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जनपदों से 
 
हवा में झूलता विकास

 

  • जसपाल नेगी

 

झूला पुल के टूटने पर लोग वर्षों से जान जोखिम में डालकर नदी पार करते आ रहे हैं। कई ग्रामीण पलायन तक कर चुके हैं। लेकिन देश-प्रदेश को संवारने का दंभ भरने वाले पौड़ी जिले के दिग्गज नेता इसके जीर्णोद्धार के बजाए मोटर मार्ग बनाने का आश्वासन देकर ग्रामीणों के साथ धोखा करते रहे हैं

 

पौड़ी। मौजूदा दौर की सरकार जनहित में कार्य करने के बजाए कॉरपोरेट घरानों के बैलेंस सीट की तर्ज पर कार्य करती है। जिस प्रकार निजी कंपनी नफा-नुकसान के आधार पर अपने प्रोडक्ट को बाजार में उतारती है। ठीक उसी प्रकार से आज की सरकारें और जनप्रतिनिधि क्षेत्र विशेष में वोटरों की संख्या एवं अपना वोट बैंक को देखकर विकास कार्य करते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो पौड़ी तहसील के करीब चार सौ मतदाताओं वाले बड़खोलू गांव को जिला मुख्यालय से जोड़ने के लिए सरकार तीन साल से क्षतिग्रस्त झूला पुल का मरम्मत कार्य करा ही देती। महज चार सौ मतदाताओं की खातिर शायद सरकार राजकोष पर भार नहीं डालना चाहती। तभी तो इस गांव का सम्पर्क वर्षों से दूसरे क्षेत्रों से कटा हुआ है और शासन-प्रशासन कुंभकरणी नींद से जग नहीं पाया है।

 

उत्तराखण्ड के सुदूर गावों में बसे ग्रामीण किन हालात में जिंदगी बसर करते हैं इसकी परवाह न नौकरशाहों को होती है और न ही ग्रामीणों द्वारा चुने नुमाइंदों को। अस्थाई राजधानी देहरादून की चकाचौंध के बीच पहुंचकर यहां के नेता कैसे अपनी जनता की परिस्थितियों से बेखबर हो जाते हैं यह सवाल हैरान कर देने वाला है। उत्तराखण्ड की राजनीति में सबसे अधिक नेता पौड़ी जनपद से ही हैं। दोनों प्रमुख पार्टियों (कांग्रेस-भाजपा के अधिकतर वरिष्ठ नेता इसी जनपद से हैं। वर्तमान मुख्यमंत्री सहित पिछली सरकार के दोनों मुख्यमंत्री इसी जनपद से थे। इसके बावजूद एनएच-११९ पर स्थित सतपुली कस्बे से महज पांच किलोमीटर दूर बसा बड़खोलू गांव यहां की सरकारी तंत्र की विद्रूपताओं का एक उदाहरण बना हुआ है। ढाई साल पहले तक इस गांव में आम पहाड़ी गांवों की तरह सामान्य जीवन चल रहा था। सतपुली-बांद्घाट-पौड़ी मुख्यमार्ग की दूसरी ओर नयार नदी के पार बसे इस गांव तक जाने के लिए दशकों पूर्व एक झूला पुल बनाया गया था। यह झूला पुल गांव के लिए जीवनरेखा के समान था। आवाजाही से लेकर राशन पानी व अन्य जरूरी सामान की आपूर्ति भी इस पुल के जरिए ही संभव हो पाती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। ढाई वर्षों से इस गांव के बाशिंदे रोज अपनी जिंदगी जोखिम में डाल जिंदगी बसर करने का जुगाड़ कर रहे हैं।

 

दरअसल वर्ष २०१० में सितंबर माह की १७ और १८ तारीख को समूचे उत्तराखंड में भारी बारिश के कारण व्यापक तबाही हुई थी। इसी बारिश में बड़खोलू गांव के लिए बना झूला पुल भी उफनती नयार नदी के प्रचंड वेग को नहीं सह पाया। इस झूला पुल के लिए बनी अप्रोच सीढ़ियां नदी के बहाव के साथ बह गईंजबकि पुल की फर्श पर बिछाए गए लकड़ी के तख्तों का नामो- निशान तक नहीं रहा। बड़खोलू और इसके दो अन्य गांवों की तकरीबन एक हजार की आबादी देश-दुनिया से अलग-थलग पड़ गई। आपदा राहत एवं पुनर्वास के नाम पर करोड़ों के बजट आने की खबरें इस गांव के बाशिंदों ने भी सुनी लेकिन यह सब इनके लिए बेमानी था। महज कुछ हजार रुपए में आवाजाही के लिए तैयार होने वाला झूला पुल आज भी जस का तस है। 

 

झूला पुल क्षतिग्रस्त होने और आज तक उसका मरम्मत कार्य नहीं होने के कारण लोग अब गांव से पलायन करने को मजबूर हो गए हैं। गांव के युवा संजय कुमार पुल क्षतिग्रस्त होने से पूर्व परिवार के साथ गांव में ही रहा करते थे। उनके बच्चे पुल पार कर सतपुली स्थित प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने जाते थे लेकिन पुल टूटने के बाद संजय कुमार को बच्चों की पढ़ाई की खातिर गांव से पलायन को मजबूर होना पड़ा। संजय कहते हैं- ग्राम प्रधान सहित पूरे गांव के लोगों ने कई बार प्रशासन से मिलकर झूला पुल की मरम्मत कराने का आग्रह किया लेकिन प्रशासन ने वहां मोटर पुल बनाने का आश्वासन देकर हमें वापस भेज दिया। ढाई साल से कुछ नहीं हुआ। मजबूरन अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए हमें पलायन करना पड़ा। संजय उदाहरण मात्र हैं दरअसल ऐसे दर्जनों मामले गांव में देखने को मिल रहे हैं। अब तो हालात ये हैं कि केवल आर्थिक रूप से बेहद गरीब परिवार ही मजबूरन गांव में रह रहे हैं।

 

बीते ढाई वर्ष में सरकार के प्रयासों का उल्लेख भी कर लिया जाए। जिले के लोक निर्माण विभाग ने झूला पुल की मरम्मत के बजाए ग्रामीणों को इस स्थान पर मोटरपुल की स्वीकूति के बबत जारी शासनादेश का झुनझुना थमा दिया। लकड़ी के फट्टों पर चलकर नदी पार कर रहे ग्रामीणों का कहना है कि मोटरपुल के शासनादेश के नाम पर झूला पुल की मरम्मत से मुंह मोड़ना अफसरों व नेताओं के मानसिक दीवालियेपन का उदाहरण है। ग्रामीण इसे उनके साथ भद्दा मजाक करार देते हुए कहते हैं कि यदि शासनादेश के मुताबिक मोटरपुल का निर्माण होता भी है तो इसमें कम से कम चार से पांच साल लगेंगे क्या तब तक ग्रामीण अपनी जान जोखिम में डालते रहेंगे। शासन-प्रशासन के इन तुगलकी फरमान से आहत ग्रामीण बेहद लाचार और निराश हैं।

 

हेरोइन के साथ छात्र गिरफ्तार

सितारगंज (उधमसिंह नगर। कोतवाली पुलिस ने ८ मई को चार सौ ग्राम हेरोइन के साथ कानून की पढ़ाई कर रहे छात्र को गिरफ्तार किया। पुलिस ने बरामद हेरोइन की कीमत लगभग चार करोड़ रुपये आंकी है। कोतवाल भूपेन्द्र सिंह धौनी ने बताया कि पुलिस को मुखबिर ने सूचना दी कि खटीमा चौक पर एक युवक हेरोइन की तस्करी करने के फिराक में है। पुलिस क्षेत्राधिकारी खटीमा जेएस पांगती कोतवाल एसआई दिनेशनाथ मतलूब खान उमेश राज दिलबर सिंह जगदीश लोहनी ने खटीमा चौक पर घेराबंदी कर एक संदिग्ध युवक को हिरासत में ले लिया। तलाशी लेने पर छात्र के कब्जे से ४०० ग्राम हेरोइन बरामद हुई। कोतवाल भूपेन्द्र सिंह धौनी ने बताया कि पकड़ा युवक राजस्थान का रहने वाला है और देहरादून में एलएलबी का छात्र है। 

 

 

 
         
 
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