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प्रदेश 
 
कठघरे में औद्योगिक नीति

 

  • दाताराम चमोली

 

विरोध अकेले कोका कोला प्लांट का नहीं बल्कि सरकार की उस औद्योगिक नीति का भी हो रहा है जो रोजगार के नाम पर युवाओं को छलती रही है। इस नीति से राज्य की कृषि भूमि भी सिमटती जा रही है

 

 

देहरादून जिले के विकास नगर क्षेत्र के अंतर्गत छरबा ग्राम पंचायत में ग्राम समाज की ५२० बीघा जमीन को अधिग्रहित करने के राज्य सरकार के फैसले का स्थानीय लोग जमकर विरोध कर रहे हैं। शीतला नदी के किनारे कोका कोला प्लांट के लिए इसमें से ३२० बीघा जमीन दिए जाने पर लोगों में भारी असंतोष है। जनता के इस असंतोष की ठोस वजह है। औद्योगिक विकास और रोजगार के नाम पर सरकार निरंतर कूषि भूमि और हरियाली को नष्ट करती जा रही है लेकिन प्रदेश के युवा बेरोजगारी के चलते निरंतर पलायन कर रहे हैं। विकास और रोजगार का वादा महज छलावा साबित हुआ है।

 

राज्य गठन के बाद औद्योगिक विकास के लिए सरकार ने हरिद्वार सितारगंज और ऊधमसिंहनगर में सिडकुल की स्थापना के लिए ५९७६ एकड़ कूषि भूमि अधिग्रहित की। सिडकुल-२ के लिए भी सितारगंज में ११०० एकड़ कूषि योग्य भूमि अधिग्रहित की गई है।

 

विडंबना ही है कि एक तरफ जहां सरकार सिडकुल की बेशकीमती भूमि औने-पौने दामों पर बिल्डरों को बेच रही है वहीं दूसरी तरफ उद्योगों के लिए कूषि भूमि भी अधिग्रहित कर रही है। यह सब युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने के नाम पर हो रहा है। लेकिन इस रोजगार की हकीकत यह है कि औद्योगिक क्षेत्र में स्थित फैक्ट्रियांें और कारखानों में प्रबंधन वर्ग सरकार की शह पर ठेकेदारों के जरिये मजदूरों की आपूर्ति करता आ रहा है। ढाई-तीन हजार रुपये के मामूली वेतन पर प्रतिदिन कई घंटों काम करने वाले इन मजदूरों को अवकाश चिकित्सा एवं अन्य जरूरी सुविधाएं मिलनी तो दूर समय पर वेतन भी मिल जाय तो गनीमत है। इतना ही नहीं खतरनाक कारखानों और फैक्ट्रियों में उनके हाथ-पांव कट जाएं या फिर उनका स्वास्थ्य प्रभावित हो जाए इससे प्रबंधकों और सरकार पर कोई असर नहीं पड़ता है।

 

सोचने का विषय यह है कि एक तरफ मैदानी क्षेत्रों में कूषि योग्य भूमि उद्योगों के लिए अधिग्रहित की जा रही है वहीं पहाड़ों में यह निरंतर बांध परियोजनाओं और खनन की भेंट चढ़ती रही है। पहाड़ों में कई हजार एकड़ उपजाऊ भूमि बड़े बांधों की झील में समा चुकी है और सौ एकड़ अभी प्रस्तावित बांध परियोजनाओं की भेंट चढ़ जाएगी। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि कूषि प्रधान राज्य उत्तराखण्ड में भविष्य में कूषि के लिए भूमि कहां और कैसे बची रह पाएगी इसलिए मैदानों में तेजी से बढ़ते औद्योगिकीकरण के बहुत बड़े खतरे हैं। यहां कूषि भूमि को बचाए रखना जरूरी है। उद्योग रोजगार देने में अक्षम हैं और कूषि भूमि हाथ से निकलती जा रही है। टाटा डाबर और ब्रिटानिया जैसे नामी गिरामी औद्योगिक घंरानों की इकाइयों की स्थापना के लिए प्रदेश में कौड़ियों के भाव जमीन उपलब्ध कराई गई लेकिन उद्योगों में राज्य के युवाओं को ७० प्रतिशत रोजगार देने की सरकार की घोषणा महज हवाई साबित हुई। इससे सरकार की पूरी औद्योगिक नीति ही कटघंरे में है। अब लोग महसूस करने में लगे हैं कि रोजगार उपलब्ध कराने के बहाने वे सिर्फ छले जा रहे हैं। शीतला नदी के किनारे कोका कोला के विरोध में इसीलिए जनता की आवाज बुलंद हुई है। जनता समझ रही है कि इससे न सिर्फ ग्राम समाज की जमीन छीनी जाएगी बल्कि संपूर्ण पछवादून क्षेत्र के पर्यावरण पर बुरा असर पड़ेगा। राज्य का प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बांध परियोजनाओं और उद्योगों को प्रदूषण फैलाने से रोकने में जरा भी सक्रिय नहीं रहा है बल्कि आंख मूंदकर बैठा रहा है। इससे लोग दमा क्षय और आंखों की बीमारियों के शिकार भी हो जाते हैं।

 

समय रहते सरकार को औद्योगिक विकास की ऐसी संतुलित नीति अपनानी होगी जिससे कूषि भूमि भी बची रहे और लोगों को पलायन के लिए मजबूर भी न होना पड़े। यह सच है कि पहाड़ों पर बड़े उद्योग नहीं लग सकते हैं। लेकिन वहां के कुटीर उद्योगों को पुनर्जीवन अवश्य प्रदान किया जा सकता है। वहां की शिल्प कला दम तोड़ रही है। आखिर उन लोगों की कला को संरक्षण देने के बारे में क्यों नहीं सोचा जाता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी मिट्टी पत्थर और धातु की सुंदर देवमूर्तियां बताते रहे। जिनके ताम्र शिल्प ने दुनिया को आकर्षित किया। जिनकी उंगलियां बांस और रिंगाल को सुंदर टोकरियों और चट्टाइयों को आकार देती रहीं। औद्योगिक विकास की दृष्टि से उत्तराखण्ड में फलोत्पादन पुष्प उत्पादन दुग्ध उत्पादन कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर निर्माण करने जैसी तमाम अन्य संभावनाएं हैं। लेकिन राज्य की अब तक की सरकारों का पूरा ध्यान कूषि भूमि को सिमटाने तक ही सीमित रहा है।

 

 

हवा में विकास

घाट क्षेत्र के विकास की मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की घोषणा हवाई ही साबित हुई। तहसील न बन पाने के कारण लोग जरूरी प्रमाण पत्रों के लिए ३० किलोमीटर दूर जाने को विवश हैं। सड़कों के निर्माण की मांग को लेकर वे आए दिन आंदोलन करते रहे हैं

 

प्रदेश में सरकारी स्तर पर विकास के बड़े-बड़े वादे किये जाते रहे हैं लेकिन सीमांत जिलों के कई क्षेत्रों में लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। शिक्षा और विकास की दृष्टि से इन दूरस्थ क्षेत्रों के लोग निरंतर पिछड़ते जा रहे हैं। विकास की जो घोषणाएं नेता यहां आकर करते हैं वे भी हवाई साबित हो जाती हैं।

 

ऐसा ही एक उपेक्षित क्षेत्र सीमांत चमोली जिले का घाट क्षेत्र हैं। सुरक्षा की दृष्टि से सीमांत जिलों में सड़कों और दूरसंचार जैसी सुविधाएं होना जरूरी समझा जाता है। लेकिन घाट क्षेत्र में एक ओर जहां बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं वहीं दूसरी ओर लोगों को शासन-प्रशासन के उपेक्षापूर्ण रवैये के चलते तमाम समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। मूलभूत सुविधाओं के अभाव में यहां के लोग कठिनाइयों में जीवनयापन करने को विवश हैं। लगातार आंदोलन के बाद भी इस विकासखंड की सुध लेना वाला कोई नहीं हैं। वर्तमान विधायक जीतराम टम्टा के पास कोई मंत्री पद न होने के चलते भी क्षेत्र के विकास की गति पर विराम सा ही लगा हुआ है। नतीजा यह है कि जनता को अपनी छोटी-छोटी मांगों को लेकर सुदूर इलाकों से उतरकर आंदोलन में कूदने को विवश होना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की घाट को तहसील बनाने की घोषणा से लोगों में जरा सी विकास की उम्मीद जरूर जगी हुई है। मगर अभी तक घाट को तहसील का दर्जा न मिलने से यहां के लोगों को मूल निवास जाति समेत अन्य महत्वपूर्ण प्रमाण पत्रों को बनवाने के लिए ३० किलोमीटर दूर चमोली तहसील आना पड़ता है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी विकासखंड के छात्र-छात्राएं पिछड़ते जा रहे हैं। डिग्री कॉलेज की मांग को लेकर भी लोग कई बार आंदोलन कर चुके हैं किन्तु उन्हें हर बार आश्वासनों का झुनझुना थमाया जाता है। प्राथमिक श्क्षिा में भी इस क्षेत्र का हाल बुरा है। घाट में सरकार द्वारा स्कूल तो खोले गए हैं मगर इन स्कूलों के संचालन के लिए शिक्षकों की तैनाती नहीं की गई हैं। अधिकांश स्कूलों में मानकों के अनुसार शिक्षक न होने से नौनिहालों का भविष्य सुरक्षित नहीं दिख रहा है।

 

शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने के क्षेत्र की मांग को लेकर लोग महीनों तक जिला कार्यालय पर धरना तक दे चुके हैं। बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है। चिकित्सा के दावे भी क्षेत्र में हवा ही साबित हो रहे हैं। लोगों को छोटे मोटे इलाज के लिए भी ४० किलोमीटर दूर जिला चिकित्सालय व ७० किलोमीटर दूर कर्णप्रयाग के चिकित्सालयों का सहारा लेना पड़ता है। घाट क्षेत्र के दर्जनों गांव कई बार मूलभूत सुविधाओं के लिए लगातार आंदोलन कर चुके हैं लेकिन आज भी क्षेत्र के द्घूनी रामणी सुतौल कनौल पगना सैंती प्राणमति मटई गांव के लोग सड़क स्वास्थ्य बिजली पानी व दूरसंचार के लिए तरस रहे हैं। मोटर मार्गों के निर्माण की मांग को लेकर क्षेत्र में लोग निरंतर आंदोलन करते रहे हैं। लेकिन शासन-प्रशासन ने इसमें कभी कोई दिलचस्पी नहीं ली। राजनीतिक पार्टियों चुनाव के वक्त क्षेत्र के विकास के लिए बड़ी-बड़ी घोषणा करने से नही चूकती हैं किन्तु सरकार आते ही इन पार्टियों के नेता अपने वादे भूल जाते हैं। जिस कारण आज घाट क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से कटता ही जा रहा है। यहां के हुक्मरानों ने यहां की भोली जनता को लूटने के सिवाय कुछ नहीं किया। हर सरकार ने विकास के भारी-भरकम दावे किये लेकिन घाट के संबंध में ये दावे हवाई ही साबित हुए। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि घाट के हिस्से में विकास तो नहीं किन्तु आंदोलन जरूर आए हैं।

 

बात अपनी-अपनी

घाट क्षेत्र की समस्याओं को लेकर ग्रामीणों ने कई बार आंदोलन किए। मगर अभी तक शासन प्रशसन इस क्षेत्र की उपेक्षा कर रहा है। यदि शीद्घ्र ही यहां की समस्याएं न निपटाई गईं तो ग्रामीण उग्र आंदोलन करने के लिए विवश होंगे।

ममता गौड प्रमुख विकासखंड घाट

हमारा गांव घाट ब्लॉक में पड़ता है। यहां पिछले चार सालों से पानी की समस्या बनी हुई है। पीने के पानी के लिए हमें दो किलोमीटर दूर प्राकृतिक स्रोत का सहारा लेना पड़ता है। आस-पास के गांवों का भी यही हाल हैं। कई बार हम समस्याओं को लेकर जिला मुख्यालय पर आंदोलन कर चुके हैं। लेकिन वादों के सिवाय कुछ नहीं मिल पाया है।

पूनम देवी निवासी पगना

 

 

 
         
 
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  • संजय स्वार

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