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vad 45 28-04-2018
 
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संवाद 2
 
^प्रतिभा को नजरअंदाज कर चंद धनिकों को ताकतवर करना राष्ट्रवाद नहीं^

गुजरात में कार्यरत ^नर्मदा बचाओ आंदोलन^ के कार्यालय को बंद क्यों करना पड़ा\

जब केंद्र सरकार के जलसंसाधन मंत्री कमलनाथ को मंत्रालय में ?kqldj आंदोलन के प्रतिनिधियों ने द्घेर लिया था] तब पहली बार बड़ौदा स्थित ^नर्मदा बचाओ आंदोलन^ के कार्यालय पर हमला हुआ था। इसके बाद जब मैं बड़ौदा गई] तो मुझे ही रेस्ट हाउस में नजरबंद कर दिया गया। मुझे इजराइल में पानी के सवाल पर एक आयोजन में शरीक होना था। लेकिन मुझे अचानक यात्रा रोकनी पड़ी। दूसरा हमला भी मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जी के कार्यकाल में ही हुआ। साबरमती स्थित गांधी आश्रम में २००२ के दंगे के बाद शांति सभा में जिस तरह उनके लोगों ने मेरे ऊपर लात-द्घूसों से हमला किया था] वह अकल्पनीय था। मुझे स्मरण है कि उस द्घटना क्रम में मुझसे ज्यादा मार तो पत्रकारों को लगी थी कि वे मुझे पीटते हुए कवरेज कर रहे थे। कुछ पत्रकारों को तो काफी चोटें आई थीं और उन्हें लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ा था। उस केस की अभी सुनवाई चल रही है। १० बार मुझे अहमदाबाद की अदालत में बुलाया गया। हर बार मुझसे इस तरह सबाल-जबाव किया जा रहा है जैसे कि मार खाकर मैंने ही कोई अपराध कर दिया हो। अब उस गुजरात में ^नर्मदा बचाओ आंदोलन^ का कार्यालय संचालित करना मुश्किल था। हमारे डाक] हमारे फोन] कार्यालय सचिव कोई सुरक्षित नहीं था। हमने तब कार्यालय पर हमलों को बड़ा मुद्दा इसलिए नहीं बनाया कि इससे आंदोलन का मुख्य मुद्दा पीछे छूट सकता था।    

देश में सब कुछ कैसे चल रहा है\ क्या आपातकाल लाया जा सकता है\ 

फासीवाद और आपातकाल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। फासीवादी राज्य शक्ति के आतंक से हम लोकतांत्रिक आवाज भी नहीं उठा पा रहे हैं। देश के चारों तरफ हमें आगे बढ़ने से रोका जा रहा है। हमसे पूछा जा रहा है] यह आंदोलन क्यों\ मोदीजी के नेतृत्व में जो कुछ हो रहा है] ऐसा वाजपेयी जी के समय नहीं दिखा था। आपातकाल ?kksf"kr करें] यह जरूरी नहीं है। हम आपातकाल से ज्यादा बुरे समय में जी रहे हैं। जिंदगी और जीवन पर हमला] सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को ताक पर रखकर नर्मदा के गांवों में जलहत्या की तैयारी] यह लोकतंत्र में संभव नहीं था। 

आप राष्ट्रवाद की अवधारणा को किस तरह देखती हैं\ 

राष्ट्रवाद किसी राष्ट्र में शासकीय व्यवस्था को ताकतवर रूप देना ही नहीं] राष्ट्रवाद देश के नक्शे और भौगोलिक पृष्ठभूमि से नहीं] लोगों के जल-जंगल-जमीन और उनकी जीवन- रुसंस्कृति से भी जुड़ा है। एक तरफ जब पूरी दुनिया वैश्विक ग्राम में बदल रही है तो संकुचित दायरे में राष्ट्रवाद के नाम पर समाज को तोड़कर राष्ट्र की नई परिभाषा कायम करना] राष्ट्रवाद की मिथ्या अवधारणा है। चूंकि राष्ट्रवाद के मुद्दे पर लोगों को भ्रमित करना है और भूमंडलीकरण के नाम पर देश के संसाधनों को कॉरपोरेट्स के हाथ में कब्जा दिलाना है इसलिए जरूरी है कि राष्ट्रवाद की नई परिभाषा प्रचारित की जाए। राष्ट्र के भीतर मानवतावादी] विविधतापूर्ण] संस्कृति का सम्मान करना] राष्ट्र के अंदर मानव संसाधन की पूंजी का बेहतरीन इस्तेमाल करते हुए राष्ट्र को ताकतवर करने के बजाय राष्ट्र के भीतर के मानवबल] मानव प्रतिभा को नजरअंदाज कर चंद धनिकों को ताकतवर करना राष्ट्रवाद नहीं है। देश के भीतर और देश की सीमा पर सैन्य शक्ति से बंदूक का शासन कायम करना राष्ट्रवाद नहीं है। उपभोक्तावादी बाजार के लिए चीन और पाकिस्तान के साथ व्यापार बढ़ाने में उन्हें खुशी है पर राष्ट्र की साझी संस्कूति को पाकिस्तान की संस्कूति से जोड़ने में इन्हें खतरा महसूस होता है। 

सवाल आम आदमी पार्टी से चुनाव लड़ना क्या आपकी चूक थी\ आपके पास पहले कभी चुनाव लड़ने का प्रस्ताव नहीं था\ 

हां] मैं मानती हूं कि आम आदमी पार्टी से चुनाव लड़ना मेरी चूक थी। चूक का मतलब यह नहीं कि मैंने कोई अपराध कर दिया पर आंदोलनों की शक्ति को चुनाव में लगाने से आंदोलन की ऊर्जा का अपव्यय होता है। मेरे पास २००० से पूर्व कांग्रेस ने मध्य प्रदेश से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया था। अगर सांसद बनना ही मेरे जीवन का उद्देश्य होता तो मुझे कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहिए था। मुंबई से चुनाव लड़ते हुए मेरा मुंबई के स्लम इलाके के मुद्दे से मोह जुड़ा था। मुझे लगता था कि हम चुनाव हार भी गए तो झुग्गियों का मुद्दा राजनीतिक मुद्दा तो बन जाएगा। लेकिन मुझे चुनाव के मैदान में कूदकर और बाहर निकलकर यह मालूम चला है कि चुनावी मुद्दे चुनाव के बाद राजनीतिक मुद्दे नहीं बन पाते हैं। अपने आंदोलन के साथियों की राय से मैंने चुनाव लड़ने का फैसला किया था। राजनीति और जनांदोलनों के हिस्सेदार साथी प्रशांत जी और योगेंद्र जी ^आम आदमी पार्टी^ से उस तरह नहीं जुड़े होते तो शायद मैं भी चुनाव मैदान में उतरने का फैसला नहीं करती। मुझे लगा कि स्पर्धा में शामिल होकर हम अपने मानवीय और नैतिक मूल्यों की सीमित ताकत को बचा कर नहीं रख सकते। दलीय एवं चुनावी राजनीति को आधार मानकर टिकने से मुझे लगा कि हमारी जड़ें खत्म हो सकती हैं। आम आदमी पार्टी की पूरी प्रक्रिया इस तरह चलाई जा रही थी] जिसमें मुझे लोकतांत्रिक संवाद की प्रक्रिया नहीं दिखी। मुझे उनके नेतृत्व में एक तरह की अपरिपक्वता और सत्ता केंद्रित अवसरवादिता ज्यादा प्रबल दिखी। जनांदोलनों के मुद्दे पर वे समर्थक की भूमिका में आ सकते हैं। ऐसा तो लालू-नीतीश] दिग्विजय सिंह भी करते रहे हैं। प्रशांत भूषण और योगेंद्र जी ने जिस संगठन को विचारधारा और नैतिक मूल्यों की बुनियाद पर खड़ा करने की कोशिश की थी] उस संगठन से अपने दोनों साथियों के साथ अपमानजनक बर्ताव मुझे अपने आत्म सम्मान पर झटका लगा था और एक पल के लिए भी मुझे वहां टिकना मुमकिन नहीं था। जनांदोलनों के भीतर से निकले जनलोकपाल के मसौदे को स्वीकार करना उनके लिए जरूरी था पर सत्ता के अवसरवाद ने उन्हें धन-लोकपाल का रास्ता दिखा दिया।     

आपके बारे में आरोप है कि आप नर्मदा के मुद्दे पर सड़क से लेकर संसद तक वामपंथियों का समर्थन लेती हैं पर उनके पक्ष में चुनाव के मैदान में खुला प्रचार नहीं करती हैं\ क्या आपका गांधीवादी हठयोग आपको वामपंथियों से दूरी रखने की चेतावनी देता है\

वाम की जो सैद्धांतिक परिभाषा होती है] उसके आधार पर हम भी केंद्रीय सत्ता के वाम वाजू में ही हैं पर हमारी आइडियोलॉजी जनतांत्रिक समाजवादी है। वामपंथी विचारधारा एक बात है और वाममोर्चें में हर समय साथ देना दूसरी बात है। वाममोर्चें के लोकतांत्रिक la?kर्ष में तो हम हर हमेशा साथ रहते ही हैं। सत्ता में होते हुए जब उनसे कोई चूक होती है तो जनता के साथ खड़ा होकर उनकी चूक पर अंगुली रखना भी जरूरी होता है। वे हमारे प्रतिस्पर्धी नहीं हैं] न ही कभी थे। विकास के मॉडल और वर्ग के अलावा जातियों के विभाजन को उनकी स्वीकूति] उनकी विचारधारा के विपरीत है] बावजूद हमारी आपसदारी कायम है। चुनाव के प्रचार में जनांदोलनों की भूमिका को तटस्थ रखने की स्थिति की वजह से हमने उनके पक्ष में चुनावी प्रचार नहीं किया] पर चुनाव के मैदान में उनके साथ खुले समर्थन की बजाय नैतिक समर्थन तो रहा ही है। निर्दलीय और गैर संसदीय शक्तियों की ताकत को खत्म करने की राज्य शक्ति की कोशिशों के विरुद्ध जनांदोलनों के जन की शक्ति को कायम रखना भी वाममोर्चें की जनवादी ताकत को मजबूती प्रदान करता है। 

आप पूंजीवाद-फासीवाद के रिश्तों के साहचर्य को किस तरह देखती हैं\  

पैसों की ताकत से मनुष्य और रिश्ते को बाजार में आजमाते हैं तो यहां बाजार का निर्णय हावी होता है। बाजार की स्पर्धा में प्राकूतिक पूंजी और मेहनतकशों के मानवश्रम को दबाकर एक तरह की मुनाफाखोरी की इच्छा शक्ति के साथ राजनीतिक सत्ता हासिल करने की होड़ में पूंजीवाद आगे बढ़ता है तो इसी बुनियाद पर फासीवाद खड़ा होता है। फासीवाद केवल पूंजीवाद से नहीं आता है। धर्मवाद] जातिवाद] संप्रदायवाद अलग-अलग मुद्दों को आधार बनाकर] लोकतांत्रिक ताकतों को खारिज कर नई व्यवस्था को स्थापित करना फासीवाद को ताकतवर करता है। ब्राह्मणवादी शक्तियों का सामंतवाद भी फासीवाद ही था। आज फासीवाद को मजबूत करने के लिए फिर से ब्राह्मणवाद को प्रबल किया जा रहा है।   

देश के बुद्धिजीवियों और मीडिया से आपकी क्या अपेक्षा है\ 

उपेंद्र बख्शी] प्रभाष जोशी] कमलेश्वर सहित देश के कई प्रबुद्ध बुद्धिजीवी नर्मदा बचाओ आंदोलन के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट में विस्थापितों के पक्ष में याचिकाकर्ता थे। प्रभाष जी की आंदोलन संबंधी] विकास संबंधी मीडिया संबंधी जो विचारधारा थी] वह विचारधारा ही हमारे देश से खत्म होती जा रही है। बावजूद हम देश के प्रबुद्ध जनों को आगाह करना चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी की जाे तानाशाही आज दिख रही है] उसी तानाशाही में नर्मदा में जबरन डूब लाई जा रही है। मोदी जी की अर्थनीति] विकासनीति और राजनीति को चुनौती देने के लिए सरदार सरोवर के विस्थापन से बेहतर दूसरा कोई मॉडल नहीं हो सकता है। हम अभी ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि अगर वे अगले वर्ष दिल्ली में सरदार सरोवर महोत्सव आयोजित करें तो आप भूल नहीं जाएंगे कि इस महोत्सव की बुनियाद में नर्मदा ?kkVh के ५० हजार आदिवासी किसान-मजदूर परिवारों की जलहत्या शामिल है।  

 

 

 
         
 
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