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vad 45 28-04-2018
 
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नजरिया 13
 
lkfgR; से बदलाव की उम्मीद

  • मंगलेश डबराल

कवि एवं संपादक

अन्ना आंदोलन और आप का जन्म आदि जो ?kVuk]a हैं] ये बताती हैं कि जब भी सुपर स्ट्रक्चर के आंदोलन चलते हैं वह कहीं&न &कहीं जाकर विसर्जित हो जाते हैं। अन्ना ने जो आंदोलन शुरू किया] उस समय कितने लोगों को लगता था कि वह एक देशव्यापी आंदोलन होगा] पूरे देश को बदल कर रख देगा। इससे लोगों में संभावनाएं बन गई थीं] लोग शामिल भी हुए। इसने पूंजीपतियों से लेकर आंदोलनकारियों तक को प्रभावित किया। लेकिन आम आदमी पार्टी का जितना व्यापक उदय हुआ है] उतनी ही तेजी से उसका पराभव भी हुआ है। ऐसा हाल हुआ कि अंततः दिल्ली में ही सिमट कर रह गई। कुछ हद तक पंजाब में भी इसका असर रहा है। आज स्थति यह है कि योगेंद्र यादव] प्रशांत भूषण जैसे लोगों का आप से निष्कासन यह बताता है किस तरह अरविंद केजरीवाल इस आंदोलन का अराजनीतिकरण कर रहे हैं। चूंकि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे लोगों की अपनी राजनीतिक विचारधारा है। यह भी दिखता है कि विचारधारा के लोगों को बाहर निकाल कर पार्टी की यह स्थति है कि सिर्फ ऊपरी सतह पर काम कर रहे हैं। पार्टी भ्रष्टाचार] बिजली] पानी जैसे मुद्दों पर ही सिमट कर रह गई है। उनके पास विचारधारा का अभाव है जो सचमुच बदलाव ला सकती है

 

मैं और मेरे हमउम्रों की पीढ़ी जो आजादी के बाद पैदा हुए हैं] उनके लिए नेहरूयुगीन महास्वप्न था। जब हम पढ़ने& लिखने लायक हुए तब तक वह स्वप्न टूट चुका था। इस महास्वप्न के टूटने के बाद मेरी संवेदना विकसित हुई है। यह मोहभंग था। नेहरुयुगीन महास्वप्न से जो मोहभंग की दौड़ है उसने हमारी रचना को आकार दिया है। उसके बाद जो जन आंदोलन शुरू हुआ है] खास कर नेहरु की मृत्यु के बाद उससे इस देश में बहुत से जनसंद्घर्ष शुरू हुए हैं। वो दौर ऐसा था जो बहुत उथल& पुथल से भरा हुआ था। 

देश में डॉ लोहिया का गैर कांग्रेसवाद]नक्सलबाड़ी में जनवादी कांग्रेस का उद्द्घोष और साहित्य में भूखी पीढ़ी] दिगंबर रचियत अनुसंगम तेलुगु] महाराष्ट्र में साहित्य में दलित आंदोलन जो दलित पैंथर के नाम से शुरू हुआ। इस सबसे ऐसा सामजिक राजनीतिक वातावरण निर्मित हुआ जिससे लगता था कोई परिवर्तन होने वाला है। 

यही वो दौर था जब बहुत से लोग शहरों की तरफ आए] खासतौर से युवा वर्ग। उस दौर में बड़ा असंतोष व्याप्त था। पश्चिम बंगाल के विद्यार्थी नक्सलबाड़ी आंदोलन की तरफ आकर्षित हुए। मुंबई में उन दिनों ट्रेड यूनियन सक्रिय हुई। इन सारी चीजों को देखते हुए एक ऐसा माहौल हुआ जिससे परिवर्तन की उम्मीद लग रही थी। देश की राजनीति में प्रमुखता से नक्सलबाड़ी आंदोलन] गैर कांग्रेसवाद जिसका बुद्धिजीवियों पर बहुत असर था] यह एक प्रमुख पड़ाव था। मंडल कमीशन भी एक बहुत बड़ा पड़ाव रहा है] जिसने कम्युनिस्ट आंदोलन को भी पृष्ठभूमि में डालने की कोशिश की। वर्ग की जगह जाति का विमर्श उभर कर सामने आया। 

कभी&कभी ऐतिहासिक परिस्थितियां और संदर्भ भी ऐसे लोगों को नायक बने देते हैं जो अन्यथा नहीं होते। वीपी सिंह भी उसी तरह के नायक बने। इस कोम्मिसिओं को लागू करने से एक नया विमर्श शुरू हुआ खासकर उत्तर भारत में। अयोध्या में बाबरी विध्वंस] राजनीति की एक बहुत बड़ी द्घटना है] जिसने समाज को प्रभावित किया। दक्षिणपंथी] सांप्रदायिक] कट्टरपंथी] विभाजनकारी ताकतों का उदय भी हमारी राजनीति को नाकारात्मक रूप से प्रभावित करने वाली बड़ी द्घटना है। यह ?kVuk]a ऐसी हैं जिन्होंने भारतीय समाज की आत्मा को अच्छे या खराब सांचे में ढाला। इन सबसे एक त्रासदी हुई है कि जनता के पास बस वोट डालने का अधिकार बचा है। जनता को उनके अधिकारों से लगातार वंचित किया जाता रहा है। 

अगर बदलाव के क्षेत्र में आंदोलनों पर चर्चा करें तो पहले के आंदोलन बड़े पैमाने पर राजनीतिक आंदोलन हुआ करते थे। जेपी आंदोलन किसी राजनीतिक आंदोलन के रूप में शुरू नहीं हुआ] लेकिन अंततः उसका रूप राजनीतिक हो गया। जब हम युवा थे तब के आंदोलन राजनीतिक थे। वह आंदोलन किसी पार्टी पॉलिटिक्स में नहीं] बल्कि व्यापक स्तर की राजनीति थी] बड़े पैमाने पर मानवीय राजनीति जो सामाजिक बदलाव के लिए हो।

आज के आंदोलन के स्वरूप को हम देखें तो समाज का अराजनीतिकरण हुआ है। यह बाजारवाद] भूमंडलीकरण] अंतरराष्ट्रीय पूंजी के कारण हुआ है। इसका प्रभाव खासकर युवाओं पर पड़ा है। युवा पीढ़ी को राजनीति से कोई गहरा लगाव नहीं रहा। तो कहा जा सकता है कि वर्तमान दौर के आंदोलनों की हालत खराब है। कोई आंदोलन ऐसा दिखाई नहीं देता जिसे राजनीतिक आंदोलन कहा जा सके।

हमारे देश की राजनीति एक व्यक्तिवादी राजनीति होकर रह गई है। यहां व्यक्ति पूजा होती आई है। चाहे जवाहर लाल नेहरु को ले लीजिए या फिर इंदिरा गांधी को। इंदिरा गांधी से ज्यादा व्यक्तिवादी राजनीति तो कभी हुई ही नहीं है। नरेंद्र मोदी जिस तरह से चुनाव में जीत कर आए हैं वह चुनाव शुद्ध व्यक्तिवादी आधार पर जीता गया है। भारतीय राजनीति से व्यक्तिवाद को हटाना मुश्किल काम है। सिर्फ कम्युनिस्ट आंदोलन ही एक ऐसा रहा है जिसमें व्यक्तिवादी राजनीति की जगह एक सामूहिक नेतृत्व हमारे सामने आया। हमारा मानना है कि आजादी गांधी जी ने दिलाई। लेकिन प्रश्न यह उठता कि क्या यह आजादी सिर्फ गांधी जी ने दिलाई है। कांग्रेस का इतना बड़ा संगठन जो लड़ा था या जो लोग आजादी की लड़ाई में शामिल थे हम उन सब को छोड़कर सिर्फ गांधी जी को ही कहते हैं। इन सब बातों से यह साफ पता चलता है कि यह व्यक्तिपूजा समाज है। सामूहिक राजनीति हमारे समाज में शुरू से ही बिखरती रही है।

अन्ना आंदोलन और आप का जन्म आदि जो ?kVuk]a हैं] ये बताती हैं कि जब भी सुपर स्ट्रक्चर के आंदोलन चलते हैं वह कहीं&न&कहीं जाकर विसर्जित हो जाते हैं। अन्ना ने जो आंदोलन शुरू किया] उस समय कितने लोगों को लगता था कि वह एक देशव्यापी आंदोलन होगा] पूरे देश को बदल कर रख देगा। इससे लोगों में संभावनाएं बन गई थीं] लोग शामिल भी हुए। इसने पूंजीपतियों से लेकर आंदोलनकारियों तक को प्रभावित किया। लेकिन आम आदमी पार्टी का जितना व्यापक उदय हुआ है] उतनी ही तेजी से उसका पराभव भी हुआ है। ऐसा हाल हुआ कि अंततः दिल्ली में ही सिमट कर रह रहे गई। कुछ हद तक पंजाब में भी इसका असर रहा है। आज स्थति यह है कि योगेंद्र यादव] प्रशांत भूषण जैसे लोगों का आप से निष्कासन यह बताता है किस तरह अरविंद केजरीवाल इस आंदोलन का अराजनीतिकरण कर रहे हैं। चूंकि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे लोगों की अपनी राजनीतिक विचारधारा है। यह भी दिखता है कि विचारधारा के लोगों को बाहर निकाल कर पार्टी की यह स्थिति है कि सिर्फ ऊपरी सतह पर काम कर रहे हैं। पार्टी भ्रष्टाचार] बिजली] पानी जैसे मुद्दों पर ही सिमट कर रह गई है। उनके पास विचारधारा का अभाव है जो सचमुच बदलाव ला सकती है।

आंदोलनों ने राजनीति को बहुत प्रभावित किया है। गुजरात का छात्र आंदोलन या फिर बिहार के ही युवा छात्र आंदोलन ने इतना प्रभावित किया है कि इंदिरा गांधी को देश में इमरजेंसी द्घोषित करनी पड़ी। हाल के समय में देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में साहित्यकार और लेखकों के सम्मान वापसी से सरकार ?kcjk उठी। यह इतना प्रभावशाली रहा कि संद्घ परिवार के सदस्यों ने माना कि बिहार चुनाव में भाजपा की हार का यह कारण बना। रोहित वेमुला के आंदोलन ने इतना प्रभावित किया है जिससे मोदी सरकार आशंकित है कि वो अगले चुनाव के लिए दलित वोट खो रही है। रोहित वेमुला विवाद ने दलितों में एक नई राजनीतिक चेतना पैदा कर दी है।

एक आंदोलन लेखक को प्रभावित करता है और लेखन भी आंदोलनों को प्रभावित करता है। हालांकि आम जन आंदोलन के सामने लेखक की हैसियत और ताकत बहुत कम होती है। स्वाधीनता आंदोलन को रवींद्रनाथ ठाकुर के साहित्य ने प्रभावित किया। रेणु के साहित्य का असर बिहार आंदोलन पर पड़ा। लेकिन राजनीतिक आंदोलन के प्रभाव जो होते हैं वो तात्कालिक होते हैं। हो सकता है लेखक का प्रभाव तात्कालिक दिखाई न दे। लेखक के प्रभाव अप्रत्यक्ष होते हैं और हो सकता है कुछ समय तक रहें। हममें जो राजनीतिक चेतना है उस पर प्रेमचंद के साहित्य का प्रभाव नहीं होगा या महादेवी वर्मा ने जो स्त्री विमर्श शुरू किया था उससे आंदोलन पर प्रभाव  नहीं पड़ेगा] निश्चित ही पड़ा है। उनका तात्कालिक असर नहीं हुआ है। हालांकि उसका तात्कालिक असर भी हुआ है जो जनगीत और नुक्कड़ नाटक आदि से होते हैं। इतिहास में देखें तो कम्युनिस्टों ने जन गीत और नुक्कड़ नाटक किए। मजदूरों के आंदोलन के लिए लिखा गया शैलेंद्र का वो गीत ^^हर जोर जुल्म के टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है^^] लंबे समय से मजदूर आंदोलनों में चलता रहा है। बहुत से जनकवियों की रचनाएं जन आंदोलनों में बहुत काम आती रही हैं और उनको प्रभावित करती रही हैं।

आंदोलनों में मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका रही है। स्वाधीनता संग्राम के समय तमाम बड़े नेताओं ने अखबार और पत्रिका निकाली। गांधी जी ने 'हरिजन' निकाला। हमारे बहुत सारे नेता पत्रकारिता से जुड़े रहे। उत्तराखण्ड के 'अल्मोड़ा' अखबार ने कुली बेगार प्रथा के खिलाफ इतना बड़ा आंदोलन चलाया कि अंततः इस प्रथा को खत्म करना पड़ा। इमरजेंसी से पहले इंदिरा गांधी की तानाशाही प्रवृति थी जिसकी आलोचना करने में अखबार आगे रहे] जिसका असर भी हुआ। 

इमरजेंसी लगने पर सबसे पहले प्रेस सेंसरशिप लगाई गई। मीडिया की बहुत भूमिका रही जो आज भी है] मगर दुर्भाग्य है कि आज मीडिया खरीदे हुए गुलामों की तरह व्यवहार करता है। आज मीडिया में अपनी भूमिका को लेकर जो गिरावट आई है वह एक बड़ी nq?kZVuk है।

बात करें अन्ना आंदोलन की तो यह आंदोलन उस वक्त आया जब मीडिया को हमेशा सनसनी की तलाश रहती थी। मीडिया के लिए अन्ना आंदोलन एक सनसनी की तरह था जिससे उसकी टीआरपी बढ़ती। आज जिन नेताओं और प्रतिनिधियों को अपनी जनता के दुःख दर्द सुनने की फुर्सत नहीं है वो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए हमेशा फुर्सत में रहते हैं] जिसका मतलब है कि वो मीडिया की ताकत को जानते हैं।

मौजूदा दौर एक बहुत कठिन दौर है हमारे देश के लिए भी और शायद अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी। इस समय एक कठिनतम और क्रूरतम दौर से दुनिया गुजर रही है। दुनिया में शरणार्थियों की कमी नहीं है। इस समय दुनिया की महाशक्तियां  उन सबको नष्ट करने पर अमादा हैं जहां पर उनकी बात नहीं मानी जा रही] जहां उनका विरोध किया जा रहा है। इस वक्त दुनिया में मार काट मची हुई है। जो भी ताकतवर है अपने से कमजोर को मार रहा है] बर्बाद कर रहा है। हिंदुस्तान की बात करें तो तमाम आदिवासी अपने ही ?kj में विस्थापित हो रहे हैं। उन्हें ?kj से दूर जाने की आवश्यकता भी नहीं] उन्हें ?kj बैठे ही शरणार्थी बना दिया जाता है। बहुत ही कठिन समय है] किसी भी राजनीति दल को मनुष्य के भविष्य की चिंता नहीं है। मौजूदा सत्ताधारी दल जो है वो जरा भी नहीं सोच रहा कि किस तरह अपने उपद्रवी] आतंकी हरकतों और अपनी गुंडई के दम पर हमारे समाज को नष्ट कर रहा है। दलितों] मुस्लिमों और आदिवासियों को लगातार हाशिए पर ढकेला जा रहा है। मुस्लिमों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश हो रही है। यहां तक कि उनसे वोट का अधिकार छीनने की भी बात की जाती है। इन सब चीजों पर कोई अंकुश नहीं है। समाज में सभी प्रकार के लोग रहते हैं और उन पर अंकुश लगाकर ही लोकतंत्र चल सकता है। 

साहित्य इस ओर लगातार इशारा करता रहा है। बाबरी मस्जिद विध्वंस पर जितनी कविताएं लिखी गई वो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। बढ़ती सांप्रदायिकता] असहिष्णुता पर बहुत कविताएं लिखी गई हैं। जरूरत पड़ी तो लेखकों ने हस्तक्षेप भी किया। महाश्वेता देवी] अरुंधती राय जैसे लेखक जब भी लोकतंत्र पर संकट आया खुल कर सामने आए हैं। साहित्य से बदलाव लाने की उम्मीद हम हमेशा करते हैं। समाज में लेखकों और कवियों को एक मार्गदर्शक कहा गया है। कबीर का पूरा जीवन असहिष्णुता के खिलाफ बीत गया।

¼सैयद तहसीन अली से बातचीत पर आधारित½


 
         
 
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वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह से रोविंग एसोसिएट एडिटर गुंजन कुमार की बातचीत 

जेपी के आंदोलन में संपूर्ण क्रांति तो थी। मगर उनका मूल लक्ष्य था दिल्ली में

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