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vad 50 02-06-2018
 
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आवरण कथा
 
बदलते राजनीतिक रिश्ते

  • कृष्ण कुमार

राजनीति में न कोई स्थाई दोस्त रहता है और न दुश्मन। राजनीतिक हित वर्षों पुराने तमाम मतभेदों को एक क्षण में भुला देते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय कल तक एक&दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते थे। लेकिन पार्टी के मौजूदा राजनीतिक हालात में अपना&अपना वजूद बचाने की चिंता इन दोनों को करीब लाई है। इनके करीब आने से उन नेताओं की बेचैनी बढ़ गई है जो रावत को हाशिए पर डालकर अपना दबदबा कायम करना चाहते हैं

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय के बीच चल रही खटास अब दूर होती दिखाई दे रही है। हालांकि दोनों नेताओं में सुलह के प्रयास कई बार हुए, लेकिन नतीजा नहीं निकल पाया। अब प्रदेश कांग्रेस के मौजूदा हालात एक&दूसरे से बेहद नाराज चल रहे किशोर उपाध्याय और हरीश रावत के बीच सुलह का एक बेहतर मौका लेकर आए हैं। इसे दोनों नेताओं के राजनीतिक भविष्य के लिए एक अच्छा संकेत कहा जा सकता है। दोनों  नेताओं के बीच सुलह की खबरों से कांग्रेस पार्टी के भीतर कई चर्चाओं का बाजार गरम है। इसके साथ ही जो बड़े नेता हरीश रावत प्रदेश से बाहर होने का ख्वाब देख रहे थे उनके लिए यह बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है। सूत्रों की मानें तो जब हरीश रावत पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय के साथ अपने सभी मतभेदों को भुलाकर नये सिरे से एकजुटता दिखाने का प्रयास कर रहे थे ठीक उसी समय कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और दिग्गज नेता इंदिरा हृदयेश राहुल गांधी के साथ मुलाकात कर हरीश रावत की एकला चलो नीति का रोना रो रहे थे।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हरीश रावत आज भी पूरे दमखम के साथ सरकार के खिलाफ हर मोर्चे पर डटे हुए हैं। प्रदेश भर में कार्यक्रमों और अपनी यात्राओं के जरिए वे सरकार के खिलाफ जनता में महौेल बनाने का प्रयास कर रहे हैं। विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार से हताश कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में उत्साह का वतावरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ कांग्रेस संगठन और पार्टी के बड़े नेता एक दूसरे को कमतर दिखाने के काम में जुटे हुए हैं। यह हालात तब हैं कि जब आने वाले समय में निकाय चुनाव होने हैं और थराली विधानसभा क्षेत्र का उप चुनाव सिर पर है। कांग्रेसी कोई तैेयारी करने के बजाय आपसी रार और मतभेदों के चलते पार्टी की राह में रोड़े अटकाने का काम ही करते दिखाई दे रहे हैं।

सही मायनों में देखा जाए तो उत्तराखण्ड कांग्रेस में हरीश रावत आज भी एक बड़े चेहरे के तौर पर माने जाते हैं। हाल ही में दिल्ली में संपन्न हुई कांग्रेस की जन हुंकार रैली में जिस तरह से प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं से केवल हरीश रावत को ही मंच में बैठने और संबोधन करने का अवसर राहुल गांधी द्वारा दिया गया, इससे यह तो साफ हो गया कि विधानसभा में करारी हार के बावजूद कांग्रेस आलाकमान की निगाह में आज भी हरीश रावत सबसे बड़े चेहरे हैं। संभवतः हरीश रावत जनता के बीच अपने कार्यक्रमों ओैर यात्राओं से आज भी पार्टी आलाकमान में लोकप्रिय बने हुए हैं। लेकिन इसके उलट हैरत की बात यह है कि प्रदेश कांग्रेस का एक वर्ष में ऐसा कोई कार्यक्रम देखने को नहीं मिला जिस पर पूरी कांग्रेस मजबूती के साथ सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरी हो या उसने कोई बड़ा आंदोलन किया हो। जन आक्रोश रैली जरूर कांग्रेस के खाते में मानी जाती है। लेकिन जिस तरह से इस रैली को टुकड़ों में राज्य के अलग&अलग स्थानों में आयोजित किया गया उससे सरकार के खिलाफ न तो बड़ा आंदोलन खड़ा हो पाया और न ही दबाब बन पाया।

राजनीतिक जानकारों की मानें तो इसके पीछे कांग्रेस के बड़े नेताओं के अपने&अपने क्षेत्रों में ही सिमट जाने की मजबूरी है। जिसके चलते वे किसी अन्य स्थान पर ऐसा कोई बड़ा सामूहिक कार्यक्रम या आयोजन नहीं कर पाये जितना एक विपक्षी पार्टी से आशा की जाती है। दूसरी तरफ भाजपा जब&जब विपक्ष में रही है उसने सत्ता और सरकार के खिलाफ जनता में विरोध का माहौल खड़ा करने में बड़ी सफलता पाई है। मोदी मैजिक के साथ&साथ यह भाजपा नेताओं का अनुशासन और आंदोलनों की रणनीति रही कि विधानसभा चुनाव में ५७ सीटें जीतकर राज्य के इतिहास में पहली बार कोई राजनीतिक दल प्रचंड बहुमत से सत्ता में आया।

इसके उलट कांग्रेस के नेता अपनी ^एकला चलो^ की राह पर चलते रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह के बारे में कहा जा रहा है कि कांग्रेस आला कमान द्वारा उनको काम करने की खुली छूट दी गई है, लेकिन वे प्रदेश कांग्रेस की नई कार्यकारिणी के पदाधिकारियों की सूची पार्टी आलाकमान से स्वीकूत नहीं करवा पा रहे हैं। तकरीबन एक वर्ष का समय बीत चुका हैे, लेकिन अभी तक नइर् कार्यकारिणी की सूची पर मोहर नहीं लग पाई है। सूत्रों के मुताबिक हरीश रावत की सहमति के बगैर कांग्रेस संगठन द्वारा नई प्रदेश कार्यकारिणी की सूची आलाकमान को भेजी गई। जिस पर रावत द्वारा आपत्ति की जा चुकी है। कांग्रेस आलाकमान द्वारा नई कार्यकारिणी को हरी झंडी दिए जाने पर मौजूदा कार्यकारिणी पूर्व की भांति काम करती रहेगी। यानी जो पहले पदाधिकारी था वह पदाधिकारी की तरह काम करता रहेगा। इसमें सबसे बड़ा सवाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पर उठता है कि वे अपनी ही पार्टी के नेताओं को साध नहीं पाए हैं और गुटों को साधने के चक्कर में स्वयं भी गुटबाजी के फेर में जाते दिखाई दे रहे हैं। 

दूसरी ओर कांग्रेस की दिग्गज नेता इंदिरा हृदयेश भी अपने राजनीतिक वजूद को लेकर खासी चिंतित बताई जाती हैं। नेता प्रतिपक्ष होने के बावजूद इंदिरा हृदयेश की राजनीतिक अनुभव का फायदा कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को मिल पा रहा हो, ऐसा लगता नहीं। दरअसल, कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति की शिकार हृदयेश भी होती रहती हैं। हल्द्वानी से आईएसबीटी के स्थानांतरण के मामले में जिस तरह से इंदिरा हृदयेश के कार्यक्रम से बड़े नेताओं ने दूरी बनाकर रखी उससे यह साफ हो गया कि कांग्रेस में नेताओं को अपने&अपने कार्यक्रमों के अलावा अन्य कार्यक्रमों के लिए समय नहीं है। हरीश रावत इससे कई बार दो चार हो चुके हैं। उनके द्वारा कई ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया गया जिनसे कांग्रेस कार्यकर्ताओं को एकजुट करने में सहयोग मिल सकता था। चाहे वह काफल पार्टी हो या जन यात्राएं हर कार्यक्रम में हरीश रावत को अकेले ही ^एकला चलो^ के तहत चलना पड़ा। वर्तमान में भी केदारनाथ की यात्रा में हरीश रावत अकेले ही जूझ रहे हैं। कांग्रेस संगठन का  इसमें कोई सहयोग नहीं करना साफ बताता है कि कांग्रेस के नेता हरीश रावत की रणनीति से अपने आप को असहज महसूस कर रहे हैं ओैर इसे अपने राजनीतिक वजूद के लिए खतरा मान चुके हैं।

हरीश रावत एक मंझे हुए राजनेता हैं। हो सकता है कि किशोर उपाध्याय के साथ उनकी सुलह बड़े राजनीतिक समीकरणों को साधने का प्रयास हो। लेकिन इतना तो तय है कि किशोर उपाध्याय और हरीश रावत की यह ताजातरीन जुगलबंदी प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर कर सकती है। जिसकी जद में कांग्रेस के बड़े नेताओं के आने की आंशकाएं जताई जा रही हैं। सूत्रों की मानें तो किशोर उपाध्याय टिहरी लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने के इच्छुक बताये जा रहे हैं। लेकिन जिस तरह से कांग्रेस संगठन में उन्हें किनारे किया जा चुका है उससे उनकी राह आसान नहीं होने वाली। हरीश रावत भी किशोर उपाध्याय को टिहरी से टिकट दिलावने के लिए अपना समर्थन जता चुके हैं। इसके चलते किशोर उपाध्याय की राह कुछ आसान हो सकती है। दोनों नेताओं की नई सुलह से कांग्रेस में साफ तौेर पर नए समीकरण दिखाई रहे हैं। एक तरफ हरीश रावत और किशोर उपाध्याय का गुट आकार ले रहा है, तो दूसरी तरफ प्रीतम सिंह और इंदिरा हृदयेश साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। आने वाले समय में दोनों ही गुट कितने मजबूत होंगे यह देखने वाली बात होगी। कम से कम अभी तो हालात हरीश रावत और किशोर उपाध्याय के पक्ष में लग रहे हैं। किशोर उपाध्याय के एक मामले में न्यायालय से जमानत मिलने के बावजूद पुलिस द्वारा उनकी गिरफ्तारी के लिए उनके आवास पर दबिश दी गई। इस पर हरीश रावत गुट किशोर उपाध्याय का जिस तरह से साथ दिया गया उससे यह साफ हो गया कि दोनों नेताओं को एक&दूसरे की जरूरत है। एक और एक ग्यारह की तर्ज पर अपने विरोधियों को आईना दिखाने के लिए फिलहाल दोनों कामयाब होते दिखाई दे रहे हैं।

krishan.kumar@thesundaypost.in

 
         
 
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,क्या उत्तराखंड में ऐसी कोई सरकार आयेगी जो जंगलों को जलने से रोक सके

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  • प्रेम भारद्वाज

कर्नाटक को लेकर चल रहे हाई वोल्टेज ड्रामे में जब देश की जनता मजा ले रही थी तब भी मीडिया चैनलों के तुगलकी एंकरों और पैनल में बैठे जानकारों

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