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संवाद 5
 
^लोकतंत्र के ढांचे पर फासिज्म का पूरा कब्जा^

आंदोलनकारी और तेलगु कवि वरवर राव से पुष्पराज की विशेष बातचीत

आपका जन्म गुलाम भारत में हुआ था। आपके सामने देश आजाद हुआ। आपने किस तरह की आजादी की कल्पना की थी\ आपने किस तरह के भारत का स्वप्न देखा था\

मैं इस तरह नहीं कह सकता कि मेरा जन्म गुलाम भारत में हुआ था। मेरा जन्म गुलाम हैदराबाद रियासत में हुआ था। हैदराबाद रियासत देश की तमाम रियासतों में सबसे बड़ी रियासत थी। यहां का राजा उस्मान अली खान काफी खतरनाक और क्रूर राजा था। मेरा जन्म द्वितीय विश्व युद्ध के समय हुआ था। हैदराबाद रियासत ने द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार की खूब मदद की थी। इधर आंध्र महासभा के नेतृत्व में कम्युनिस्टों ने यहां सामंतों और भूपतियों के विरुद्ध १९३० से ही आंदोलन शुरू कर दिया था। स्वामी रामानंद यहां राज्य कांग्रेस के नेता थे। स्वामी सहजानंद सरस्वती आंध्र में किसानों&मजदूरों के la?k"kZ का समर्थन करने आए थे। कम्युनिस्टों के नेतृत्व में जारी तेलंगाना के la?k"kZ में तीन हजार गांवों में तीन लाख एकड़ जमीन पर भूमिहीनों ने कब्जा कर लिया था। १९४८ के १३ से १७ सितंबर का काल आंध्र प्रदेश के लिए बहुत बुरा दिन था। भारत की सेना ने हैदराबाद रियासत पर आक्रमण कर दिया था। इस आक्रमण में रजाकार कहकर जहां ४० हजार निर्दोष मुसलमान मारे गए] वहीं तेलंगाना में la?k"kZरत चार हजार कम्युनिस्ट समर्थक भी मारे गए। तेलंगाना में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में जो मुक्ति la?k"kZ चल रहा था] उस la?k"kZ पर नेहरू&पटेल की सेना ने हमला किया था। हम तो निजाम और सामंत दोनों से एक साथ लड़ रहे थे। निजाम को नेहरू&पटेल की सेना ने कब्जे में लिया] लेकिन हम सबको जबरन अपने कब्जे में लिया। इस तरह आक्रमण कर हम कब्जे में कर लिए गए हों तो भारतीय आजादी हमारे लिए दुःस्वप्न से ज्यादा कुछ नहीं है।

आंध्र महासभा एक तरह का संयुक्त मोर्चा था] जिसे कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व प्राप्त था। पहली बार भारत में ^स्ंदक जव जीम जपससमत^ का नारा तेलंगाना la?k"kZ के बाद आया है। ४ जुलाई] १९४६ को तेलंगाना में मजदूरों के एकल जुलूस पर जमींदारों ने गोली चलवाई] जिसमें डोड्डी कोमरय्या की शहादत के बाद संकल्प लिया गया कि अब आत्म&सम्मान के लिए हथियार उठाना है। भारत में पहली बार कम्युनिस्टों के नेतृत्व में सशस्त्र la?k"kZ १९४८ से १९५१ तक चला। इस la?k"kZ में हैदराबाद के निजाम से लेकर दिल्ली की हुकूमत से टकराहट हुई। १९५१ में नेहरू ने कहा कि हम भूमि सुधार करने जा रहे हैं। तो हम स्ंदक जव जीम जपससमत देंगे। नेहरू के वादे पर डांगे को भरोसा हो गया। ३ साल के सशस्त्र la?k"kZ को कम्युनिस्ट पार्टी ने अचानक रोक दिया। हथियारबंद la?k"kZ को वापस लिया और हथियार सरकार को वापस किया तो लोगों के कब्जे से जमीन भी जाने लगी। अब देखिए कि भारत में किसानों] मजदूरों के हक में पहला सशस्त्र la?k"kZ करने वाली] तेलंगाना में हजारों कम्युनिस्टों की शहादत देने वाली कम्युनिस्ट पार्टी को नेहरू पर जो भरोसा कायम हो गया कि नेहरू लैंड&रिफोर्म लाएगा] नेहरू ही समाजवाद भी लाएगा।  नेहरू ने पंचवर्षीय योजनाओं से विकास का सपना दिखाया। कम्युनिस्ट पार्टी इंतजार कर रही थी कि इन्हीं पंचवर्षीय योजनाओं से समाजवाद आ रहा है। नेहरू की मौत १९६४ में हुई तो हम समझते हैं कि नेहरू ही समाजवाद लाएगा] इस भरोसे पर टिकी कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर समाजवाद के सपनों की छटपटाहट में नेहरू की मौत के बाद १९६७ में विखंडन शुरू हो गया। चीन का युद्ध एक बड़ी द्घटना है। यह एक गैर जरूरी युद्ध था पर इस युद्ध के मोर्चे पर भारतीय राज्य सत्ता और कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका जनता के सामने उजागर हो गई। मैंने इस तरह के भारत का सपना तो नहीं देखा था। भगत सिंह ने इंकलाब की ताकत से किसान&मजदूरों के हक के जिस भारत का सपना देखा था] वही सपना मेरा भी था पर यह सपना तो भगत सिंह के साथ ही रह गया। आजादी को हम मात्र ट्रांसफर ऑफ पावर ¼शक्ति का हस्तांतरण½ मानते हैं।

तेलंगाना का सशस्त्र la?k"kZ कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में शुरू हुआ था। कालांतर में तेलंगाना के प्रभाव से नक्सलवादियों का सशस्त्र la?k"kZ शुरू हुआ। कम्युनिस्ट पार्टियों ने इस la?k"kZ को कम्युनिस्ट मानने से इंकार कर दिया। क्या सशस्त्र la?k"kZ सैद्धांतिक तौर पर भटकाव है\ कौन तय करेगा कि असली कम्युनिस्ट कौन हैं\

१९६७ में देश भर में संसदीय राजनीति में नेहरू परिवार के एकाधिपत्य के खिलाफ कांग्रेस विरोधी राजनीति शुरू हुई। लोहिया] कूपलानी] जेपी कांग्रेस विरोधी राजनीति के अगुवा थे। ९ राज्यों में कांग्रेस विरोधी सरकारें आईं। अजय मुखर्जी ने प . बंगाल में बंगाल कांगे्रस बनाई थी। वाम मोर्चा ने अजय मुखर्जी के साथ चुनावी समझौता किया और अजय मुखर्जी के नेतृत्व में विधानसभा चुनाव लड़ा। अजय मुखर्जी की बंगाल कांग्रेस को मात्र ५ सीटें मिली] जबकि वाममोर्चा को ८० सीटें प्राप्त हुईं। चुनावी समझौते की शर्तों के आधार पर अजय मुखर्जी मुख्यमंत्री हुए तो ज्योति बसु उपमुख्यमंत्री सह गृहमंत्री हुए। उस समय चारु मजुमदार सिलीगुड़ी डिवीजन के सीपीएम सचिव थे। लेनिन ने जैसे प्रथम विश्व युद्ध को जनयुद्ध में बदलने की अपील की थी तो उसी तरह चारु मजुमदार सोचते थे कि चीन&भारत युद्ध को भारत के अंदर जनयुद्ध में बदला जाए। चारु ने क्रांति के आठ दस्तावेज लिखे] जिसे ^तेराई दस्तावेज^ कहा जाता है। वाम मोर्चा ने चुनाव में वादा किया था कि ६ लाख हेक्टेयर जमीन जो जोतदार के हाथ में है] वाम मोर्चा सत्ता में आई तो भूमिहीनों में बांट देगी। चारु मजुमदार ने वाम मोर्चा के सत्ता में आने पर पहले संगठन को वादे की याद दिलाई फिर वादे को पूरा करने के लिए आंदोलन शुरू किया। १९६७ के २३ मई से २५ मई तक नक्सलबाड़ी& खेरीबारी गांव में हजारों संथाल आदिवासी परंपरागत हथियारों के साथ जमीन पर बैठ गए और ?kks"k.kk कर दिया कि यह जमीन हमारी है। गृहमंत्री ज्योति बसु ने सीआरपीएफ को गोली चलाने का आदेश दिया। ४ महिलाएं और ३ बच्चे मारे गए। कम्युनिस्ट पार्टी के द्वारा शुरू किया तेलंगाना का सशस्त्र la?k"kZ नक्सलबाड़ी से होता हुआ] पूरे देश के आदिवसी गांवों में फैल गया। अब चूंकि भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां संसदीय राजनीति में शामिल होकर सत्ता की भूख में la?k"kZ से अलग हो गई हैं तो इन्हें अपने हकों के लिए सशस्त्र la?k"kZ करने वाले शत्रु प्रतीत होते हैं। la?k"kZ और शहादात की हिम्मत उनके वश की बात नहीं तो la?k"kZ और शहादत की क्रांतिकारी परंपरा को वे भटकाव कह रहे हैं। नक्सलियों को तो इन्हीं कम्युनिस्ट पार्टियों ने कभी सीआईए का एजेंट भी कहा था। कम्युनिस्ट ?kks"k.kk पत्र के अनुसार जो वर्ग la?k"kZ करता है] वही कम्युनिस्ट है। जो किसान] मजदूर] सर्वहारा के लिए la?k"kZरत है] वही कम्युनिस्ट है।

तेलंगाना का la?k"kZ जिन मुद्दों पर शुरू हुआ था] उनमें क्या सफलता हासिल हुई\ अलग तेलंगाना राज्य क्या तेलंगाना के भूla?k"kZ आंदोलन का अगला चरण था\

तेलंगाना में कम्युनिस्ट सशस्त्र la?k"kZ से जो जमीन भूमिहीनों के हिस्से आई थी] वह सशस्त्र आंदोलन छोड़ने से हाथ से चली गई। १९७० के बाद नक्सल के प्रभाव से श्रीकाकुलम में जो नक्सलबाड़ी la?k"kZ शुरू हुआ तो इस नक्सलबाड़ी की आग से तेलंगाना का la?k"kZ फिर ताकतवर हुआ। इस क्रांतिकारी सशस्त्र la?k"kZ में मैदानी इलाकों में २ लाख एकड़ और जंगली क्षेत्र में ३ लाख एकड़ जमीन पर भूमिहीनों का कब्जा हुआ। भूla?k"kZ के मुद्दे पर सफलता के साथ तेलंगाना राज्य का मुद्दा क्रांतिकारी la?k"kZ से थोड़ा भिन्न होते हुए भी तेलंगाना आंदोलन का दूसरा चरण है। जल] जंगल] जमीन] भाषा&संस्कूति पर स्थानीय कब्जादारी] वैश्वीकरण के विरुद्ध स्वावलंबन सहित स्थानीय अस्मिता की मांग। यह क्रांतिकारी या समाजवादी तेलंगाना नहीं] लोकतांत्रिक तेलंगाना है। गांधीवादी सर्वोदयी] लोकतांत्रिक विचारधाराओं के लोग अलग तेलंगाना की मांग में एकजुट हुए इसलिए इसे हम अस्मिता के साथ स्वावलंबन का la?k"kZ मानते हैं। तेलंगाना के la?k"kZ की बुनियाद में नक्सलबाड़ी और माओवादियों का la?k"kZ है इसलिए अलग राज्य की स्थापना के बाद तेलंगाना की सरकार बार&बार ?kks"k.kk करती है कि हम माओवादियों के एजेंडे को लागू करेंगे। हम सुधार करेंगे] गरीबी खत्म करेंगे। लेकिन हम अच्छी तरह जानते हैं कि पूंजीवादी लोकतंत्र में कोई सरकार माओवादियों के एजेंडे को किस तरह लागू करेगी।

आज भारत के अलग&अलग हिस्सों में बिखरे जनांदोलनों को किस तरह देखते हैं\

हम अलग&अलग हिस्सों में बिखरे आंदोलनों को तीन श्रेणी में बांटकर देखते हैं। पहला है & क्रांतिकारी आंदोलन & जो जंगल महल] झारखंड के सारंडा] दंडकारण्य] ओड़ीसा के आंध्र बॉर्डर] आंध्र&तेलंगाना के इलाके में सशस्त्र la?k"kZ चल रहा है। दूसरी श्रेणी है&राष्ट्रीयता के आधार पर जो आंदोलन चल रहे हैं। कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों में बिखरा आंदोलन। तीसरा है & नर्मदा जैसे बड़े बांधों के खिलाफ जारी आंदोलन] विकास परियोजनाओं से हो रहे विस्थापन के विरुद्ध विस्थापितों का आंदोलन] पोस्को] नियमागिरी से लेकर महानगरों में झुग्गियों के हकों का आंदोलन जो निःशस्त्र है लेकिन इसमें जनता शामिल है। 

नर्मदा बचाओ आंदोलन ने बांधों के बारे में लोगों की आंखें खोल दीं। भाखरा नांगल] हीराकुंड जैसे बांध बने थे तो हम लोग सोचते भी नहीं थे कि ये बांध इतने खतरनाक होंगे। नेहरू ने बड़े बांधों को विकास का आधुनिक देवालय जो कह दिया था। पोल्लवरम को हम पैकेज डील मानते हैं। इधर तेलंगाना है तो उधर पोल्लावरम बांध परियोजना है। पोल्लवरम बांध परियोजना में ३ लाख आिदवासियों का जीवन समाप्त हो जाएगा। शेबरी नदी भी इस बांध से खत्म हो जाएगी।

भारत की तमाम विकास परियोजनाओं में अब तक सबसे ज्यादा आदिवासियों को विस्थापन का शिकार होना पड़ा है। अभी&अभी छत्तीसगढ़ के जंगलों में आदिवासियों के वनग्राम के अधिकार समाप्त कर दिए गए हैं\

आदिवासियों का उजाड़ सबसे ज्यादा इसलिए हो रहा है कि आदिवासी इलाके में ही तमाम संसाधन हैं। आदिवासी इलाकों में धरती के नीचे और ऊपर दोनों तरफ संसाधन हैं। पांव के नीचे लोहा] कोयला से लेकर तमाम तरह के खनिजों की खान हैं तो ऊपर जंगल] जल] जमीन की प्राकूतिक संपदा मौजूद है। धरती के नीचे खान&खदान पर कब्जा करना या जंगल के पेड़ों की कटाई करनी हो तो पहली टकराहट तो आदिवासियों से होगी। इस तरह १९४७ के बाद जो पूंजीवादी विकास का चक्र चला तो आदिवासियों को उजाड़ना राज्य सत्ता के लिए जरूरी हो गया। आदिवासी किसी कीमत पर जंगल और अपने वनग्राम छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते हैं। उन्हें पैसों की ताकत पर बहलाया नहीं जा सकता है तो लगातार आदिवासियों से राज्य सत्ता की टकराहट होती रही। उजड़ने के बाद विस्थापित सस्ते श्रमिक के रूप में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। प्राकूतिक संसाधन और मानव श्रमशक्ति मुफ्त में उपलब्ध हो जाए तो आदिवासियों के इलाके विकास परियोजनाओं के लिए सबसे ज्यादा उपयुक्त मान लिए गए। छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के साथ क्रांतिकारियों का समर्थन है इसलिए इन्हें समूल नष्ट करना संभव नहीं है। भूरिया कमिटी की अनुशंसा] पेसा कानून के होते हुए आदिवासियों का उजाड़ जारी है] जो खतरनाक है। आदिवासियों के हक में जितने कानून हैं] उनका इस्तेमाल नहीं हो रहा है। अगर उन कानून को लागू किया जाएगा तो राजनेताओं और पूंजीपतियों की सांठ&गांठ टूट जाएगी। डॉ . बीडी शर्मा ने तो खुद पेसा कानून बनाया और खुद पेसा कानून को लागू करवाने के लिए आदिवासियों के साथ आंदोलन कर रहे थे। बीडी शर्मा ने ग्रीन हंट को ट्राइबल हंट कहा था। 

उन्होंने वनग्रामों को संवैधानिक दर्जा दिलाया था। आज पूंजीवादियों के हित में वनग्राम के हक खत्म किए जा रहे हैं] यह आदिवासियों के लिए खतरनाक है।छत्तीसगढ़ में इनकाउंटर किलिंग में महिलाओं के साथ बलात्कार कॉमन फार्मूला हो गया है। सीएलएफ ¼सिविल लिबट्री फोरम½] एचआरएफ ¼ह्यूमन राइट्स फोरम½ लगातार दुनिया भर में मानवाधिकार संगठनों को सूचना भेज रहे हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी छत्तीसगढ़ के इन इलाकों में फैक्ट फाइंडिंग कमेटी] ¼तथ्य अन्वेषी समूह½ को भेज रहा है। जगदलपुर में आदिवासियों के दमन के विरुद्ध कानूनी सहायता उपलब्ध कराने वाली ^लॉयर्स इनिसिएटिव^ की ५ महिला अधिवक्ताओं को राज्य पोषित बार एसोसिएशन ने जगदलपुर छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया है। लोकल बार एसोशिएशन ने इन ५ महिला वकीलों का रजिस्ट्रेशन रद्द कर जगदलपुर से बाहर कर दिया है। ये वकील भी महिलाएं ही हैं और इन पर आदिवासी महिलाओं के मानवाधिकार का पक्ष लेने का आरोप है। इन्हीं महिला वकीलों से मिलकर लौट रही सोनी सोरी पर हमला हुआ। २ पत्रकार जेल में हैं। हिमांशु तो गांधीवादी थे] उन्हें दंतेवाड़ा इलाके से भगा दिया गया। प्रोफेसर साईंबाबा को क्यों जेल भेजा गया है\ नंदिनी सुंदरम सलवा जुडूम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा की थी तो नंदिनी सुंदरम को भी धमकी है। 

जानकारी मिली है कि वीरसम के प्रभाव से आंआँा्र प्रदेश में काफी साहित्य रच गया। काफी नाटक और फिल्में चर्चित हुई हैं। आप इसके बारे में बताएंगे\

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में साहित्य&संस्कूति के निर्माण में वीरसम के साथ&साथ गद्दर के नेतृत्व में जन नाट्य मंडल की बड़ी भूमिका रही है। जन नाट्य मंडली के प्रभाव और प्रवाह में हजारों नाटक रचे गए। वीरसम से जुड़े कई रचनाकारों ने फिल्मों के लिए भी पटकथाएं लिखीं। नारायाण मूर्ति ३० साल से सिर्फ क्रांतिकारी फिल्में बना रहे हैं। चर्चित फिल्म निर्देशक सी उमा मेहश्वर राव ने वीरसम के प्रभाव में ^अंकुरम^ फिल्म बनाई। अंकुरम क्रांतिकारी la?k"kZ को आवाज देने वाली पुरस्कूत फिल्म है। इस फिल्म को १९९३ में भारत सरकार ने नेशनल फिल्म अवार्ड से सम्मानित किया। इस फिल्म में चर्चित तेलगु अभिनेत्री रेवती के साथ ओमपुरी की भूमिका काफी लोकप्रिय हुई है। इस फिल्म को जन अवाम के बीच काफी लोकप्रियता हासिल हुई है। 

आपने एक बार साक्षात्कार में कहा था कि आंध्र प्रदेश में लोग नक्सलियों को ^अन्नलू^ कहते हैं। ^अन्नलू^ का मतलब तेलगु में भाई होता है। जब आंध्र प्रदेश में नक्सलियों का सफाया हो रहा था] तब अन्नलू जनता पर इसका क्या असर पड़ा\

इमरजेंसी के बाद तारकुंडे कमेटी ने आंध्र प्रदेश में पुलिस इनकाउंटर में ७५ नक्सलियों की हत्या के खिलाफ जांच दल भेजा था। तारकुंडे कमेटी में कन्नाविरन] कालोजी] अरुण शौरी] पूर्व उपराष्ट्रपति कूष्णकांत] के प्रताप रेड्डी] एमवी राममूर्ति शामिल थे। कन्नाविरन और अरुण शौरी ने तथ्यों को जमा करने और रिपोर्ट बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। तारकुंडे कमेटी की रिपोर्ट से पूरे देश में पुलिस इनकाउंटर के खिलाफ पहली बार बवाल मचा था और आंध्र प्रदेश से शुरू हुए इनकाउंटर विरोधी जनांदोलन के कारण भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के कार्यरत न्यायाधीश के नेतृत्व में भार्गव कमीशन गठित किया था। पुलिस इंकाउंटर विरोधी जनांदोलन में सीपीआई] सीपीएम इकट्ठे होकर जनता के साथ खड़े हुए थे। राजनीतिक दबाव में भार्गव कमीशन का ट्रायल रोक दिया गया] इसलिए किसी को सजा नहीं हो पाई। पुलिस इनकाउंटर के खिलाफ आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने ५ जजों वाले खंडपीठ ने न्यायमूर्ति रद्घुराम के नेतृत्व में ऐतिहासिक फैसला सुनाया&^किसी भी इनकाउंटर को हत्या माना जाएगा और मारने वाले पुलिसकर्मी पर तत्काल हत्या का मुकदमा दर्ज होगा। अगर मुकदमे की सुनवाई में तथ्य प्रमाणित करेगा कि उक्त पुलिसकर्मी ने आत्म सुरक्षार्थ गोली चलाई थी तो उसे निर्दोष माना जा सकता है।^ यह अन्नलू जनता की जीत है। 

हम लोगों ने देश में पहली बार इनकाउंटर में मारे गए लोगों की लाश प्राप्ति के हक का आंदोलन चलाया। पुलिस इनकाउंटर कर लाश को गायब नहीं कर सकती है। हम लोगों ने ^डेड बॉडी स्वाधीन कमेटी^ बनाई। १९९६ जनवरी में मेदक जिला में हुए पुलिस इंकाउंटर के खिलाफ ^मुर्दा देहालाल स्वाधीन कमेटी^ 

बनाई। गद्दर इस कमेटी के संयोजक थे। डेड बॉडी सिर्फ परिवार जन को ही क्यों। ^डेड बॉडी राइट & ह्यूमन राइट^ का सवाल बड़ा मुद्दा बन गया। इसी आंदोलन के दबाव में १९९६ के अप्रैल में पुलिस ने गद्दर के द्घर पर गोली चलाई। अब इस आंदोलन के दबाव में मारे गए किसी भी नागरिक की लाश गायब करना पुलिस के लिए आसान नहीं है। अगर किसी की लाश पुलिस के भय से उसके निकट संबंधी स्वीकार करने की हिम्मत नहीं कर रहे हैं या उसके कोई सगे&संबंधी परिवार जन नहीं हैं तो ^अमरुला बंधमित्रुला la?kम^ ¼शहीदों का बंधु मित्रों का la?k½ डेड बॉडी रिसीव कर सकता है। १९६९ से अब तक अविभाजित आंध्र प्रदेश में ६००० क्रांतिकारी पुलिस के हाथों मारे गए हैं। इतनी बड़ी शहादत के बाद भी प्रतिरोध की क्रांतिकारी परंपरा को खत्म करना राज्यसत्ता के वश की बात नहीं है।

शंकर गुहा नियोगी को कमलेश्वर ने श्रमिक देवता लिखा था। क्या शंकर गुहा नियोगी को लोग भूल चुके हैं\

शंकर गुहा नियोगी को भूलना संभव नहीं है। शंकर गुहा नियोगी से दो वजहों से हमारी निकटता कायम हुई। पहला & राष्ट्रीयता का मुद्दा। छत्तीसगढ़ राज्य की मांग पहली बार छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने उठाई थी। हम लोग आदिवासियों की खुशहाली के लिए उस समय विशाल&बस्तर की मांग कर रहे थे। मद्रास में राष्ट्रीयता और छत्तीसगढ़ की अस्मिता पर बात करने के लिए हम लोगों ने नियोगी को एक सभा में बुलाया भी था। १९८५ में जब वीरसम और गद्दर की जन नाट्य मंडली ने अखिल भारतीय क्रांतिकारी सांस्कूतिक यात्रा निकाली थी तो उस यात्रा में शंकर गुहा नियोगी ने राजनांद गांव में शहीद वीरदेव सिंह नारायण की स्मृति में आयोजित शहीद स्मृति सभा में हमारे जत्थे को आमंत्रित किया था। हजारों आदिवासियों का जन सैलाब उस शहीद सभा में इकट्ठा हुआ था। मैं बता रहा था कि राष्ट्रीयता के साथ&साथ हम लोगों ने जल&जंगल&जमीन का नारा नियोगी से लिया है। यह शंकर गुहा नियोगी का नारा है। हम लोगों ने इस नारे में इज्जत और सत्ता को जोड़ा है। नियोगी की हत्या से श्रमिक आंदोलन को जरूर धक्का लगा पर छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा और भिलाई इस्पात संयत्र के खान मजदूरों का la?k"kZ नियोगी के रास्ते पर कायम है।

बाबरी मस्जिद विध्वंस से लेकर गुजरात के दंगों के एक दशक और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्वकाल को किस तरह देख रहे हैं\

बीज तो १९४७ के विभाजन के साथ ही बो दिया गया था। विभाजन के साथ जुड़ा दंगा] रक्तपात स्वाभाविक तो नहीं था। देश भर में नक्सल आंदोलन पर दमन] भोपाल गैस त्रासदी और १९८४ के सिखों के कत्लेआम को आप क्यों भूलते हैं\ सिखों के कत्लेआम के बाद राजीव गांधी ४०१ सीट लाकर २१वीं सदी का जो स्वप्न दिखा रहे थे] वही स्वप्न आज पूरा हो गया है। राजीव गांधी ने राम मंदिर का दरवाजा खोला तो आडवाणी ने द्वारिका से अयोध्या की रथयात्रा निकाली। सोवियत la?k का fo?kVu] वैश्वीकरण] नव&उदारवाद का अगला चरण १९९२ का बाबरी मस्जिद विध्वंस और गुजरात का दंगा है। वैश्वीकरण और भगवाकरण का पहला गठबंधन १९८४ में ही हो गया था] जो १९९२ में उजागर हुआ। गुजरात में इसी प्रैक्टिस पर भाजपा ५ बार सत्ता में आई। अब इस समय तथाकथित लोकतंत्र के ढांचे पर फासिज्म पूरी तरह कब्जा कर चुका है। इस चार वर्ष को भारत का फासीवादी काल ही कह सकते हैं।

आप जेएनयू से शुरू हुए राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रोह के मसले को किस तरह देखते हैं\

मद्रास आईआईटी में पेरियार और अंबेडकर को प्रतिबंधित करना] पुणे फिल्म संस्थान के निदेशक की कुर्सी पर चौहान को बिठाना शुरुआत थी। रोहित को आत्महत्या के लिए मजबूर करना] दलित&अल्पसंख्यक की आपसदारी को तोड़ने की तरह देखना चाहिए। जेएनयू में कन्हैया और उमर के साथ कश्मीर और राष्ट्रीयता के मसले को आम जनता को उत्तेजित करने के षड्यंत्र की तरह देखा जाना चाहिए। राष्ट्रीयता पर हमला करने के लिए अफजल गुरु को मुद्दा बनाना] वामपंथ को निशाना करने के लिए कन्हैया को मुद्दा बनाना] la?kपोषित राज्यसत्ता की la?k कार्ययोजना का हिस्सा है। हमारी समझ है कि कन्हैया वामपंथ पर हमले का] अफजल गुरु राष्ट्रीयता पर हमले का] रोहित&दलित&अल्पसंख्यक मिल्लत पर हमले का और सोनी सोरी आदिवासी&महिला पर अत्याचार के प्रतीक हो चुके हैं।

सरकार माओवाद को देश का सबसे बड़ा खतरा मान रही है। आप खुद दो बार आंध्र प्रदेश सरकार और माओवादियों के बीच वार्ताकार रहे हैं। शांति की पहल में कहां अड़चन है\ स्वामी अग्निवेश शांति वार्ता में भूमिका निभा रहे थे। वार्ता कहां रुक गई\

मैं २००२ में चंद्रबाबू नायडू सरकार के साथ वार्ताकार था। वार्ता के बाद भी इनकाउंटर चलता रहा। २००४ में रेड्डी सरकार ने पुनः वार्ता बुलाई। वार्ता के बाद दोनों पक्षों के साथ हस्ताक्षर हुए। सरकार ने सीज फायर की अधिसूचना भी निकाली। जुलाई में संगठन के ऊपर से प्रतिबंध भी हटाया। ६ माह का सीज फायर ?ksf"kr हुआ था। ७ माह तक सीज फायर कायम रहा। ७ माह के बाद २००५ के जनवरी माह से सरकार की ओर से हिंसा शुरू कर दी गई। राज्य हिंसा से सीज फायर की सरकारी अधिसूचना स्वतः अमान्य हो चुकी थी।

कांग्रेस नेतृत्व वाली पिछली सरकार के द्वारा जो शांति वार्ता का प्रचार हुआ था] वह महज छलावा था। जब सरकार शांति वार्ता के लिए तैयार थी तो वार्ता का संदेश लेकर संगठन के पास जा रहे संगठन के महासचिव आजाद की पुलिस ने हत्या क्यों कराई थी\ आजाद शांति वार्ता के वार्ताकार थे तो शांति वार्ता के वार्ताकार की पुलिस इनकाउंटर में हत्या क्या संदेश देता है\ आजाद के साथ पत्रकार हेमचंद्र भी मारे गए थे। पिछली सरकार ने शांति वार्ता के वार्ताकार की हत्या पर कोई वक्तव्य तक नहीं दिया। माओवादियों को संदेह हुआ कि वार्ता के जाल में फंसाकर आजाद की हत्या की गई। अग्निवेश जी की भूमिका के बारे में भाकपा ¼माओवादी½ के केंद्रीय कमेटी सदस्य श्रीकांत ने अग्निवेश को पत्र लिखकर कहा कि ^आप कबूतर हो सकते हैं पर आप बिल्ली की चाल में आ चुके हैं।^

देश के बदलते हुए हालात में क्या आप हैदराबाद में ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। क्या दिल्ली में आप हैदराबाद की तरह सुकून महसूस करते हैं\

मुझे आज देश की तमाम भाषाओं में लोग पढ़ रहे हैं पर यह हकीकत है कि मैं तेलगु भाषा का कवि हूं। बहुत बड़े पाठक संसार से जब रचनाकार का जैविक संबंध कायम हो जाए तो वह पाठक समाज अपने कवि की हिफाजत का सबसे बड़ा प्रहरी हो जाता है। इसलिए मैं हैदराबाद को अपने लिए दिल्ली से ज्यादा अनुकूल मानता हूं। मुझे अपने पाठक संसार पर गर्व है कि उनके दिलों में अपने कवि की लोक प्रतिष्ठा कायम है। बावजूद सावधानी और सतर्कता में अपनी हिफाजत है। वीरसम का कवि डरता नहीं है। डराने के लिए कई बार जानलेवा हमला किया गया था। हमले कभी पुलिस की ओर से तो कभी la?k के गुंडों की ओर से हुए थे।

क्या जिसे आप फासीवाद कह रहे हैं] यह v?kksf"kr तौर पर आपातकाल ही है\

सब कुछ उनके अनुकूल हो ही रहा है तो आपातकाल ?ksf"kr करने की क्या दरकार है\ जाहिर है कि अब मानवाधिकार] लोकतांत्रिक शक्तियों और जनांदोलनों पर हमला तेज होगा। मुझे लगता है कि प्रेमचंद ने सज्जाद जहीर के साथ जिस तरह प्रगतिशील आंदोलन को तेज किया था] उसी तरह देश के तमाम लेखक&कवियों को सांस्कूतिक प्रतिरोध के लिए उठ खड़ा होना चाहिए।

 
         
 
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क्या मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और और वित्त मंत्री प्रकाश पंत के बीच शीतयुद्ध चल रहा है?

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सांसद सुशील गुप्ता कुछ समय पूर्व तक कांग्रेस के नेता थे] उन्होंने पिछला विधानसभा चुनाव भी कांग्रेस के टिकट पर लड़ा। पार्टी से इस्तीफा देने के कुछ दिनों बाद ही आम आदमी पार्टी ने

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