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vad 50 02-06-2018
 
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आसान नहीं राह
  • गुंजन कुमार

गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग तो हो रही है] लेकिन किसी भी सरकार के लिए यह काम इतना आसान नहीं। सरकार राजनीतिक] सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को ध्यान में रखकर ही कोई फैसला ले पाएगी

 

देश की आजादी से ठीक १७ साल पहले ¼२३ अप्रैल १९३० को½ वीर चंद्र सिंह ^गढ़वाली^ ने स्वतंत्रता की मांग कर रहे निहत्थे पठानों पर गोलियां चलाने के ब्रिटिश आदेश को मानने से इनकार कर दिया था। इस बगावत को इतिहास में ^पेशावर कांड^ के नाम से जाना जाता है। अलग उत्तराखण्ड राज्य बने १७ साल हो गए हैं। मगर पेशावर कांड के उस हीरो के नाम पर उत्तराखण्ड की राजधानी बनाने का सपना अधूरा है। राज्य आंदोलन के समय ही आंदोलनकारियों ने उनके नाम पर गैरसैंण ¼चंद्रनगर½ को राजधानी kksf"kr कर दिया था। मगर गैरसैंण आज तक प्रदेश की राजधानी नहीं बन पाया। गैरसैंण को राजधानी बनाने का आंदोलन पहाड़ से लेकर देहरादून और दिल्ली तक अभी भी हो रहा है। ६ मई को दिल्ली में उत्तराखण्ड एकता मंच ने प्रदर्शन किया। गैरसैंण में १५० दिनों से ज्यादा समय से अनशन जारी है। इसके बावजूद सरकार दबाव में नहीं दिख रही है।

बहरहाल राजधानी का मुद्दा फिर से गर्माता जरूर दिख रहा है। गैरसैंण में आंदोलनकारी अनशन पर बैठे हैं। देहरादून] श्रीनगर रुद्रप्रयाग में भी छोटे&छोटे आंदोलन हो रहे हैं। छह मई को दिल्ली में उत्तराखण्ड के प्रवासियों ने उत्तराखण्ड एकता मंच के बैनर तले जंतर&मंतर पर हुंकार रैली निकाली। हजारों प्रवासी उत्तराखण्डी इसमें शामिल हुए। उनकी हुंकार देहरादून तक पहुंची या नहीं यह तो भविष्य में पता चलेगा। लेकिन प्रदेश से बाहर रह रहे उत्तराखण्ड के लोग भी गैरसैंण पर एकजुट होकर सड़कों पर निकल रहे हैं। गैरसैंण को स्थायी राजधानी kksf"kr किए जाने की मांग लगातार हो रही है।

उत्तराखण्ड का कुल क्षेत्रफल ५३]४८३ वर्ग किलोमीटर है। जिनमें ४६]०३५ वर्ग किलोमीटर पहाड़ी क्षेत्र है। शेष सिर्फ ७]४४८ वर्ग किलोमीटर मैदानी क्षेत्र है। प्रदेश का ८६ प्रतिशत हिस्सा पहाड़ी होने के बावजूद कोई भी सरकार पहाड़ पर राजधानी बनाने का फैसला क्यों नहीं ले पा रही है। जबकि प्रदेश के दोनों मुख्य दल ¼भाजपा&कांग्रेस½ ही सत्ता में रहे हैं। राज्य आंदोलन से निकला उक्रांद भी दो सरकार में इनके साथ शामिल रहा है। इसे ही समझने की जरूरत है। दरअसल] कोई भी सरकार कोई बड़ा फैसला तीन कारणों को ध्यान में रखकर लेती है। जिसमें सबसे पहला और महत्वपूर्ण है] राजनीति। यानी उस फैसले से प्रदेश की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा। सत्ताधारी पार्टी को कहीं राजनीतिक नुकसान तो नहीं पहुंचेगा। दूसरा] उस फैसले से सामाजिक प्रभाव क्या पड़ेगा। तीसरा है] आर्थिक प्रभाव। अब गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने से इन तीन क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा इसे देखते हैं।

राजनीतिक प्रभाव % अलग राज्य बनने के बाद पहली बार २००१ में निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन हुआ। पहले विधानसभा चुनाव में पहाड़ पर ४१ और मैदान में २९ विधानसभा सीटें थी। २००७ में यही स्थिति थी। मगर २००८ में दूसरा परिसीमन हुआ। जिससे पहाड़ की विधानसभा सीटें द्घटकर ३५ रह गई। आज पहाड़ और मैदान में ३५&३५ विधानसभा सीटें हैं। ऐसे में यदि कोई सरकार राजधानी को देहरादून से उठाकर गैरसैंण ले जाती है तो मैदान के वोटर का नाराज होने का डर सरकार को सताता है। सिर्फ यही नहीं देहरादून से सटे पहाड़ी जिलों मसलन उत्तरकाशी] टिहरी और पौड़ी की कुल १५ विधानसभा सीटों में से १२ सीटें 

देहरादून से ज्यादा नजदीक हैं। ऐसे में यहां के निवासियों को 

देहरादून आना&जाना ज्यादा आसान लगता है। राजनीतिक दलों को इन लोगों का भी भय है कि कहीं यहां के मतदाता नाराज न हो जाएं। इस तरह राजनीतिक दल ७० में से ४७ सीटों के मतदाताओं को नाराज कर चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं।

सामाजिक प्रभाव % गैरसैंण का समर्थन करने वालों का का तर्क है कि गैरसैंण प्रदेश के सेंटर में और पहाड़ पर है। इसलिए राजधानी वहीं होनी चाहिए। जबकि कुल तेरह जिलों में से 

देहरादून] हरिद्वार] उधमसिंह नगर] उत्तरकाशी] टिहरी] पौड़ी जिले के लोगों को गैरसैंण से करीब देहरादून लगता है। इसलिए बताया जाता है कि गैरसैंण आंदोलन में इन जिलों के लोगों की भागीदारी न के बराबर है। जबकि करीब दो तिहाई आबादी इन्हीं छह जिलों में रहती है। इसलिए भी राजनीतिक दल इस पर कोई फैसला नहीं ले रहे हैं।

आर्थिक प्रभाव % उत्तराखण्ड पर कर्ज का शिकंजा हर साल कसता जा रहा है। वित्तीय वर्ष २०१८&१९ में कर्ज का बोझ बढ़कर ४७५८० करोड़ से ज्यादा होने जा रहा है। राज्य गठन के समय ४४३० करोड़ कर्ज हिस्से में आया था। यानी १७ साल में करीब ४३००० करोड़ रुपए कर्ज के बढ़े हैं। आज स्थिति यह है कि प्रदेश सरकार को अपने कर्मचारियों काे वेतन&भत्ता देने के लिए भी कर्ज लेना पड़ता है। ऐसे में छोटे से पहाड़ी राज्य की कोई भी सरकार नई राजधानी विकसित करने के लिए ५०० से १००० करोड़ रुपए अतिरिक्त बोझ झेलने का साहस नहीं जुटा पा रही है।

प्रदेश के दोनों मुख्य राजनीतिक दल विपक्ष में रहने पर तो गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने की बात करते हैं] मगर जब सत्ता में आते हैं तो इस मुद्दे से दूर ही रहना चाहते हैं। पहले की सरकारें आयोग के बहाने इस मुद्दे से पीछा छुड़ाती रहीं। पिछली दो सरकारों से गैरसैंण में विधानसभा सत्र का आयोजन कर पहाड़ी लोगों को लुभाने की कोशिश हो रही है। सर्व प्रथम हरीश रावत सरकार ने विधानसभा के दो सत्र गैरसैंण में टेंट में चलाए। उन्होंने वहां विधानसभा भवन बनवाया। अब त्रिवेंद्र सरकार ने गैरसैंण में विधानसभा का बजट सत्र कर पहाड़ी लोगों को लुभाया है। विधानसभा भवन] विधायक और अधिकारियों का आवास बन जाने के बाद कम से कम यह तो जरूर कहा जा सकता है कि प्रदेश ने राजधानी के मामले में एक कदम आगे जरूर बढ़ाया है। इसलिए कुछ लोग यह मान के चल रहे हैं कि गैरसैंण स्थाई राजधानी बने या न बने मगर आज न कल ग्रीष्मकालीन राजधानी जरूर बनकर रहेगी।

 

‘सरकार ले निर्णय

पूर्व eq[;ea=h हरीश रावत से बातचीत

कोई भी सरकार गैरसैंण को राजधानी बनाने का निर्णय क्यों नहीं ले पा रही है

अभी वहां वैकिल्पक व्यवस्था नहीं है। बिना व्यवस्था किए यदि राजधानी देहरादून से गैरसैंण शिफ्ट कर दी गई तो वह मोहम्मद बिन तुगलक जैसा फरमान होगा। हमने वहां विधानसभा भवन] विधायक और अधिकारी आवास बना दिए। सचिवालय के लिए भी ५५ करोड़ मैंने मंजूर कर दिए थे। आज जमी&जमाई सरकार है] उसको इस पर फैसला लेना चाहिए।

२००८ के परिसीमन के बाद प्रदेश का राजनीतिक भूगोल बदल गया है। क्या किसी सरकार में फैसला लेने का साहस है

करीब चार सीटों को छोड़कर शेष सभी विधानसभा सीटों में एक हजार से २० हजार तक गैरसैंण समर्थक मतदाता हैं। इसलिए कोई परेशानी नहीं होगी।  

 

^सही समय पर होगा निर्णय^

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अजय भट्ट से बातचीत

गैरसैंण कब बनेगा राजधानी

गैरसैंण में विधानसभा भवन बन गया है। विधायक आवास और अधिकारियों के हॉस्टल भी बन गए हैं। हमारी सरकार ने पहली बार गैरसैंण में एक सप्ताह तक बजट सत्र चलाया। जिसमें पहाड़ के विकास कार्य के कई बिल पास कराए गए। हमारी सरकार ने पहाड़ और मैदान के समग्र विकास का संकल्प लिया है। 

आपकी सरकार गैरसैंण को राजधानी kksf"kr करेगी] इसका सीधा जवाब नहीं दिया

राजधानी बनाने के लिए वहां ढांचागत विकास होना जरूरी है। हमारी सरकार उस पर काम कर रही है। समय आने पर सरकार उस पर अवश्य निर्णय लेगी। हमें उम्मीद है कि सरकार पहाड़ी प्रदेश के हित में ही फैसला लेगी।

क्या गैरसैंण राजधानी बनना प्रदेश हित में नहीं है

यह मैंने कब कहा] मैं तो कहा रहा हूं कि गैरसैंण पर सरकार अवश्य निर्णय लेगी। यदि सरकार की मंशा गैरसैंण को लेकर ठीक नहीं होती तो क्या वह यहां बजट सत्र करती। यहां के विकास के लिए सरकार चिंतित है और उस पर काम कर रही है।

 

^गैरसैंण राज्य की आत्मा^

वरिष्ठ पत्रकार और आंदोलनकारी पुरुषोत्तम असनोड़ा से बातचीत 

प्रदेश में गैरसैंण मुद्दे से बड़ी&बड़ी कई समस्याएं हैं। आप लोग गैरसैंण से बाहर क्यों नहीं आ पा रहे हैं

प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों की समस्या दूर करने का रास्ता गैरसैंण से होकर ही गुजरता है। हमारे सारे विधायक देहरादून में रहते हैं। कोई मंत्री पहाड़ चढ़ना नहीं चाहता। अधिकारी देहरादून से बाहर नहीं निकलते। जब वे ही पहाड़ नहीं चढ़ेंगे तो उनसे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे डॉक्टरों और टीचरों को पहाड़ चढ़ने के आदेश देंगे। समस्या का मूल यही है।

क्या गारंटी है कि गैरसैंण राजधानी बनने के बाद सभी समस्याएं हल हो जाएंगी 

जब eq[;ea=h] मंत्री] विधायक और अधिकारी सभी पहाड़ पर रहेंगे तो वे यहां की समस्याओं को जानेंगे। पहाड़ की समस्या को महसूस करेंगे। जब ये सब पहाड़ पर होंगे तो डॉक्टर] शिक्षक कहां जाएंगे तब सभी पहाड़ पर ही रहेंगे

गैरसैंण में विधानसभा भवन बन तो गया

अभी विधानसभा भवन नहीं है। वे लोग सत्र के नाम पर गैरसैंण में पिकनिक मनाने के लिए इक्ट्ठा होते हैं।

क्या गैरसैंण भावनात्मक मुद्दा बन गया है 

गैरसैंण इस राज्य की आत्मा है। यह सिर्फ भावनात्मक मुद्दा नहीं है] बल्कि वैज्ञानिक और भौगोलिक दृष्टि से यह जरूरी  है। जब प्रदेश का ८६ फीसदी हिस्सा पहाड़ी है तो राजधानी भी पहाड़ में ही होनी चाहिए। सरकार तर्क देती है कि गैरसैंण में भूगर्भीय खतरों की संभावनाएं काफी ज्यादा हैं। इसलिए यहां राजधानी नहीं होनी चाहिए। लेकिन आज तक गैरसैंण में कोई बड़ी प्राकूतिक आपदा नहीं आई है। २०१३ में भी आपने देखा होगा। जब दिल्ली के लिए हरिद्वार से पानी जा सकता है तो हमारी राजधानी के लिए २५ किलोमीटर से क्यों नहीं आ सकता।

 

‘सरकार ले निर्णय

पूर्व eq[;ea=h हरीश रावत से बातचीत

कोई भी सरकार गैरसैंण को राजधानी बनाने का निर्णय क्यों नहीं ले पा रही है

अभी वहां वैकिल्पक व्यवस्था नहीं है। बिना व्यवस्था किए यदि राजधानी देहरादून से गैरसैंण शिफ्ट कर दी गई तो वह मोहम्मद बिन तुगलक जैसा फरमान होगा। हमने वहां विधानसभा भवन] विधायक और अधिकारी आवास बना दिए। सचिवालय के लिए भी 55 करोड़ मैंने मंजूर कर दिए थे। आज जमी-जमाई सरकार है] उसको इस पर फैसला लेना चाहिए।

2008 के परिसीमन के बाद प्रदेश का राजनीतिक भूगोल बदल गया है। क्या किसी सरकार में फैसला लेने का साहस है

करीब चार सीटों को छोड़कर शेष सभी विधानसभा सीटों में एक हजार से 20 हजार तक गैरसैंण समर्थक मतदाता हैं। इसलिए कोई परेशानी नहीं होगी।  

gunjan@thesundaypost.in

 
         
 
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,क्या उत्तराखंड में ऐसी कोई सरकार आयेगी जो जंगलों को जलने से रोक सके

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  • दिकदर्शन रावत

प्रिया शर्मा की कहानी में कई पेंच हैं] कई ऐसे मोड़ हैं] पूरे प्रकरण में कोहरे की इतनी गहरी परत है] जिसके चलते सच को तलाश पाना खासा मुश्किल काम

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