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vad 50 02-06-2018
 
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न्यूज़-एक्सरे 
 
पलायन आयोग का ^हिट विकेट^

  • कृष्ण कुमार

स्वास्थ्य] शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में उत्तराखण्ड से लोग निरंतर पलायन करते रहे हैं। राज्य की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने इस पर रोक लगाने के लिए पलायन आयोग का गठन किया। पहले आयोग पहाड़ से स्वयं पलायन कर जाने की खबर से सुर्खियों में रहा तो अब सरकार के पास उपलब्ध आंकड़ों को अपनी सर्वे रिपोर्ट बताकर सार्वजनिक करने के कारण सुर्खियां बटोर रहा है। पलायन पर सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी कर आयोग न खुद सवालों के ?ksjs में आया] बल्कि उसने अपनी जन्मदाता सरकार को भी dB?kjs में खड़ा कर डाला है

 

उत्तराखण्ड में पलायन एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहा है। राज्य गठन के बावजूद पलायन की गति में आई तेजी सोचने -विचारने वाले लोगों की चिंता का बड़ा कारण रही। अब तक की हर सरकारें पलायन पर अंकुश लगाने में नाकाम साबित हुई हैं। भारी बहुमत से सत्ता में आई त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार पर भारी जनदबाव था कि वह अपने चुनावी वादे के मुताबिक पलायन रोकने की दिशा में काम करे। ऐसे में सरकार को कुछ नहीं सूझा तो उसने पलायन आयोग का गठन कर डाला। सरकार के एक साल पूरा होने के बाद भी जब इस पर कुछ खास काम नहीं हुआ तो प्रदेश में पलायन का मुद्दा फिर से गरमाने लगा। मुद्दा गरमाने पर जल्दबाजी में आयोग ने बिना सर्वे किए दूसरे विभागों की रिपोर्ट पर अपना ठप्पा लगाकर सार्वजनिक कर दिया। जिससे पलायन आयोग की काफी किरकिरी हो रही है।

अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक करते समय मीडिया से आयोग के उपाध्यक्ष डॉ एसएस नेगी ने कहा कि आयोग ने एक सर्वे कर यह रिपोर्ट तैयार की है। जब सोशल मीडिया पर इतने कम समय में ७००० ग्राम पंचायतों का सर्वे कैसे किया गया? जैसे सवाल पूछे जाने लगे तो आयोग को अपनी बात से ही रौल बैक करना पड़ा। आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि हमने कोई सर्वे नहीं किया है। स्वयं आयोग के उपाध्यक्ष ने भी इसे कबूला। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि लाखों रुपए आयोग पर सरकार क्यों खर्च कर रही है? आयोग ने जो रिपार्ट सार्वजनिक की वह आंकड़ा सरकार के पास पहले से ही था। अब बिना सर्वे किए आंकड़ा सार्वजिनक करने का कोई तुक नहीं है।   

वर्तमान सरकार द्वारा अगस्त २०१७ में ग्राम्य विकास और पलायन आयोग का गठन किया गया। इसको राज्य में हो रहे पलायन के कारणों का पता लगाने का काम दिया गया। सरकार ने द्घोषणा की कि पलायन आयोग का कार्यालय पौड़ी में स्थापित किया जाएगा। डॉ एसएस नेगी को इसका उपाध्यक्ष बनाया गया। हैरत की बात यह है कि पलायन को रोकने के उद्देश्य से जिस आयोग का गठन किया गया] वही आयोग स्वयं पौड़ी से देहरादून में पलायन कर जाने को लेकर सुर्खियों में छाया रहा। सरकार पर दबाब पड़ा तो पौड़ी में आयोग का दफ्तर बना दिया गया। अब आयोग को पहाड़ी क्षेत्रों से हो रहे पलायन के कारण और उसे रोकने के उपाय बताने थे। इसके लिए आयोग को जमीन पर काम भी करना था। मगर वैसा कुछ नहीं किया गया। केवल आंकड़ों की बाजीगरी से अपना काम चलाने का प्रयास किया गया है। त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने पलायन आयोग के गठन को ऐतिहासिक बताते हुए अपनी पीठ थपथपाने में कोई कसर नही छोड़ी। लेकिन आयोग की रिपोर्ट से स्वयं सरकार पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं। लोग जानना चाहते हैं कि अब सरकार रोजगार और सुविधाओं के लिए क्या बेहतर करने जा रही है।

बहरहाल पलायन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के १३ जिलों में ९ लाख से भी अधिक बेरोजगार पंजीकूत हैं। विगत दस वर्षों में राज्य से रोजगार के लिए ५० प्रतिशत आबादी का पलायन हुआ है। इनमें ४२-२५ प्रतिशत अकेले २६ से ३५ वर्ष के युवाओं का है। रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया गया है कि मैदानी जिलों में केवल देहरादून] उधमसिंह नगर औेर हरिद्वार में ही औद्योगिक विकास हुआ है। पर्वतीय जिलों में न तो औद्योगिक विकास हो पाया है और न ही निवेश के साधन बढ़े हैं। पर्वतीय जिलों में रोजगार का विकल्प नहीं बन पाया है। पिछले १७ वर्षो में बुनियादी सुविधाओं के अभाव में राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में तेजी से पलायन हुआ है। इनमें रोजगार-आजीविका] स्वास्थ्य] शिक्षा] सड़क] बिजली] पेयजल] खेती की सुविधा का अभाव] जंगली जानवरों से परेशानी] सगे संबंधी और रिश्तेदारों की देखा-देखी आदि अन्य कारणों को पलायन की वजह बताया गया है। इन्हीं कारणों से राज्य में इन १७ वर्षों में पलायन की वजह माना गया है। इनमें स्थाई और अस्थाई पलायन के बिंदुओं को शामिल किया गया है। दस वर्षों में जो पूरी तरह से अपनी जमीन] ?kj आदि बेच कर जा चुके हैं उन्हें स्थाई पलायन में रखा गया है। जिनका अपनी जमीन] ?kj आदि है] लेकिन वे कुछ समय के लिए अन्य कारणों से अपने गांव-द्घरों में आते रहते हैं] उन्हें अस्थाई पलायन करने वाला माना गया है।

आंकडों के अनुसार उत्तरकाशी जिले में १९८९३ लोग अस्थाई और २७२७ स्थाई तौर पर पलायन कर चुके हैं। टिहरी जिले में ७१५०९ लोग अस्थाई और १८८३० स्थाई रूप से बाहर जा चुके हैं। पौड़ी जिले में ४७४८८ अस्थाई और २५५८४ लोग स्थाई तौर पर पलायन कर चुके हैं।

इसी तरह से रुद्रप्रयाग जिले २२७३५ लोग अस्थाई तो ७८३५ स्थाई पहाड़ रूप से छोड़ गए हैं। चमोली जिले में ३२०२० लोग अस्थाई और १४२८९ लोग पूरी तरह से पलायन कर चुके हैं। पिथौरागढ़ में ३१७८६ लोग अस्थाई और ९८८३ लोग स्थाई पलायन कर चुके हैं। बागेश्वर जिले में २३३८८ लोग अस्थाई और ५९१२ लोग स्थाई तौर पर पलायन को मजबूर हुए। चंपावत जिले में भी अस्थाई तौर पर २०३३२ लोग और स्थाई तौर पर ७८८६ लोग अपने ?kj छोड़ चुके हैं। सांस्कूतिक नगरी अल्मोड़ा जनपद में ५३६११ लोग अस्थाई और १६२०७ लोग पूरी तरह से पलायन कर गए हैं।

बात केवल पर्वतीय जनपदों की नहीं है। मैदानी और तराई जिलों में भी पलायन तेजी से बढ़ा है। सबसे विकसित जिले देहरादून से अस्थाई तौर पर २५७११ लोग अस्थाई और स्थाई २८०२ लोग तो पलायन कर चुके हैं। ऊधमसिंह नगर में भी ६०६४ अस्थाई और ९५२ स्थाई तौर पर पलायन कर चुके हैं। हरिद्वार में ८१६८ अस्थाई और १२५१ स्थाई तौर पर  बाहर चले गए हैं। नैनीताल जिले में २०९५१ अस्थाई और ४८२३ लोग स्थाई तौर पर पलायन कर चुके हैं। इससे यह भी साफ है कि अब तक की सरकारों के विकास के दावों और नीतियों में कहीं न कहीं भारी असंतुलन है जिसके चलते पलायन की यह गंभीर तस्वीर उभर कर सामने आई है।

आयोग के अनुसार पलायन राज्य के भीतरी जिलों में जिस तेजी से हुआ है उतनी ही तेजी से राज्य के बाहर भी हुआ है। जहां प्रदेश के दूसरे जिलों में पलायन १९-४६ प्रतिशत रहा है तो वहीं राज्य से बाहर देश के अन्य राज्यों में भी २९ फीसदी पलायन हुआ है। जबकि देश के बाहर महज १ फीसदी ही पलायन हुआ है। गौर करने वाली बात यह है कि राज्य में पलायन शहरीकरण और शहरी सुविधाओं के चलते तेजी से हुआ है। इसमें तकरीबन ३५ प्रतिशत तो जिला मुख्यालयों और नजदीकी कस्बों में ग्रामीणों का पलायन हुआ है। यानी शहरीकरण के चलते भी तेजी से गांवों में पलायन हुआ है। इससे शहरों] कस्बों की आबादी तेजी से बढ़ी है।

आयोग के मुताबिक खेती की सुविधाओं की भारी कमी जंगली जानवरों से परेशान होकर ५-६१ प्रतिशत लोगों ने पलायन किया है। तकरीबन सभी पर्वतीय जिलों में जंगली जानवरों के चलते पलायन एक बजह बनी हुई है। पलायन की तस्वीर कितनी भयावह है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जाा सकता है कि प्रदेश में औसतन प्रतिदिन ३३ लोग पलायन करने को मजबूर हैं। राज्य बनने के बाद से राज्य में ३२ लाख लोगों ने पलायन किया है। जबकि विगत दस वर्ष में ही ७३४ गांवों के द्घरों में ताले लटके हुये हैं। दस वर्षों में ५६५ ऐसे राजस्व गांव हैं जिनमें ५० प्रतिशत आबादी पलायन कर चुकी है। इन राजस्व गावों में हरिद्वार] देहरादून और ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जिले के गांव भी शामिल हैं। जहां की आबादी ५० प्रतिशत कम हुई है। सबसे ज्यादा पौड़ी जिले का प्रतिशत रहा है जहां ११२ गांव ऐसे हैं जहां की आबादी आधी रह गई है। इसके अलावा जिले के १८६ गांव पूरी तरह से गैर आबादी वाले हैं। दरअसल] पलायन की भयावहता को समझने के लिए एक अकेला पौड़ी जिला ही काफी है। यह जिला राजनीतिक] आर्थिक और सामाजिक तौर पर सबसे मजबूत माना जाता रहा है। ब्रिटिशकाल से ही गढ़वाल का सबसे विकसित जिला रहा है। कमिश्नरी होने का सौभाग्य भी पौड़ी जिले को मिला है। गढ़वाल राईफल्स का मुख्यालय भी इसी जिले में है। बावजूद इसके जिले में १८६ गांव पूरी तरह से आबादी विहीन होते चले गए। राजनीतिक तौर पर देखें तो पौड़ी जिला अविभाजित उत्तर प्रदेश में भी मजबूत रहा है। इसके मूल निवासी हेमवतीनंदन बहुगुणा अविभाजित उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और देश की राजनीति में एक बड़े चेहरे के तौर पर पहचान रखते थे। वर्तमान सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खण्डूड़ी] पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमेश पोखरियाल ^निंशक^ और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत भी पौड़ी से ही हैं। सतपाल महाराज] पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा] हरक सिंह रावत] सुरेंद्र सिंह नेगी जैसे दिग्गज नेता पौड़ी ने दिए हैं। वर्तमान राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी भी पोैड़ी से ही हैं। शासन-प्रशासन में भी पौड़ी जिले के कई चेहरे अपनी धाक जमा चुके हैं। थलसेना अध्यक्ष जनरल विपिन रावत और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल जैसे चेहरे पौड़ी जिले से ही हैं। इसके बावजूद यह जिला पलायन की भयंकर मार झेल रहा है।

पलायन आयोग की रिपोर्ट में रिवर्स माइग्रेशन का भी जिक्र किया गया है। बेशक प्रदेश में पलायन लगातार बढ़ रहा है] मगर कुछ लोग गांव की ओर वापस भी आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक वीरान हो चुके करीब ९०० गांवों में रिवर्स माइग्रेशन हुआ है। इन गांवों में गांव छोड़कर जाने वालों में से दो-दो] चार-चार परिवार वापस अपनी जन्म स्थली आए हैं। रिपोर्ट में एक दिलचस्प खुलासा भी हुआ है। राज्य के गांवों से जहां लोग पलायन कर रहे हैं] वहीं दूसरे प्रदेश के लोग यहां आकर पहाड़ी गांवों में रह रहे हैं। बाहर से आकर यहां रहने वालों ज्यादातर नेपाल और बिहार के लोग हैं। ये लोग मजदूरी करने अन्य काम कर अपनी आजीविका चला रहे हैं।

 

 

पहली बात तो यह है कि हमने कोई सर्वे नहीं किया। हमने सरकारी कर्मचारी जो कि गांवों में काम करते हैं जैसे बीडीओ और ग्राम पंचायत अधिकारी से आंकडे़ लिए हैं। हर गांव में परिवार रजिस्टर होता है जिसमें सभी का पूरा रिकॉर्ड दर्ज है। हमने वही आंकड़े लिए हैं। एक दिन में १३५ गांवों का सर्वे औसत किसी भी सूरत में नहीं निकाला जा सकता। यह औसत आप लोग निकाल रहे हैं।

डॉ. एस. एस. नेगी] उपाध्यक्ष पलायन आयोग उत्तराखण्ड

krishan.kumar@thesundaypost.in

 

 
         
 
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,क्या उत्तराखंड में ऐसी कोई सरकार आयेगी जो जंगलों को जलने से रोक सके

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  • जीवन सिंह टनवाल

आईपीएल के मौजूदा सीजन में ही महिला आईपीएल की भी भूमिका तैयार हो गई है। प्लेऑफ मुकाबलों से पहले ही महिला क्रिकटरों का जो प्रदर्शनी मुकाबला

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