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vad 7 05-08-2017
 
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प्रदेश 
 
चाहिए लंबी रेस के घोड़े

 

  • दाताराम चमोली

 

राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सियासी पार्टियों से उत्तराखण्ड की जनता का मोहभंग हो चुका है। उसे नये नेतृत्व की तलाश है। निकाय चुनावों में उसने निर्दलीय प्रत्याशियों पर भरोसा जताया है। अब यह उन पर निर्भर करता है कि वे विधायकों की तरह सत्ता की मलाई चाटने में ही मशगूल रहते हैं या फिर जनमत का सम्मान करते हुए भविष्य में बेहतर नेतृत्व देंगे

 

उत्तराखण्ड के निकाय चुनावों में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सियासी पार्टियों को नकार कर लोगों ने जो जनमत दिया उस पर विचार मंथन करने के बजाय ये पार्टियां अपने-अपने तरीके से चुनाव परिणाम से ध्यान हटाने में जुट गई हैं। सत्तारूढ़ कांग्रेस के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा जनता के लिए कुछ ज्यादा ही चिंतित हो उठे हैं। शासन को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए उन्होंने नौकरशाहों के विभाग बदल डाले। और तो और जो काम जनता को करना था वह खुद बहुगुणा और उनके समर्थक कांग्रेस विधायक करने लगे हैं। गोमुख से लेकर उत्तरकाशी तक के क्षेत्र को ईको सेंसिटिव जोन बनाए जाने को लेकर उन्हें स्थानीय लोगों के हक-हकूक छिन जाने और विकास की भारी चिंता हो गई है। वे अपनी ही पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के गजट नोटिफिकेशन के खिलाफ बतौर आंदोलनकारी खड़े हो गए हैं। ऐसे में सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि क्या बहुगुणा और उनके समर्थक विधायकों की चिंता जनता के बहाने उन बांध परियोजनाओं के मालिकों स्टोन क्रशरों और प्रदूषण फैलाते उद्योगों के पक्ष में तो नहीं जिन्हें हजारों करोड़ रुपए का नुकसान होने की आशंका है? 

 

भारतीय जनता पार्टी चुनाव नतीजों से उत्साहित है। देहरादून और कुछ अन्य निकायों में मिली विजय से पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव में भी बेहतर परिणाम मिलने की संभावनाएं देख रही है। लेकिन पार्टी के नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि ३६८ वार्डों में निर्दलीय ही विजयी रहे। जिनके पास न तो धनबल था और न ही बाहुबल। उनके पास न चुनावों में बांटने को शराब थी और न सियासत में कोई उनके आका ऊंचे ओहदों पर थे। कई युवा बहुत छोटी उम्र में निर्दलीय पार्षद और चेयरमैन बने। सियासत में शराब और पैसा हावी हो चुका है यह धारणा इन चुनावों में टूटी है। 

 

दरअसल सियासी पार्टियों से जनता का भरोसा टूटता जा रहा है। क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों का यह रवैया जनता को खलता रहा है कि चुनावों के वक्त इन पार्टियों के नेता जनहित के बड़े-बड़े वादे करते हैं लेकिन बाद में ऐसे मनमाने फैसले लेते हैं जो बिल्कुल ही जनविरोधी होते हैं। आलाकमान ऐसे नेताओं को जनता पर थोप देते हैं जो राज्य को अपनी जागीर समझ लेते हैं या फिर लूट-खसोट में मशगूल हो जाते हैं। उनकी प्रतिबद्धता राज्य की जनता के प्रति नहीं होती बल्कि वे अपने आलाकमान के नौकर बने रहने में ही भलाई समझते हैं।

 

राज्य में कांग्रेस-भाजपा के खिलाफ तीसरा विकल्प खड़ा करने में जुटी बसपा और क्षेत्रीय पार्टियां जनता का विश्वास हासिल करने में निकायों में बुरी तरह नाकाम रही हैं। उत्तराखण्ड क्रांति दल और उत्तराखण्ड रक्षा मोर्चा आदि क्षेत्रीय दलों के नेताओं को अहसास हो जाना चाहिए कि उनसे सैकड़ों गुना ज्यादा भरोसा जनता ने निर्दलीय उम्मीदवारों में जताया है। क्या वे इस पर आत्म-मंथन करेंगे कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि राज्य की जनता नया विकल्प तो चाहती हैलेकिन इसमें वे क्यों नहीं हैं? इन दोनों क्षेत्रीय दलों के नेता सरकार में ऊंचे ओहदों पर रहे हैं या आज भी हैं। इसके बावजूद निकाय चुनावों में इनके प्रत्याशी निर्दलीय प्रत्याशियों के मुकाबले कहीं नहीं ठहरे। यह कटु सत्य है कि सत्ता की मलाई चाटने और अपने निजी स्वार्थों के चलते क्षेत्रीय दलों के नेताओं ने आज अपने संगठनों की दुर्गति कर दी है। जनता उन पर जरा भी भरोसा करने को तैयार नहीं है।

 

निकाय चुनावों में जनता ने जिन निर्दलीय उम्मीदवारों को चुनकर भेजा है उन्हें भी ध्यान रखना होगा कि जनता ने जिस विश्वास से सियासी पार्टियों का दरकिनार कर उन्हें अपना कीमती वोट दिया वह टूटने न पाए। अगर वे भी राज्य के निर्दलीय विधायकों की तरह सत्ता के नशे में मदमस्त होकर जनता का दुख-दर्द भूल जाएंगे तो स्थिति बेहद खतरनाक साबित होगी। जनता ने उन्हें नए नेतृत्व के तौर पर आगे किया है। जनता राज्य में एक सक्षम नए नेतृत्व चाहती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि निकायों में विजयी निर्दलीय लंबी रेस के घोड़े बनकर जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे और भविष्य में राज्य को बेहतर नेतृत्व देंगे।


 

खतरे की घंटी

भाजपा छह में से चार नगर निगमों में मेयर की सीट जीतने से उत्साहित है। पार्टी के अधिकतर वरिष्ठ नेता इसे अपनी कामयाबी मान रहे हैं और अब २०१४ का आम चुनाव फतह करने का दावा भी करने लगे हैं। लेकिन वार्डों में पार्टी की स्थिति बेहद खराब रही है। पौड़ी और टिहरी लोकसभा क्षेत्र के चुनाव परिणाम इन नेताओं को आईना दिखाने के लिए काफी हैं। भाजपा के दो पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूड़ी रमेश पोखरियाल 'निशंक' प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत उपाध्यक्ष धनसिंह रावत पूर्व मंत्री मोहन सिंह गांववासी सभी पौड़ी से हैं। लेकिन पौड़ी और कोटद्वार में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। यहां की जनता ने कांग्रेस पर भी भरोसा नहीं जताया और पौड़ी नगर पालिका में अध्यक्ष सहित सभी सभासद निर्दलीय चुने गए। क्या पार्टी इसे ही 'फाइनल मैच' यानी आम चुनाव २०१४ की तैयारी मान रही है

 

भारतीय जनता पार्टी निकाय चुनावों में कांग्रेस से बढ़त हासिल करने पर उत्साहित है। इसी उत्साह में पार्टी २०१४ में होने वाले लोक सभा चुनाव में जीत को लेकर अभी से आशावान है जबकि वास्तविकता यह है कि इन चुनावों में भाजपा को भी प्रदेश की जनता ने उतना ही नकारा है जितना कि कांग्रेस को। असल में भाजपा कांग्रेस से केवल एक सीट अधिक जीत कर नाममात्र की बढ़त हासिल कर पाई है। निकायों के अध्यक्ष पदों पर कांग्रेस को २१ तो भाजपा को २२ सीटें मिली हैं। भाजपा के लिए संतोष करने लायक इतना ही है कि छह नगर निगमों में से ४ नगर निगमों में मेयर की सीटें उसने जीती हैं और कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी। वार्डों में भाजपा के कई प्रत्याशी निर्दलियों से पीछे रहे हैं। यह हालात कमोबेश सभी लोकसभा क्षेत्रों की है। 

 

टिहरी और पौड़ी लोक सभा क्षेत्रों में भाजपा के हालात सबसे ज्यादा खराब दिखाई दे रहे हैं। जबकि दोनों ही संसदीय क्षेत्र प्रदेश में उसके लिये सबसे महत्वपूर्ण हैं। टिहरी लोक सभा क्षेत्र प्रदेश की राजनीति के हिसाब से सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। पूर्व में इस सीट पर पार्टी का लगातार आठ बार कब्जा रहने के कारण प्रदेश में यह उसका सबसे बड़ा गढ़ माना जाता रहा है। २००७ में महाराजा मानवेन्द्र शाह के निधन के बाद इस सीट पर हुए उप चुनाव में कांग्रेस के विजय बहुगुणा ने भाजपा से यह सीट हासिल की और फिर २००९ के आम चुनाव में भी कांग्रेस के ही विजय बहुगुणा यहां से चुने गये। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपने पुत्र साकेत बहुगुणा को उप चुनाव में उतारा लेकिन सरकार से नाराजगी केन्द्र सरकार के घोटालों और महंगाई की मार से त्रस्त जनता ने भाजपा प्रत्याशी महारानी राजलक्ष्मी को २२ हजार मतों से विजयी बनाया और इस तरह यह सीट एक बार फिर भाजपा के खाते में डाल दी। निकाय चुनावों में टिहरी लोक सभा क्षेत्र के ११ निकायों में से दस में चुनाव हुए। इनमें से भाजपा के हाथ केवल देहरादून नगर निगम की सीट ही आ पाई कांग्रेस को बड़कोट पुरोला चिन्यालीसौड़ विकासनगर और मसूरी में जीत हासिल हुई है। टिहरी चम्बा उत्तरकाशी और हर्बटपुर निकायों में निर्दलियों ने बाजी मारी। इससे साफ पता चलता है कि भाजपा का ग्राफ टिहरी संसदीय क्षेत्र में बुरी तरह गिरा है। जबकि कुछ ही माह पूर्व उसने इस क्षेत्र में जीत हासिल की है।

 

टिहरी नगर पालिका में तो भाजपा की सबसे बड़ी फजीहत हुई है। २०१२ के विधान सभा चुनाव में बुरी तरह हारे खेमसिंह चौहान को भाजपा ने नगर पालिका चुनाव में भी उम्मीदवार बनाया। लेकिन चौहान यहां अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए। इससे पार्टी में टिकट बंटवारे को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। जो उम्मीदवार विधान सभा चुनाव मे तीसरे स्थान पर रहा हो उसे तमाम बड़े दावेदारों को नकार कर निकाय में खड़ा करना भाजपा के नेताओं की निर्णय क्षमता पर भी सवाल खड़े करता है। उत्तरकाशी बड़कोट चिन्याली सौड़ और चम्बा में भी भाजपा के प्रत्याशी अपनी जमानतें तक नहीं बचा पाये। यह हालत तब है जबकि कुछ माह पूर्व ही टिहरी लोक सभा क्षेत्र के उपचुनाव में टिहरी जिले से भाजपा को अच्छी बढ़त हासिल हुई थी। टिहरी विधानसभा क्षेत्र में भी कांग्रेस को करारी हार मिली थी।

 

वर्तमान में पुरोला और मसूरी विधानसभा क्षेत्र भाजपा के कब्जे में है। पुरोला के विधायक मालचंद हैं जो कि २०१२ के चुनाव में कांग्रेस से खासी बढ़त हासिल करके विधायक बने थे। इसी तरह मसूरी में भी भाजपा के गणेश जोशी विधायक हैं। बावजूद इसके गणेश जोशी एक ही साल में अपना दमखम पूरी तरह खो चुके हैं। जिस मसूरी पालिका पर भाजपा का बोर्ड सहित पूरी तरह कब्जा था आज हालत यह है कि वहां पार्टी का एक भी प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत पाया। पूर्व अध्यक्ष ओपी उनियाल के साथ-साथ भाजपा के सभी सभासद भी चुनाव में बुरी तरह हार गये। टिहरी संसदीय क्षेत्र में भाजपा के पास उपलब्धियों के नाम पर केवल एक ही जीत है और वह भी देहरादून नगर निगम। भाजपा के लिये २०१४ में होने वाले लोक सभा चुनाव के लिए यह साफतौर पर खतरे की द्घंटी है। महज एक वर्ष में जिस तरह से भाजपा का ग्राफ कम होता गया है उससे आशंका है कि आगामी लोकसभा चुनाव में वह टिहरी सीट पर बरकरार रख पाएगी या नहीं। पौड़ी संसदीय क्षेत्र कब्जा भाजपा को कुछ राहत जरूर मिली है। यहां २१ निकायों में से १९ पर चुनाव सम्पन्न हुए। जिसमें भाजपा का जोशीमठ नंद प्रयाग रुद्रप्रयाग गैरसैंण अगस्तमुनि कीर्तिनगर स्वर्गाश्रम जौंक और मुनिकी रेती सहित ८ सीटां पर जीत हासिल हुई है। जबकि कांग्रेस को केवल ४ सीटें ही मिल पाईं हैं।

 

भाजपा के लिये १९ में से ८ सीटें जीतना एक उपलब्धि हो सकती है क्योंकि पौड़ी संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस का कब्जा है। कांग्रेस के दिग्गज सतपाल महाराज यहां से सांसद हैं। लेकिन भाजपा के लिए यह क्षेत्र आने वाले समय में कठिनाइयों से भरा है। गौेचर पोखरी गोपेश्वर श्रीनगर और देवप्रयाग सीटों पर खड़े पार्टी उम्मीदवारों की जमानतें तक जब्त हो गईं। देवप्रयाग में तो भाजपा के प्रत्याशी को महज ५० वोट ही हासिल हो पाये। श्रीनगर में भाजपा के उम्मीदवार कृष्णानंद मैठाणी पूर्व में भी नगर पालिका के अध्यक्ष रह चुके हैं। इसके बावजूद चुनाव में अपनी जमानत तक नहीं बचा पाये।

 

ऐसा ही पौड़ी नगर पालिका सीट पर भी हुआ। यहां भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों को जनता ने बुरी तरह नकार दिया और निर्दलियों को पूरे वार्ड पर चुन कर बैठा दिया। पूर्व विधायक यशपाल बेनाम इस बार निर्दलीय चुनाव लड़े और भारी मतों से जीते। सभी सभासद भी निर्दलीय ही जीते हैं। कोटद्वार में भी भाजपा के लिए स्थिति बेहद खराब रही। कोटद्वार पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के बड़े नेता बीसी खण्डूड़ी का चुनाव क्षेत्र रहा है। विधानसभा चुनाव में खण्डूड़ी की हार का असर आज भी दिखाई दे रहा है। पहली बार बसपा को यहां से जीत हासिल हुई है जबकि भाजपा और कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा।

 

पौड़ी संसदीय क्षेत्र में भाजपा ने खूब प्रचार भी किया। पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावतप्रदेश संगठन मंत्री धनसिंह रावत पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहन सिंह रावत गांववासी जैसे नेताओं की कर्मभूमि पौड़ी जिले में पार्टी की करारी हार से नेतृत्व की कार्यशैली और निर्णय लेने की क्षमता पर सवाल उठना लाजिमी है। नये प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत के लिये दमखम दिखाने बड़ा मौका था। लेकिन वे अपने ही गृह जनपद पौड़ी में तीन महत्वपूर्ण निकाय पौड़ी श्रीनगर कोटद्वार में पार्टी प्रत्याशियों को जीत नहीं दिलवा पाये। इसी तरह निशंक खण्डूड़ी और प्रदेश संगठन महामंत्री धनसिंह रावत अपनी कर्मभूमि में भाजपा को जीत नहीं दिलवा पाए जबकि इन नेताओं पर ही आने वाले लोक सभा के चुनाव में भाजपा की जीत का दारोमदार है और ये सभी पार्टी के बड़े चेहरे हैं। कुल मिलाकर भाजपा चाहे जो भी सोचे लेकिन निकाय चुनाव के परिणाम उसके लिए एक बड़े खतरे के संकेत हैं।

 

 
         
 
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  • अरुण कश्यप

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