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सामयिक
 
जोन का जिन्न

 

 

  • गुंजन कुमार

 

उत्तराखण्ड में ईको सेंसटिव जोन के मसले पर मासान शुरू हो चुका है। राजनेता विकास की दुहाई देकर केंद्र से अधिसूचना पर पुनर्विचार की मांग कर रहे हैं। दूसरी तरफ पर्यावरणविदों का तर्क है कि इससे स्थानीय जनता के हितों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। लेकिन जनता के बीच से यह भी आशंकाएं उठ रही हैं कि अधिसूचना के प्रावधानों के तहत लोगों को अपने छोटे-छोटे कामों के लिए भी सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटने को विवश होना पड़ेगा

 

गोमुख से लेकर उत्तरकाशी तक के क्षेत्र को ईको सेंसटिव जोन बनाए जाने संबंधी केंद्र का गजट नोटिफिकेशन (अधिसूचना जारी होने के साथ ही उत्तराखण्ड से लेकर दिल्ली तक बवाल शुरू हो गया है। पर्यावरणविद् केंद्र के नोटिफिकेशन का स्वागत कर रहे हैं तो राजनेता इसके विरोध में यह कहकर खड़े हैं कि इससे विकास रुक जाएगा और स्थानीय लोगों के हित प्रभावित होंगे। हालांकि नोटिफिकेशन में स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा संबंधी सभी प्रावधान हैं लेकिन आशंका यह भी पैदा हो रही है कि सरकारी विभागों से जनता के कार्यों का निस्पादन आसान नहीं होगा। जोन में अपने कई कामों के लिए उन्हें सरकारी विभागों से अनुमति लेनी होगी और विभागों की कार्यप्रणाली किसी से छुपी नहीं है। लोगों को जाति एवं आवासीय प्रमाण पत्रों के लिए महीनों भटकना पड़ता है और कई बार उन्हें दलालों की शरण में भी जाना पड़ता है। ऐसे में जोन के अन्दर आने वाले गांवों की विकास योजना कितनी जल्दी स्वीकृत होगी यह सवाल उठना लाजिमी है। इसलिए यहां ईको सेंसटिव जोन के गजट नोटिफिकेशन के तथ्यों को समझना जरूरी है।

 

केंद्र के गजट नोटिफिकेशन के अनुसार उत्तरकाशी जिले के १०० किमी लंबे और ४१७९ ़४९ वर्ग किमी क्षेत्र में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली कार्ययोजनाओं पर प्रतिबंध लग जाएगा। राज्य की बहुगुणा सरकार इससे चिंतित है। राज्य कैबिनेट ने २९ अप्रैल को एक बैठक कर इस नोटिफिेशन को यह कहते हुए गलत करार दिया कि इससे स्थानीय विकास पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है। बैठक में कैबिनेट ने मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री से मिलकर इसे खत्म कराने के लिए अधिकृत किया। ६ मई को मुख्यमंत्री सांसद सतपाल महाराज कैबिनेट मंत्री अमृता रावत और नवनियुक्त मुख्य सचिव सुभाष कुमार आदि प्रधानमंत्री से मिले और राज्य सरकार का पक्ष रखा। प्रधानमंत्री को सौंपे गए ज्ञापन में राज्य की ओर से बिन्दुवार समस्याओं का उल्लेख किया गया है। पर्यावरणविद् सरकार के इस रवैये से नाराज हैं।

 

नदी बचाओ आंदोलन के प्रमुख सुरेश भाई मातृसदन के संस्थापक स्वामी शिवानंद सहित अधिकतर पर्यावरणविद् केन्द्र के इस कदम को स्वागतयोग्य बताते हैं। स्वामी शिवानंद कहते हैं लंबे संघर्ष के बाद केन्द्र ने एक अच्छा नोटिफिकेशन जारी किया है। विरोध करने वालों ने अभी तक इसे पढ़ा भी नहीं होगा। प्रदेश सरकार लोगों में भ्रम पैदा कर रही है। इसी तरह सुरेश भाई कहते हैं कि ईको सेंसटिव जोन की अधिसूचना गौमुख से उत्तरकाशी तक वहां मौजूद चीजों को संरक्षित करने के लिए जारी की गई है। कई पर्यावरणविदें का तर्क है कि प्रदेश सरकार की चिंता स्थानीय जनता के हितों की रक्षा के लिए नहीं है बल्कि जोन के अन्दर के क्षेत्रों में राज्य सरकार लैंड यूज चेंज नहीं कर पाएगी। आखिर लैंड यूज चेंज कर ही सरकार भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है।  

 

केन्द्र की अधिसूचना में चिंता जताई गई है कि भागीरथी नदी प्रवासी प्रजातियों सहित जलीय वनस्पति और जीव-जंतुओं से समृद्ध है। जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण के कारण उनके प्रवास में बाधा होती है और इससे पारिस्थितिकीय -प्रणाली पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। इस कारण ही ईको सेंसटिव जोन (परिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र बनाया गया है।

 

अधिसूचना में केन्द्र ने सेंसटिव जोन में विकास कार्यों के लिए आंचलिक महायोजना बनाने की बात कही है। राज्य को निर्देश दिया गया है कि क्षेत्र के विकास कार्यों के लिए अधिसूचना जारी होने की तारीख से दो वर्ष के अंदर स्थानीय जनता विशेषकर महिलाओं के परामर्श से एक आंचलिक महायोजना बनाएगी। उसे वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार अनुमोदित करेगी। आंचलिक महायोजना पर्यावरण वन शहरी विकास पर्यटन नगर पालिका राजस्व लोक निर्माण विभाग ग्रामीण विकास आदि जैसे राज्य के सभी संबंधित विभागों की भागीदारी से बनाई जाएगी ताकि इसमें पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय विचारों को सम्मिलित किया जा सके। सीमांत क्षेत्र के विकास की योजनाओं और अन्य योजनाओं को भी आंचलिक महायोजना में शामिल किया जाएगा।

 

यहां अधिसूचना में दिए गए बिन्दुओं से किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी लेकिन सरकारी कार्यों की लेटलतीफी भी छुपी नहीं है। दो साल में आंचलिक महायोजना बनेगी यह कहा नहीं जा सकता। जब तक यह महायोजना नहीं बनती तब तक क्या होगा? इसका जवाब इस अधिसूचना के बिंदु संख्या नौ में दिया गया है। ऐसी स्थिति में जोन के अन्दर के सभी नए निर्माण भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से अनुमति लेकर ही किये जा सकेंगे। महायोजना बनने तक क्षेत्र के लोगों को जोन के अन्दर अपना घर भी बनाना होगा तो उसके लिए उन्हें केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से अनुमति लेनी होगी। जहां आम नागरिक को देहरादून जाने में ही कई दिन लगते हैं ऐसे में वह अपने कार्यों के लिए दिल्ली कैसे जाएंगे समझा जा सकता है। सरकारी दफ्तरों से जिनका पाला पड़ा है वे भली भांति जानते हैं कि वहां काम कराना कितना दुष्कर कार्य होता है। जैव विविधता और पहाड़ पर हरियाली बढ़े न बढ़ेलेकिन यह आम आदमी के लाल फीताशाही में बंधे रहने का मुकम्मल इंतजाम है। 

 

ईको जोन में आम लोगों को घर आदि बनाने के लिए भी अनुमति लेनी होगी। वहीं विभिन्न बड़े भवनों होटलों रिसार्ट के निर्माण में क्षेत्र की परंपरागत कलाओं और वास्तु का पालन करना होगा। यहां होटलों रिसार्ट बनने पर रोक नहीं है। उन्हें सिर्फ थोड़ी हिदायत और दिशा-निर्देश दिये गये हैं। वहीं यदि स्थानीय जनसंख्या बढ़ जाए और उसकी आवासीय जरूरतों को पूरा करना आवश्यक हो तो कृषि भूमि के अत्यधिक सीमित परिवर्तन के लिए भी राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिए होगा। इस अनुमोदन पर केन्द्र की स्वीकृति मिलने के बाद ही स्थानीय निवासियों की बढ़ी जनसंख्या को छत नसीब हो सकेगी।

 

गंगोत्री-उत्तरकाशी ईको सेंसटिव जोन के गजट में मौजूद कई प्रावधान पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने जैसे हैं। जैसे गजट के खंड ३ के धारा (ख में ईको सेंसटिव जोन में विनियमित यानी रेगुलेट किये जाने वाले क्रियाकलापों की सूची में चीड़ के वृक्षों का रोपण भी है। जोन के अन्दर चीड़ रोपने पर प्रतिबन्ध लगाने के बजाय उसे विनियमित करने की बात कही गई है जबकि चीड़ तो स्वयं जैव विविधता का बड़ा दुश्मन माना जाता है। पर्यावरणविद् भी चीड़ के पेड़ को पहाड़ के लिए सही नहीं मानते। चीड़ की पत्तियों में पायिनिक एसिड होती है। जब ये नुकीली पत्तियां जमीन पर गिरती हैं तो जमीन भी अमलीय हो जाती है। चीड़ अपने आस-पास अन्य प्रजाति के वृक्षों को नहीं पनपने देता है। जंगल की आग को फैलाने में यह बेहद सहायक होता है। ऐसे में प्रश्न यह है कि पर्यावरण की बेहतरी के लिए बनने वाले इन ईको सेंसिटिव जोन में चीड़ रोपना जारी रख कर पर्यावरण का हित कैसे हो सकता है। इस पर कई बुद्धिजीवियों का मानना है कि चीड़ के व्यावसायिक दोहन को बरकरार रखने के लिए इस खतरनाक पेड़ के रोपे जाने को जारी रखने का विशेष प्रावधान किया गया है।

 

केन्द्र देश भर में ईको सेंसटिव जोन बनाने जा रहा है। पूरे देश की ही तरह उत्तराखण्ड में भी पारिस्थितिकीय और जैव विविधता को बचाने के नाम पर तमाम राष्ट्रीय पार्कों और वन्य जीव अभयारण्यों के दस किलोमीटर के क्षेत्र को पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र यानी ईको सेंसटिव जोन बनाया जाना है। उत्तराखण्ड में पैंसठ प्रतिशत वन भूमि राष्ट्रीय पार्क और वन्यजीव अभ्यारण्यों का जाल भी लगभग पूरे राज्य में फैला हुआ है। इस तरह उत्तराखण्ड का अधिकांश हिस्सा ईको सेंसटिव जोन के दायरे में आएगा। इसलिए ईको सेंसटिव जोन घोषित होने की चर्चा होते ही विभिन्न स्थानों पर इसका विरोध शुरू हो गया। लोगों में यह आशंका घर कर गई कि पहले से ही राष्ट्रीय पार्क और वन्य जीव अभयारण्य उनका जीना मुश्किल किये हुए हैं और उस पर ईको सेंसटिव जोन तो उनका जीना लगभग नामुमकिन कर देगा। हालांकि बांधों और बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं पर प्रतिबंध होगा। जब तक सरकार अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं करती और आम जनता के हितों के लिए गंभीर नहीं होती तब तक यह अधिनियम पहाड़वासियों के हित में नहीं होगा।

 

इस तरह बने सेंसटिव जोन

२१ जनवरी २००२ को भारतीय वन्य जीव बोर्ड की इक्कीसवीं बैठक में वन्यजीव संरक्षण रणनीति-२००२ बनाई गयी। इसी दस्तावेज के बिंदु संख्या नौ में राष्ट्रीय पार्क और वन्य जीव अभयारण्यों की सीमा से लगे दस किलोमीटर तक के क्षेत्रों को पर्यावरण (संरक्षण अधिनियम १९८६ के तहत ईको सेंसिटिव जोन (पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने का प्रस्ताव पास किया गया। यह बैठक तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में हुई थी। हिमाचल प्रदेश गोवा और राजस्थान जैसे कुछ राज्यों ने इसमें शामिल दस किलोमीटर की सीमा पर आपत्ति जताई थी। राष्ट्रीय वन्य जीव एक्शन प्लान (२००२-२०१६ में भी ईको सेंसिटिव जोन  की वकालत की गयी थी। ईको सेंसिटिव जोन घोषित करवाने के िलए गोवा फाउन्डेशन नामक एनजीओ उच्चतम न्यायलय चला गया। ०४ दिसम्बर २००६ के अपने फैसले में उच्चतम न्यायलय ने ईको सेसटिव जोन घोषित किये जाने पर मोहर लगा दी। २०१० में ओखला पक्षी विहार के निकट नोएडा में बन रहे पार्क के मामले में उच्चतम न्यायालय ने नोट किया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने संरक्षित क्षेत्रों के निकट ईको सेसटिव जोन नहीं घोषित किये क्योंकि केंद्र सरकार द्वारा इस सन्दर्भ में दिशा-निर्देश जारी नहीं किये गए थे। तत्पश्चात केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने ईको सेसटिव जोन के मानक तय करने के लिए प्रोनब सेन की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की। देश भर में बनाये जा रहे ईको सेसटिव जोन इसी कमेटी द्वारा तय मानकों के अनुसार बनाये जा रहे हैं।

 

 

 
         
 
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