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संवाद 1
 
^प्रतिभा को नजरअंदाज कर चंद धनिकों को ताकतवर करना राष्ट्रवाद नहीं^

नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर से पुष्पराज की बातचीत

सरदार सरोवर विकास परियोजना पर १९८३ में ४२०० करोड़ मात्र की लागत अनुमानित थी जो ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में ७० हजार करोड़ और इस वर्ष के आकलन के अनुसार ९० हजार करोड़ पहुंच चुकी है। बड़े कमांड क्षेत्र को सिंचित करने का लक्ष्य अधूरा है। १८ लाख हेक्टेयर क्षेत्र के सिंचित होने के दावे के विपरीत मात्र ढाई लाख हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई हो पाई। अभी सौराष्ट्र और कच्छ तक पानी हकीकत में नहीं विज्ञापनों में ही पहुंचा है। यह विचित्र है कि सरदार सरोवर के कुल जलाशय का २० फीसदी ही सिंचाई के कार्य में इस्तेमाल हो रहा है। गुजरात ने जिन प्यासे गांवों को पानी देने का वादा किया था] वे अब तक प्यासे हैं

आपका जन्म आजादी के बाद हुआ तो आजाद भारत का भविष्य सामने था। आपने अपने साथ भारतीय लोकतंत्र को जवान होते देखा है। वह दौर किस तरह का था 

बचपन में २ कमरे के छोटे से ?kj में सुबह -शाम मजदूरों की मीटिंग होती रहती थी। पिता वसंत खानोलकर और मां इन्दु खानोलकर दोनों ने अलग तरह का जीवन चुना था। उन्होंने अंतर्जातीय विवाह किया था। पिता पूरी तरह नास्तिक थे। मां आस्तिक और धार्मिक हैं पर ?kj में कभी सत्यनारायण की पूजा नहीं होती थी। पिता केमिकल इंडस्ट्रीज से जुड़े कामगारों के ट्रेड यूनियन लीडर थे। नौकरी भी करते थे पर गृहस्थी मां ही चलाती थीं। मां डाक?kj से सरकारी वेतन उठाती थीं। पिता महाराष्ट्र हिंदू मजदूर सभा के अध्यक्ष और काफी दिनों तक कॉरपोरेशन में नगर सेवक रहे। पिता के पूर्णकालिक ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता होने की वजह से गृहस्थी मां चलाती रहीं तो परिवार पुरुष प्रधान नहीं रह गया था। मृणाल गोरे] पन्नालाल खुराना सहित कई बड़े समाजवादी नेताओं का मेरे ?kj आना-जाना लगा रहता था। मृणाल गोरे को मैं मौसी कहती थी। कहती क्या थी] मौसी से ज्यादा ही थीं। राष्ट्रसेवा दल एक ऐसा संगठन है] जिसकी स्थापना राष्ट्रीय स्वयं la?k के समानांतर धर्मनिरपेक्षता की संस्कूति के साथ समाजसेवा और नैतिक शक्ति को समाज में प्रतिष्ठित कराने के उद्देश्य से हुई थी। मैं राष्ट्रसेवा दल के शिविरों में लगातार मुंबई की बस्तियों और मुंबई से दूर के गांव-गिरांव जाती रहती थी। उन शिविरों में कूषि कार्य से लेकर] सफाई] कुआं खोदना] तालाब खोदना] बीमारों की सेवा] सरीखे हर तरह के कार्य शामिल थे। पिता प्रजा समाजवादी दल से चुनाव लड़ते थे। झोपड़ी उनका सिर्फ चुनाव चिह्न ही नहीं थी उनके उद्देश्य में झोपड़ी शामिल थी। ?kj के माहौल में जात-पात] धर्म] ईश्वर] पूजा-पाठ के आधार पर कुछ भी तय नहीं होता था। हम मुंबई में जन्मे जरूर थे पर हमारी दुनिया मुंबई से अलग की दुनिया थी। हमारे चारों तरफ अलग किस्म की हवा बहती थी। देश-दुनिया की ?kVukvksa पर जैसी चर्चा आज चैनलों में होती है] उससे ज्यादा उम्दा तरीके से मेरे ?kj में होती रहती थी। मुझे याद है कि हमारे मुंबई में समाजवादियों के बीच ^^शहर छोड़ो] गांव चलो^^ का नारा ७० की दशक में चर्चित हो रहा था। जाहिर है कि मुंबई में जन्म लेकर भी हम मुंबई से चमत्कूत तो नहीं थे। एक दूसरी मुंबई हमारे जेहन में थी। मुंबई के भीतर की बस्तियां जहां बेशुमार तकलीफें थीं] महाराष्ट्र के गांव के खेतिहर किसान जो तब आत्महत्याएं नहीं कर रहे थे पर शोषण से कराह रहे थे। मैं कह सकती हूं कि माता-पिता की प्रेरणा ही थी कि वंचितों की तकलीफ से ज्यादा तकलीफ महसूस होती थी। खुलगे बाई मेरी शिक्षिका थीं] मुझसे स्पर्धाओं में मुद्दों पर संवाद कराती थीं। मणिपुरी नृत्य सीखने में ४ वर्ष लगाए थे। मां आरसी ¼आईने½ के सामने खड़े होकर आत्मबल और दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ भाषण करना सिखाती थीं। ?kj में गहने] चमकदार वस्त्रों] ठाठ-बाट] संपत्ति सृजन का महत्व नहीं था तो व्यक्तित्व निर्माण और नैतिक बल के साथ अनुशासित जीवनशैली का विकास पहली प्राथमिकता थी। उस पारिवारिक विरासत से प्राप्त समझ से ही मैं नर्मदा बचाओ आंदोलन से लेकर नेशनल एलायंस ऑफ पीपुल्स मूवमेंट की तरफ प्रेरित होती रही। पिता अक्सर कहते थे-हम तो ^संगठित क्षेत्र में काम करते रह गए पर असंगठित क्षेत्र में कार्य करने की ज्यादा जरूरत है।^ 

जब आपने नर्मदा बचाओ आंदोलन की नींव रखी थी तो आपकी उम्र ३१ वर्ष थी। एक युवती जिसे अभी अपनी पढ़ाई पूरी करनी थी। आपका पूरा करियर आपके सामने था। आपको कभी लगता है कि आंदोलन में कूदकर कोई गलत निर्णय ले लिया 

मैंने कभी मुड़कर सोचा नहीं कि क्या कोई गलती हो गई। चलो] अभी सोच लेती हूं। १९८५ में शुरू हुए आंदोलन की ताकत से १९९० में विश्व बैंक को ललकारना आसान नहीं था। मैं तो समझती हूं] मैंने ?kj से लेकर अकादमिक शिक्षा से जो हासिल किया था] उसका सरदार सरोवर के मसले को समझने में बेहतर उपयोग किया। विकास के नाम पर त्राहिमाम] सत्यानाश सिर्फ कहने से नहीं होगा] प्रमाणित किया। मैंने सिर्फ अपनी ताकत से नहीं] हिमांशु ठक्कर] संजय संगवई] डॉ बीडी शर्मा जैसे कितने लोगों ने अपने विवेक] अपनी इच्छा शक्ति से मुझे बल प्रदान किया।  

नर्मदा बचाओ आंदोलन की नींव में आपका दाम्पत्य भी पीछे छूट गया 

इस समय दांपत्य पर क्या चर्चा करना। यह सब क्या चर्चा का विषय है। लेकिन मुझे लगता है कि गृहस्थी में रहते हुए आंदोलन में पूर्णकालिक जीवन संभव नहीं था इसलिए आंदोलन की नींव में अगर कुछ पीछे छूट गया] तो इस पर क्यों मलाल करना। शादी करना] शादी ना करना या दाम्पत्य में होना या ना होना] वैसा मसला नहीं] जिस पर चर्चा करने के लिए आंदोलन पर जारी चर्चा को प्रभावित किया जाए।  

नर्मदा बचाओ आंदोलन की शुरुआत ही टकराहट से हुई। सरदार सरोवर को गुजरात के विकास का प्रतीक ?kksf"kr किया गया तो जाहिर है कि उस विकास का विरोध कर रहे आंदोलन को गुजरात का विरोधी बताया जाए।

हमने बाबा आम्टे के नेतृत्व में जब निमाड़ पहाड़ के पाटीदार और आदिवासियों को साथ लेकर १९९० में फेडकुआ सत्याग्रह का एलान किया था तो मालूम नहीं था कि गुजरात के मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल हमारी ^जन विकास la?kर्ष यात्रा^ को रोकने के लिए राज्यसत्ता की सारी ताकत को हमारे सामने खड़ा कर देंगे। हमारी यात्रा के जबाव में गुजरात में भी यात्रा का एलान कर दिया गया था। दरअसल हमलोग सरदार सरोवर को दिल्ली-मुंबई की बजाए सीधे कार्यस्थल पर जाकर रोकना चाहते थे। हमने ऐसा फैसला तब लिया था] जब सरदार सरोवर परियोजना की व्यापक समीक्षा के लिए केंद्र सरकार एवं गुजरात-मध्य प्रदेश] महाराष्ट्र की राज्य सरकारों से हम निराश हो चुके थे। २०० किमी की यात्रा तय कर जब हम गुजरात की सीमा पर पहुंचे तो गुजरात की तरफ से बांध समर्थकों की ^शांति यात्रा^ हमारी तरफ बढ़ रही थी। निमाड़-पहाड़ के हजारों आंदोलनकारियों के साथ दिल्ली] नासिक] पूना] मुंबई] रायपुर सहित देश और देश के बाहर से आए कुल २० हजार से ज्यादा समर्थक हमारे साथ सरदार सरोवर की तरफ आगे बढ़ रहे थे। हम नारे लगा रहे थे - ^^हिंदी मराठी या गुजराती % डूबने वाले एक ही जाति^^ ^^सरदार सरोवर धोखा है] धक्का मारो मौका है^^। बांध समर्थकों की संख्या काफी कम थी पर उनके पास काफी संसाधन मौजूद थे। बांध समर्थकों की देखभाल के लिए पूरी राज्य मशीनरी शामिल थी। निरमा उद्योग के मालिक बढ़-चढ़कर रैली का इंतजाम संभाल रहे थे। निरमा के स्वामी ने धमकी दी थी - हम बाबा को निरमा से धो देंगे। गुजरात के मुख्यमंत्री हेलीकॉप्टर से बांध समर्थकों का उत्साहवर्धन कर रहे थे। हमें गुजरात की सीमा से ५० मीटर की दूरी पर जबरन रोक दिया गया। हमने देवराम माई] लक्ष्मी बहन] खाजा भाऊ सहित छः साथियों के साथ अनशन शुरू कर दिया। हमने २१ दिनों तक अनशन के बाद फेडकुआ सत्याग्रह समाप्त किया था। फेडकुआ से लौटते हुए डॉ बीडी शर्मा ने नारा दिया था ^^मावा नाटे] मावा राज^^ ¼हमारा गांव में हमारा राज½। फेडकुआ सत्याग्रह में ठीक है कि हमें सरदार सरोवर तक पहुंचने से रोक दिया गया पर हमारे सत्याग्रह की आवाज तो देश-दुनिया तक पहुंची। उपवास-सत्याग्रह का हमारा लक्ष्य ही होता है - विरोधी के विवेक को जागृत करना। हमने देखा कि गुजरात की जनता तक इस लंबे la?kर्ष से हमारा संदेश पहुंचा। सत्ता ने नर्मदा बचाओ आंदोलन को अपना विरोधी-शत्रु जरूर ?kksf"kr कर दिया था पर गुजरात की जनता हमारे सत्याग्रह का संदेश समझ चुकी थी। 

सरदार सरोवर से जब सबसे बड़ी डूब] सबसे बड़ी बर्बादी] सबसे ज्यादा विस्थापन मध्य प्रदेश का है तो वहां की राजनीति में सरदार सरोवर बड़ा मुद्दा क्यों नहीं बना 

अर्जुन सिंह] जब दुबारा मुख्यमंत्री हुए तो उन्होंने कहा था कि सरदार सरोवर को मंजूरी देकर बड़ी भूल हुई है। मध्य प्रदेश में उस समय जनla?k और कांग्रेस दोनों सरदार सरोवर के खिलाफ सड़क पर उतरे थे। सरदार सरोवर राज्य के विरुद्ध है] यह बात तो १९६९ से १९७९ तक मध्य प्रदेश में पक्ष-विपक्ष एक साथ कहते रहे। तीनों राज्यों में नर्मदा के मसले पर विवाद की वजह से केंद्र सरकार ने नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण गठित किया था। इस न्यायाधिकरण ने राज्यों के आपसी विवाद समाप्त कराने की बजाय लोगों के जीवन के मुद्दे को प्राथमिकता नहीं दी। अर्जुन सिंह] शंकर दयाल शर्मा दोनों सरदार सरोवर के विरुद्ध थे। गुजरात में कच्छ के लोगों का भी कहना था कि सरदार सरोवर धोखा है। दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री होते हुए सदन से सरदार सरोवर को रोकने के मुद्दे पर सर्वदलीय प्रस्ताव पारित कराकर केंद्र सरकार से राज्य का विरोध प्रकट किया था। + + +  

नर्मदा बचाओ आंदाेलन ने सरदार सरोवर को राजनीतिक मुद्दा क्यों नहीं बनाया मध्य प्रदेश की बर्बादी की कीमत पर गुजरात का विकास क्यों इस तरह के भावनात्मक मुद्दे ज्यादा प्रभावी हो सकते थे

मध्य प्रदेश के राजनीतिक दल और राजनेता भी कहां जानते थे कि सरदार सरोवर से इतनी बड़ी बर्बादी होगी। सरदार सरोवर से होने वाले पर्यावरणीय प्रभाव विस्थापन] जंगलों का विनाश] ऐतिहासिक स्थलों का विनाश- यह सब तो नर्मदा बचाओ आंदोलन की अध्ययन प्रक्रिया से जुड़े रहने से स्पष्ट हुआ। एक तरफ निमाड़ से पहाड़ तक एक-एक गांव के एक-एक लोगों को विकास के साथ जुड़े विनाश के छद्म से अवगत कराना] दूसरी तरफ एक-एक तिनके से स्थानीय सभ्यता- संस्कूति को जानने की कोशिश करना। पूरी दुनिया में पर्यावरण और विस्थापन के मुद्दे पर हो रहे अध्ययन प्रक्रिया के साथ नर्मदा ?kkVh के एक-एक मुद्दों को समझने की कोशिश करना। हम जब एक निष्कर्ष पर पहुंचते हैं तो उस निष्कर्ष से एक नागरिक से लेकर एक राजनेता तक को वाकिफ करा सकते हैं। हम समस्या की पड़ताल] समस्या की भयावहता को जानने की कोशिश करते हुए] दूसरों को जागृत कर सकते थे पर शायद आंदोलन से यह संभव नहीं था कि आंदोलन मुद्दों की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी तैयार करे। हमने नैतिकता के आधार पर मध्य प्रदेश की बर्बादी की शर्त पर गुजरात का विकास क्यों जैसे भावनात्मक नारे अपनी तरफ से नहीं उछाले पर अब ऐसा लगता है कि मध्य प्रदेश की राजनीतिक पार्टियां अगर इस तरह के मुद्दे उछालें तो बुरा क्या है ^^डूबते को तिनके का सहारा ही सही^^ + + + 

१९९५ में सरदार सरोवर रुक गया तो आपने अपनी शक्ति एनरॉन में लगा दी। क्या इससे आंदोलन से केंद्रित शक्ति में बिखराव आ गया

सरदार सरोवर परियोजना से विश्व बैंक को भगाने के लिए जिस तरह मजबूर किया गया था] उसमें नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथ जुटे देश भर के समर्थक समूह की शक्ति थी। इस राष्ट्रीय समर्थन समूह के साथ १९९२ में नेशनल एलायंस फॉर पीपुल्स मूवमेंट ¼आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय½ गठित हुआ। एनएपीएम ने ४ अप्रैल] १९९३ को एनरॉन के खिलाफ la?kर्ष का फैसला लिया। नर्मदा बचाओ आंदोलन और एनरॉन विरोधी आंदोलन विकास का मसला अलग-अलग होते हुए भी ज्यादा अलग नहीं था कि दोनों विकास के नाम पर विनाश के बुनियाद पर टिके थे। हम ^^कोंकण विकास यात्रा^^ लेकर मुंबई पहुंचे थे तो हमारे स्वागत के लिए मुंबई पुलिस सामने खड़ी थी। हमारी गिरफ्तारी- पिटाई हुई। हमारे साथ ८० से ज्यादा साथी गिरफ्तार हुए थे। महिलाओं पर पुलिस का दमनचक्र उस भाजपा-शिवसेना सरकार के असली चरित्र से हमारा साक्षात्कार था] जो भाजपा-शिवसेना एनरॉन को समुद्र में फेंकने का नारा देकर सत्ता में आई थी। परियोजना बहुराष्ट्रीय होते हुए भी अगर एनरॉन जैसी विवादास्पद हो तो उसके खिलाफ la?kर्ष होना मुश्किल नहीं है। हम यूं ही एनरॉन के विरुद्ध नहीं खड़े हुए थे। १९९० में न्यू मैक्सिको में एनरॉन को प्रदूषण फैलाने के आरोप में पौने ४ लाख डॉलर और प्रदूषण की भरपाई के लिए ६०० करोड़ डॉलर जुर्माना भरना पड़ा था। १९९२ ई में मैक्सिको में ही एनरॉन को जल प्रदूषित करने के लिए १]२५]०० करोड़ डॉलर का जुर्माना किया गया। इस कंपनी को द्घूसखोरी] भ्रष्टाचार सहित कई मामलों में अमेरिकी अदालत में सजा मिली थी। हमारा एक विरोध यह भी था कि एनरॉन का इतना खराब रिकॉर्ड होने के बावजूद उसे किसी टेंडर के बिना क्यों बुलाया गया। एनरॉन] वेक्टेल और जनरल इलेक्ट्रिक सहित ९ कंपनियों के सहयोग से बने दाभोल परियोजना के लिए पर्यावरण की जितनी बड़ी बर्बादी होनी थी] उसका हिसाब लगाना मुश्किल था। रत्नागिरी जिला के अंजनबेल] बेलदूर और कातलवाड़ी गांवों की ६००० हेक्टेयर जमीन इस परियोजना से प्रभावित हो रही थी। एनरॉन का विरोध देश के हर क्षेत्र में विकास के नाम पर थोपे जा रहे विनाश] विस्थापन और विषमता के खिलाफ चल रहे राष्ट्रीय la?kर्ष का एक चरम बिंदु था। १९९५ में जब एनरॉन सौदा रद्द हुआ तो एक अंग्रेजी पत्र ने अपने संपादकीय में लिखा था - महाराष्ट्र सरकार द्वारा एनरॉन की दाभोल परियोजना रद्द होने से देश तबाह तो नहीं हो गया] आसमान तो नहीं टूट कर गिर गया। एनरॉन ने धमकी दी थी कि ^^एनरॉन रद्द हुआ] तो विदेशी निवेशकों का भरोसा टूटेगा।^^ हम समझते हैं कि एनरॉन के विरुद्ध la?kर्ष से एनएपीएम के साथ-साथ नर्मदा बचाओ आंदोलन को भी नई दृष्टि मिली। 

सरदार सरोवर से प्रभावित राज्यों में महाराष्ट्र] गुजरात क्या एक तरह आंदोलन के विरुद्ध रहे क्या बांध विरोधी अंतरराष्ट्रीय समर्थन का प्रदेशों की सत्ता-राजनीति पर कोई असर नहीं हुआ।

विश्व बैंक की स्कडर समिति ने साफ कहा था कि सरदार सरोवर से विस्थापितों के पुनर्वास की कोई राजनीतिक इच्छा शक्ति ही नहीं है। चिमनभाई पटेल गुजरात कांग्रेस की स्थानीय राजनीति करते थे। प्रादेशिक राजनीति इतनी भावनात्मक होती है कि ऐसी राजनीति के सामने तर्क-वितर्क] हक-अधिकार] नीति-नैतिकता की कोई बात सुनी नहीं जाती। महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार शुरू से गुजरात का साथ नहीं दे रही थी। केशुभाई पटेल भाजपा से ही थे पर गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो कहा था कि सरदार सरोवर सौराष्ट्र के हित में नहीं है। उन्होंने आंदोलन को ज्यादा परेशान नहीं किया पर चिमनभाई पटेल ने तो हमारे हर रास्ते पर गुजरात में पुलिस को खड़ा कर दिया था। विदेश से आए पत्रकारों को जबरन पुलिस थानों पर रोक लेना] यह आम बात थी। गुजरात के उस दौर में तो मार्क्सवादियों ने भी मेरा समर्थन नहीं किया था। जल नियोजन और विकास की पूरी आवधारणा पर हमने सवाल उठाया था पर इंद्रजीत गुप्ता] गीता मुखर्जी के आलावा बहुत लोग हमारी बात समझ नहीं पाए।  

नर्मदा बचाओ आंदोलन अपने नारे ^^हमला चाहे जितना भी हो] हाथ हमारा नहीं उठेगा^^ पर टिका रहा] बावजूद इस अहिंसक आंदोलन पर भी पुलिस दमन हुए। पुलिस दमन के उस दौर को आप किस तरह याद करती हैं  

छह अप्रैल] १९९० को बड़वानी में शांतिपूर्ण धरने पर द्घुड़सवार दौड़ाए गए थे। मई महीने में अलिराजपुर तहसील में आदिवासी गांवों में पुलिस का कहर टूटा था। २८ दिसंबर] १९९० को हरसूूद दिवस की वर्षगांठ पर कसरावद के आस पास पुलिस कर्फ्यू का माहौल था। रात-बेरात कसराबाद में द्घोड़े दौड़ाना] द्घरों में ?kqldj आंदोलन से अलग होने के लिए लोगों को धमकाना] पीटना आम बात हो गई थी। बच्चे-बूढ़े तक जेलों में बंद कर दिए गए। पुलिस का एसपी रामनिवास धमकाता था - सारी धरती खून से लाल कर दूंगा। बाबा आम्टे की कुटिया के पास पुलिस वाले लाउडस्पीकर से आंदोलन के विरुद्ध अभद्र गालियां देते थे। झाबुआ का कलक्टर राधाकूष्ण जुलवानिया अलिराजपुर क्षेत्र के आदिवासियों पर कहर बरपा रहा था। अंजनवाड़ा में पुलिस की ताकत से शासन सर्वे करना चाह रही थी। आंदोलन ने ^^हम नहीं हटेंगे] बांध नहीं बनने देंगे^^ के संकल्प के साथ ^लोक निवाड़ा^ अभियान चलाया था। ^लोक निवाड़ा^ और ^सर्वे^ साथ- साथ नहीं चल सकते थे। सर्वे कराने आई पुलिस अंजनवाड़ा में आदिवासियों से भिड़ गई। पुलिस उनके ?kj ?kqldj चूल्हा तोड़ने] अनाज नष्ट करने] धुनाई-पिटाई करने लगीे तो लोगों ने पुलिस का शिविर उजाड़ दिया। पुलिस ने आदिवासियों पर बर्बर तरीके से लाठी चलाई] जिसमें दो सौ लोग जख्मी हुए। पुलिस की गोली से १८ वर्षीय रेहमल पुन्या बसावे शहीद हुआ। इसी तरह मणिबेली में भी पुलिस ने लोगों पर जबरन मणिबेली खाली करने के लिए जुल्म ढाया था। अंजनवाड़ा में हुए पुलिसिया अत्याचार पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दिया तो जल संसाधन मंत्री विद्याचरण शुक्ल की आवाज बंद हुई थी इसलिए कि उनके द्वारा गठित समिति ने मणिबेली में पुलिस अत्याचार की किसी द्घटना से इंकार कर दिया था। 

सरदार सरोवर सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ५ वर्ष तो रुका रहा पर २००० में पुनर्वास की शर्त पर बांध बढ़ाने का आदेश दिया तो क्या आंदोलन को झटका लगा। बांध का विरोध पुनर्वास की शर्त पर रुक गया क्या आपने ^^कोई नहीं हटेगा] बांध नहीं बढ़ेगा^^ का नारा भी बदला

इस तरह के अदालती निर्णय से तत्काल हमें इंसान के तौर पर झटका जरूर महसूस होता है पर जब हम आंदोलन के लिए la?kर्षरत होते हैं] तो झटके क्या हर तरह के हमले झेलने के लिए हम मानसिक तौर से तैयार होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ५ वर्ष बाद बांध निर्माण को हरी झंडी दिखा दी तो हमने समझौता कहां किया बांध विरोध का हमारा आंदोलन आज भी जारी है। हमारे नारे कभी नहीं बदले। नारे आंदोलन के प्राण होते हैं। हम नारे क्यों बदल देंगे। हमारे पास पुनर्वास स्वीकार करने के अलावा विकल्प ही क्या था लेकिन नर्मदा ?kkVh में अभी भी हजारों-हजार परिवारों ने सशर्त पुनर्वास की शर्त ¼जमीन के बदले जमीन½ के आधार पर पुनर्वास पैकेज को हाथ नहीं लगाया है। हमने २००६ के दिल्ली अनशन से तत्काल जीत नहीं हासिल की थी पर १२२ मीटर पर हमने ८ वर्षों तक बांध निर्माण को ^^पुनर्वास ना होने तक निर्माण कार्य हरगिज नहीं^^ की शर्त पर सुप्रीम कोर्ट से बांध को रोक कर तो रखा। ^^बड़े बांध धोखा है] विनाशकारी है^^ इस मुद्दे से ही हमारी लड़ाई शुरू हुई थी और इसी मुद्दे पर हमारी लड़ाई टिकी हुई है।

गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में आपने क्या नरेंद्र मोदी से सरदार सरोवर के मुद्दे पर कभी संवाद किया था 

la?k के प्रतिष्ठित सिद्धांतकार गोविंदाचार्य हमारी ?kkVh में भी विस्थापितों के हालत देखने आए थे। वे गुजरात में थे तो उन्होंने कहा था कि आप एक आदमी को समझा लीजिए तो उसका बहुत असर होगा। उस समय नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री नहीं हुए थे। उनके मुख्यमंत्री होने के बाद हमने आंदोलन की ओर से कई बार उन्हें पत्र लिखे। कभी उनकी ओर से कोई प्रत्युत्तर नहीं आया। मुख्यमंत्री के रूप में २००६ में नरेंद्र मोदी जी हमारे आमने-सामने भी आए जब जंतर-मंतर में जारी हमारे २२ दिनों के अनशन के विरुद्ध उन्होंने गुजरात में ५१ द्घंटे का अनशन किया था। मीडिया ने उस समय उनके अनशन को फाइवस्टार अनशन कहा था। मुख्यमंत्री के रूप में दिग्विजय सिंह संवाद करते थे। उनके मुख्य सचिव शरद चंद्र बेहार को तो गुजरात सरकार एनबीए एक्टिविस्ट कहकर बदनाम करती थी।

नर्मदा बचाओ आंदोलन] बांध विरोध] पुनर्वास के साथ- साथ इन दिनों भ्रष्टाचार से भी मुठभेड़ कर रहा है। आपने नर्मदा क्षेत्र में भ्रष्टाचार को किस तरह चुनौती दी है 

हर विकास परियोजना में भ्रष्टाचार द्घोटाला होता है। मुझे तो लगता है कि भ्रष्टाचार] द्घोटालों के लिए ही विकास परियोजनाओं की परिकल्पना तैयार की जाती है। मध्य प्रदेश में पुनर्वास के लिए सरकार के पास जमीन नहीं है तो जमीन कागज पर गढ़ना मुमकिन तो नहीं है। आशीष मंडलोई] रणवीर भाई] देवेंद्र भाई ने ^^जमीन नहीं है] तो रजिस्ट्री किस तरह^^ को आधार बनाकर सूचना के अधिकार से फर्जी रजिस्ट्रियों की सूची निकाली। आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों पर ६७ फर्जी रजिस्ट्री तो हमारे इन कार्यकर्ताओं ने प्रमाणित कर दिए] जिसे सरकार ने भी स्वीकार किया था। हमारे इन साक्ष्यों के आधार पर जबलपुर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एके पटनायक ने २००८ में फर्जी रजिस्ट्री और पुनर्वास स्थल पर हुए निर्माण कार्य में लूट की जांच के लिए अवकाश प्राप्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसएस झा के नेतृत्व में ^झा आयोग^^ गठित किया। ७ साल तक चली जांच प्रक्रिया के बाद १८ फरवरी] २०१६ को झा कमीशन ने अपनी रिपोर्ट कोर्ट में सुपुर्द कर दी है। मध्य प्रदेश सरकार ने झा कमीशन की जांच रिपोर्ट को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला किया है। सरकार की आपत्ति की वजह से झा कमीशन की रिपोर्ट की हकीकत स्पष्ट नहीं हुई है] लेकिन झा कमीशन ने अपने प्रगति प्रतिवेदन में कहा था कि ज्यादातर रजिस्ट्री फर्जी है। इस आधार पर हम लोगों का आकलन है कि इस फर्जी रजिस्ट्री द्घोटोले में १००० करोड़ रुपए से ज्यादा का भ्रष्टाचार उजागर होगा।

सरदार सरोवर के डूब क्षेत्र में अभी कितने विस्थापित पुनर्वास से वंचित हैं कितने लोगों को पुनर्वास हक प्राप्त हुआ है 

भारत में पहली बार किसी विकास परियोजना में इतनी बड़ी तादाद में अपनी शर्तों के साथ पुनर्वास प्राप्त हुआ है। महाराष्ट्र और गुजरात में अब तक कुल १४ हजार परिवारों को जमीन के बदले जमीन का हक प्राप्त हुआ है। महाराष्ट्र में ४ हजार परिवारों को आदर्श पुनर्वास प्राप्त हुआ है। गुजरात में ९० फीसदी विस्थापितों को पुनर्वास प्राप्त हुआ है। मध्य प्रदेश में अब तक सिर्फ ३१ परिवारों को जमीन के बदले जमीन का हक प्राप्त हुआ है। मध्य प्रदेश के डूब क्षेत्र में ५० हजार परिवार निवास कर रहे हैं पर सरकार फाइलों में कह रही है कि सबको पुनर्वास प्राप्त हो गया है। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के डूब क्षेत्रों के विस्थापितों के परिवारों की शिक्षा के लिए आंदोलन के द्वारा जन सहयोग की ताकत पर ९ जीवनशालाएं संचालित हैं। उक्त जीवनशाला का सूत्रवाक्य है- ^^लड़ाई पढ़ाई] साथ-साथ^^। गुजरात से विस्थापितों को एक दशक बाद खदेड़ा जा रहा है। कहा जा रहा है कि १]००० से ज्यादा लाभान्वितों को अपात्रता के आधार पर पुनर्वास मिल गया था। एक दशक बाद उन्हें अपने पुनर्वास स्थल छोड़ने का निर्देश प्राप्त हुआ है। अब वे कहां जाएंगे। मध्य प्रदेश के सैकड़ों विस्थापित गुजरात में प्राप्त जमीन के बंजर होने की वजह से छोड़कर लौट आए हैं। गुजरात में विस्थापितों को जमीन के बदले दी गई। इस जमीन में एक संकट यह भी खड़ा हुआ है कि जो जमीन विस्थापित को दी गई है] उस जमीन का उचित मुआवजा उस जमीन के भू-स्वामी को अब तक प्राप्त नहीं हुआ है। जमीन का मूल स्वामी उचित मुआबजे के बिना दूसरे को अपनी जमीन पर कब्जा करने क्यों देगा गुजरात में विस्थापित- विस्थापित के बीच विचित्र तरह की टकराहट पैदा की गई है।

नरेंद्र मोदी ने पूर्व उपप्रधानमंत्री आडवाणी द्वारा ?kksf"kr भारत की शान सरदार सरोवर के मामले में प्रधानमंत्री बनने के बाद किस तरह की रुचि दिखाई क्या आपने प्रधानमंत्री से अपना पक्ष जताया 

मुख्यमंत्री के रूप में मैं नरेंद्र मोदी के कार्यालय से जिस तरह किसी पत्र का जबाव ना देते हुए संवादहीनता कायम रखी गई थी। उसी तरह की स्थिति प्रधानमंत्री कार्यालय में भी लागू है। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री की शपथ लेने के बाद जो महत्त्वपूर्ण फैसले लिए] उनमें पहला निर्णय यही लिया कि सरदार सरोवर से प्रभावित राज्यों से किसी तरह का परामर्श किए बिना ८ वर्ष से १२२ मीटर की ऊंचाई पर रुके सरदार सरोवर के निर्माण को १३९ मीटर तक बढ़ाने का फैसला लिया। उनके उस फैसले पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने मीडिया से कहा था कि उनसे सहमति तो नहीं ली की गई] उन्हें सूचित भी नहीं किया गया। गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन ने सरदार सरोवर की ऊंचाई बढ़ाने के प्रधानमंत्री के फैसले पर प्रधानमंत्री के प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा] ^^लंबित मामले का त्वरित निपटारा हुआ] अच्छे दिन आ गए।^^ प्रधानमंत्री ने अपने अधिकार का उपयोग करते हुए जिस तरह अपने पराक्रम का परिचय दिया] इससे सुप्रीम कोट के उस निर्देश का mYya?ku हुआ है] जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि ^^पुनर्वास के बिना विस्थापन और बांध का निर्माण कार्य मंजूर नहीं होगा।^^ जाहिर है कि मध्य प्रदेश] महाराष्ट्र और गुजरात सरकारों के अपने ही रिकॉर्ड के अनुसार अभी हजारों परिवारों का पुनर्वास किया जाना बाकी है। 

प्रधानमंत्री ने सरदार सरोवर को अपने लक्ष्य की ऊंचाई प्रदान कर दी तो क्या सरदार सरोवर से ?kksf"kr सिंचाई और विद्युत उत्पादन का लक्ष्य पूरा हो रहा है+ + +

सरदार सरोवर विकास परियोजना पर १९८३ में ४२०० करोड़ मात्र की लागत अनुमानित थी जो ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में ७० हजार करोड़ और इस वर्ष के आकलन के अनुसार ९० हजार करोड़ पहुंच चुकी है। सरदार सरोवर से उत्पादित कुल बिजली में ५६ प्रतिशत मध्य प्रदेश को २७ प्रतिशत महाराष्ट्र को और १७ प्रतिशत गुजरात को वितरित किया जाना है। गुजरात सरकार] मध्य प्रदेश सरकार और महाराष्ट्र को वादानुसार विद्युत आपूर्ति का दावा कर रही है पर मुफ्त में विद्युत आपूर्ति के वादे को पूरा नहीं किया गया। उत्पादन की संरचना पर हुए व्यय में महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से विद्युत आपूर्ति के प्रतिशत की दर से संरचना व्यय वसूला गया। बड़े कमांड क्षेत्र को सिंचित करने का लक्ष्य अधूरा है। १८ लाख हेक्टेयर क्षेत्र के सिंचित होने के दावे के विपरीत मात्र ढाई लाख हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई हो पाई। अभी सौराष्ट्र और कच्छ तक पानी हकीकत में नहीं विज्ञापनों में ही पहुंचा है। यह विचित्र है कि सरदार सरोवर के कुल जलाशय का २० फीसदी ही सिंचाई के कार्य में इस्तेमाल हो रहा है। गुजरात ने जिन प्यासे गांवों को पानी देने का वादा किया था] वे अब तक प्यासे हैं। इंडियन एक्सप्रेस की खबर है कि गुजरात सरकार सानंद में कोकाकोला बॉटलिंग प्लांट के लिए ३० लाख लीटर पानी रोज नर्मदा से आवंटित कर रही है। सूखाग्रस्त इलाके तक पानी पहुंचाने के लिए  सरकार मेन केनाल से जुड़े माइक्रो-केनाल नहीं बना पाई। नहरों का जाल फैलाए बिना सूखे इलाकों तक पानी पहुंचाना मुश्किल होगा। गुजरात सरकार को नहरों का जाल फैलाने के लिए जमीन अधिग्रहण करने की जरूरत है। गुजरात के किसान खुद नहरों का जाल फैलाने के लिए अपनी जमीन देने के लिए तैयार नहीं हैं। + + +

^सरदार सरोवर^ से सिंचाई का लक्ष्य पूरा नहीं हो रहा है तो सरदार सरोवर की ऊंचाई बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री व्याकुल क्यों थे आपने क्या सुप्रीम कोर्ट को उनके ही निर्देशों के mYya?ku का स्मरण कराया 

सरदार सरोवर परियोजना से कोलाकोला के साथ-साथ अडानी] अंबानी की परियोजनाओं को नर्मदा का पानी मिल रहा है। प्रधानमंत्री बनने से पूर्व भी कांग्रेस सरकार पर गुजरात सरकार का दबाव था कि सरदार सरोवर के निर्माण से रोक हटा ली जाए। जयराम रमेश पर बहुत दबाव बनाया गया था। पर्यावरण मंत्रालय ने एटॉर्नी जनरल से राय ली थी तो एटॉर्नी ने कोर्ट की अनुमति के बिना बांध आगे नहीं बढ़ाने की राय दी थी। इस समय प्रधानमंत्री ने जिस तरह राज्य सरकारों को अंधकार में रखा तो उससे ऐसा प्रतीत होता है कि किसी कानूनी प्रक्रिया को पूरा नहीं किया गया। हम सुप्रीम कोर्ट से न्याय की अपेक्षा रखते हैं पर सुप्रीम कोर्ट में अमित शाह ने अपने वकील यूयू ललित को सीधे सुप्रीम कोर्ट का जज बना दिया है तो यूयू ललित नर्मदा मामलों में हमेशा तैनात रहते हैं। बदले हुए हालात में सुप्रीम कोर्ट में सरदार सरोवर के मामले पर सुनवाई का कोर्ट के भीतर माहौल ही नहीं हैं। अब कोर्ट में उनके वकील मुझे बोलने ही नहीं देते हैं।  

प्रधानमंत्री ने सरदार सरोवर की ऊंचाई का लक्ष्य प्रदान करने के बाद सरदार पटेल की सबसे ऊंची मूर्ति सरदार सरोवर बांध पर खड़ा करने का निर्णय लिया+ + +

प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस बांध परियोजना की नींव रखी थी। नेहरू बड़े बांधों को विकास का मंदिर मानते थे। अब सरदार सरोवर अगर विकास का मंदिर ही है तो इस मंदिर में कोई देवता भी चाहिए। सरदार पटेल को विकास मंदिर का विकास देवता ?kksf"kr करने में अगर ३ हजार करोड़ खर्च हो रहा है तो पटेल के जीवनीकार महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी ने सही ही कहा है कि पटेल होते तो आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बहुत निराश होते। मेरा दावा है कि प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट में जिस तरह १८२ मीटर ऊंचे दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा के रूप में ^स्टेच्यू ऑफ यूनिटी^ की द्घोष्ाणा की गई है] वह द्घोषणा पूरी भी हो जाए तो यूनिटी कायम करने में वे कामयाब नहीं हो पाएंगे। राजमोहन गांधी ने सही कहा है] आज सरदार पटेल इस बात से कतई सहमत नहीं होते कि उनके नाम पर खड़ी होने वाली किसी परियोजना में लाखों परिवारों की जलहत्या कर दी जाए। जहां ^स्टेच्यू ऑफ यूनिटी^ खड़ा किया जा रहा है] उस स्थल के चारों तरफ ७०० एकड़ जमीन अधिग्रहित कर पर्यटन केंद्र विकसित करने की योजना है। इस पर्यटन केंद्र के विकास के लिए केवड़िया कॉलोनी] कोठी] वद्घाडिया] लिम्बडी जैसे गांवों पर जमीन अधिग्रहण की तलवार लटक रही है। इन गांवों की जमीन १९६१ में सरदार सरोवर की बुनियाद में अधिग्रहित की गई थी पर मुआवजा अब तक प्राप्त नहीं हुआ है। सरदार तो किसानों के नेता थे। वे इस बात को कतई पसंद नहीं करते कि उनकी मूर्ति को इस तरह खड़ा कर दिया जाए और गांवों के किसानों को पुलिस की ताकत से खदेड़ दिया जाए। जारी + + +

 
         
 
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  • दाताराम चमोली

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