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संवाद 6
 
^पूंजीवाद गरीबों के खिलाफ एक युद्ध है^

समाजवादी चिंतक j?kq ठाकुर से रोविंग एसोसिएट एडिटर गुंजन कुमार की बातचीत

समाजवाद विफल नहीं हुआ है। दुनिया के किसी भी देश में अभी तक समाजवाद का प्रयोग सत्ता के तौर पर नहीं हो पाया है। मार्क्सवाद का हुआ है। यूरोप के कुछ देशों में सोशलिस्ट पार्टी सत्ता में रही है। लेकिन वह कॉरपोरेट सोशलिस्ट पार्टी थी। वह समाजवाद की बात तो करते हैं लेकिन वह दुनिया के बाकी के देशों में बाजार का काम करते हैं। जिस समाजवाद की बात हम लोग करते हैं] वह भारतीय समाजवाद है। इस समाजवाद की थ्योरी लोहिया ने रखी है। लोहिया ने उस वक्त सात प्रकार की क्रांति बताई हैं। आज उसमें हमलोग और वृद्धि कर रहे हैं। लोहिया की सात क्रांति हैं & आर्थिक समता] लैंगिक समता] रंग भेद की समाप्ति] सामाजिक समानता] निःशस्त्रीकरण] विकेंद्रीकरण और विश्व संसद। इन सात चीजों का बदलाव उस वक्त जरूरी था। लोहिया ने समाजवाद को यहां की मिट्टी के अनुरूप बनाया है। लोहिया कहते हैं] भाषा] भूषा और भवन इन तीन चीजों पर समाजवादियों का आचरण भारतीय होना चाहिए

लोहिया काल से अब तक समाज और राजनीति में क्या बदलाव आया है 

आजादी के पहले देश के प्रति प्रेम] सामाजिक सौहार्द और आंदोलन का वातावरण था। वह गांधी जी के साथ जाता रहा। आजादी के करीब&करीब २५ वर्ष तक भी देश का सामाजिक वातावरण राजनीतिक समाज के प्रति समर्पित था। लेकिन १९७१ के बाद देश की राजनीति में पैसे का चलन बढ़ा। कुछ दिनों के बाद वह चलन बाजार में पूरी तरह बदल गया। अब राजनीति पर बाजार का पूरी तरह से कब्जा हो गया है। ^निराशा का कर्तव्य^ लोहिया की एक पुस्तिका है। उसमें उन्होंने लिखा है कि उस वक्त देश में तीन निराशा थी। एक थी मानवीय निराशा। दूसरी राष्ट्रीय निराशा थी और तीसरी थी अन्तरर्राष्ट्रीय निराशा। व्यक्ति समाज के प्रति चैतन्य नहीं हो रहा था। la?k"kZ नहीं करता था। राष्ट्रीय स्तर पर भी लोग बदलाव करने के लिए प्रयास नहीं कर रहे थे और अन्तरर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कोई संस्था सक्रिय नहीं थी। आज के समय में निराशा ?kVus के बाजाए और बढ़ गई है। आज हमारे सामने छह निराशा है। पहले के तीन निराशा के साथ तीन और निराशा जुड़ गई है। उनमें धार्मिक] समाजिक और वैचारिक है। धार्मिक इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जिस धर्म को लोगों के मन बदलने का माद्दा हो सकता था] वह धर्म आज बाजार की वस्तु बन गया है। १९ वीं सदी के शुरूआत में लोग बेशक अशिक्षित थे लेकिन समाज का वातावरण मूल्य आधारित था। तब समाज किसी बुरे आदमी को सम्मान और साथ नहीं देता था। अच्छाई कमजोर भी होती थी तो लोग उसके साथ खड़े होते थे। आज सामाजिक निराशा इसी कारण है कि लोगों ने अपने मूल्यों को तिलांजली दे दी है। लोग उस व्यक्ति के साथ खड़े हो जाते है] जिसने किसी भी प्रकार से धन] पद और प्रतिष्ठा प्राप्त कर लिया हो। १९ और २० सदी के मध्य तक देश और दुनिया में एक विचार को लेकर चर्चा थी और होती थी। मगर आज वैचारिक प्रवाह बहुत धीमा हो गया है। इसके पीछे भी वैश्वीकरण का एक योजनाबद्ध प्रचार है। आज दुनिया में जो साहित्य रचा जा रहा है] इसमें बहुत बड़ी भूमिका पूंजीवाद की है। पूंजीवाद अपने लक्ष्य के लिए साहित्य को रचवाता है। दो किताबों का जिक्र यहां करूंगा। एक थी ^ऐंडा फिस्टरी।^ इसमें कहा गया है कि दुनिया में कोई विचार नहीं है। सिर्फ पूंजीवाद जिंदा रहेगा। दूसरी किताब आई जिसकी बहुत चर्चा हुई] वह थी ^क्लेश ऑफ सिविलाइजेशन^ यह किताब भी उन्हीें लोगों की तरफ से आई। इसमें बताया गया है कि दुनिया में दो प्रकार के विचार हैं। एक कट्टरवाद और दूसरा बहुत समझदार है। इस तरह के वातावरण बनाए जाने के कारण ही वैचारिक लोग कहीं पीछे चले गए हैं।

आज कल राजनीति में पैसे का चलन बढ़ा है। इस कारण पहले जो एक सामान्य आदमी समाज और राजनीति में काम करने का साहस जुटाता था] वह अब साहस नहीं जुटा पा रहा है। हमारे मध्य वर्ग में बहुत बदलाव आया है। पीछे ३०&३५ वर्ष के दौरान मध्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा उच्च वर्ग हो गया है। एक तरह से वे नए एलिट क्लास में तब्दील हो गया है। अपने देश में कर्मचारियों का बहुत बड़ा तबका है। आज कर्मचारी वर्ग सर्वहारा वर्ग में नहीं रहा। सरकारी और निजी क्षेत्र में लोग अच्छे वेतन ले रहे हैं। सरकारी क्षेत्र में भी सातवें वेतनमान के बाद सबसे निचले कर्मचारी को भी अच्छे वेतन मिल रहा है। ये लोग उच्च मध्य वर्ग में शामिल हो गए हैं। आज इनकी रोजी&रोटी समस्या नहीं रही है। इनकी सोच कहीं न कहीं बाजार और वैश्वीकरण की सोच से मिल गयी है। इसलिए अब इनका लक्ष्य बदल गया है। अब इनका लक्ष्य बेटे को अच्छी कंपनी में नौकरी और अच्छा पैकेज मिल जाए भर है। कहने का अर्थ यह है कि आज सामाजिक सोच में बदलाव आया है। एक अौर निराश है। वह है मीडिया का निराशा। इसके चरित्र में भी बहुत गिरावट आई है। आजादी के समय मीडिया आंदोलनकारियों के साथ था। आजादी के बाद भी मीडिया ने अपने निष्ठा में ज्यादा बदलाव नहीं किया था। हालांकि तब भी अखबार पूंजीवादी लोग ही निकालते थे लेकिन तब संपादक स्वतंत्र था। संपादक बेशक वेतन लेते थे लेकिन वे नौकर नहीं थे। वे आजाद तबीयत का होते थे। आज संपादक रहा ही नहीं। वह पीआरओ बन गया है। कभी मुखर आवाज रखने वाली मीडिया की भाषा बदल गई है। 

क्या पूंजीवाद को आप विचारधारा मानते हैं

हां] पूंजीवाद विचारधारा है।

फिर विचारधारा की निराशा क्यों है

पूंजीवाद विचारधारा जरूर है। पर यह बहुत कम लोगों की है। ^ऑक्सफेम इंडिया^ की रिपोर्ट आई है। जिसमें कहा गया है कि इंडिया की जीडीपी का १५ फीसदी धन केवल ८ लोगों के पास है। दुनिया का ७० फीसदी धन एक फीसदी लोगों के पास है। ये ही पूंजीवादी हैं। केवल एक फीसदी लोगों की यह विचारधारा है। यह समग्र समाज के लिए नहीं हैं। जो विचारधारा समग्र समाज के लिए नहीं है] उसे विचारधारा कहना लाचारी हो सकती है। पर वह तार्किक नहीं है। यह तो गरीबों पर हमला है। पूंजीवाद एक युद्ध है जो गरीबों के खिलाफ लड़ा जा रहा है। आपने कहा मध्य वर्ग] उच्च मध्य वर्ग में तब्दील हो गया। 

सरकारी मुलाजिम अब सर्वहारा नहीं रहा। तो क्या साम्यवादी विचारधारा के मजदूर अब खत्म हो गए

साम्यवादी विचारधारा को तीन हिस्सों में बांटते हैं। पहला] मार्क्स का मुख्य लक्ष्य था बराबरी का। वह लक्ष्य ठीक था। दूसरा] उन्होंने पूरी दुनिया को वर्ग la?k"kZ के रूप में देखा। हर जगह उन्हें क्लास दिखा। यह दृष्टि यूरोप के लिए तो ठीक था मगर यूरोप से बाहर सही नहीं था। क्योंकि अपने देश को देखें तो हिन्दुस्तान में वर्ग कहां है। यहां तो जाति सत्य है। यहां के अधिकांश राजनीतिक दल जाति पर आधारित है। उसके बाद धर्म है। धर्म के नाम पर भी राजनीतिक दल हैं। मार्क्स इसे नहीं समझ पाएं। उनके सामने यूरोप और जर्मनी था। मार्क्स का तीसरा विश्लेषण भी सीमित था। उन्होंने क्रांति का क्रम बताया है। जिसमें कहा कि छोटे उद्योगों को बड़े उद्योग खाऐगें। वह और बड़ा बनेगा। इससे मजदूर बढ़ेंगे। मजदूर बढ़ेंगे तो la?k"kZ होगा। जिसमें पूंजीवादी हार जाएंगे। उनकी यह कल्पना भी औद्योगिक राज्यों के लिए थी। औद्योगिक राज्य यूरोप के दो&तीन देश ही थे। बाकी के देशों में उद्योग न के बराबर थे। इसलिए देखा गया कि मार्क्सवादी परिवर्तन औद्योगिक देशों में नहीं हुआ। परिवर्तन वहां हुआ] जहां औद्योगिकीकरण न के बराबर था। रूस और चीन उद्योग में सबसे पीछे था। वहां मार्क्सवादी परिवर्तन हुआ। एक और तथ्य मार्क्स से छूट गया। जिसका जिक्र सबसे पहले हिन्दुस्तान में डॉक्टर लोहिया ने किया है। डॉक्टर लोहिया ने यहां बहस शुरू की कि क्या मार्क्सवाद से बदलाव संभव है। थोड़े देर के लिए अहिंसा छोड़ दें तो क्या हिंसा से बदलाव हो जाएगा। लोहिया ने ५० के दशक में कहना शुरू किया कि मार्क्स की विचारधारा से हिन्दुस्तान में बदलाव संभव नहीं है। उसकी वजह उन्होंने बताई। मार्क्स ने सरप्लस वैल्यू बताई है सरप्लस वैल्यू दो हिस्सों में बनती है। मार्क्स ने सरपल्स वैल्यू की कल्पना स्टेट के साथ की। लोहिया ने सरप्लस वैल्यू दो देशों के बीच भी बताया। जब ब्रिटेन के मेनचेस्टर का कपड़ा हिन्दुस्तान आता है तो वहां भी सर प्लस वैल्यू तैयार होती है। जो मार्क्सवाद का सर्वहारा था] वह पूंजीवाद का सहयोगी बन गया। इसलिए उनकी कल्पना संभव थी ही नहीं। पांचवी बात यह है कि क्या आप बड़े उद्योग से दुनिया की समस्या खत्म कर सकते हैं। आज दुनिया में सबसे बड़ी समस्या है गरीबी और बेरोजगारी। ये दो जुड़वा बहने हैं। पूंजीवाद एक हजार को काम देता है तो एक लाख को बेरोजगार बनाता है। नए प्रकार के उद्योग से बेरोजगारी बढ़ रही है। मशीन का पेट बिजली से भरती है। जो प्रकृति से बनती है। मगर मनुष्य का पेट अन्न से भरता है। प्रकूति के पास बिजली बनाने के संसाधन सीमित हैं जो कभी न कभी खत्म हो जाएगा। उसके बाद क्या होगा। मार्क्स की कल्पना यहां तक नहीं पहुंचती। इसलिए वे अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकें। मार्क्स और वैश्वीकरण में एक समानता है। क्योंकि दोनों बड़े उद्योग चाहते हैं। बड़े उद्योग का कल्चर बराबरी नहीं ला सकता। वह गैर बराबरी ही लाएगा। इसलिए डॉक्टर लोहिया ने गांधी की बात को आगे बढ़ाया। जिसमें छोटी मशीन को स्वीकार किया गया है। छोटी मशीन उत्पादन में लोगों का सहयोगी तो बने मगर वह अधिकार न छीन ले। 

भारत के मार्क्सवादी यहां के सामाजिक&राजनीतिक संरचना के मुताबिक अपनी विचारधारा में बदलाव क्यों नहीं कर पाए

यहां के मार्क्सवादी लोग मार्क्स के दौर से इतने प्रभावित थे कि वे भारतीयता को मन से स्वीकार नहीं कर पाए। वे भारतीयता की हमेशा से उपेक्षा करते रहे। वे लोग भारत को हमेशा से पुरातनपंथी मानते रहे। भाषा के सवाल पर उनकी सोच अलग है। जाति को तो वे मानते ही नहीं। वे तो क्लास को मानते हैं। हालांकि बंगाल से उनकी सरकार जाने के बाद उन्हें पता चला कि जाति भी कुछ होती है। अब उनकी भाषा कई बार काशीराम से भी आगे जाकर मायावती तक पहुंच जाती है। भारतीय भूमि पर मार्क्सवाद उपजाऊ नहीं था। यहां के लिए गांधी और लोहिया ही सही हैं।

यहां के मार्क्सवादी तो भारतीय थे तो उन्होंने इस सच्चाई को क्यों नहीं समझा

क्योंकि वे मानसिक दासता के शिकार थे। मानसिक दासता विदेशी विचारकों की थी। चीन यहां के मार्क्सवादियों को मदद करने लगा। जब आप आंदोलन के लिए विदेशों से आर्थिक मदद लेने लगेंगे तो अपना विचार कहां रख पाएंगे। यहां  मार्क्सवादी दो हिस्सों में बंट गया। सीपीआई रूस का हो गया और सीपीएम चीन का। जब आपकी जड़े दूसरे का रस पीने लगेगी तो आप खड़े कैसे हो पाएंगे

तो क्या यह माना जाए कि आज बाजार सर्वशक्तिशाली हो गया है

ऐसा दिखता तो है। मगर बाजार सबसे कमजोर भी है। कमजोर इसलिए है कि वह चंद लोगों के लिए है। उसकी शक्ति दूसरों की अज्ञानता और संगठन पर निर्भर है। उसकी अपनी ताकत नहीं है। अंग्रेज भारत पर राज कर रहा था तो अपनी शक्ति के कारण नहीं बल्कि भारतियों में फूट डालकर कर रहा था। हमलोगों का प्रयास यह है कि बाजार से लोगों को अवगत कराएं। गरीब लोगों को एकजुट कर उन्हें सामर्थ्यवान बनाएं। यदि आप एक सामान का इस्तेमाल बंद कर दें तो दुनिया से एक पूंजीपति खत्म हो जाएगा। उनकी कमजोरी और डर का एक उदाहरण बताता हूं। वे अपने प्रति सद्भाव पैदा करने के लिए प्रयासरत हो चुके हैं। पिछले दिनों खबर आई कि बिल गेट्स ने साढ़े चौसठ हजार डॉलर टैक्स दिया है। यह दुनिया का सबसे ज्यादा टैक्स है। उन्होंने यह भी कहा कि अमीरों पर और टैक्स लगना चाहिए। उन्हें अब लगने लगा कि इतना पैसा का क्या करेंगे। इसलिए वह चाहते हैं कि टैक्स ही कुछ ले लो। अपने आप को जिंदा रखने के लिए इससे वह लोगों में अपने प्रति सहानभूति पैदा कर रहे हैं। इससे यह भी दिखता है कि पैसे की जरूरत की सीमा का अंत हो चुका है। दूसरा इनकी भूख ने गरीबी और अमीरी की जो खाई चौड़ी की है उसकी अब प्रतिक्रिया होने का डर है। उससे वह चिंतित हैं। इसलिए वह समाज में अपने प्रति सद्भाव पैदा करने के लिए यह सब कर रहे हैं। यहीं पूंजीवाद की हार होती दिखती है।

आप समाजवाद के तरफ कैसे आए

मैं जब विश्वविद्यालय में पढ़ता था] वहां एक सहायक रजिस्ट्ररार लक्ष्मी नारायण भारद्वाज थे वह आजादी के समय आंदोलन में थे। मेरे पिता जी भी स्वतंत्रता सेनानी थे। मेरे पिताजी आजादी मिलने के बाद खेती में लग गए। लक्ष्मी नारायण जी डॉक्टर लोहिया से बहुत प्रभावित थे। उस दौरान लोहिया की पत्रिका ^जन^ निकलती थी। वह उस पत्रिका और साहित्य को लोगों के पास पहुंचाते थे। पहली बार उन्होंने ही मुझे लोहिया के साहित्य से जोड़ा। इनसे जुड़ने के पहले तक मैं नेहरू का प्रशंसक था। हालांकि वह हमारी अल्प समझ थी। जब मैंने लोहिया को पढ़ा तो वह गांधी के करीब थे। उस वक्त की वह जरूरत भी थी। बाद में १९६३ में लोहिया की पार्टी स्वयं सोशलिस्ट पार्टी ¼एसएसपी½ का मैं सदस्य बन गया। तब से मैं समाजवाद से जुड़ गया और अभी तक काम कर रहा हूं।

समाजवाद में बराबरी की बात होती है। फिर यह विचार विफल क्यों हुआ

समाजवाद विफल नहीं हुआ है। दुनिया के किसी भी देश में अभी तक समाजवाद का प्रयोग सत्ता के तौर पर नहीं हो पाया है। मार्क्सवाद का हुआ है। यूरोप के कुछ देशों में सोशलिस्ट पार्टी सत्ता में रही है। लेकिन वह कॉरपोरेट सोशलिस्ट पार्टी थी। वह समाजवाद की बात तो करते हैं लेकिन वह दुनिया के बाकी के देशों में बाजार का काम करते हैं। जिस समाजवाद की बात हम लोग करते हैं] वह भारतीय समाजवाद है। इस समाजवाद की थ्योरी लोहिया ने रखी है। लोहिया ने उस वक्त सात प्रकार की क्रांति बताई हैं। आज उसमें हमलोग और वृद्धि कर रहे हैं। लोहिया की सात क्रांति हैं & आर्थिक समता] लैंगिक समता] रंग भेद की समाप्ति] सामाजिक समानता] निःशस्त्रीकरण] विकेंद्रीकरण और विश्व संसद। इन सात चीजों का बदलाव उस वक्त जरूरी था। लोहिया ने समाजवाद को यहां की मिट्टी के अनुरूप बनाया है। लोहिया कहते हैं] भाषा] भूषा और भवन इन तीन चीजों पर समाजवादियों का आचरण भारतीय होना चाहिए। हमारी भाषा कौन सी हो। मार्क्सवादियों ने भाषा के सवाल को समझा ही नहीं। लोहिया ने कहा कि बदलाव के लिए उस देश की स्थानीय भाषा जरूरी है। चीन और रूस ने अपने भाषा में कोई बदलाव नहीं किया। उसने अंग्रेजी न तो ढोई और न ही जनता पर थोपी। मगर अपने देश के मार्क्सवादी अंग्रेजी से बाहर आ ही नहीं पाए। लोहिया हिन्दी या प्रदेश की अपनी भाषा के बारे में बोलते थे। वह अंग्रेजी के वर्चस्व को हटाना चाहते थे। इससे समाजवाद की स्वीकार्यता बढ़ी। लोगों को लगा कि यह अपने हैं। लोहिया ने धर्म के बारे में एक नई दृष्टि दी। मार्क्सवादी धर्म को अफीम कहते हैं। लोहिया ने कहा धर्म और राजनीति का रिश्ता अलग प्रकार का है। उन्होंने कहा] राजनीति अल्पकालिक धर्म है। धर्म] दीर्द्घकालिक राजनीति है। यानी  पचास&सौ साल में समाज कैसा होना चाहिए] वह राजनीति है। समाज में मानव कैसा होना चाहिए] वह धर्म है। यह कह कर लोहिया ने धर्म के साथ मार्क्स के कटुता के रिश्ते को खत्म किया। भारतीय समाज के आम धारणा को जोड़कर उसमें बदलाव लाने का प्रयास किया। यह कल्पना भारतीय सभ्यता की प्राचीन कल्पना है। वैदिक काल में कोई संपत्ति अर्जित नहीं करता था। तब कोई जाति] धर्म नहीं था। तब धर्म प्रकृति थी। पानी] सूर्य] पेड़ की पूजा होता थी। इसलिए यह खत्म नहीं हो सकता।

 लोहिया विश्व संसद की बात करते थे फिर वैश्वीकरण का विरोध भी क्यों

लोहिया की विश्व संसद की कल्पना भारतीय सभ्यता की ही कल्पना है। ^वसुदेव कुटंबकंम^ मानवता को लेकर था] बाजार के लिए नहीं था। वैश्वीकरण बाजार के लिए है मानवता के लिए नहीं है। इस वैश्वीकरण में दुनिया को एक करना नहीं है। यह तो द्घोर वैश्वीकरण की विरोधी है। जब अमेरिका अपनी संपन्नता और तेल के लिए युद्ध करता है तो वैश्वीकरण कहां है। वह तो वैश्वीकरण का सबसे बड़ा समर्थक है। यह तो कुछ ताकतवर देशों का ढकोसला है। वैश्वीकरण तो एक प्रकार का आवरण है। यह पूंजीवाद का बुर्का है। इसके भीतर पूंजीवाद छिपा है। हैलरी किसंकर की एक बात यहां कहूंगा। उन्होंने कहा था कि ग्लोबलाइजेशन इज नथिंग। डब्लूटीओ इज नथिंग। यह अमेरिका की श्रेष्ठता के आगे कुछ नहीं है। हम मानवता आधारित विश्व संसद के पक्षधर हैं। यूएन में पांच देश ब्रह्मा के  बनाए हुए हैं। बकाया देश ब्रह्मा के पेट से पैदा हुए हैं। उनको सुरक्षा परिषद में वीटो का अधिकार दिया हुआ है। बाकी देश हाथ उठाते रहिए। जब यूएन का गठन ही गैर वैश्वीकरण है।

फिर समाजवाद सत्ता का अगुवाई क्यों नहीं कर पाया

सत्ता तक नहीं पहुंचने के पीछे कुछ वजहें थी। इसमें संगठन की कमी मुख्य कारण है। धर्म को कुछ राजनीतिज्ञ लोगों ने संस्था का रूप देकर इस्तेमाल किया। वह देश के जन मानस तक जल्दी पहुंच गया। उसके पास संगठन और प्रचार तंत्र था। उसने अंधविश्वास और कट्टरता का सहारा लिया। जिसको पूंजीवाद ने सहयोग किया। वहीं धर्म का सौहार्द पक्ष लोगों तक नहीं पहुंच पाया। मीडिया ने भी अपने रूप में बदलाव कर लिया। लोहिया के गैरकांग्रेसवाद नारे के बाद देश और प्रदेश में सरकारें बदलीं। मगर जो सरकारें बदली उन्होंने गैर कांग्रेसवाद को कुर्सीवाद समझ लिया। उन्होंने समाजवाद की मूल आत्मा को छोड़ दिया। वे लोग सरकार बचाने में लगे रहे। बुराइयां कांग्रेस में थी] उन बुराइयों को इन लोगों ने न केवल अंगीकार कर लिया] बल्कि उससे भी आगे चले गए। देश के दो बड़े राज्यों में लोहिया के नाम लेकर राजनीति करने वालों की सरकारें बनीं। बिहार में कर्पूरी ठाकूर तक ठीक था। लेकिन उसके बाद लालू का दौर आया। इन लोगों ने 

समाजवादियों का चेहरा काला करने का काम किया। यूपी में मुलायम सिंह की सरकार आई। इन लोगों ने हमारे चेहरे पर कालिख पोत दी। देढ़ सौ संसदीय क्षेत्र वाले दो प्रदेशों में समाजवादी को बदनाम करने का काम समाजवादियों ने ही किया। हम हारे नहीं हैं। बाहर के लोगों ने हमें नहीं हराया है। हमें अपने लोगों ने हराया है। हमें मारा है। बदनाम किया है। सामान्य लोग तो प्रचार देखते हैं। मुलायम सिंह की पार्टी का नाम समाजवादी पार्टी है। हमने उनसे कई बार आग्रह किया कि अपनी पार्टी का नाम बदलकर हम पर मेहरबानी कीजिए। इन लोगों ने समाजवाद और लोहिया का नाम लेकर उनके विचार को बदनाम कर दिया। क्योंकि इन्होंने लोहिया का गलत मॉडल पेश किया। यदि इन्होंने लोहिया के अनुकूल मॉडल दिया होता तो समाजवाद सर्वस्वीकार होता। एक परिस्थितिजन हमला हम लोगों पर हुआ है। इससे संगठनिक बिखराव भी हुआ। इससे उबरने में हमलोग लगे हुए हैं।

सत्ता में आते ही समाजवादियों में बदलाव क्यों हुआ

पहला तो मैंने बताया कि ये लोग सरकार बनाने और बचाने में लग गए। दूसरा] इन लोगों ने लोहिया के गैरकांग्रेसवाद का अर्थ नहीं समझा। लोहिया कांग्रेस नामक संस्था का विरोध नहीं करते थे। वह तो कांग्रेस में रहे हैं। वह तो कांग्रेस की प्रवृतियों का विरोध करते थे। कांग्रेस की प्रवृतियों में एकाधिकार था] परिवारवाद था। राजनीति में पैसे का इस्तेमाल शुरू हुआ] नीतियों बड़े लोगों के लिए बनाने लगी थी। विसंगतियां थी। भारत के जन मानस में गहरे रूप से बैठा हुआ था कि कांग्रेस हट नहीं सकती। लोहिया ने इसे तोड़ा। १९६७ में एक साथ ७ प्रदेशों में गैरकांग्रेसी  सरकार बनीं। कार्यक्रम के आधार पर लोगों को इक्ट्ठा किया। १९६७ में जनसंद्घ से लेकर वामपंथी को एक मंच पर लेकर आए। इसमें वे सफल भी हुए। लेकिन अल्पज्ञानी] कुर्सी लोभी लोगों ने लोहिया के समाजवाद को कुर्सीवादी समाजवाद बना दिया। आज लोहिया होते तो वह भाजपा के खिलाफ लोगों को कार्यक्रम के आधार पर इक्ट्ठा करते।

लोहिया कहा करते थे कि सत्ता लोगों को भ्रष्ट बना देती था। इसके पीछे उनकी सोच कहीं यह तो नहीं थी कि समाजवादी सत्ता पर न बैठे

इस बारे में उनके दो पक्ष थे। आपने आधा पक्ष लिया। उनका कहना था कि दिमागों में गड़बड़ियां आएंगी। सत्ता में जो लोग पहुंचेंगे उनमें भी गड़बड़ियां आ सकती हैं। पर बदलाव का मानस चलते रहना चाहिए। रोटी को उलटते&पलटते रहो। स्थिर नहीं रहने दो। यदि समाजवाद नाम के किसी दल की सत्ता आए। वह रास्ते पर नहीं है तो उसके खिलाफ भी la?k"kZ करो। १९६७ में जब कुछ प्रदशों में मिलीजुली सरकार बनी तो उस सरकारों के खिलाफ भी उन्होंने la?k"kZ करवाएं। उत्तरप्रदेश की सरकार ने छात्र संद्घ का गठन नहीं किया। चरण सिंह मुख्यमंत्री थे। लोहिया ने अपने छात्रों को कहा जाकर आंदोलन करो। लाठियां चली। लक्ष्य सरकार नहीं है। समाजवाद सत्ता का कोई बराबरी वाद नहीं है। हमें समाजवादी सरकार नहीं बनानी है। बल्कि समाजवादी सरकार के माध्यम से समाजवाद की व्यवस्था लानी है। अगर वह सरकार समाजवादी व्यवस्था नहीं ला पाती है तो वह समाजवादी नहीं है। हमारा उससे लेना&देना नहीं है। जैसे हमारे लिए कांग्रेस] भाजपा की सरकार है उसी तरह मुलायम सिंह की सरकार भी है। हमारा लक्ष्य बराबरी लाना है। यदि एक जाति] परिवार से कांग्रेस बने] एक जाति धर्म से भाजपा बने और एक अन्य जाति और परिवार से मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी बने तो इन सब में अंतर क्या है। इसलिए वह कहते थे कि जिंदा कौम पांच साल इंतजार नहीं करती।

आज के समय में यदि लोहिया होते तो क्या वे असफल होते या प्रचंड बहुमत में होते

लोहिया सफल कब हुए। जब वे जिंदा थे। उनकी पार्टी थी। वह la?k"kZ कर रहे थे। उस वक्त भी कितनी संख्या थी। तब भी उनके साथ सीमित संख्या थी। यदि आप मानते है कि सत्ता के शीर्ष में पहुंचना ही सफलता है तो लोहिया सफल नहीं थे। गांधी भी सफल नहीं थे। उन्होंने मेरे जैसे युवाओं को प्रेरित कर समाजवाद की दृष्टि दे दी तो वे मेरी नजर में सफल थे। पर वे सीमित युवाओं को ही जोड़ पाए। बीज तो खत्म नहीं होने दिया। किसी ने मेहनत कर फसल तैयार की और फसल नष्ट हो गई। यदि बीज बच गया तो फसल फिर से तैयार हो जाएगी। गांधी का योगदान यह था कि उन्होंने भारत की वैदिक संस्कूति के बीज को जिंदा रखा। लोहिया का योगदान था कि उन्होंने गांधी की समाजवादी और बराबरी को जिंदा रखा और हमलोगों को दिया। हम लोग लोहियावादी इसलिए है क्योंकि उनकी बीज को बचाकर रखे हैं।

आप लोहियावाद के अंतिम कड़ी माने जाते हैं। आपके बाद j?kq ठाकुर कौन होगा

सैकड़ों&हजारों युवा हैं। यह कभी नहीं मानना चाहिए कि किसी व्यक्ति के गुजरने के बाद विचारधारा खत्म हो जाता है। जबकि सबसे ज्यादा सफल वह है जो अपने मरने के बाद कुछ लोगों को तैयार कर के जाए।

२०१४ में मोदी को मिले प्रचंड बहुमत का क्या कारण मानते है

कांग्रेस की दस साल की सरकार पर पांच&छह आक्षेप थे। भाजपा का प्रचार तंत्र कांग्रेस का सामना कर पाया। उसमें पूंजीवादी] बाजार] मीडिया सब शामिल हैं। एक तो उन्होंने लोगों के दिमाग में बैठा दिया कि कांग्रेस विदेशी पैसे की पार्टी है और हम स्वदेशी पार्टी हैं। हम विदेशी कंपनियों को भगा देंगे। दूसरा] इन्होंने धर्म पर मानसिक विभाजन जबरदस्त ढंग से कर दिया। तीसरा] कांग्रेस भ्रष्ट पार्टी है। हम ईमानदार है। चौथा] सबसे महत्वपूर्ण है। उनको जन समर्थन मिला। उन्होंने लोहिया और कर्पूरी ठाकुर के बीज मंत्र को स्वीकार कर लिया। लोहिया ने एक जमाने में जाति को मिटाने के बारे में कहा था। इन्होंने जाति को अलग&अलग श्रेणी में रखा था। कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ी जाति को भी दो हिस्सों में बांटा। उन्होंने पिछड़ी जाति के मजबूत वर्ग और अति पिछड़ा वर्ग को अलग किया। भाजपा ने जब मोदी को चुना तो उनके दिमाग में कहीं न कहीं लोहिया&कर्पूरी ठाकूर का वही बीज मंत्र था। वीपी सिंह के बाद पिछड़ा वर्ग मजबूत हुआ था। बिहार] यूपी में यादव] कहीं जाट सत्ता में पहुंच गई। भाजपा ने पिछड़े वर्ग के सबसे कमजोर वर्ग में संदेश पहुंचाया कि उसके लोगों को आगे ला रहे हैं। अति पिछड़ी जाति के लोगों ने मोदी में अपना चेहरा देखा। वह अकेली भाजपा या मोदी की जीत नहीं है। यूपी] बिहार] हरियाणा एवं अन्य प्रदेशों में जहां पिछड़ी जाति राजनीतिक रूप से मजबूत रही। वहां अति पिछड़ी जातियों ने उसके खिलाफ एकजुट होकर मोदी को वोट किया। एक तरफ भाजपा का कट्टर हिन्दुत्व था। वहीं लोहिया&कर्पूरी की सामाजिक पक्ष भी था। वह हमारी जमीन पर जीते हैं। यह विडंबना है कि हमारे लोगों ने इस पक्ष को नहीं समझा। विवेकानंद ने एक बहुत ही अच्छी बात कही थी। उन्होंने कहा था कि हमारा हिन्दुत्व दिमाग से वैदिक है और शरीर से इस्लाम है। यह समाजिक समरसता की ओर इशारा करता है।

मोदी का कार्यकाल अब समाप्ति की ओर है। उनके कार्यकाल पर आप क्या कहेंगे

मोदी के व्यक्तित्व और जीवन के बारे में मैं उनसे प्रसन्न हूं। कोई परिवारवाद नहीं है। कोई जातिवाद नहीं कर रहा है। उनके कार्य क्षेत्र में द्घर या परिवार के किसी लोगों का दखल नहीं है। निजी तौर पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है। व्यक्ति के तौर पर मोदी के बारे में मेरी राय अच्छी है। मगर उनकी कॉरपोरेट मानसिकता है। जिसे वह तात्कालिक सत्ता के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। उनकी सारी निर्भरता पूंजीवाद पर है। जिसका पूरा लाभ कॉरपोरेट उठा रहा है। उनका आर्थिक लक्ष्य बराबरी का नहीं है। वह चंद बड़े लोगों को लाभ पहुंचा रहे हैं  वे कॉरपोरेट द्वारा रचे गए एक प्रकार के ईमानदार नौकर हैं। पिछली सरकार कॉरपोरेट की बूढ़ी नौकर थी। ये कॉरपोरेट के जवान नौकर हैं। मनमोहन सिंह भी कॉरपोरेट द्वारा लाए गए थे। उन्हें देखा यह तो अब हमारे काम आ नहीं रहा। तो उन्हों हटा दिया गया। अब मोदी भी उन्हें अनुकूल नहीं लग रहे हैं।  क्योंकि कांग्रेस में चलन था कि वह कॉरपोरेट के साथ है] वह दिखाती भी थी। मगर मोदी यह दिखाना नहीं चाहते। इसलिए अब मोदी को भी वह हटाने वाले हैं। मोदी की वैचारिक मानसिकता धार्मिक समरसता की नहीं है। वह कट्टर हिन्दू पंथ के हैं। इसी कारण वह हिन्दू के नेता बन गए। लेकिन मोदी की अब सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वह कट्टर विचार को फलने&फूलने नहीं दे पा रहे। क्योंकि हमारा संविधान इस बात की इजाजत नहीं देता। इसलिए अब मोदी से कट्टर हिन्दू भी खुश नहीं है। राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी वे असफल हैं। आज किसान] मजदूर] कट्टर हिन्दू से लेकर नोटबंदी] जीएसटी के चलते व्यापारी वर्ग भी नाराज हैं।

नोटबंदी] जीएसटी के बाद भी भाजपा कई राज्यों में जीती है

यह इसलिए कह रहा हूं कि पहले की तुलना में वोट प्रतिशत ?kV रहा है। पहले सत्ता और विपक्षी के बीच १०&१५ फीसदी का अंतर होता था। अब वह ?kVकर एक फीसदी रह रहा है।

क्या आपको मोदी का विकल्प कोई दिखता है

अगर आप व्यक्ति का विकल्प देखेंगे तो कोई नहीं है। मेरा मानना है कि विकल्प व्यक्ति का नहीं] बल्कि विचारधारा का देखना चाहिए। देखें तो मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस हैं। उसके अध्यक्ष राहुल गांधी का इमेज कॉरपोरेट ने बिगाड़ा। अब वही कॉरपोरेट उनकी छवि सुधारने में लग गया है। राहुल भी विकल्प के रूप में हो सकते हैं। १९३६ के समय नेहरू और लोहिया के संबंध या फिर कांग्रेस और समाजवादियों के संबंध अलग प्रकार के थे। वह la?k"kZ] विचार और त्याग का संबंध था। १९६० के बाद कांग्रेस और समाजवादियों के टकराव का काल था। क्योंकि तब तक कांग्रेस की कार्य संस्कूति बदल गई थी। यहां सवाल उठता है कि क्या राहुल कांग्रेस में १९३० की कार्य संस्कूति लाने को तैयार हैं। यदि वे ऐसा करते हैं तो उनकी स्वीकार्यता बढ़ेगी। इसमें कोई सहयोग चाहेंगे तो हम देने को तैयार हैं। वह यदि सिर्फ कुर्सी के लिए सहयोग चाहेंगे तो लालू] मुलायम ही प्रर्याप्त हैं।

इतनी पुरानी कांग्रेस पार्टी को बदलने का मद्दा क्या राहुल में है

नहीं। वह कांग्रेस को नहीं बदल सकते। क्योंकि अभी तक उन्होंने अपने काम से ऐसा कुछ दिखाया नहीं है। मैंने मोदी की तारीफ की जबकि मैं उनका विरोधी हूं। मोदी ने परिवार के खिलाफ बोला लेकिन वे अपने पार्टी में लागू नहीं करा पाए। क्योंकि उनके नेता बोलने लगे कि मेरा परिवार कहां जाएगा। तो सभ्यता को बदलना एक व्यक्ति के वश में नहीं है। मगर प्रयास तो करें।

लोहिया गैर कांग्रेवाद के समर्थक रहे हैं। आज लोहियावाद या आपका समाजवाद भाजपा के करीब है या कांग्रेस के

लोहिया का विचार किसी के करीब नहीं होना चाहिए या सबके समीप होना चाहिए। लोहिया जब गैर कांग्रेसवाद की रणनीति बना रहे थे तो उन्होंने लिखा कि हम कांग्रेस के खिलाफ नहीं हैं। हम तो इनकी कुर्सी गिराना चाहते हैं। जिसमें जड़ता आ गई है। तब उन्होंने यह भी लिखा है कि यदि कल हमारी सरकार आती है तो उसे भी गिराएं। क्योंकि वह भी बिगड़ेगी। बिगड़ने पर उसे भी हटाइऐं। इसमें कोई अपना&पराया नहीं है। विचार व्यक्ति या संस्था का विरोधी नहीं होता है। हम तो संस्था की बिगड़ी हुई कार्य संस्कृति के विरोधी हैं। यदि आज भाजपा समाजवाद को एडॉप्ट कर लेती है तो हम उसके समर्थक होंगे। नहीं तो उसके विरोधी हैं।

मोदी की छवि कट्टर हिन्दूत्व की है। उनकी सरकार के तीन तलाक पर लिए गए फैसले को आप किस रूप में देखते हैं

तीन तलाक का फैसला समाज के हित में है। किसी भी देश में एक बड़ी आबादी को आप बंधनों में रखें] यह ठीक नहीं है। मगर उनका फैसला मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति के लिए नहीं है।  वह इसके माध्यम से हिन्दुत्व की धारा को फिर से पकड़ना चाहते हैं। फैसला ठीक है मगर उनकी भावना सही नहीं है। हमारे नेता डॉक्टर लोहिया ने कहा था कि देश में कॉमन सिविल कोड होना चाहिए। समाज आगे जा रहा है। जाति&धर्म के नाम पर आप लोगों को जकड़ कर नहीं रख सकते। धर्म कानून नहीं बनाता। धर्म तो मानव बनाता है। यह तो परंपराएं थी जो कानून के रूप में सामने आई। इसको बदलो।     जारी + + +

 

 

 
         
 
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क्या मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और और वित्त मंत्री प्रकाश पंत के बीच शीतयुद्ध चल रहा है?

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  • रामशरण जोशी

वरिष्ठ पत्रकार

व्यक्ति रहे या राजनीतिक दल] दोनों की स्वप्न] आकांक्षाएं &महत्वाकांक्षाएं और संकल्प] इन सभी का आधार

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