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vad 23 25-11-2017
 
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देश-दुनिया 
 
कर्नाटक में बजा चुनावी बिगुल

 

  • अंकित फ्रांसिस

 

भाजपा की सरकार में पांच साल तक बदलते मुख्यमंत्री बढ़ते भ्रष्टाचार और जातिवादी राजनीति के चरम को देखने के बाद ५ मई को कर्नाटक में फिर से विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनावों को देखते हुए मायावती सुषमा स्वराज सोनिया गांधी नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी ने जुबानी जंग भी शुरू कर दी है। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि २२५ सदस्यीय कर्नाटक विधानसभा में लिंगायत समुदाय के प्रभावी नेता बीएस येदियुरप्पा की जोड़-तोड़ से पहुंची भाजपा इस बार भितर घातों के चलते कमजोर नजर आ रही है।

 

फिलहाल सत्ता पर कब्जा बनाए रखने और ११३ के जादुई आंकड़े तक पहुंचने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों ने प्रलोभनों की राजनीति को हवा देना शुरू कर दिया है। एक तरफ जहां भाजपा ने गरीब परिवारों को एक रुपए प्रति किलो के भाव २५ किलो चावल देने और प्री-यूनिवर्सिटी क्लासों के छात्रों को मुफ्त लैपटॉप आदि देने का वादा किया है तो उधर कांग्रेस ने भी अपने द्घोषणापत्र में गरीब परिवारों को एक रुपए किलो के दामों पर ३० किलो चावल छात्रों को मुफ्त लैपटॉप देने और ब्याज रहित कूषि ऋण देने की द्घोषणा की है। लोकल लेवल पर भी मतदाताओं को लुभाने के लिए सभी प्रत्याशी तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। चुनाव आयोग ने अब तक ११ करोड़ रुपए नकद और ३ करोड़ रुपए से अधिक की शराब जब्त की है। दूसरी तरफ इलेक्शन वॉच नाम की संस्था की रिपोर्ट के अनुसार चुनाव में खड़े सभी पार्टियों के प्रत्याशियों की औसत संपत्ति २५ करोड़ रुपए है। 

 

उधर सेंटर फॉर द स्टडीज ऑफ द डेवलपिंग सोसायटीज (सीएसडीएस की ओर से किए गए सर्वे के नतीजों से माहौल और गरमा गया है। इसमें कहा गया है कि कांग्रेस को इस बार विधानसभा चुनावों में ११७ से १२९ सीटें मिल सकती हैं जबकि पार्टी के वर्तमान में ७१ विधायक हैं। सर्वे के मुताबिक वर्ष २००८ के चुनावों में भाजपा को १०४ सीटें मिली थीं जो सत्ता विरोधी लहर के कारण इस बार ३९ से ४९ सीटों के बीच सीमित हो सकती हैं। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा जनता दल (एस) को ३४ से ४४ सीटें मिल सकती हैं और भाजपा के पूर्व नेता वीएस येदियुरप्पा की कर्नाटक जनता पार्टी (केजेपी) एवं निर्दलियों को संयुक्त रूप से १४ से २२ सीटें मिल सकती हैं। सर्वेक्षण में कहा गया है कि कांग्रेस को ३७ फीसदी मत मिलने की संभावना है जो २००८ के चुनावों की तुलना में दो फीसदी अधिक है। चुनावों में भाजपा के मत प्रतिशत में पिछले चुनाव की तुलना में काफी कमी आने की संभावना जताई गई है। भाजपा को सिर्फ २३ फीसदी मत मिलने की संभावना है जो २००८ की तुलना में ११ फीसदी की कमी है।

 

गौरतलब है कि दक्षिण भारत में भाजपा को पहली बार सत्ता दिलवाने वाले येदियुरप्पा और उसके साथियों को भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल ३-३ मुख्यमंत्रियों को बदलने और येदियुरप्पा के भाजपा से अलग होकर नवम्बर २०१२ में 'कर्नाटक जनता पार्टी' पार्टी के गठन ने भाजपा को खासा नुकसान पंहुचाया है। येदियुरप्पा के अलग हो जाने से भाजपा को पिछली बार मिले लिंगायत समुदाय के वोटों का बंटना तय माना जा रहा है। इसके अलावा राज्य में विकास कार्य ठप्प हो जाने के कारण भी लोगों में नकारात्मक माहौल बना हुआ है। हाल ही के स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा की हार और जनता दल यूनाइटेड का राज्य में अलग चुनाव लड़ना भाजपा के लिए नकारात्मक साबित हो सकता है। 

 

जहां तक कांग्रेस का संबंध है इसे भी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है जिनमें पूर्व मुख्यमंत्रियों एसएम कूष्णा और एन धर्म सिंह को चुनाव प्रचार से दूर रखना और पार्टी में जारी धड़ेबंदी और अंतर्कलह भी शामिल है। कांग्रेस को २००४ के चुनावों में मात्र ६४ व २००८ के चुनावों में ८० सीटें ही मिली थीं। लेकिन इस बार कांग्रेस ने सूबे में जाति समीकरण पर खास फोकस किया है। भाजपा के लिंगायत प्रेम को ध्यान में रखकर कांग्रेस भी कर्नाटक विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा दांव इस बार इसी समुदाय पर लगाने को तैयार है। कांग्रेस के टिकट वितरण में लिंगायत समुदाय का बोलबाला होगा। दूसरे प्रभावी समुदाय वोक्कालिगा की भागीदारी भी चुनाव में प्रभावी होगी। कांग्रेस ने पिछले विधानसभा चुनावों में ४३ उम्मीदवार लिंगायत समुदाय से उतारे थे इनमें से १६ जीते थे। जबकि वोक्कालिगा समुदाय से ४० को टिकट मिले थे इनमें से २० को जीत मिली थी। मुस्लिम समुदाय से भी १६ उम्मीदवार उतारे गए जिनमें ७ जीते। पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रदेश के नेताओं से साफ कहा है कि कांग्रेस प्रदेश में चुनाव जीतने की स्थिति में है लिहाजा पूरी ताकत लगाकर चुनाव लड़ें। चुनाव विश्लेषकों का कहना है कि इस बात की पूरी संभावना है कि चुनावों के बाद एचडी देवेगौड़ा की जनता दल (एस) के तीसरे स्थान पर रहेगी और त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में भाजपा और कांग्रेस दोनों से मोल-भाव करने की स्थिति में होगी। जहां तक येदियुरप्पा की 'कर्नाटक जनता पार्टी' का संबंध है तो चुनाव विश्लेषकों और सर्वे के अनुसार इसका वही हश्र होगा जो भाजपा से अलग होने वाले केशुभाई पटेल की 'गुजरात परिवर्तन पार्टी' का हुआ।

 

चीन की पैंतरेबाजी

चीन के प्रधानमंत्री को मई में भारत आना है और सीमा पर विवाद छिड़ा है। चीन का दावा है सैनिक अपनी सीमा के भीतर हैं। भारत का कहना है कि चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा में १९ किमी अंदर तक घुसपैठ कर रखी है। विदेश मंत्री कह रहे हैं कि बहुत जल्द सब कुछ सुलझ जाएगा जबकि भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस मुद्दे को तूल नहीं देना चाहते। दरअसल चीन के नए प्रधानमंत्री लि केकियांग खासतौर से भारत को अपनी पहली विदेश यात्रा की जमीन बनाना चाहते हैं। इससे पहले भारतीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ९ मई को बीजिंग जा रहे हैं।

 

भारत ने चीन की सेना पर लद्दाख में नियंत्रण रेखा पार करने का आरोप लगाया है। आरोपों के मुताबिक १५ अप्रैल को चीनी सेना नियंत्रण रेखा पार कर भारतीय इलाके में १० किलोमीटर तक घुसी। लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी सेक्टर में हुई. देपसंग घाटी तक पहुंची चीनी सेना ने भारतीय इलाके में टेंट भी गाड़ दिए। चीन ने सीमा पार जाने की खबरों से इनकार किया है और उसका कहना है कि उसके सैनिक वास्तविक नियंत्रण रेखा के पार नहीं गए। इस संबंध में भारतीय थल सेना प्रमुख जनरल विक्रम सिंह ने उत्तरी कमान के सैन्य कमांडरों के साथ जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में स्थिति की समीक्षा की । इसके बाद उन्होंने इस पूरे मामले की जानकारी रक्षा मंत्री एके एंटनी को दी। इसके अलावा सेना ने सरकार और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के नेतृत्व वाले चीन स्टडी ग्रुप को भी मौजूदा स्थिति और विकल्पों के बारे में जानकारी दी। भारतीय सेना ने स्थिति अनुसार मौके पर सैनिकों की तैनाती भी कर दी।

 

चीन और भारत के बीच सीमा विवाद अंग्रेजी हुकूमत के इतिहास से जुड़ा है जिसकी पीड़ा दोनों ही मुल्कों को उठानी पड़ रही है। एशिया के ये दोनों पड़ोसी दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाले देश हैं। दोनों के बीच बीते छह दशकों से सीमा विवाद जारी है। इसी विवाद की वजह से वर्ष १९६२ में दोनों देशों के बीच युद्ध भी हुआ। इसमें भारत की हार हुई। इसी कारण चीन पूर्वोत्तर भारत के ९० हजार वर्ग किलोमीटर इलाके पर अपना दावा जताता है। यह इलाका अरुणाचल प्रदेश में आता है। वहीं भारत का आरोप है कि चीन ने कश्मीर में उसकी ३८ हजार वर्ग किलोमीटर जमीन कब्जाई हुई है। इस पूरे मामले को लेकर भारत और चीन के बीच अब तक करीब १५ दौर की बातचीत भी हो चुकी है। लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है। 

 

दरअसल बीते तीन दशकों में चीन ने अपने आपको सैन्य महाशक्ति के रूप में स्थापित किया है। सौ बिलियन डॉलर से भी ज्यादा वह अपने रक्षा मद में खर्च कर रहा है। इसलिए उसकी विदेश नीति दूसरों को डिक्टेट करती है। वह संसार को यह समझाने में सफल रहा कि सेनकाकू द्वीप एक विवादित क्षेत्र हैहालांकि इस पर जापान का बरसों पुराना आधिपत्य है। इसी तरह उसने स्कारबोरो सोल द्वीप के पास अपने जहाजों की तैनाती कर फिलीपींस के मछुआरों को वहां पहुंचने से रोक दिया है। दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में उसका आधिपत्य स्पष्ट होने लगा है। नेपाल को उसने अपनी कॉलोनी बना लिया है और वहां पर वह भारतीय प्रभाव को धीरे-धीरे खत्म कर रहा है। मालदीव में भी उसकी मौजूदगी के चलते भारतीय असर फीका हुआ है और श्रीलंका में भी भारत की स्थिति कमजोर हुई है जबकि चीन का प्रभाव बढ़ा है। चीन को तिब्बत के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा का भारत में रहना भी नापसंद है। दक्षिण चीन सागर में वियतनाम के साथ काम कर रही भारतीय कंपनियों के रुख से भी चीन नाराज रहता है। वहीं भारत को चीन- पाक दोस्ती तनाव देती है। इतने सारे मतभेद के बावजूद दोनों देशों के आर्थिक रिश्ते अच्छे हैं। फिर भी भारतीय क्षेत्र में चीनी सेना की घुसपैठ और लेह से कई सौ किलोमीटर दूर दक्षिण-पूर्व चुमार में हवाई क्षेत्र का उल्लंद्घन बताता है कि चीन ने भारतीय नेतृत्व की अक्षमता को भांप लिया है। चीन के सामने आज हमारी जो स्थिति है उससे तो यही लगता है कि हम उसकी इस कार्रवाई का न तो कूटनीतिक जवाब देने की स्थिति में हैं और न ही जमीनी मुकाबला कर सकने की हालत में।

 

 

 
         
 
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