों से बात करने पर पता चला कि बिस्टिक फैक्ट्री ताला लटके हुए जिस मकान में है] वह तारा ताकुली का है। तारा देवी सूपी गांव की पूर्व प्रधान हैं। इन्होंने कुछ साल पहले क्षेत्र की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए महिला स्वयं सहायता समूह बनाया। इसके बाद ^मां तिल्ठा आजीविका स्वायत्त सहकारिता^ की छतरी के नीचे कई स्वयं सहायता समूहों को एकजुट किया।

 फैक्ट्री का प्रबंधन ^मां तिल्ठा आजीविका स्वायत्त सहकारिता^ मुनार लोहारखेत के हाथों में है। यही बोर्ड इस फैक्ट्री में लगा हुआ मिला। यह स्वायत्त सहकारिता संस्था कुल ८६ महिला स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने मिलकर बनाई है। जिसकी अध्यक्ष तारा ताकुली हैं। इनके अलावा सचिव] कोषाध्यक्ष सहित अन्य पदाधिकारी भी हैं। जिसमें सभी महिलाएं ही हैं। फैक्ट्री के लिए ९ बोर्ड मेंबर बनाए गए हैं। जिसके हाथों में फैक्ट्री का प्रबंधन है। जिसका नेतृत्व तारा ताकुली ही करती हैं। इसलिए फैक्ट्री की वास्तविक स्थिति को जानने के लिए उनसे मुलाकात की कोशिश की गई। तारा कहती हैं] ^जब मैं ग्राम प्रधान थी तभी से क्षेत्र की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास शुरू किया। गांव की महिलाओं को उनके आर्थिक स्वास्लंवन के बारे में समझाकर महिला स्वयं सहायता समूह बनाकर स्वरोजगार खड़ा करने का प्रयास किया।^

तारा ताकुली आगे बताती हैं] ^आसपास के गांवों में किसान मंडुवा] चौलाई] मक्का आदि की खेती करते हैं। मगर जो किसान इसकी खेती करते हैं] वो ही खाने में इसे प्रयोग नहीं करते। इसलिए इसके बाजार में दिक्कत हो रही थी। इन खाद्यानों का उपयोग करने के लिए ही बिस्किट बनाने का आइडिया आया। 

महिलाओं को आजीविका के लिए हमने फैक्ट्री खोलने का एक प्रयास किया। फैक्ट्री खोली भी मगर कई समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं। हमें कहीं से कोई सहयोग नहीं मिल रहा है। साल के केवल ४&५ लाख रुपए आते हैं। मदद के अभाव में हमारी बहुत बुरी स्थिति हो गयी है। मकान का किराया तक नहीं मिल पा रहा है। यहां तक कि बर्तन भी अपने द्घर से उसमें दिये हैं। ऐसी विषम परिस्थिति में बिस्किट की फैक्ट्री खोली है। किसी प्रकार उसे चला रहे  हैं। अभी रिटर्न न के बराबर है। मगर आशा और उम्मीद है। खासकर प्रधानमंत्री मोदी की मन की बात कार्यक्रम के बाद उम्मीदें और बढ़ गई हैं।^

मुनार की महिलाओं की यह बिस्किट फैक्ट्री अभी किसी तरह चल रही है। फैक्ट्री में कुल ५ लोगों का स्टाफ है। यहां सवाल उठता है कि आखिर प्रधानमंत्री ने कैसे ९०० परिवारों के आजीविका की बात अपने कार्यक्रम में कह दी। इस पर हिमालया आजीविका स्वयं सहायता समूहों की कोषाध्यक्ष लीला ताकुली कहती हैं] ^८६ महिला स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने फैक्ट्री खोलने के समय १००&१०० रुपए के शेयर दिए थे। इस तरह करीब ८००&९०० महिलाएं एक तरह से उस फैक्ट्री की शेयर होल्डर हैं। फैक्ट्री से होने वाले लाभ को इन शेयरधारकों में बांटा जाएगा। हालांकि अभी तक एक भी पैसा नहीं मिला है।^ आशा ताकुली की इस बात से स्पष्ट हो गया है कि अभी बिस्किट फैक्ट्री इन महिलाओं को आजीविका देने की स्थिति में नहीं आई है। जबकि एक साल से ज्यादा का समय फैक्ट्री को खुले हुए हो गया है। इस पर सहकारिता समिति के ब्लॉक कॉर्डिंनेटर हरीश पांडा कहते हैं कि फैक्ट्री फरवरी २०१७ में खुली थी। इसके लिए हमें एकीकूत आजीविका सहयोग परियोजना से दो लाख की मदद मिली थी। उससे मशीन खरीदी गई। शुरुआती समय में काम न के बराबर था। नवंबर २०१७ से काम बढ़ा है। काम बढ़ने पर ही लाभ भी होगा। धीरे&धीरे काम में तेजी आ रही है। जैसे&जैसे ऑर्डर आएंगे] वैसे&वैसे फैक्ट्री भी रफ्तार पकड़ेगी। अभी फैक्ट्री चलाने के लिए कई प्रकार की समस्याओं से जूझना पड़ रहा है।^

सुदूर गांव होने के कारण फैक्ट्री से तैयार माल को बाजार भेजने से लेकर कच्चा माल लाने में भाड़ा ज्यादा लग रहा है। लाइट की अलग ही समस्या है। लाइट नहीं रहने पर मशीन बंद रहती है। आस&पास के गांवों से मंडुवा या चौलाई की पूर्ति नहीं होने पर इन्हें दूसरे स्थानों से मंगाना होता है। कई ग्रामीणों का कहना है कि मंडुवा बहुत कम लोग उपजाते हैं क्योंकि उसका बाजार नहीं है। लेकिन फैक्ट्री की मांग बढ़ेगी तो लोग खेती जरूर करेंगे। मगर खेती के लिए संसाधन चाहिए। जो यहां नहीं मिल पाते है। महिलाओं के आपसी सहयोग से फैक्ट्री खोल तो दी गई है मगर यह बिना सहयोग या प्रोत्साहन के कब तक चलेगी] इसे कोई नहीं जानता। जिस फैक्ट्री और महिलाओं की तरीफ प्रधानमंत्री अपने कार्यक्रम में करते हैं] वहां अभी तक न जिलाधिकारी] न कोई विधायक और न ही सांसद आए हैं। यह फैक्ट्री केवल तारा देवी और महिलाओं के संगठित प्रयासों से शुरू की गई थी] लेकिन कहीं से किसी भी प्रकार की कोई आर्थिक सहायता न मिलने से गांव वालों की उम्मीदें टूट रही हैं। हालांकि प्रधानमंत्री के जिक्र के बाद प्रदेश सरकार की नींद खुली है। महिलाओं के इस बेहतरीन प्रयास को संजोने और सहयोग की जरूरत है। बिना इसके महिलाओं का यह प्रयास कभी भी चरमरा सकता है। स्थिति यह है कि वहां काम कर रहे एक मात्र कारीगर के छुट्टी पर जाने से फैक्ट्री ही बंद हो जाती है। पिछले दिनों ही कारीगर के छुट्टी पर जाने के कारण फैक्ट्री २२ दिन तक बंद रही।

तारा ताकुली कहती हैं] ^फैक्ट्री किसी तरह चल रही है। मगर प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ के बाद हमें ऑर्डर मिले हैं। अब देहरादून से भी बहुत ऑर्डर मिले हैं। इसके बावजूद पहाड़ की गरीब और सीधी&सादी महिलाएं अकेले इसे चलाने में सक्षम नहीं हैं। हमें सहयोग की जरूरत है। सहयोग मिलने पर यह एक बड़ी यूनिट में परिवर्तित हो सकती है।^ इन महिलाओं को आर्थिक मदद के साथ&साथ तकनीक] बाजार आदि में भी सरकार से सहयोग चाहिए। प्रधानमंत्री ने जिस रूप में इस फैक्ट्री का जिक्र किया] उस रूप में यह कतई नहीं है। यह यहां के स्थानीय लोग भी मानते हैं। ग्रामीण भी आश्चर्यचकित हैं कि आखिर हिचकोले खाकर आगे बढ़ रही नाव को कैसे प्रधानमंत्री ने महिलाओं का उत्साह बढ़ाने वाला बता दिया। इसलिए यहां एक गंभीर सवाल यह जरूर उठ रहा है कि आखिर पीएमओ कार्यालय को किस स्रोत से इस फैक्ट्री की गलत जानकारी मिली।  यदि पीएमओ को स्थानीय प्रशासन] सरकार या पार्टी से इसकी जानकारी मिली तो  प्रधानमंत्री के ^मन की बात^ कार्यक्रम में शामिल करवाने से पहले इसकी सत्यता क्यों नहीं जांची गई। इससे मन की बात में प्रधानमंत्री के उल्लेखित लोगों की जानकारी संदेह के ?ksjs में आ जाती है। पीएमओ से इतनी बड़ी गलती होने की उम्मीद कोई नहीं करता है।

 

 

मुनार गांव का नाम प्रधानमंत्री के मुंह से सुनकर हम गदगद हैं। उससे गांव की महिलाएं उत्साहित हैं। उनमें नया करने की प्ररेणा और उत्साह पैदा होगा। फैक्ट्री के हालत खराब हैं] यह एक अलग विषय है। लेकिन यहां की महिलाओं ने अपने प्रयास से स्वरोजगार पैदा किया है] यह बड़ी बात है।

चंदन राम दास] विधायक बागेश्वर

 

यह क्षेत्र खेती में बहुत ही अच्छा है। यहां मंडुवा] चौलाई की खेती होती है। मगर उसको बेचने के लिए किसानों को हल्द्वानी या अल्मोड़ा के व्यापारियों पर निर्भर रहना पड़ता था। इसलिए हमने एक योजना बनाई] जिससे यहां की उपज को यहीं इस्तेमाल किया जाए। हमने डेढ़&दो साल पहले स्वरोजगार के तहत कार्य करने के लिए २ लाख रुपए की मदद की थी। ताकि इस तरह के प्रोजेक्ट यहां शुरू हो सकें।

धर्मेंद्र पांडे] एकीकृत आजीविका सहयोग परियोजना अधिकारी

 

 

अभी फैक्ट्री किसी तरह चल रही है। यह सही है कि इसमें ८६ महिला स्वयं सहायता समूह जुड़े हुए हैं। मगर अभी तक हम उनके लिए आजीविका पैदा नहीं कर पाए हैं। मतलब फैक्ट्री से अभी उतना लाभ नहीं हो रहा है] जिससे ९०० परिवार पल सकें। इसके लिए हमें सहयोग की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने जब हमारी फैक्ट्री का जिक्र किया] उसके बाद देहरादून से भी हमें ऑर्डर मिले हैं।

तारा ताकुली] अध्यक्ष मां तिल्ठा आजीविका स्वायत्त सहकारिता मुनार

gunjan@thesundaypost.in


 
         
 
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