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vad 50 02-06-2018
 
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मेरी बात अपूर्व जोशी
 
राष्ट्रीयता की कसौटी और जिन्ना

  • अपूर्व जोशी

वर्ष १९२० में जब गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने स्वाधीनता के लिए आंदोलन को तेजी देनी शुरू की] जिन्ना कांग्रेस से अलग हो गए। यही वह समय था जब अखंड राष्ट्र के समर्थक जिन्ना ने चोला बदला और मुस्लिम राजनीति के लिए काम करना शुरू कर दिया। अगले कुछ ही वर्षों में जिन्ना सावरकर के दो राष्ट्र सिद्धांत के प्रबल पक्षधर बन उभरे। इस दौरान १९३० में सर मोहम्मद इकबाल] जिन्हें ज्यादा ख्याति बतौर कवि के रूप में मिली] ने उत्तर&पूर्व के क्षेत्र को पृथक मुस्लिम राष्ट्र बनाए जाने की बात कही। अल्लामा इकबाल को उनकी शायरी के लिए आज भी याद किया जाता है। ^सारे जहां से अच्छा] हिंदोस्ता हमारा] हम बुलबुले हैं इसके] यह सारा जहां हमारा^ लिखने वाला शायर लियाकत अली जिन्ना का कब और क्यों प्रबल समर्थक बन गया] यह अलग से तफ्तीश का मुद्दा है

 

महात्मा गांधी का देश के बंटवारे को लेकर क्या  मानना था\ और वह चाहते तो क्या बंटवारा रोका जा सकता था\ क्या गांधी मुसलमानों के प्रति अधिक उदार थे\ क्या अकेले जिन्ना ही देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार थे\ इस तरह के कई ऐसे प्रश्न हैं जिनको लेकर नाना प्रकार की भ्रांतियां हैं] इन दिनों फैलाई भी जा रही हैं। इन सब प्रश्नों के उत्तर] सही उत्तर आजादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी व अन्य राष्ट्रीय नेताओं की भूमिका से समझे जा सकते हैं। बशर्ते समझने की नीयत किसी विचारधारा विशेष से प्रभावित होने के चलते बाधित न हो। चलिए थोड़ा टहला जाए इतिहास के आंगन में और तलाशें जाएं इन प्रश्नों के उत्तर।

पहले बात महात्मा की। प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी पुस्तक ^इंदिरा आफ्टर गांधी^ में लिखते हैं कि महात्मा अंतिम क्षण तक अखंड भारत के प्रबल पैरोकार रहे। ग्यारह मार्च १९४७ को उन्होंने कहा था&^यदि जिन्ना कहें कि दो राष्ट्रों की मांग को मान लो अन्यथा वह मुझे गोली मार देंगे तो मेरा उत्तर होगा % आप मुझे मार सकते हैं।^ गांधी के प्रपौत्र राजमोहन गांधी ने अपनी पुस्तक ^मोहनदास^ में लिखा है कि गांधी को बंटवारे की बाबत पूरी तरह से अंधेरे में रखा गया। पंजाब प्रांत के बंटवारे की खबर उन्हें समाचार पत्रों के जरिए लगी थी। आहत महात्मा ने अपने आक्रोश को व्यक्त करते हुए वल्लभ भाई पटेल को इस बाबत लंबा पत्र लिख उनसे स्पष्टीकरण की दरकार की थी। बकौल राजमोहन गांधी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने महात्मा संग बंटवारे को लेकर चल रहे समझौते की बात साझा नहीं की क्योंकि महात्मा हर कीमत में भारत के बंटवारे को टालना चाहते थे। इतिहासकार सुमित सरकार ने अपनी पुस्तक ^मॉडर्न इंडिया^ में इस बात की पुष्टि करते हुए लिखा है कि ^कांग्रेस संग अपनी दूरी बनाने के बाद गांधी पूरी तरह से अहिंसा के जरिए सामाजिक समरसता बनाने की मुहिम में जुट गए। नौखाली] बिहार कोलकाता और दिल्ली में हिंदू&मुस्लिम सौहार्द स्थापित करना उनका मुख्य लक्ष्य बन गया।^ निश्चित ही महात्मा गांधी की इच्छा के विरुद्ध बंटवारे की नींव रखी गई थी। तीस दिसंबर १९३७ को हिंदू महात्मा को संबोधित करते हुए वीर सावरकर ने हिंदू और मुस्लिम को दो राष्ट्र कहा। इससे पहले १९२३ में प्रकाशित अपनी पुस्तक ^हिंदुत्व^ में वे इस थ्योरी को मुद्दा बना बंटवारे के बीज बो चुके थे। गांधी का मानना था धर्म राष्ट्र का आधार नहीं हो सकता। उनके कथन की पुष्टि १९७१ में पाकिस्तान के बंटवारे से सिद्ध हो गई और जिन्ना की मुस्लिम राष्ट्र की थ्योरी गलत साबित हुई। लियाकत अली जिन्ना] जिनकी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में टंगी तस्वीर इन दिनों विवाद का केंद्र बनी है दरअसल] एक समय में अखंड भारत के प्रबल समर्थक थे। जिन्ना] राजनीति या यूं कहिए स्वाधीनता संग्राम में कांग्रेस कार्यकर्ता के बतौर शामिल हुए थे। १९०६ में जब मुस्लिम लीग का गठन हुआ तो जिन्ना ने धर्म के आधार पर बने इस संगठन की खिलाफत की थी। १९१३ में लेकिन वे संगठन के सदस्य बन गए। मुस्लिम लीग का जन्म एक साहित्यिक आंदोलन से हुआ जो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुआ था। सैयद अहमद खान ने बतौर संस्थापक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मोहम्मद एज्युकेशनल कॉन्फ्रेंस की स्थापना की थी जिसे विश्वविद्यालय ने प्रतिबंधित कर दिया था। दिसंबर १९०६ में इस संगठन ने ढाका में एक सम्मेलन कर ऑल इंडिया मुस्लिम लीग का गठन किया जिसका तात्कालिक उद्देश्य मुस्लिम समाज के अधिकारों की रक्षा करना भर था। कई इतिहासकारों का मानना है कि कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं की सलाह पर ही जिन्ना ने मुस्लिम लीग की सदस्यता ली ताकि कांग्रेस और लीग के मध्य बेहतर तालमेल हो सके। मुस्लिम लीग इस समय तक एक गैर राजनीतिक संगठन था जिसका कुल उद्देश्य मुस्लिमों] विशेषकर संपन्न मुस्लिम समाज के हितों की रक्षा करना था। १९२० में जब गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने स्वाधीनता के लिए आंदोलन को तेजी देनी शुरू की] जिन्ना कांग्रेस से अलग हो गए। यही वह समय था जब अखंड राष्ट्र के समर्थक जिन्ना ने चोला बदला और मुस्लिम राजनीति के लिए काम करना शुरू कर दिया। अगले कुछ ही वर्षों में जिन्ना सावरकर के दो राष्ट्र सिद्धांत के प्रबल पक्षधर बन उभरे। इस दौरान १९३० में सर मोहम्मद इकबाल] जिन्हें ज्यादा ख्याति बतौर कवि के रूप में मिली] ने उत्तर&पूर्व के क्षेत्र को पृथक मुस्लिम राष्ट्र बनाए जाने की बात कही। अल्लामा इकबाल को उनकी शायरी के लिए आज भी याद किया जाता है। ^सारे जहां से अच्छा] हिंदोस्ता हमारा] हम बुलबुले हैं इसके] यह सारा जहां हमारा^ लिखने वाला शायर लियाकत अली जिन्ना का कब और क्यों प्रबल समर्थक बन गया] यह अलग से तफ्तीश का मुद्दा है। बहरहाल जिन्ना ने सावरकर के दो राष्ट्र की थ्योरी को १९३० के बाद से अपना मुख्य एजेंडा बना डाला। ^फूट डालो शासन करो^ की नीति पर चलने वाले ब्रिटिश साम्राज्य के लिए इससे बढ़िया भला और क्या हो सकता था। उन्होंने धर्म के आधार पर समाज के विभक्तीकरण को मजबूती देने में खासा महत्वपूर्ण किरदार निभाया। इतिहास के आंगन में टहलिए तो पाएंगे कि जिन लियाकत अली जिन्ना की तस्वीर के बहाने देशभक्ति को आंकने का नया पैमाना इन दिनों तैयार किया जा रहा है] टीवी चैनलों पर द्घनद्घोर राष्ट्रवादी एंकर चीख&चीखकर जिन्ना को बंटवारे का खलनायक बता रहे हैं] वही जिन्ना एक समय में सबसे अधिक अखंड भारत के पैरोकार थे। १९२५ में इन्हीं जिन्ना ने तत्कालीन सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेम्बली में कहा था कि ^मैं पहले एक राष्ट्रवादी हूं। दूसरे पर भी राष्ट्रवादी हूं और अंत में भी राष्ट्रवादी हूं।^ प्रश्न उठता है क्योंकर एक कट्टर राष्ट्रवादी ने अपनी विचारधारा बदली और क्यों वह एक धर्म आधारित राष्ट्र की नींव का कट्टर पैरोकार बन बैठा\ इसे समझने के लिए स्वतंत्रता संग्राम में तेजी से पैठी सांप्रदायिकता को समझना होगा। १९३० में भारत छोड़ इंग्लैंड जा बसने वाले लियाकत अली जब वापस देश पहुंचे तो मुस्लिम लीग का नेतृत्व संभाल पृथक मुस्लिम राष्ट्र के सबसे बड़े समर्थक बन बैठे। यह जिन्ना की मजबूरी और महत्वाकांक्षा का मिलाजुला परिणाम था। मजबूरी इसलिए कि हिंदू राष्ट्र के पैरोकार अपनी जड़ें मजबूत करने में जुटे थे तो मुस्लिम भी अपनी जमीन तलाशने में जुट गए थे। जिन्ना के पास विकल्प सीमित थे। या तो अन्य राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं की तरह वे कांग्रेस संग रहते या फिर मुस्लिम लीग को उग्र मुस्लिम संगठन बना डालते। १९२० में कांग्रेस छोड़ने के बाद वापसी संभव थी नहीं। जिन्ना की बाबत एक बात और महत्व की है। वे कभी भी कट्टरपंथी मुसलमान नहीं रहे। रही बात गांधी के मुसलमानों के प्रति उदार होने की तो गांधी दर्शन की समझ रखने वाले सभी जानते हैं कि महात्मा ने कभी भी धार्मिक तुष्टिकरण की राजनीति नहीं की। गांधी को लेकर ऐसी भ्रांतियों के मूल में वह पचपन करोड़ रुपए हैं जो उनके चलते भारत ने पाकिस्तान को दिए। बंटवारे के समय यह निर्णय हुआ था कि भारत&पाकिस्तान को नकद पचहत्तर करोड़ देगा। बीस करोड़ तत्काल दिए गए थे। कश्मीर में कबिलाइयों की आड़ लेकर पाकिस्तानी सेना के आक्रमण बाद भारत सरकार ने बाकी बचे पचपन करोड़ पर रोक लगा दी। गांधी इसके खिलाफ थे। उनका मानना था कि बंटवारे की शर्तों का पालन किया जाना चाहिए। उन्हें आशंका थी कि कंगाल पाकिस्तान इसे मुद्दा बना युद्ध छेड़ सकता है। लैरी कॉलिन्स और डॉमीनिक लॉपियर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ^फ्रीडम एट मिडनाइट^ (आजादी आई आधी रात) में इसका जिक्र करते हुए लिखा है कि गांधी ने इसे भारत की गरिमा के विपरीत मानते हुए जवाहर लाल नेहरू सरकार पर दबाव बनाने की नीयत से भूख हड़ताल कर दी। १३ जनवरी १९४८ के दिन बापू अनशन पर जा बैठे। उनके अनशन से द्घबरा भारत सरकार ने पचपन करोड़ तो पाकिस्तान को दे दिए] लेकिन गांधी को इसकी भारी कीमत मात्र सत्रह दिन के भीतर अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। जहां तक प्रश्न जिन्ना की तस्वीर का है तो निश्चित ही यह व्यर्थ का विवाद वोटों की राजनीति के चलते फैलाया जा रहा है। जिन्ना अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी छात्र संद्घ के आजीवन सदस्य थे। इस नाते उनकी तस्वीर वहां १९३८ से लगी है। ठीक इसी प्रकार शहीद&ए&आजम भगत सिंह के पैतृक द्घर को पाकिस्तान में स्माारक का दर्जा है। गांधी को पाकिस्तान में एक बड़ा वर्ग बहुत सम्मान की दृष्टि से देखता है। २००९ में लाहौर के एक चित्रकार ने अपने खून से बापू की तस्वीर बना उसे उनकी प्रपौत्री तारा गांधी भट्टाचार्य को भेंट की थी। हालांकि हाल पाकिस्तान का भी अपने मुल्क समान ही है। कराची हाईकोर्ट के सामने लगी महात्मा की प्रतिमा को कुछ धर्मांधों ने तोड़ डाला था। लाला लाजपत राय की प्रतिमा को भी वहां तोड़ा गया। जाहिर है राजनेता अपनी राजनीति को चमकाने के लिए भावनाएं भड़काने का काम दोनों ही देशों में करते रहते हैं। जरूरत इस बात को समझने की है कि क्यों दशकों से टंगी एक तस्वीर को पैमाना बना आज राष्ट्रीयता को मापा जा रहा है। इसके पीछे एकमात्र बड़ा कारण है असल मुद्दों से लेकर भटकाव करवाना भर है। बहस होनी चाहिए भूख पर] भ्रष्टाचार पर] समाज के हिंसक होते जाने पर] बहस का मुद्दा है कि पिछले चार वर्षों में प्रधानमंत्री रहते नरेंद्र मोदी किन&किन जन अपेक्षाओं पर खरे उतर पाए हैं और कहां वे विफल रहे। लेकिन इन मुद्दों पर बहस हमारे राजनेताओं को रास आती नहीं] इसलिए जिन्ना की तस्वीर जैसी व्यर्थ की बातों को तरजीह दी जाती है ताकि जनता जनार्दन का फोकस असल से हटकर नकली पर केंद्रित रहे।

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,क्या उत्तराखंड में ऐसी कोई सरकार आयेगी जो जंगलों को जलने से रोक सके

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  • गुंजन कुमार

बॉलीवुड और क्रिकेट का संबंध अब प्रगाढ़ होते जा रहे हैं। पुराने समय से क्रिकेटर्स और बॉलीवुड की अभिनेत्रियां एक दूजे के होते रहे हैं। आईपीएल

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