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आवरण कथा
 
एनडी के बहाने ब्राह्मणों को रिझाने का प्रयास

 

 

  • अपूर्व जोशी

 

उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में इस समय सभी दलों के बीच सवर्ण मतों के ध्रुवीकरण को लेकर संघर्ष तेज हो गया है। जाहिर है इसके चलते नारायण दत्त तिवारी एक बार फिर राजनीतिक दृष्टि से प्रासंगिक हो चले हैं। कांग्रेस के रणनीतिकारों को यह समझ में आ गया है कि यदि दोबारा सवर्ण और अल्पसंख्यक उसके साथ जुड़ जाते हैं तो शायद २०१४ के चुनाव में उसकी स्थिति कुछ बेहतर हो जाये। तिवारी से इसी मुद्दे पर कांग्रेस आलाकमान ने चर्चा की है। तिवारी के एक करीबी की मानें तो सोनिया गांधी ने उनसे उत्तर भारत में कांग्रेस के घटते जनाधार पर चर्चा की और मार्गदर्शन भी चाहा। लेकिन इसके साथ ही इन चर्चाओं ने भी जोर पकड़ा है कि ब्राह्माण वोट बैंक को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए तिवारी को किसी सम्मानजनक पद पर प्रतिष्ठित किया जा सकता है। जानकारों के अनुसार एनडी को दोबारा राज्यपाल बनाने का प्रस्ताव स्वयं तिवारी ने खारिज कर दिया है। ऐसे में इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि पार्टी के लिए बोझ बनते जा रहे उत्तराखण्ड के वर्तमान सीएम को बाहर का रास्ता दिखा कहीं कांग्रेस आलाकमान तिवारी को तो यह जिम्मेदारी नहीं सौंपने जा रहा? राजनीतिक दृष्टि से यह कांग्रेस के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकता है

 

नारायण दत्त तिवारी एक बार फिर से राजनीति में सक्रिय होने जा रहे हैं। हालांकि इस कथन से कइयों को आपत्ति हो सकती है कि भला तिवारी निष्क्रिय कब हुए थे? जो ऐसा मानते हैं वे भी अपनी जगह सही हैं लेकिन यह कथन भी गलत नहीं कि पिछले कुछ अरसे से नारायण दत्त राष्ट्रीय राजनीति में हाशिये पर धकेल दिए गए थे। ऐसा होने के पीछे कई कारण रहे जिन पर बहुत कुछ कहा-सुना जा चुका है और नया कुछ कहने को बचा नहीं है। नया हैअट्ठासी बरस के इस चिर युवा का एक बार फिर से राजनीति के अखाड़े में ताल ठोंकना और कांग्रेस आलाकमान की इसमें मौन सहमति होना। तिवारी पिछले दिनों कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिले। उनकी इस मुलाकात के कई अर्थ निकाले जा रहे हैं। लम्बे अरसे से कांग्रेस नेतृत्व द्वारा उपेक्षित एनडी को अचानक दिल्ली दरबार का बुलावा आना मात्र मिजाज पुरसी तो हो नहीं सकता। तब क्या कारण है कि आजीवन कांग्रेस के वफादार सेवक बन कर रहे नारायण दत्त को राजनीतिक वनवास में भेज चुका कांग्रेस आलाकमान अचानक इतना मेहरबान हो गया कि न केवल कांग्रेस अध्यक्ष ने उनसे लम्बी मुलाकात की बल्कि दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में उनकी वापसी के संकेत भी तेजी से उछले? इससे इस संभावना को बल मिलता है कि कांग्रेस २०१४ के आम चुनाव से ठीक पहले कुछ ऐसा अवश्य करने जा रही है जिससे कि उससे छिटक पहले भाजपा फिर बसपा और उसके बाद सपा का दामन पकड़ चुका एक बड़ा ब्राह्मण वोट बैंक वापस उसके साथ आ जाये।

 

पंडितजी को दिल्ली दरबार का बुलावा इसी रणनीति का हिस्सा है। यानी कांग्रेस तिवारी को साध ब्राह्मण मतदाता को रिझाने का प्रयास करने जा रही है। और बात केवल एनडी तक ही सीमित नहीं बल्कि मध्य प्रदेश के दिग्गज कांग्रेसी नेता विद्या चरण शुक्ला के दिन भी बहुरने वाले हैं। कांग्रेस आलाकमान के सलाहकारों का मानना है कि इन दो बुजुर्ग नेताओं की वापसी का सीधा असर २०१४ के आम चुनाव में देखने को मिल सकता है। उनके इस आकलन में खराबी भी नहीं है। देश की संसद को ८० सांसद देने वाले उत्तर प्रदेश में पिछले दो आम चुनाव ब्राह्मण को सामने रख लड़ गए। इसको इससे समझा जा सकता है कि २००७ के विधानसभा चुनाव में बसपा ने ८० ब्राह्मण प्रत्याशी मैदान में उतारे थे तो २०१२ के चुनाव में उसके ७४ ब्राह्मण प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे। २०१२ के चुनावों में बम्पर जीत दर्ज करने वाली समाजवादी पार्टी ने ५० ब्राह्माणों को टिकट दिया जिसमें से २१ विधायक बन गए। बसपा के लोकसभा और राज्यसभा में १० सांसद ब्राह्मण हैं। मायावती के खासमखास सिपहसलार सतीश चन्द्र मिश्र इन दिनों पूरे उत्तर प्रदेश का दौरा इसी ब्राह्मण वोट को वापस पाने के लिए कर रहे हैं। उनकी हर सभा में इस पर जोर रहता है कि कैसे १६ प्रतिशत ब्राह्मण वोटर और २४ प्रतिशत दलित वोटर एक हो जाएं। बसपा की इस छटपटाहट को मुलायम सिंह यादव भली भांति समझ-बूझ रहे हैं। उन्होंने इसकी काट करने की लिए कट्टर समाजवादी रहे जनेश्वर मिश्र तक को जातीय राजनीति के दलदल में धकेलने से गुरेज नहीं किया। वे लखनऊ में ३६० एकड़ में पंडित जनेश्वर मिश्र के नाम पर पार्क बनाने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को पाठ्यक्रम में शामिल करने से लेकर परशुराम जयंती को सार्वजनिक अवकाश घोषित करने तक ऐसा हर कदम उठाने से परहेज नहीं करते नजर आ रहे जिसके चलते वे इस विशाल वोट बैंक पर अपनी पकड़ मजबूती के साथ बनाये रख सके। अपनी इसी रणनीति के तहत उन्होंने नारायण दत्त तिवारी को भी साधने का प्रयास किया। इसकी शुरुआत १८ अक्टूबर २०१२ से हुई जब देहरादून के फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के एक खंडहर से भूत बंगले में निर्वासित जीवन बिता रहे तिवारी के जन्मदिन को भले ही उनकी अपनी पार्टी के दिग्गजों ने भुला दिया लेकिन मुलायम सिंह यादव ने नहीं भुलाया। न केवल मुलायम ने स्वयं तिवारी को मुबारकबाद दी बल्कि देहरादून छोड़ लखनऊ आने का न्यौता भी दे डाला। बतौर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री तिवारी को आवंटित लखनऊ स्थित बंगले को न केवल अखिलेश यादव सरकार ने सजाया-संवारा बल्कि तिवारी को पूरा राजकीय सम्मान भी दिए जाने के निर्देश प्रशासन को दिए। इससे ब्राह्मणों में सपा की पकड़ मजबूत हुई है तो दूसरी तरफ कांग्रेसी खेमे में बेचैनी बढ़ने लगी है।

 

दरअसल उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में इस समय सभी दलों के बीच सवर्ण मतों के ध्रुवीकरण को लेकर संघर्ष तेज हो गया है। जाहिर है नारायण दत्त तिवारी इस सबके चलते एक बार फिर से राजनीतिक दृष्टि से प्रासंगिक हो चले हैं। कांग्रेस के रणनीतिकारों को यह समझ में आ गया है कि यदि एक बार फिर से सवर्ण और अल्पसंख्यक उसके साथ जुड़ जाते हैं तो शायद २०१४ के चुनाव में उसकी स्थिति कुछ बेहतर हो जाये। तिवारी से इसी मुद्दे पर कांग्रेस आलाकमान ने चर्चा की। तिवारी के एक करीबी की माने तो सोनिया गांधी ने उनसे उत्तर भारत में कांग्रेस के घटते जनाधार पर चर्चा की और मार्गदर्शन भी चाहा। लेकिन इसके साथ ही इन चर्चाओं ने भी जोर पकड़ा है कि ब्राह्मण वोट बैंक को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए तिवारी को किसी सम्मानजनक पद पर प्रतिष्ठित किया जा सकता है। जानकारों के अनुसार एनडी को दोबारा राज्यपाल बनाने का प्रस्ताव स्वयं तिवारी ने खारिज कर दिया है। ऐसे में इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि पार्टी के लिए बोझ बनते जा रहे उत्तराखण्ड के वर्तमान सीएम को बाहर का रास्ता दिखा कहीं कांग्रेस आलाकमान तिवारी को तो यह जिम्मेदारी नहीं सौपने जा रहा? राजनीतिक दृष्टि से यह कांग्रेस के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकता है। अब तक के सभी ६ मुख्यमंत्रियों में तिवारी का प्रदर्शन हर तरह से बेहतर रहा है। उनके समय में राज्य में सबसे ज्यादा पूंजी निवेश हुआ और रोजगार के अवसर भी सबसे ज्यादा बढ़े। हालांकि भ्रष्टाचार में भी उनके कार्यकाल में खासा इजाफा हुआ था लेकिन सिटूर्जिया और जलविद्युत परियोजनाओं में जैसी धांधली भाजपा सरकारों के कार्यकाल में देखी गयी और जिस प्रकार की खुली लूट का माहौल बहुगुणा के शासनकाल में देखने को मिल रहा है उसे देखते हुए एनडी तिवारी अब तक के सब से बेहतर मुख्यमंत्री साबित हुए हैं। उत्तराखण्ड राजनीतिक रूप से कांग्रेस के लिए ज्यादा महत्व नहीं रखता। मात्र पांच संसदीय सीटों वाले इस राज्य में तिवारी की ताजपोशी का रिस्क कांग्रेस उठा सकती है क्योंकि यदि यह दांव चल गया तो उसे देश भर में और विशेष रूप से हिंदी भाषी राज्यों में सवर्ण मतों का फायदा पहुंच सकता है जो दिनों-दिन पतली हो रही उसकी हालत को राहत देने और २०१४ में सत्ता करार रखने का कारण भी बन सकता है।

 

 

 
         
 
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