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vad 50 02-06-2018
 
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संवाद 4
 
^ये मंजिलें हैं कौन सी] न वो समझ सके न हम^

वरिष्ठ राजनेता और विचारक डॉ कर्ण सिंह से गुंजन कुमार की बातचीत

 वहां की सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि पढ़े&लिखे लोग] जागरूक लोग भी सिर्फ कश्मीर&कश्मीर की रट लगाते रहते हैं। जबकि कश्मीर नाम का कोई राज्य नहीं है] बल्कि जम्मू& कश्मीर है। बाहर के लोगों को यह महत्वपूर्ण नहीं लगता होगा] परंतु वहां रहने वाले लोगों को लगता है कि उन्हें अपने ही राज्य में बांट दिया गया है। जिस राज्य को हमारे पूर्वजों ने बनाया। जिसके लिए मेरे पिता जी ने हस्ताक्षर किए] वह जम्मू&कश्मीर राज्य है। राज्य में कश्मीर है] लेह&लद्दाख है] गिलगिट बलिस्तान है। लेह& लद्दाख] गिलगिट बलिस्तान की कोई बात ही नहीं करता। यह सवाल एक बार मुझसे राज्यसभा में किया गया था। तब मैंने इसके जवाब में एक गाना गाया था। आज भी वही गाना गाता हूं। आप उसी से समझ जाएंगे। ^ये मंजिलें हैं कौन सी] न वो समझ सके न हम।^ यह बहुत ही पेचीदा मामला है। बहुत सी दुखद बातें वहां हुई हैं। कश्मीरी पंडितों के साथ ही नहीं] बल्कि कश्मीरी मुसलमानों के साथ भी बहुत बुरा हुआ है। पिछले बीस साल में १० हजार के करीब कश्मीरी मुसलमान आतंकवादी और सुरक्षा बलों की गोलियों से मरे हैं। कश्मीर के गांवों के कब्रिस्तान भरे हुए हैं। कश्मीर समस्या के समाधान की आशा ही कर सकते हैं। डॉ. मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री थे। तब उनके और जनरल परवेज मुशर्रफ के बीच बातें हो रही थीं] तब बहुत प्रगति हुई थी। उसी दौरान जनरल मुशर्रफ ने पाकिस्तान में मुख्य न्यायाधीश पर हाथ डाल दिया तो उनकी कुर्सी ही चली गई तब बात वहीं रुक गई

 

आजादी से लेकर अब तक भारतीय राजनीति में किस प्रकार के बदलाव देखते हैं\

आजादी के बाद से नहीं] बल्कि आजादी के दिन से ही भारतीय राजनीति ने कई बदलाव देखे हैं। इन बदलाव को हर भारतवासी ने दिल से आत्मसात भी किया है। अपने देश में लोकतंत्र के मजबूत होने के पीछे मुख्य तथ्य भी यही है कि वक्त और काल के साथ हमने अपने को बदला। यदि यह बदलाव नहीं होता तो शायद भारतीय लोकतंत्र इतना मजबूत भी नहीं होता। इसे विकास की बयार भी कह सकते हैं। किसी भी ठहराव को ठीक नहीं माना जाता। इसलिए भारत के राजनेता और भारतवासी समय के साथ चलते गए। परिवर्तन कैसे&कैसे हुआ इसे समझना पड़ेगा। १९५० में बने संविधान में सौ बार संशोधन हो चुका है। ६६ साल में सौ बार संविधान संशोधन का एक ही अर्थ है कि हम सभी समय के साथ चलने और परिवर्तन के लिए बेताब हैं। गुलामी के बंधन से मुक्त होने के बाद परिवर्तन के लिए बेताब कितने थे] उसे इससे समझें। बहुत कम लोगों को पता होगा कि १९५० में संविधान बनने के अगले साल ¼१९५१½ में ही पहला संविधान संशोधन हो गया। पहले संशोधन में ही सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग ¼एससी] एसटी½ की उन्नति के लिए प्रोविजन किया गया। जमींदारी उन्मूलन कानून] मौलिक अधिकारों को मजबूत किया गया। शुरुआती समय में चुनाव बहुत ही साधारण ढंग से लड़ा जाता था। आज चुनाव ने विशाल रूप ले लिया है। आम लोगों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ी है। पिछड़े लोगों का विकास बहुत ज्यादा हुआ है। उनका स्वाभिमान जगा है। उन्हें अपने अधिकार का पता होने लगा है। अब वह इसके लिए लड़ाई भी लड़ रहे हैं। चुनाव प्रक्रिया में आरक्षण लागू होने के बाद भी बहुत परिवर्तन हुआ है। पहले आरक्षण न होने के कारण पिछड़े वर्ग के लोग संसद या विधानसभा में नहीं आ पाते थे। सदन में इनकी उपस्थिति से इनकी आवाज बुलंद हो रही है। इसने राजनीतिक परिस्थितियों को बदल दिया है। एक और परिवर्तन भारतीय राजनीति में हुआ। यह बहुत ही महत्वपूर्ण भी है। आजादी के बाद लंबे समय तक देश में कांग्रेस पार्टी छाई हुई थी। १९४७ से १९६७ तक तो सिर्फ कांग्रेस थी। १९६७ में कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार हुई थी। यह सत्ता पार्टी में हुआ पहला बदलाव था। केंद्र में छोटे&छोटे समय के लिए गठबंधन की सरकार रही। लेकिन १९९५ तक भी ज्यादातर कांग्रेस की सरकार ही रही। १९९९ के पहले तक कोई भी गैर कांग्रेसी सरकार नहीं चली। इसके बाद परिवर्तन आया। फिर २०१४ में तो मोदी के नेतृत्व ने जिस तरह से भाजपा पूर्ण बहुमत में आई] वह परिवर्तन का सबसे ताजा उदाहरण है। देश में हुए सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का असर राजनीति पर भी पड़ा।

क्या आप इन परिवर्तनों को सही दिशा में जाते हुए देख रहे हैं\

परिवर्तन कभी भी गलत नहीं हो सकता। हां] यह जरूर है कि इन परिवर्तनों में कुछ चीजें ऐसी भी आ सकती हैं] जिसे सही नहीं कहा जा सकता। उसका उस समय विरोध भी होता है। मसलन] पहले लोकसभा और राज्यसभा में एक स्वस्थ बहस होती थी। सरकार अपने विपक्षी की बातें सुनती और उनका सम्मान करती थी। संसद स्थगित नहीं होती थी। आज इसमें परिवर्तन हुआ है। संसद नहीं चलती है। स्वस्थ बहस के बदले मारपीट] गाली&गलौज होने लगी है। इसके लिए कोई एक पार्टी जिम्मेवार नहीं है। सभी पार्टियां जिम्मेवार हैं। यूपीए के समय में बीजेपी वाले संसद नहीं चलने देते थे। वही आज कांग्रेस कर रही है। विधानसभाओं की हालत और भी खराब है। इस परिवर्तन को कोई सही नहीं कहेगा। किंतु स्मरण रहे कि भारत की आजादी के वर्ष या उसके आस& पास कई अन्य देश भी स्वतंत्र हुए। इनमें कई देशों में स्वतंत्रता के पांच&दस साल में ही तानाशाही शासन या फिर सैनिक शासन। मगर भारत में ऐसा नहीं हुआ। यह हम भारतवासियों के लिए सुखद है। भारत में सभी को बोलने की] अपनी बात रखने की] विरोध करने की पूरी आजादी है। इसलिए आज दुनिया के लोग कहते हैं कि भारत में प्रजातंत्र काफी सशक्त है।

दो दशक से देश में गठबंधन सरकार का दौर शुरू हुआ है। हालांकि वर्तमान लोकसभा में जनता ने एक पार्टी की पूर्ण बहुमत दिया] फिर भी सरकार गठबंधन की ही चल रही है। क्या भारत के लिए गठबंधन की सरकार सही है\

यहां सही और गलत का सवाल नहीं है। लोकतांत्रिक प्रणाली में सरकार बहुमत आने पर ही बनेगी। यदि किसी दल को बहुमत नहीं आता तो मिली&जुली सरकार ही बनेगी। और कब तक सरकार नहीं बनाओगे। कब तक जनता का पैसा बार&बार चुनाव पर खर्च करते रहोगे। यह जनता को फैसला करना है कि वह देश या अपने राज्य में गठबंधन की सरकार चाहती है या नहीं। २०१४ से पहले व्यक्ति नेता या पार्टी देश में लंबे समय तक एक दल की सरकार की कल्पना नहीं कर रहे थे लेकिन लोकसभा चुनाव में देश की जनता ने भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत दिया। यह अच्छी बात है।

क्या गठबंधन सरकार में छोटी पार्टियां नेतृत्व  करने वाली पार्टी को ब्लैकमेल करती रहती हैं\

मैं ऐसा तो नहीं कहूंगा। लेकिन यह जरूर है कि गठबंधन सरकार चलाना आसान नहीं है। बहुत कठिनाई आती है। शायद लोगों को भी इसका एहसास हुआ होगा। उन्हें भी लगा होगा कि गठबंधन की सरकार उनके लिए ठीक नहीं है। तभी तो राजीव गांधी के बाद २०१४ में जाकर एक पार्टी को बहुमत आया। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि अपने देश की जनता राजनीतिक रूप से बहुत ही जागरूक है। गरीब से गरीब लोग हों] मजदूर भाई हां] कम पढ़े&लिखे लोग हों। लद्दाख और लक्ष्यद्वीप जैसी जगहों के लोगों की राजनीतिक दृष्टि विकसित हो चुकी है। इसमें टेलीविजन ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। मतदाता चुनाव से पहले अपना मन बना लेता है कि किसे वोट करना है।

वामपंथ के अप्रासंगिक या कमजोर होने के आप क्या कारण मानते हैं\

एक कारण तो मैं अंतरराष्ट्रीय मानता हूं। सोवियत यूनियन ¼यूएसएसआर½ के टूटने से वामपंथी विचारधारा एक तरह से फेल हो गई है। सोवियत यूनियन के विद्घटन के बाद भारत के वामपंथ को उनका जो समर्थन मिलता था] वह खत्म हो गया। सीपीआई ¼भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी½ के कमजोर होने के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ¼सीपीएम½ मजबूत हुई थी। अब वह भी कमजोर हो गई है। इसका दूसरा कारण यह है कि वामपंथी विचारधारा बेशक सामाजिक रूप से अच्छी है] लेकिन उसकी राजनीतिक और आर्थिक नीति सफल नहीं है। इस कारण लोगों ने वामपंथ को नकार दिया।

आप पंडित नेहरू से लेकर अब राहुल गांधी का दौर देख रहे हैं। पार्टी में क्या बदलाव देखते हैं\

बदलाव तो होते ही हैं। यदि बदलाव नहीं होगा तो पार्टी का विस्तार और विकास नहीं होगा। एक व्यक्ति का बदलाव नेतृत्व का बदलाव होता है। दूसरा परिस्थितियों के अनुसार बदलाव किया जाता है। पंडित नेहरू का अपना एक विशाल कद था। उनकी नीतियों ने देश में लोकतंत्र की जड़ों का मजबूत किया। कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगता है। मगर आप देखिए पंडित नेहरू ने अपने बाद अपनी बेटी इंदिरा गांधी को नहीं चुना। लाल बहादुर शास्त्री को आगे किया। यदि शास्त्री की मौत नहीं हुई होती तो आज परिवर्तन और ज्यादा दिखता। शास्त्री जी के बाद इंदिरा जी आईं। इंदिरा जी के काल में जब कांग्रेस टूटी और उन्होंने कांग्रेस ¼आई½ बनाई। तब जाकर परिवार का इस पर एक तरह से वर्चस्व हो गया।

आप जम्मू&कश्मीर राजद्घराने से हैं। या कहें राजा हैं। फिर भी आपने शुरू में ही बोल दिया कश्मीर पर कुछ नहीं बोलूंगा। यह कैसे हो सकता है। कुछ तो वहां के बदलाव] समस्याओं पर बोलना ही होगा\

वहां की सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि पढ़े&लिखे लोग] जागरूक लोग भी सिर्फ कश्मीर &कश्मीर की रट लगाते रहते हैं। जबकि कश्मीर नाम का कोई राज्य नहीं है] बल्कि जम्मू&कश्मीर है। बाहर के लोगों को यह महत्वपूर्ण नहीं लगता होगा] परंतु वहां रहने वाले लोगों को लगता है कि उन्हें अपने ही राज्य में बांट दिया गया है। जिस राज्य को हमारे पूर्वजों ने बनाया। जिसके लिए मेरे पिता जी ने हस्ताक्षर किए] वह जम्मू&कश्मीर राज्य है। राज्य में कश्मीर है] लेह&लद्दाख है] गिलगिट बलिस्तान है। लेह&लद्दाख] गिलगिट बलिस्तान की कोई बात ही नहीं करता। यह सवाल एक बार मुझसे राज्यसभा में किया गया था। तब मैंने इसके जवाब में एक गाना गाया था। आज भी वही गाना गाता हूं। आप उसी से समझ जाएंगे। ^ये मंजिले हैं कौन सी न वो समझ सके न हम।^ यह बहुत ही पेचीदा मामला है। बहुत सी दुखद बातें वहां हुई हैं। कश्मीरी पंडितों के साथ ही नहीं] बल्कि कश्मीरी मुसलमानों के साथ भी बहुत बुरा हुआ है। पिछले बीस साल में १० हजार के करीब कश्मीरी मुसलमान आतंकवादी और सुरक्षा बलों की गोलियों से मरे हैं। कश्मीर के गांवों के कब्रिस्तान भरे हुए हैं। कश्मीर समस्या के समाधान की आशा ही कर सकते हैं। डॉ मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री थे। तब उनके और जनरल परवेज मुशर्रफ के बीच बातें हो रही थीं] तब बहुत प्रगति हुई थी। उसी दौरान जनरल मुशर्रफ ने पाकिस्तान में मुख्य न्यायाधीश पर हाथ डाल दिया तो उनकी कुर्सी चली गई तब बात वहीं रुक गई।

भाजपा&la?k के हिन्दुत्व की व्याख्या से भारतीय राजनीति और समाज में क्या बदलाव आएगा\

यह जरूर है कि उन्होंने हिंदू धर्म का प्रचार बहुत किया है। लेकिन कुछ बातों पर उनकी विचारधारा लोगों को पसंद नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उसकी विचारधारा आपको पसंद नहीं है तो हिंदू धर्म ही त्याग दें। आप अपने ढंग से जिएं हिंदू धर्म बहुत खुला हुआ है। यहां विकल्प बहुत हैं। आपके ऊपर निर्भर है कि आप किस देवी&देवता की पूजा करते हैं। वेद और उपनिषद भी कहीं से कट्टर और संकुचित नहीं हैं। वेदांत में तो कहा गया है हर इंसान में ईश्वर का वास है। इसी लिए हिंदुत्व एक पवित्र चीज है। बहुत अद्भुत धर्म है। इतना विशाल दृष्टि वाला धर्म पूरे विश्व में दूसरा नहीं है। इसमें कई गुण हैं।

 
         
 
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,क्या उत्तराखंड में ऐसी कोई सरकार आयेगी जो जंगलों को जलने से रोक सके

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  • दिकदर्शन रावत

प्रिया शर्मा की कहानी में कई पेंच हैं] कई ऐसे मोड़ हैं] पूरे प्रकरण में कोहरे की इतनी गहरी परत है] जिसके चलते सच को तलाश पाना खासा मुश्किल काम

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