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vad 45 28-04-2018
 
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संवाद 3
 
^जो जैसा है वैसा ही रूका है^

वरिष्ठ साहित्यकार असगर वजाहत से सैयद तहसीन अली की बातचीत

जो धनवान था और धनवान हुआ] जो गरीब था और गरीब हुआ है। बेरोजगारी और बढ़ी है] साम्प्रदायिकता और बढ़ी है] तनाव और बढ़े हैं] जातिवाद और ज्यादा बढ़ा है। यह सब चीजें हमें यह बताती हैं कि हमारी राजनीति ने हमें कोई सकारात्मक योगदान नहीं दिया है

आजादी से अब तक राजनीति में बदलाव को आप किस तरह देखते हैं\

पहले एक सत्ता दल अपनी सत्ता बनाए हुए था] आज राजनीतिक दल बढ़ गए हैं] मगर सत्ता के चरित्र में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। ये सभी राजनीतिक दल उसी सत्ता को बनाने में लगे हुए हैं जिसे पहले दल ने बनाया था। राजनीतिक स्थिति यहां यथास्थितिवाद की है] जो जैसा है वो वैसा रुका हुआ है। कोई बहुत बड़े परिवर्तन राजनीतिक पार्टियों के माध्यम से नहीं आ रहे हैं। यदि कोई परिवर्तन आ भी रहा है तो यथास्थितिवाद को बनाए रखने के लिए आ रहे हैं] उसे तोड़ने के लिए नहीं। जैसे विषमता हमारे यहां पहले भी थी] वह अब बढ़ गई है। बेरोजगारी पहले भी थी अब और बढ़ गई है। कोई भी राजनीतिक दल किसी विकल्प को लेकर नहीं आया है बल्कि उसने वही काम किया जो कांग्रेस पहले कर रही थी और समाज की हालत लगभग वैसी ही है। कोई बदलाव नहीं आया है। जो धनवान था और धनवान हुआ] जो गरीब था और गरीब हुआ है। बेरोजगारी और बढ़ी है] साम्प्रदायिकता और बढ़ी है] तनाव और बढ़े हैं] जातिवाद और ज्यादा बढ़ा है यह सब चीजें हमें यह बताती हैं कि हमारी राजनीति ने हमें कोई सकारात्मक योगदान नहीं दिया है।

अब तक के बदलाव में मुस्लिम कहां खड़ा है\ उसकी आजादी] उसका भय] सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर प्रकाश डालें\

पाकिस्तान बनने के बाद मुसलमान का पढ़ा-लिखा वर्ग पाकिस्तान चला गया। यहां केवल किसान या कारीगर या छोटा- मोटा काम करने वाले लोग बचे थे। मुसलमानों का नेतृत्व यहां नहीं बचा था] पूरा नेतृत्व पाकिस्तान चला गया था। ऐसी स्थिति में जिनके पास कोई नेतृत्व न हो] समझदारी न हो] पढ़े-लिखे न हों] उन्हें दूसरे लोग इस्तेमाल करते हैं। यहां कांग्रेस ने मुसलमानों का इस्तेमाल किया] समाजवादी पार्टी ने इस्तेमाल किया] बसपा ने किया] जितने भी दल सत्ता में आए उन्होंने मुसलमानों का इस्तेमाल किया। मुसलमानों की बुनियादी समस्या जहां की तहां रह गई। यह जरूर है कि कुछ मुसलमानों के पास आजादी के बाद पैसा आया] कुछ को शिक्षा मिली] लेकिन जितने बड़े स्तर पर यहां सुधार के काम होने चाहिए थे] न तो वे मुसलमानों ने स्वयं किए और न उन राजनीतिक दलों ने किए। राजनीतिक नेतृत्व की रुचि इसी में रही कि मुस्लिमों को धार्मिक बनाए रखो ताकि यह हमारी गिरफ्त में रहें। मुसलमानों को किसी भी पार्टियों ने किसी भी प्रकार से आगे बढ़ने की कोई सहूलियत नहीं दी। दंगे होते रहे] फसाद होते रहे] असुरक्षा की भावना उनके अंदर पैदा होती रही। इसका लाभ उठाते रहे राजनीतिक दल।

अगर विभाजन नहीं हुआ होता तो इस मुल्क की राजनीतिक सामाजिक स्थिति बेहतर होती या बदतर\

अगर विभाजन न हुआ होता तो निश्चित रूप से बहुत से विवाद बहुत गंभीर होते। लेकिन उन विवादों को सुलझाने के भी रास्ते और तरीके थे। बड़े-बड़े देश जहां पर एक सांस्कूतिक बहुलता है] उन्होंने अपने आप को एकजुट किया और विकास किया है। ऐसा नहीं है कि भारत में बहुत समस्याएं होतीं और उसका हल नहीं निकलता। हो सकता है समस्याओं का समाधान निकलता और बेहतर रूप से निकलता। आजादी के बाद समाधान तो कोई निकला नहीं] समाज में विषमता] बेरोजगारी और साम्प्रदायिकता बढ़ती चली गई।

राष्ट्रवाद क्या है\ ऐसा क्यूं है कि आजादी के इतने साल बाद भी मुसलमानों को देशभक्ति का प्रमाण देना होता है\ 

देखिए] इसकी दो बातें हैं। पहली तो ये कि जब पाकिस्तान बना तो बहुत से मुसलमान भावनात्मक स्तर पर  उनके रिश्तेदार हैं] पाकिस्तान मुसलमानों का देश है। पाकिस्तान के प्रति एक सॉफ्ट कार्नर था। ठीक उसी तरह जैसे कम्युनिस्टों का सॉफ्ट कार्नर कम्युनिस्ट देशों की तरफ था क्योंकि उनकी विचारधारा उस प्रकार की थी। इस सॉफ्ट कार्नर के कारण और अपनी अज्ञानता के कारण मुसलमान मुख्यधारा में पूरी तरह शामिल नहीं हो पाए और उनको किया भी नहीं गया। इस कारण मुसलमान यहां से अलग- थलग हो गए हैं। आज भी मुसलमान का एक पृथक पहचान है]  मिली जुली पहचान नहीं है। वो देश और समाज में उतनी सक्रियता से भाग नहीं ले पाते जितनी सक्रियता से लेना चाहिए। शिक्षा और जागरूकता की कमी है। यह कारण रहे हैं कि मुसलमानों को एक निशाना बनाना सांप्रदायिक शक्तियों के लिए आसान हो गया। आरएसएस और भाजपा के लिए सबसे आसान है कि मुसलमान को निशाना बनाकर हिंदू समाज को एकजुट किया जाए। हिंदू समाज को धर्म के आधार पर एकजुट कर लेंगे तो उनकी शक्ति बढ़ जाएगी। एकजुट करने के लिए शत्रु का होना जरूरी है। मुसलमानों को माना गया है कि यह एक आसान टारगेट है] अगर इस पर निशाना साधेंगे तो हिंदू मत का ध्रुवीकरण कर पाएंगे। इस कारण से मुसलमानों की समस्या को हल करने के बजाए बढ़ाया जाता रहा है। बढ़ते-बढ़ते आप देख रहे हैं भयानक दंगे हुए] आतंकवाद हुआ। ये इस कारण हुआ कि मुसलमानों की समस्याओं का कोई सार्थक समाधान न निकाला जाए] वे पिछड़े ही रहे और निशाने पर रहें। इस कारण आज मुसलमानों की वही स्थिति है।

आखिर ये देश किसका है] जनता का या किसी दल विशेष का\

दल विशेष का कोई देश नहीं होता] देश उन सबका होता है जो उस देश में रहते हैं] यानी उस देश की जनता। जो उस देश की व्यापक जनता के हित में कुछ करता है वो देशहित कहलाता है। किसी पार्टी या विचारधारा के हित में करने का मतलब देशहित नहीं है। आरएसएस और भाजपा वालों ने ये पूरा माहौल बना दिया है कि जो उनकी विचारधारा] उनकी राजनीति से सहमत नहीं वो देशद्रोही है। मेरे विचार से देशद्रोही वो स्वयं हैं। क्योंकि जो देश की बहुलता और लोकतंत्र पर भरोसा नहीं करता वो देश से विद्रोह करता है। वो देश की एकता को नहीं बनाए रखता है। सांप्रदायिकता फैलाने वाले देश की एकता को तोड़ते हैं] वो देशद्रोह का काम करते हैं।  

कहा जा रहा है कि मोदी के शासन में मुस्लिमों में खौफ बढ़ा है\

देखिए] खौफ इसलिए बढ़ा है कि जब आप देखते हैं कि आपके जो बुनियादी अधिकार हैं और जो आपको संविधान अधिकार देता है] वह नहीं मिलेंगे। हमारा अधिकार है कि सरकार हमें सुरक्षा देगी] पर सरकार में वो लोग आ गए जिन्होंने सुरक्षा नहीं दी है और जो इस पर किसी प्रकार से लज्जित भी नहीं हैं कि उनके शासन में इतने दंगे हुए। वो उनके बारे में क्षमा याचना भी नहीं करते हैं और साथ-साथ साम्प्रदायिक प्रतीक को बढ़ा रहे हैं। साम्प्रदायिकता के बारे में बिल्कुल चुप हैं और वो देखते हैं कि किस प्रकार से अल्पसंख्यकों पर] दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं] फिर भी कुछ नहीं बोलते। अगर कुछ कहते भी हैं तो वो केवल एक धर्म विशेष के प्रतीकों को चाहते हैं कि राष्ट्र प्रतीक बन जाए। तो जब यह स्थिति बनेगी तब निश्चित रूप से अल्पसंख्यक चाहे वो मुस्लिम हों] सिख हों] इसाई हों या कोई दूसरा] उनके मन में भय पैदा होगा क्योंकि हमारा जो अस्तित्त्व है] हमारी जो पहचान है] हमारे जो अधिकार हैं वो हमें नहीं मिलेंगे। तो इस कारण भय पैदा हुआ है।

आज के आंदोलन पहले के आंदोलन से किस प्रकार भिन्न हैं\

आजादी के बाद जेपी का आंदोलन एक व्यापक आंदोलन था जो कि एक लोकतांत्रिक और सेक्युलर लाइन पर चलने वाला आंदोलन था। स्थिति अब वो नहीं रह गई है] अब अधिकतर जाति और धर्म के नाम पर आंदोलन होते हैं। सबसे बड़ा आंदोलन राम मंदिर आंदोलन है] बाबरी मस्जिद का आंदोलन है। उत्तर भारत में निश्चित रूप से आंदोलनों की शक्ल बदली है और वो अधिक सांप्रदायिकता की ओर बढ़ने लगी है।

आंदोलनों ने साहित्य को कितना प्रभावित किया है\

साहित्य को आंदोलन अप्रत्यक्ष तरीके से प्रभावित करता है सीधे-सीधे नहीं। जो साहित्य प्रत्यक्ष रूप से आंदोलन के लिए लिखा जाता है वो क्षणिक होता है। आंदोलन समाप्त हो जाते हैं तो वो साहित्य भी समाप्त हो जाता है। लेकिन आंदोलन जिन मूल्यों के लिए चलाए जाते हैं वो मूल्य साहित्य में झलकती हुई दिखाई देते हैं। जैसे जेपी आंदोलन ने एक जनवाद को उभारा था तो साहित्य में भी जनवादी विचारधारा उभरता हुआ दिखाई देता है। जो लोकतांत्रिक चेतना है वो साहित्य में भी दिखाई देती है। जो सांप्रदायिकता का विरोध है वो साहित्य में भी दिखाई देता है। आंदोलन यदि किसी विचार को लेकर चल रहा हो तो वो विचार साहित्य को प्रभावित करता है और साहित्य उसमें अपने आप को ढूंढ़ता है।

आंदोलन ने लेखक को बनाया है या लेखकों ने आंदोलन को मजबूत किया है\

लेखक राजनीति से आगे की बात सोचता है जबकि राजनीति लेखक से आगे की बात नहीं सोचता। उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो प्रेमचंद ने १९३६ में कहा था जमींदारी आंदोलन समाप्त कर देना चाहिए] यह अमानवीय है। यह काम राजनीति ने १९४७ में पूरा किया। ११ साल बाद राजनीति के समझ में वो बात आई जो साहित्य पहले कह रहा था। साहित्य एक मशाल के रूप में है जो विचार आगे रखता है राजनीति उसे बाद में फॉलो करती है। साहित्य राजनीति से आगे है राजनीति साहित्य के पीछे।

हिंदी में मुस्लिम लेखकों की संख्या कम हो रही है। इस संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे\

कम तो नहीं हो रही है] मेरे ख्याल से बढ़ रही है। मुस्लिम लेखक हिंदी में पहले बहुत कम थे] केवल शानी थे। अब अब्दुल बिस्मिल्लाह] मंजूर] मोहम्मद आरिफ जैसे कई और लेखक हैं। मुस्लिम लेखकों की संख्या कम नहीं हो रही है] लगभग बढ़ रही है। बढ़ने की रफ्तार भले ही थोड़ी कम हो सकती है लेकिन वो संख्या कम नहीं हो रही है] बल्कि और वो आगे आ रहे हैं। क्योंकि हिंदी साहित्य से मुस्लिम युवाओं का परिचय बढ़ रहा है। हिंदी साहित्य में लेखकों और कवियों की भागीदारी बढ़ रही है।

हिंदी कहानियों में मुस्लिम पात्र धूमिल होता जा रहा है] ऐसा क्यूं\

अगर प्रेमचंद की बात करें तो प्रेमचंद के पास जितने मुस्लिम पात्र थे उस हिसाब से मुस्लिम पात्र अब कम आ रहे हैं। चिंता की बात है कि मुस्लिम पात्र या मुस्लिम समाज केवल मुसलमान लेखकों के माध्यम से ही सामने आता है। लेकिन यह भी समझ आता है कि लेखक उन्हीं के बारे में लिखेगा जिसके बारे में जानेगा। आजादी के बाद जो मुस्लिम और हिंदू के बीच की दूरी बढ़ी है उससे मुसलमानों के लिए हिंदुओं को समझना और हिंदू के लिए मुसलमानों को समझना पहले के मुकाबले थोड़ा कठिन हो गया है। इसलिए लेखकों का ध्यान अपने-अपने समुदाय में ज्यादा केंद्रित हो गया है। अल्पसंख्यक साहित्य में कम आ पा रहे हैं। चाहे वो मुस्लिम हों] सिख हों या ईसाई मुख्यधारा से दूर हैं] जिस वजह से पात्र कम आ रहे हैं।

आज की तारीख में इस मुल्क में क्या सबसे बड़े बदलाव की जरूरत है\

पूरे सिस्टम को बदलने की जरूरत है] लोकतंत्र को बदलने की जरूरत है] चुनाव प्रक्रिया को] संसद के नियमों को] १८६१ में बने पुलिस एक्ट को। बदलने की जरूरत तो पूरे राजनीतिक सामाजिक सिस्टम को है। जिसे कोई बदलना नहीं चाहता। सब उससे लाभ उठाना चाहते हैं। इस लोकतंत्र में सौ साल पहले का] अंग्रेजों का या हमारे पूर्वजों का दिया हुआ है] वो सब असंगत हो गया है। अब चाहें कि पुलिस १८६१ के हिसाब से काम करे तो उससे कोई फायदा नहीं होगा बल्कि जनता का अहित होगा। चुनाव वैसे ही हों जैसे पंडित नेहरू के समय हुआ करते थे तो वो सही चुनाव नहीं होंगे। लोकतंत्र का जो विकास होना चाहिए था वो हमारे देश में नहीं हुआ। इस कारण समस्याएं पैदा हो गई। केंद्र और राज्य के संबंध जो पुराने थे वही चले आ रहे हैं। उनको बदलने की कोशिश नहीं की गईं] क्योंकि यह शासक वर्ग के हित में है।

 
         
 
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  • रामबहादुर राय

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